5807. || सप्तम कहानी || सूर्यप्रभ का वृत्तान्त: अन्तिम युद्ध
5807. || सप्तम कहानी || सूर्यप्रभ का वृत्तान्त: अन्तिम युद्ध;
सप्तम तरंग
सूर्यप्रभ का वृत्तान्त: अन्तिम युद्ध
रात बीतने पर, प्रातःकाल, मन्त्रियों के साथ शम्या से उठकर सूर्यप्रभ, अपनी दानव और मानव-सेना को लेकर रणभूमि में गया ।॥ १।।
उधर विद्याधरों की सेना-सहित श्रुतशर्मा भी युद्ध के मैदान में आकर डट गया और देवता, असुर आदि भी प्रतिदिन के समान, आकाश में युद्ध का दृश्य देखने के लिए आ गये ॥२॥
उस दिन दोनों ओर की सेनाओं में अर्थचन्द्र व्यूह बनाये गये और उसके पश्चात् दोनों सेनाओं में संग्राम प्रारम्भ हुआ ॥३॥
सनसनाहट के साथ दोनों ओर से दौड़ते हुए और आपस में एक दूसरे को काटते हुए और पंखों पर बड़े हुए बाण भी मानों आपस में टकरा-टकराकर युद्ध करने लगे ॥४
म्यानों के मुँह से निकली लम्बो और खून की प्यासी, अतएव चलती हुई तलवारें मानों काल की जीभों के समान रणभूमि में लपलपा रही थीं ॥५॥
तूर योद्धाओं के खिले हुए मुख-कमलों पर गिरते हुए चक्र-युद्धरूपी महासरोवर, राजहंसों के विनाश के लिए था ॥६॥
उछलते, कटते और गिरते हुए योद्धाओं के मस्तक-रूपी गेंदों से वह युद्धभूमि मृत्यु की क्रीडाभूमि¹-सी लग रही थी ॥७॥
रक्त से खींचे जाने के कारण रणांगण² जब धूलि से रहित हो गया, तब परस्पर दोनों दलों में द्वन्द्व-युद्ध प्रारम्भ हुआ ॥८॥
सूर्यप्रभ का धुतवार्मा के साथ और प्रभास का दामोदर के साथ द्वन्द्व-युद्ध प्रारम्भ हुना । इसी प्रकार, महोत्पात के साथ सिद्धार्थ का, ब्रह्मगुप्त के साथ प्रहस्त का और संगम के साथ वीतभीति का चन्द्रगुप्त के साथ प्रज्ञाड्य का, अक्रम के साथ प्रियंकर का और अतिबल के साथ सर्वदमन का द्वन्द्व-युद्ध होने लगा ॥९-११॥
इसी प्रकार, घुरंधर के साथ कुंजरकुमार भिड़ गया और अन्यान्य महारथियों के साथ अन्यान्य महारथी भिड़ पये ॥१२॥
उनमें पहले महोत्पात ने बाणों से सिद्धार्थ के बाणों को और धनुष को काटकर उसके सारथी और घोड़ों की भी मार डाला ॥१३॥
रयहीन और क्रुद्ध सिद्धार्थ ने भी रथ से कूदकर और दौड़कर लोहे के डंडे से महोत्पात के रथ को भी चूर-चूर कर डाला ॥ १४॥
तब सिद्धार्थ ने, महोत्पात के साथ बाहुयुद्ध करके उसे पटक दिया और जब पटककर उसे मार डालना चाहा, तब उसके पिता भग देवता ने उसकी रक्षा की और वह रणभूमि से उठकर भाग गया ।।१५-१६।।
प्रहस्त और ब्रह्मगुप्त परस्पर रयहीन होकर पृथक् प्रथक् पैंतरेबाजी के साथ तलवारों से लड़ रहे थे। प्रहस्त ने, तलवार से उसकी ढाल को काटकर पैतरेबाजी के क्रम से ब्रह्मगुप्त को पृथ्वी पर गिरा दिया ॥ १७-१८॥
जब प्रहस्त गिरे हुए ब्रह्मगुप्त का शिर तलवार से काटने लगा, तब उसके पिता ब्रह्मा ने दूर से ही उसे स्वयं रोक दिया ॥१९॥
'तुम सब लोग अपने पुत्रों की रक्षा करने आये हो, युद्ध देखने नहीं', इस प्रकार कहते हुए सभी दानव, देवताओं को हँसी उड़ाने लगे ॥२०॥
इतने में ही वीतभय (वीतभीति) ने धनुष काटकर और सारथी को मारकर, हृदय पर बाणों की वर्षा करके संक्रम को प्रद्युम्नास्त्र से मार डाला ॥२१॥
रथ के दूर चले जाने से पैदल लड़ते हुए प्रज्ञाड्ध ने रथहीन और पैदल युद्ध करते हुए चन्द्रगुप्त का मस्तक खड्ग-युद्ध में काट डाला ॥ २२॥
