5.305. || पंचम कहानी || वत्सराज के द्वारा शिव की आराधना; देवदास वैश्य की कथा; वत्सराज का दिग्विजय के लिए प्रयाण; वत्सराज के दिग्विजय की कथा
5.305. || पंचम कहानी || वत्सराज के द्वारा शिव की आराधना; देवदास वैश्य की कथा; वत्सराज का दिग्विजय के लिए प्रयाण; वत्सराज के दिग्विजय की कथा पंचम तरंग वत्सराज के द्वारा शिव की आराधना तब यौगन्धरायण ने वत्सराज से कहा- 'महाराज ! इस समय आपका दैव (भाग्य) अनुकूल है और पुरुषार्थ (बल) तुममें है ही। इधर हमलोग (मन्त्रिगण) भी राजनीतिक दाँव-पेंचो के जानकार है, इसलिए जैसा सोचा गया है तदनुसार पृथ्वी का विजय करो' ।।१-२।। यह सुनकर वत्सराज ने कहा- 'यह ठीक है, किन्तु कल्याण-साधना में विघ्न बहुत होते हैं' ॥३॥ इसलिए मैं इस विजय की सिद्धि के लिए मैं तप द्वारा शिव जी की आराधना करता हूँ; क्योंकि उनकी कृपा के बिना इष्ट सिद्धि कैसे हो सकती है' ।।४।। राजा की इस इच्छा का सभी मन्त्रियों ने इस प्रकार अनुमोदन किया, जिस प्रकार सेतु बाँधने के लिए उद्यत रामजी के शिवाराधन के लिए कभी वानरों ने अनुमोदन किया था ।।५।। तदनन्तर दोनों रानियों और मन्त्रियों के साथ तीन रात तक उपवास करते हुए राजा को शिवजी ने स्वप्न में आदेश दिया ।।६।। 'मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, उठो, तुम विना किसी विघ्न-बाधा के विजय प्राप्त कर...