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5502. || द्वितीय कहानी || शक्तिदेव का कनकपुरी देखने के लिए जाना; अशोकदत्त और राक्षसराज कपालस्फोट की कथा; अशोकदस और विद्युत्प्रभा की विवाह-कथा

5502. || द्वितीय कहानी || शक्तिदेव का कनकपुरी देखने के लिए जाना; अशोकदत्त और राक्षसराज कपालस्फोट की कथा; अशोकदस और विद्युत्प्रभा की विवाह-कथा द्वितीय तरंग शक्तिदेव का कनकपुरी देखने के लिए जाना इसी बीच चाही हुई राजकन्या द्वारा अपमानित अतएव दुःखित वह युवक ब्राह्मण शक्ति-देव सोचने लगा ॥१॥ 'कनकपुरी मैंने देखी है' - इस प्रकार झूठ बोलकर मैंने उस राजकन्या के बदले अत्यन्त अपमान प्राप्त किया है ।।२।। अतः उस राजकन्या की प्राप्ति के लिए मुझे तबतक सारी पृथ्वी का चक्कर काटना पड़ेगा, जबतक मैं उस नगरी को न देख लूं या प्राणों का त्याग न कर लूं ॥ ३॥ उस नगरी को देखकर उसी शर्त पर मैं राजकन्या को न ब्याह लूं, तो मेरे इस जीवन से ही क्या लाभ है ? 11 ऐसी प्रतिज्ञा करके वह उस वर्षमान नगर से दक्षिण दिशा का मार्ग पकड़कर चल पड़ा ।।५।। क्रमण. चलते हुए उम शक्तिदेव को मार्ग में विन्ध्य नाम का महान् और घोर वन-प्रान्त मिला। वह ब्राह्मण-युवक, अपनी लम्बी और दृढ़ इच्छा के समान उस महान् वनप्रान्त में प्रविष्ट हुआ ।।६।। वाय् से हिलाये गये कोमल पल्लवों से वह वन, अत्यन्त उष्ण सूर्य की किरणों से सन्तप्त उपके शरीर पर ...