तब पुत्र के वध से क्रुद्ध चन्द्रमा स्वयं युद्ध-भूमि में उतरकर प्रज्ञाध से लड़ने लगा। फलतः, उन दोनों का युद्ध बराबर का हुआ ।।२३।।
रबहीन प्रियंकर ने तलवार के एक ही प्रहार से रयहीन अक्रम के दो टुकड़े कर डाले ॥२४।।
फेंके हुए अंकुश से धनुष के काटने पर सर्वदमन ने अतिबल को सहज मेंही मार डाला ॥ २५।।
तब कुंजरकुमार ने अस्त्रों और प्रत्यस्त्रों के युद्ध में रयहीन घुरंधर को बार-बार मारा ॥२६॥
विक्रमशक्ति, धुरंधर के लिए बार-बार रथ उपस्थित करता था और अस्त्रों से अस्त्रों को दूर कर अपनी रक्षा कर रहा था। तब कुंजरकुमार ने क्रुद्ध होकर दौड़ते हुए, भारी पत्थर उठाकर विक्रमशक्ति के रथ पर फेंका ॥ २७-२८॥
रथ के चूर-चूर हो जाने और विक्रमशक्ति के भाग जाने पर कुंजरकुमार ने उसी पत्थर की मार से धुरंधर को चूर्ण-विचूर्ण कर डाला ॥२९॥
सूर्वप्रभ ने, श्रुतशर्मा से युद्ध करते हुए भी, विरोचन को मार देने के क्रोष से एक ही बाण से दम को मार डाला ॥३०॥
पुत्र-वध के क्रोध से, अश्विनीकुमार देवता, युद्ध के लिए उतर आये। सुनीथ ने उनको रोका, तो उन दोनों में घमासान युद्ध मच गया ।॥३१॥
स्थिरबुद्धि, शक्ति (अस्त्र) से पराक्रम को मारकर उसके वध से क्रुद्ध आठ वसुनों के साथ लड़ने लगा ॥३२॥
दामोदर से युद्धरत प्रभास ने, भास को रयहीन करनेवाले मर्दन को एक बाण से मार डाला ॥३३॥
प्रकम्पन नामक दानव, अस्त्रयुद्ध में तेजःप्रभ को मारकर उसके वर्ष से क्रुद्ध अग्निदेव से युद्ध करने लगा ।॥३४।।
यमपुत्र यमदंष्ट्र को मारनेवाले घूमकेतु दानव का उसके पिता यमराज के साथ युद्ध हुआ ॥३५॥
सिंहवंष्ट्र, पत्थर के प्रहार से सुरोषण को मारकर उसके वर्ष से क्रुद्ध निर्ऋति देवता से युद्ध करने लगा ॥३६॥
कालचक दानव ने, चक्र से वायुबल (विद्याधर) के दो टुकड़े कर दिये। इस कारण क्रुद्ध उसके पिता वायु के साथ उसका युद्ध होने लगा ॥३७॥
महामाय दानव ने सर्प, पहाड़, वृक्ष आदि नाना प्रकार के रूप धारण करनेवाले कुबेरदत्त नामक विद्याघर को गरुड़, वज्र और अग्नि का रूप धारण करके मार डाला ॥३८॥
इस कारण क्रुद्ध कुबेर महामाय से युद्ध करने लगा। इसी प्रकार, अनेक देवता अपने-अपने आंशिक पुत्र विद्यावरों के मारे जाने के कारण क्रुद्ध होकर दानवों और मानवों से युद्ध करने लगे ॥३९॥
पल-पल में उछलते हुए मानवों और दानवों ने, अनेक प्रसिद्ध विद्याधर-राजाओं और उनके सरदारों को मार डाला ॥४०॥
इवर प्रभास के साथ दामोदर का अस्त्रों और प्रत्यस्त्रों के द्वारा घमासान युद्ध चल रहा था। कुछ समय कटे हुए धनुष और मरे हुए सारथीवाले दामोदर ने, दूसरा धनुष लेकर और स्वयं घोड़े की लगाम पकड़कर युद्ध किया ॥४१-४२१॥
दामोदर को साधुवाद देते हुए बह्या से इन्द्र ने पूछा 'प्रभो, हारते हुए दामोदर को आप साधुवाद क्यों दे रहे हैं? ॥४३॥
तब ब्रह्मा ने कहा क्यों न साधुवाद हूँ। यह दामोदर इस प्रभास के साथ इतनी देर तक जमकर पुद्ध कर रहा है, यह साधारण बात नहीं है।॥४४॥
भगवान् विष्णु के अंश-स्वरूप दामोदर के अतिरिक्त कौन इस प्रभास से युद्ध कर सकता है। क्योंकि, अकेले प्रभास के लिए युद्ध में सभी देवता एक साथ मिलकर भी कम हैं॥४५।।
