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5807. || सप्तम कहानी || सूर्यप्रभ का वृत्तान्त: अन्तिम युद्ध

5807. ||  सप्तम  कहानी || सूर्यप्रभ का वृत्तान्त: अन्तिम युद्ध;  सप्तम तरंग सूर्यप्रभ का वृत्तान्त: अन्तिम युद्ध रात बीतने पर, प्रातःकाल, मन्त्रियों के साथ शम्या से उठकर सूर्यप्रभ, अपनी दानव और मानव-सेना को लेकर रणभूमि में गया ।॥ १।। उधर विद्याधरों की सेना-सहित श्रुतशर्मा भी युद्ध के मैदान में आकर डट गया और देवता, असुर आदि भी प्रतिदिन के समान, आकाश में युद्ध का दृश्य देखने के लिए आ गये ॥२॥ उस दिन दोनों ओर की सेनाओं में अर्थचन्द्र व्यूह बनाये गये और उसके पश्चात् दोनों सेनाओं में संग्राम प्रारम्भ हुआ ॥३॥ सनसनाहट के साथ दोनों ओर से दौड़ते हुए और आपस में एक दूसरे को काटते हुए और पंखों पर बड़े हुए बाण भी मानों आपस में टकरा-टकराकर युद्ध करने लगे ॥४ म्यानों के मुँह से निकली लम्बो और खून की प्यासी, अतएव चलती हुई तलवारें मानों काल की जीभों के समान रणभूमि में लपलपा रही थीं ॥५॥ तूर योद्धाओं के खिले हुए मुख-कमलों पर गिरते हुए चक्र-युद्धरूपी महासरोवर, राजहंसों के विनाश के लिए था ॥६॥ उछलते, कटते और गिरते हुए योद्धाओं के मस्तक-रूपी गेंदों से वह युद्धभूमि मृत्यु की क्रीडाभूमि¹-सी लग रही ...