5803. || तृतीय कहानी || सूर्वप्रभ का उद्योग;
5803. || तृतीय कहानी || सूर्यप्रभ का उद्योग; तृतीय तरंग सूर्यप्रभ का उद्योग तदनन्तर मय, सुनीथ और सूर्यप्रभ ये सभी उस कश्यप आश्रम से चलकर चन्द्रभागा और इरावती के संगम पर पहुंचे, जहाँ सूर्यप्रभ की प्रतीक्षा में उसके मित्र, बन्धु, ससुर आदि सभी ठहरे हुए थे ।॥१-२॥ सूर्वप्रभ को देखकर वहां ठहरे हुए सभी राजा और मित्र बन्धु मरने को तैयार होकर रोते हुए उसके सामने आये ॥ ३॥ चन्द्रप्रभ को न देखने से उसके प्रति बुरी आशंका से दुःखित उन सब को सूर्यप्रभ ने, जो कुछ समाचार था, सब कह सुनाया ॥४१॥ इस पर भी अत्यन्त व्याकुल हुए सूर्यप्रभ के उनसे पूछने पर उन्होंने श्रुतशर्मा द्वारा उनकी समस्त मर्यादाओं का अपहरण-वृत्तान्त अत्यन्त कठिनाई से उसे सुनाया ।।५।। श्रुतशर्मा द्वारा किये गये अपमान से दुःखी होकर अपने मरने का निश्चय और आकाशवाणी द्वारा उसका रोका जाना सब उन्होंने कह सुनाया ॥६॥ यह सब समाचार सुनकर सूर्यप्रभ ने, क्रोध से यह प्रतिज्ञा की कि यदि ब्रह्मा आदि सभी देवता भी श्रुतशर्मा की रक्षा करें, तो भी उस का समूल नाश करूंगा ॥७८॥ यह मेरा दृढ निश्चय है। दूसरों की स्त्रियों का अपहरण क...