पूर्वकाल में युद्ध में सुरों का मर्दन करनेवाला नमुचि नाम का जो असुर था, वह दूसरे जन्म में सर्वरत्नमय प्रबल नाम से उत्पन्न हुआ। यही बब यह भास का पुत्र प्रभास हुआ है। भास भी पहले कालनेमि नाम का महान् असुर था। दूसरे जन्म में वह हिरण्यकशिपु नाम का दैत्य हुआ। तदनन्तर कपिजल के नाम से अवतीर्ण हुआ। सुमुंडीक नाम का जो असुरथा, वह आज सूर्यप्रभहुआ है। पहले जन्म में हिरण्याक्ष नाम का जो दैत्य याः वह अब सुनीच के रूप में है। प्रहस्त आदि ये सभी पूर्वजन्म के दैत्य और दानव हैं।॥४६-४९॥
तुम लोगों ने पहले जिन असुरों को मारा था, वे ही इस समय मानव और दानव के रूप में अवतीर्ण हुए है। इसीलिए, मब आदि सभी उनके पक्ष में हैं ।।५०।।
सूर्यप्रभ आदि द्वारा किये गये रुद्र के स्विष्टकृत् हवन के प्रभाव से बन्धन-मुक्त होकर बलि भी आज युद्ध देखने आया है ।॥५१॥
यह (बलि) अपने सत्य-वचन की रक्षा के लिए पाताल लोक में ही रहता है। तुम्हारा राज्य-काल समाप्त होने पर वही इन्द्र बनेगा ॥५२॥
इस समय ये दानव और मानव शिवजी की कृपा के पात्र हैं। अब यह तुम्हारे विजय का समय नहीं है। इसलिए सन्धि कर लो। आग्रह (हठ) करने से क्या लाभ है?' ॥५३॥
ब्रह्मा जबतक इन्द्र से इस प्रकार कह रहे थे, तभी प्रभास ने, महान् पाशुपतास्त्र बलाया ।।५४।।
सर्वसंहारकारी उस बस्त्र से भीषण संहार होते देखकर अपने अंश दामोदर के पुत्र-स्नेह से विष्णु ने सुदर्शन-चक्र चला दिया ।॥५५॥
तब समान बलशाली उन दोनों दिव्यास्त्रों का, सहसा विश्व के संहार का कारण, तीनों लोकों को व्याकुल करनेवाला युद्ध होने लगा ॥५६॥
'तुम अपने पाशुपत अस्त्र को हटा लो, तो मैं भी अपने सुदर्शन चक्र को हटा लूंगा', विष्णु के इस प्रकार कहने पर प्रभास उनसे बोला- ॥५७॥
'मेरा चलाया हुआ अस्त्र व्यर्थ नहीं जायमा। दामोदर, युद्ध-भूमि छोड़कर हट जाय, तो मैं अस्त्र-संहार कर सकता हूँ' ।॥५८॥
प्रभास के ऐसा कहने पर विष्णु ने कहा-'तो तुम भी मेरे चक्र की मान-रक्षा करो। जिससे दोनों विफल न हों ॥५९॥
विष्णु का वचन सुनकर अवसर जाननेवाले प्रभास ने कहा- 'ठीक है, आपका यह चक्र मेरे रथ को तोड़ दें' ।॥६०॥
विष्णु भगवान् के स्वीकार करने पर दामोदर युद्ध-भूमि से लौट गया। फलतः, प्रभास ने पाशुपतास्त्र को लौटा लिया और उसके रथ पर सुदर्शन-चक्र गिरा ॥६१॥
तब प्रभास, दूसरे रथ पर बैठकर सूर्यप्रभ के पास चला गया और उबर दामोदर भी श्रुतशर्मा के पास गया ।॥६२॥
इसी बीच इन्द्र का अंश होने के कारण गवित श्रुतशर्मा का और सूर्यप्रभ का द्वन्द्व-युद्ध अत्यन्त मीषण अवस्था में पहुंच गया ।॥६३॥
श्रुतार्मा बड़े ही प्रयत्न से जिस अस्त्र का प्रयोग करता था, सूर्यप्रम, उसी क्षण, प्रति अस्त्र से उसका प्रतिकार कर देता था ।। ६४मा
इसके अतिरिक्त श्रुतशर्मा ने जो-जो इन्द्रजाल की माया फैलाई, सूर्यप्रभ ने उस-उस को विरोबी माया से दूर कर दिया ॥६५॥
जब श्रुतशर्मा ने अत्यन्त कोष से सूर्यप्रभ पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया, तब सूर्यप्रभ ने भी पाशुपत अस्त्र का प्रयोग कर दिया ।।६६।।
पाशुपतास्त्र ने अब ब्रह्मास्त्र को दूर कर श्रुतशर्मा पर प्रभाव डाला, तब इन्द्र आदि लोकपालों ने क्रोध करके चारों ओर से बज आदि अस्त्रों का सूर्यप्रभ पर प्रहार किया ॥६७-६८।।
किन्तु, जब पाशुपतास्त्र उन सब अस्त्रों को हटाकर श्रुतशर्मा को मारने के लिए प्रवृत्त हुआ, तब सूर्यप्रभ ने उस अस्त्र की स्तुति करके उससे प्रार्थना की कि वह श्रुतशर्मा का वध न करे। उसे बाँधकर वह मुझे सौंप दे ॥६९-७०।।
