51003 || तृतीय कहानी || नरवाहनवत्त की कथा; शक्तियशा का कौशाम्बी में आगमन; दो विद्यारियों की कथा; शुक की आत्मकथा; मनोरथप्रभा की कथा;
51003 || तृतीय कहानी || नरवाहनवत्त की कथा; शक्तियशा का कौशाम्बी में आगमन; दो विद्यारियों की कथा; शुक की आत्मकथा; मनोरथप्रभा की कथा; तृतीय तरंग नरवाहनवत्त की कथा (क्रमागत) सुबह में सोकर उठने के बाद आवश्यक कर्मों से निवृत्त होकर नरवाह्नदत्त अपने मन्त्रियों के साथ उद्यान में विहार करने के लिए गया ।॥१॥ उद्यान में भ्रमण करते हुए उसने आकाश में पहले तेज का पुंज और उसके पश्चात् ही आकाश से उतरी हुई बहुत-सी विद्यार्धारयों को देखा ॥२॥ उन चमकती हुई विद्यारियों के मध्य उसने, एक कन्या को, इस प्रकार देखा, मानों तारिका-मंडल के मध्य चमकती हुई नयनहारिणी चन्द्रमा की रेखा हो ॥३॥ उसका मुख-कमल खिला हुआ था और उसके चंचल नयन भ्रमरों के समान झूम रहे थे। हंस के समान लीलायुक्त गमन करती हुई उसके शरीर से कमल के समान सुगन्धि निकल रही थी ।॥४॥ तरंग-युक्त त्रिवली-लता से उसकी कमर अलंकृत थी, मानों काम-रूपी वावली की शोभा की वह मूत्तिमती अभिदेवता थी ।।५।। कामदेव की संजीवनी-विद्या के समान और उत्कंठित चन्द्रमा की मूर्ति के समान उसे देखकर समुद्र के समान वत्सराज का पुत्र वह नरवाहनदत्त क्षुब्ध हो उठा ॥६॥ 'ओह ! यह तो ब्रह्म...