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Showing posts from June, 2023

25. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 25 || चरणदास चोर

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25. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 25 || चरणदास चोर विजयदान देथा राजस्थान के विख्यात लेखक और पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित  विजयदान देथा  (1 सितम्बर 1926 - 10 नवम्बर 2013) जिन्हें  बिज्जी  के नाम से भी जाना था। अपनी मातृ भाषा राजस्थानी भाषा को आदर देने के लिए उन्होंने अन्य किसी भाषा में नहीं लिखा। उनका अधिकतर कार्य उनके एक पुत्र कैलाश कबीर द्वारा हिन्दी में अनुवादित किया। इनका जन्म बोरुंदा-जोधपुर गाँव में 1 सितंबर 1926 को हुआ। वे देथा गोत्र के चारण थे। उनके पिता सबलदान देथा और दादा जुगतिदान देथा भी राजस्थान के जाने-माने कवियों में से थे। 10 नवम्बर 2013  को 87 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।  अनेक प्रसिद्ध कृतियां लिखने वाले विजयदान जी की राजस्थानी लोक कथा पर आधारित एक प्रमुख कृति है चरणदास चोर। आज हम उसी कहानी को संक्षेप में आपको सुनाते हैं।  चरणदास चोर राजस्थान में एक लोककथा प्रचलित है कि बहुत समय पहले राजस्थान में एक चोर चोरी क्या करता था। उसका नाम था चरणदास जब वह बड़ा हुआ तो चरणदास चोर के नाम से मशहूर हुआ।  चरणदास चोर एक चोर की बहुत ही मजेदार...

24. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 24 || जब जज के सामने बिहारी जी की पेशी हुई!

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जब जज के सामने बिहारी जी की पेशी हुई! वृंदावन में एक ही गरीब ब्राह्मण रहता था। वह पूरे दिन ठाकुर जी का नाम जपता रहता था। उसके पास जितना भी धन आता, उसी धन से रूखा-सूखा जो मिलता, उसे भगवान की मर्ज़ी समझकर खुशी-खुशी जीवन व्यतीत कर रहा था।  गरीब आदमी की जरूरतें कब पूरी होती है। एक बार उसे कुछ पैसों की जरूरत पड़ी तो वह पैसे लेने एक साहुकार के पास जा पहुंचा।  वह बोला, "साहूकार जी ! मुझे कुछ पैसों की जरूरत आ पड़ी है । कृपा करके उसे दे देंगे तो मैं हर माह थोड़ा-थोड़ा दे कर चुका दूंगा।" साहुकार ने पैसे देते हुए कहा, "ठीक है, पैसे जल्द ही लौटाने होंगे।"  "क्यों नहीं साहूकार जी ! हर महीने आपको थोड़े थोड़े पैसे भिजवाता रहूंगा।" उसकी बात मानकर ब्राह्मण पैसे लेकर घर आ गया। वह ब्राह्मण हर महीने किश्त के हिसाब से साहुकार के पैसे लौटा रहा था।  आखिरी किश्त के थोड़े दिन से पहले ही साहुकार ने पैसे न लौटाने का कोर्ट का समन पत्र उस ब्राह्मण के घर भिजवा दिया उस समय पत्र में लिखा हुआ था कि उसने जो पैसे साहूकार से उधार लिया था वह समय पर नहीं लौट आया है इसलिए पूरी रकम ब्याज सहित को...

23. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 23 || अक्ल बहादुर : राजस्थानी लोक कथा

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23. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 23 || अक्ल बहादुर : राजस्थानी लोक कथा अक्ल बहादुर : राजस्थानी लोक कथा आज हम आपको जो कहानी सुनाने जा रहे हैं वह कहानी राजस्थानी भाषा की मूर्धन्य साहित्यकार लक्ष्मीकुमारी चूंडावत की राजस्थानी भाषा में लिखी गयी पुस्तक “ कैरे चकवा बात ” में से ली गई है। उन्हें एक अच्छी और सधी हुई लेखिका होने का गौरव प्राप्त है।  हम चाहेंगे कि आपको कहानियां पढ़ने का शौक है तो उनकी पुस्तकें खरीद कर उनकी कहानियां अवश्य पढ़े। लक्ष्मीकुमारी चूंडावत द्वारा राजस्थानी भाषा में लिखी गई कहानी अक्ल बहादुर  का हिंदी रूपांतरण है। जिसे हम आपको सुनाने जा रहे हैं। एक नगर में चार भाई रहते थे। चारों ही अक्ल से बड़े अक्लमंद थे। चारों ही भाई अक्ल के मामले में एक से बढ़कर एक थे। उनकी अक्ल के चर्चे आस-पास के गांवों व नगरों में फैले हुए थे। लोग उनकी अक्ल की तारीफ़ करते करते उन्हें अक्ल बहादुर कहने लगे थे। उनके नाम भी बुद्धि विशेषण को लिए हुए थे जैसे कि उनमें से एक भाई का नाम सौबुद्धि, दूजे का नाम हजार बुद्धि, तीसरे का नाम लाख बुद्धि, तो चौथे भाई का नाम करोड़ बुद्धि था। एक दिन चारों ने आ...