यह देखकर सभी देवता क्रोष से युद्ध करने के लिए उत्बत हो गये और इधर उन्हें जीतने के लिए असुर भी तैयार हो गये ।।७१।।
उसी समय शंकर द्वारा प्रेरित वीरभद्र नामक गण उत्पन्न हुआ और उसने इन्द्र आदि देवताओं को शंकर की आज्ञा सुनाई ॥७२॥
'तुमलोग युद्ध देखने के लिए आये हो, तो युद्ध करने का यह कौन-सा तुक है। इस प्रकार, मर्यादा का भंग करने से और भी बुराई उत्पन्न होगी' ।॥७३॥
यह सुनकर देवता कहने लगे कि 'इस युद्ध में हम सभी के पुत्र मारे गये और मारे जा रहे हैं। इसलिए, हमलोग क्यों न लड़े ? ॥७४॥
पुत्र का स्नेह छोड़ा नहीं जा सकता। अतः, मारनेवालों पर प्रतिक्रिया अवश्य ही करनी होगी। इसमें क्या बेतुकापन है' ।॥७५।।
देवताओं के इस प्रकार कहने पर और वीरभद्र के अन्तर्धान होने पर देवासुरों का भी भीषण युद्ध प्रारम्भ हुआ ।॥७६॥
सुनीथ अश्विनीकुमारों के साथ, प्रज्ञाड्य चन्द्रमा के साथ, स्थिरबुद्धि अष्ट वसुओं के साथ, कालचक्र वायु के साथ, प्रकम्पन अग्नि के साय, सिहदंष्ट्र निर्ऋति के साथ, प्रमथन वरुण के साथ, घूमकेतु यम के साथ और महामाय धनाधिप कुबेर के साथ द्वन्द्व-युद्ध करने लगे। इसी प्रकार, जन्य असुर भी शस्त्रास्त्रों द्वारा देवताओं से युद्ध करने लगे ॥७७७९॥
बन्त में देवता अपने जो-जो परम अस्त्र का प्रयोग करते थे, शिवजी उस-उस अस्त्र को हुकार मात्र से व्यर्थ कर देते थे ॥८०॥
गदा उठाये हुए अपने मित्र को शिव ने शान्तिपूर्वक मना किया। अस्त्रों के विफल हो जाने के कारण विवश देवता युद्ध से विरत हो गये ॥८१॥
तब इन्द्र, क्रोध से भरकर स्वयं सूर्यप्रभ से युद्ध करने लगा और उस पर बाणों तथा अभ्धान्य शस्त्रास्त्रों की वर्षा करने लगा ॥८२॥
सूर्यप्रभ ने, उसकी शस्त्र-वर्षा की साधारणतः उपेक्षा करके कान तक खींचे हुए धनुष से इन्द्र को एक सौ बाणों से मारा ॥८३॥
तब देवराज इन्द्र ने कोष से भरकर बच्चा उठाकर सूर्यप्रभ पर प्रहार किया, तो शिवजी ने हुंकार कर दिया। फलतः, बच्चा नष्ट होगया ।॥८४॥
तब इन्द्र के युद्धभूमि से चले जाने पर स्वयं नारायण, कोष से भरकर तीक्ष्ण मुक्तवाले बाणों से प्रभास को लड़ाने लगे ॥८५॥
नारायण के अस्त्रों का उत्तर विरोधी अस्त्रों से देता हुआ प्रभास, अविचल भाव से साधारण व्यक्ति के समान युद्ध करने लगा। घोड़ों के मर जाने और रथ के टूट जाने पर भी वह दूसरे रथ पर चढ़कर लड़ रहा था। तब विष्णु भगवान् ने क्रुद्ध होकर प्रभास पर जलते हुए चक्र का प्रहार किया, तो तुरन्त प्रभास ने भी अभिमन्त्रित खड्ग का प्रयोग कर दिया। उन दोनों अस्त्रों (चक और लड्ङ्ग) को परस्पर युद्ध करते हुए और चक्र से खड्ग को धीरे-धीरे निर्बल होते हुए देल कर शंकर भगवान् ने हुंकार किया। उससे वे दोनों सड्ग और चक अन्तहित हो गये ॥८६-८९।।
तव सूर्वप्रभ के विजयी होने और बुतशर्मा के पकड़कर बाँध लिये जाने पर असुर आनन्दित और देवता लिन्न हो गये ॥९०॥
तदनन्तर देवताओं ने स्तुति करके शंकर की आराधना की। फलतः, प्रसन्न होकर गिरिजापति शंकर भगवान् ने देवताओं से यह कहा-'मैंने सूर्यप्रभ से जो प्रतिज्ञा की है, उसे छोड़कर और कोई भी वर माँगो। देवताओं ने कहा-भगवन्, आप जो प्रतिज्ञा कर चुके, उसे उलटने में कौन समर्थ हो सकता है; किन्तु हम लोगों ने मी श्रुतशर्मा को जो बचन दिया है, वह भो सत्य होना बाहिए। हमारे वंश का नाश नहीं होना चाहिए' ।।९१-९३॥
