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5.401. || प्रथम कहानी || राजा उदयन की कथा (क्रमशः); वत्सराज का मृगया-वर्णन; वत्सराज को नारदजी का उपदेश; राजा देवदत्त और उसकी वेश्या-पत्नी की कथा; राजा पाण्डु की कथा; पिंगलिका ब्राह्मणी की कथा; राजा देवदत्त और उसकी वेश्या-पत्नी की कथा;

5.401. || प्रथम कहानी || राजा उदयन की कथा (क्रमशः); वत्सराज का मृगया-वर्णन; वत्सराज को नारदजी का उपदेश; राजा देवदत्त और उसकी वेश्या-पत्नी की कथा; राजा पाण्डु की कथा; पिंगलिका ब्राह्मणी की कथा; राजा देवदत्त और उसकी वेश्या-पत्नी की कथा;  नरवाहनदत्तजनन नामक चतुर्थ लम्बक (मंगल-श्लोक का अर्थ प्रथम लम्बक के प्रथम तरग के प्रारम्भ में देखे।) प्रथम तरंग राजा उदयन की कथा (क्रमशः) कर्णताल के प्रबल आघाती से कुलपर्वनो को एक ओर करके मानो सफलता का मार्ग प्रदर्शन कर रहे हो, ऐसे विघ्नराज गणेश की जय हो ।।१।। तदनन्तर कौशाम्बी में रहता हुआ राजा उदयन, विजित पृथ्वी का एकच्छत्र राज्यभोग कर रहा था ।।२।। वह राजा, सेनापति रुमण्वान् के साथ मुख्यमन्त्री यौगन्धरायण पर ममस्त राज्य-शासन का भार देकर, अपने नर्मसचिव वसन्तक के माथ मुध्वपूर्वक मासारिक भोग-विलाम का आनन्द लेने लगा ।। ३।। वह स्वथ वीणा बजाता हुआ रानी वासवदत्ता और पद्मावती के साथ मगीत का सेवन करता था ।।४।। वासवदना के सूक्ष्म और मधुर मगीत-स्वर उसकी वीणा के स्वर की एकता (समता) होने पर बजाने के लिए चलते हुए अँगूठे से ही दोनो का भेद लक्षित होता था। अर्था...