ऐसा कहकर चुप हुए देवताओं से भगवान् महादेव ने कहा-'परस्पर सन्धि कर लने पर हो यह सम्भव है। पहले श्रुतशर्मा अपने अनुचरों के साथ सूर्यप्रभ को प्रणाम करे, तब मैं उस पक्ष के हित की बात कहूंगा' ।।९४-९५।।
शिवजी के ऐसा कहने पर 'ऐसा ही होगा', देवताओं ने कहा और धृतशर्मा को सूर्यप्रम के आगे विनम्र कर दिया ॥९६।।।
तब उन दोनों के गले मिलने पर और आपसी शत्रुता छोड़ देने पर देवताओं बौर असुरों ने बैर शान्त करके परस्पर मित्रता कर ली ॥९७॥
तदनन्तर, सभी सुरों और असुरों के सुनते रहने पर, भगवान् शंभु ने सूर्यप्रभ से कहा-॥९८।।
तुम विद्यावरों की दक्षिण ओर की आधी वेदी पर अपना चक्रवर्ती-शासन स्थापित करो और उत्तर की आधी वेदी पर श्रुतार्मा को बक्रवर्ती बने रहने दो। पुत्र, कुछ दिनों के पश्चात् इससे चौगुना किन्नर आदि आकाशचारियों का राज्य प्राप्त करोगे। जब तुम्हारा राज्य-विस्तार हो जाय, तब अपनी दक्षिणवाली आधी वेदी कुंजरकुमार को देना।' इतना कहने के पश्चात् अन्त में शिवजी ने कहा-'इस युद्ध में उभय पक्ष के जितने वीर मरे हैं, वे सब जीवित हो जायें। उनके शरीर पर एक घाव भी न रहे।' ऐसा कहकर शिवजी के अन्तर्धान होने पर सभी मुर्दे ऐसे उठ गये, जैसे अभी सोकर जगे हों ॥९९-१०३॥
तदनन्तर विजरी सूर्यत्रम शिवजी की आज्ञा को शिरोधार्य करके और एकान्त में विस्तृत भूभाग में जाकर एक स्थान पर बैठ गया और सभा (दरबार) की। उस समय आये हुए थुनशर्मा को उसने अपने निहासन के आधे भाग में स्वयं बैठाया ॥१०४-१०५।।
प्रभास आदि सूर्यप्रभ के मित्र और श्रुतशर्मा के मित्र दामोदर आदि दोनों, दोनों ओर यथास्थान बैठ गये ॥१०६॥
सुनीय और मव आदि असुर तथा अन्यान्य विद्याधर-राजा समुचित आसनों पर विराजमान हो गये। तब सातों पातालों के अधिपति प्रह्लाद आदि दैत्य-दानवेन्द्र हर्ष मनाते हुये वहाँ आये ॥१०७-१०८॥
गुरु बृहस्पति को आगे करके लोकपालों के साथ इन्द्र तथा सुमेरु, सुवासकुमार एवं यनु आदि कश्यप मुनि की सभी पत्नियाँ वहाँ आई और भूतासन विमान पर बैठकर सूर्यप्रभ को समस्त पत्नियाँ भी वहाँ पहुंचीं। ये सब लोग प्रेमपूर्वक व्यवहार करके जब यथास्थान बैठ गये, तब दनु की सखी सिद्धि ने उसी (दनु) के शब्दों में ही इस प्रकार कहा हे सुरो और असुरो ! देवी दनु, आपसे कहती हैं कि आज इस प्रीति-समाज में आप लोग जिस सुख का अनुभव कर रहे हैं, क्या इस सुक्ख का अनुभव पहले भी किया था (कहिए), इसलिए दुःखों का कारण भीरण विरोध आप लोगों को न करना चाहिए ॥१०९-११३॥
बड़े भाई हिरण्याक्ष आदि ने, स्वर्ग के लिए परस्पर विरोध किया था, वे मारे गये और अब इन्द्र ही बड़ा है, तो विरोध क्यों है? इसलिए वैर-रहित होकर आप लोग परस्पर भव्यवहार करो, जिससे कि हम लोगों को सन्तोष और तीनों लोकों का कल्याण हो' ।॥११४-११५॥
सिद्धि के मुख से माता दनु के वचन सुनकर इन्द्र ने बृहस्पति की ओर देखा। तब बृहस्पति कहने लगे- 'देवताओं को असुरों के प्रति कोई वैर नहीं है। इसलिए, देवता उनके प्रति कोई भी हानिकारक कार्य नहीं करते' ।।११६-११७।।
बृहस्पति के ऐसा कहने पर दानवराज मय बोला 'यदि असुरों के मन में देवताओं के प्रति अनिष्ट-भावना होती, तो नमुचि असुर, मुर्दों को जिलानेवाले उच्चैःश्रवा नामक घोड़े को इन्द्र के लिए दान में कैसे दे देता और प्रबल दैत्य देवताओं को अपना शरीर कैसे दान कर देता ? बलि विष्णु को अपना शरीर दान करके कारागार में क्यों जाता और अयोदेह असुर विश्वकर्मा को अपना शरीर कैसे दे देता ॥ ११८-१२०॥
और, अधिक क्या कहूँ, नित्य ही देवताओं द्वारा पीड़ित असुर यदि छल-कपट द्वारा आतंकित न किये जायें, तो उनके मन में कोई विकार नहीं हो' ।॥ १२१॥
मदासुर के इस प्रकार कहने पर सिद्धि ने कहा-'तुम जो कहते हो, ठीक है।', तदनन्तर, देवता और असुरों ने परस्पर के मित्रों से प्रेमपूर्वक मेल-मिलाप किया ॥१२२॥
इसी बीच भवानी पार्वती द्वारा भेजी गई प्रतीहारी जया भी वहीं आई। उसके आने पर सबने उसका स्वागत-सम्मान किया और वह सुमेरु से कहने लगी 'मुझे देवी पार्वती ने मेजा है और तुम्हें यह सन्देश दिया है कि तुम्हारी कामचूडामणि नाम की कन्या है, उसे तुम शीघ्र ही सूर्यप्रभ के लिए दे दो। वह कन्या मेरी भक्ता है।' सुजया के इस प्रकार कहने पर सुमेरु ने नम्रता पूर्वक उससे कहा--।।१२३-१२५॥
'मगवती ने मुझे जो आज्ञा दी, यह मुझ पर उनका अनुग्रह है। भगवान् महादेव ने भी यह बात पहले मुझसे कही थी ॥१२६।।
सुमेरु के इस प्रकार कहने पर जया ने सूर्यप्रभ से कहा-'तुम इस (कामचूडामणि) को सभी पत्नियों में प्रधान बनाना। यह तुम्हारी सभी प्रिय पत्नियों में अधिक प्रिय होगी। इस प्रकार प्रसन्न पार्वती ने तुम्हें भी आदेश दिया है' ।॥ १२७-१२८॥
सूर्यप्रभ द्वारा सम्मानिता जया इतना कहकर अन्तहित हो गई। सुमेरु ने भी उसी दिन शीघ्रता पूर्वक लग्न का निश्चय किया और वहीं पर उसने महामूल्य रत्नों के स्तम्भों तथा छतों से युक्त सुन्दर वेदी बनवाई। रत्नों की चमकीली लाल किरणों से मानों वेदी सब ओर से अग्नि द्वारा छाई हुई-सी लग रही थी ।। १२९-१३०।।
वहीं उसने अपनी सुन्दरी कन्या कामचूडामणि को बुलवाया, जिसके लावण्य को चंचल होकर देवता और असुर सभी अपने नेत्रों से पी रहे थे ।।१३१॥
उमा हिमालय से उत्पन्न हुई वी और यह सुमेरु से। मानों, इसीलिए वह पार्वती के समान सुन्दरी पी ॥१३२॥
तदनन्तर, विवाह-वेश में सजी हुई कन्या को सुमेरु ने वेदी पर बैठाकर उसे सूर्यप्रभ को प्रदान कर दिया ॥ १३३॥
सूर्यप्रभ ने भी, दनु आदि के द्वारा बाँचे गये कामचूडामणि के हाय को ग्रहण किया ॥१३४।।
पहले लाजा-होम के समय उसी क्षण आई हुई और पार्वती द्वारा भेजी गई जया ने अनश्वरी नाम की दिव्य माला उसे प्रदान की। सुमेरु ने भी अनन्त और अमूल्य रत्न उस अवसर पर प्रदान किये और ऐरावत से उत्पन्न सुन्दर हाथी भी प्रदान किया ।।१३५-१३६॥
दूमरे लाजा-होम के समय जया ने एक रत्नों की माला भेंट की, जिसके गले में रहने पर मृत्यु, भूल और प्यास का कष्ट नहीं होता था ॥ १३७७॥
सुमेरु ने भी पहले से अधिक रत्नराशि और उच्चैःश्रवा से उत्पन्न घोड़े का बच्चा प्रदान किया ॥१३८।।
तीसरे लाजा-हवन के समय जया ने मोतियों की एक लड़ीवाली माला दी। जिसके गले में रहने से यौवन का क्षय नहीं होता या ॥१३९।।
और, सुमेरु ने भी तिगुनी रत्नराशि और सब प्रकार की सिद्धियों के उपयोग में आनेवाली एक अँगूठी दी ॥१४०।।
इस प्रकार, विवाह-संस्कार पूर्ण होने पर सुमेरु ने सुरों, असुरों, विद्याधरों और देवमाताबों से इस प्रकार निवेदन किया ॥१४१॥
बाज आप लोगों को मेरे घर पर मोजन करना चाहिए और मुझ पर कृपा करनी चाहिए। मैं सिर पर अंजलि बाँधकर आप लोगों से निवेदन करता हूँ ॥१४२॥
उन सब ने जब भोजन करना न चाहा, तब शिवजी का नन्दी वहाँ बाकर उपस्थित हुना ॥१४३॥
वह प्रणाम करते हुए उन सब से कहने लगा-'शिवजी ने आप लोगों को आदेश दिया है कि आप लोगों को सुमेरु के घर पर भोजन करना ही चाहिए; क्योंकि वह हमारा आत्मीय व्यक्ति है ।॥ १४४॥
उसका बत्र खाने पर आप लोगों को शाश्वत तृप्ति होगी।' नन्दी के मुख से यह सुनकर सबने भोजन करना स्वीकार किया ॥१४५॥
तदनन्तर बिनायक, महाकाल और वीरभद्र की प्रमुखता में अनन्त गण वहाँ आ गये ।।१४६।।
उन गणों ने भोजन तैयार करके देव, दैत्य, विद्याधर और मनुष्य सब अतिथियों को सम्मान-सहित क्रम से बैठाया ॥१४७॥
और सुमेरु द्वारा विद्या-बल से तैयार किये गये तथा शिवजी के आदेश से कामधेनु द्वारा उत्पन्न किये गये विविध प्रकार के भोजन उनके सामने परोसे गये ॥१४८॥
और, एक-एक अतिथि के लिए उनकी प्रतिष्ठा के अनुसार सेवा के निमित्त वीरभद्र, महाकाल, मृङ्गी प्रभूति देवता संलग्न हो गये ॥१४९।।
बीच-बीच में प्रेम और सन्तोष से मिलते हुए आकाशचारियों के चारणों के गान और दिव्यस्त्रियों के नाच उनका मनोरंजन करते रहे ॥ १५०॥
भोजन के अनन्तर नन्दीश्वर आदि गणों ने उन्हें दिव्य मालाएँ, वस्त्र और आभूषण आदि प्रदान किये ।।१५१॥
तब नन्दी आदि गणों ने सभी देवताओं का सम्मान किया। वे सभी अपने-अपने वाहनों पर चढ़कर जहाँ से आये थे, वहीं लौट गये ॥१५२॥
और सभी, असुर तथा विद्याधर भी सूर्यप्रभ से आज्ञा लेकर अपने-अपने स्थानों को गये ॥१५३॥
सूर्यप्रभ भी अपने मित्रों तथा नववधू के साथ सुमेरु के प्राचीन आश्रम में लौट बाया ।।१५४।।
तदनन्तर, उसने अपने मित्र हवं को राजाओं तथा अपने भाई रत्नप्रभ के पास अपनी स्थिति का समाचार देने के लिए भेजा ॥१५५।।
और, सायंकाल के अनन्तर वह सूर्यत्रम, सुन्दर रत्नों के पलंग से सजे हुए और सुन्दर बने हुए कामचूडामणि के वास-भवन में प्रविष्ट हुआ ।॥१५६॥
वहाँ पर गाढ आलिंगन, दन्तक्षत और खंडन आदि से उसकी नई-नई लज्जा को क्रमशः दूर हटाकर उस नवोड़ा काम-चूड़ामणि के साथ अनिवंतीय नवीन तथा दूसरी पलियों से बनास्वादित आनन्द-उपभोग में उसने रात्रि व्यतीत की ॥१५७-१५८।।
सूर्वप्रम ने कामबूडामणि से कहा-'अब अन्य स्त्रियों का स्थान हृदय के बाहर रहेगा, किन्तु हृदय के भीतर तो केवल तुम्हारा ही स्थान है।' इस प्रकार की बातें करते हुए सूर्यप्रभ ने उसे प्रसन्न किया ।।१५९।।
तदनन्तर प्रिया के बालिंगन से सुख देनेवाली उसकी नींद और रात्रि दोनों साथ ही समाप्त हुई ।॥१६०।।
प्रातःकाल उठकर सूर्वप्रभ ने जाकर एक साथ बैठी हुई पहले की स्त्रियों से मिलकर वार्तालाप आदि से उन्हें प्रसन्न किया ।।१६१।।
वे रानियाँ, व्यंग्योक्तियों, चुटकियों तथा हास्यपूर्ण वचनों से नववधू के प्रति अनुरक्त सूर्यप्रभ को जब विविध प्रकार से बना रही थीं, इतने में ही द्वारपाल द्वारा आफर और प्रणाम करके सूर्यप्रभ सूचित किया गया और सुषेण नाम के विद्याधर ने सफल हुए सूर्यप्रभ से कहा-'महाराज, त्रिकूटनाथ आदि सभी विद्याधर-राजाजों ने मुझे आपके समीप भेजा है। वे लोग आपसे निवेदन करते हैं ।॥१६२-१६४।।
'कि आज से तीसरे दिन ऋनभपर्वत पर आपका अभिषेक शुभ है। इसकी सबको सूचना दीजिए और उसके लिए तैयारी कीजिए ॥ १६५ ॥
यह सुनकर सूर्वप्रभ ने दूत से कहा-'जाओ, त्रिकूटेश्वरों को मेरी ओर से कहो कि इस उत्सव का आयोजन आप लोग ही करें। और, लोगों को भी आप ही सूचित करें ! हम स्वयं तैयार होकर बैठे हैं।॥१६६-१६७।।
यथावकाश हम भी सबको सूचित करेंगे ही। इस प्रकार, प्रतिसन्देश लेकर दूत सुषेण चला गया ।।१६८।।
सूर्यप्रभ ने भी प्रभास आदि एक-एक मित्र को, देवताओं को, याज्ञवल्क्य मुनि को, राजाओं को, विद्याधरों को और असुरों को व्यक्-व्यक् सूचना देकर अपने अभिषेक महोत्सव में निमन्त्रित कराया ।।१६९-१७०।।
और, स्वयं अकेला शिव और पार्वती को निमन्त्रण देने के लिए कैलाश पर्वत पर गया ॥ १७१॥
सूर्यत्रन ने देव, ऋषि, सिद्ध आदि से सेवित उस कैलाश पर्वत पर जाते हुए दूसरे शंकर के समान स्वच्छ और शुत्र कैलाशपति को देखा ॥१७२॥
आधे से अधिक चड़ने पर उसने पर्वत के शिखर पर जाना कठिन समझा और सामने ही एक ओर विदुन मणि से बने हुए द्वार को देखा ॥ १७३।।
जब सिद्धि-सम्पन्न सूर्यप्रम भी द्वार में प्रवेश नहीं प्राप्त कर सका, तो वह एकाग्र चित्त से शिवजी की स्तुति करने लगा ॥१७४।।
तब द्वार को खोलकर हाथी के मुखवाले एक पुरुष ने उससे कहा- 'आओ, प्रवेश करो। तुम पर भगवान् हेरम्ब प्रसन्न हैं ।॥१७५।।
उस द्वार में प्रवेश करते हुए आश्चर्य चकित सूर्यप्रभ ने अति विस्तृत ज्योतिर्मय शिला पर बैठे हुए, बारह सूर्यों के समान चमकते हुए, एक दाँतवाले, लम्बे पेटवाले और तीन नेत्रोंवाले गणेशजी को देखा, जिनके हाथ में परशु, कुल्हाड़ा और गदा चमक रहे थे ।। १७६-१७७॥
वे विनायक, भिन्न-भिन्न मुखोंवाले गणेश से घिरे हुए थे। सूर्वप्रभ ने उन्हें देखा और उनके चरणों में नम्र होकर प्रणाम किया ॥१७८॥
विनायक ने भी सूर्यप्रभ से बाने का कारण पूछा और स्नेहपूर्ण वाणी से कहा कि 'इस मार्ग से चड़ो। सूर्यप्रभ उनके बताये हुए मार्ग से पाँच योजन (बीस कोस) और ऊपर चड़ गवां तथा उसने पद्मराग मणि के दूसरे बड़े द्वार को देखा। वहाँ भी उसने प्रवेश न पा सकने के कारण एकाग्रचित होकर और अनन्य भाव से पिनाकपाणि महादेव की शिवसहक्षनाम से स्तुति की ॥१७९-१८१॥
स्वामी कात्तिक के विधाख नामक पुत्र ने स्वयं द्वार खोला और अपना परिचय देकर उसे भीतर प्रवेश कराया। भीतर आकर उसने अग्नि की ज्वाला के समान दमकते हुए विशाल, शाल आदि पाँच पुत्रों से युक्त, उत्पन्न होते ही नश्च दुष्ट ग्रहों तया बालग्रहों से चरणों पर प्रणाम करते हुए करोड़ों गणेशों से सेवित कुमार स्वामी को देखा ॥१८२-१८४॥
उन्होंने सूर्यप्रभ से आने का कारण पूछकर उसे ऊपर चढ़ने का मार्ग बता दिया ॥१८५॥
इसी प्रकार महाकाल, वीरभद्र, नन्दी और मूंगी गणों से रक्षित जग्य पाँच रत्नों के द्वार को पार करते हुए स्फटिक मणि के विशाल द्वार को उसने देखा ॥१८६-१८७७॥
वहाँ पर देवदेव महादेव की स्तुति करते हुए उसे एकादश रुद्रों में से एक रुद्र ने द्वार खोलकर आदर के साथ भीतर प्रदेश कराया और उसने स्वर्ग से भी अधिक सुन्दर शिवधाम का दर्शन किया ॥१८८॥
जिस धाम में दिव्य पुरुषों के झुंड वृक्षों पर झूल रहे थे और वृक्ष पुष्पों से लदे हुए थे। जहाँ गन्धर्व गान कर रहे थे और अप्सराएँ नृत्य कर रहीं थीं ॥१८९॥
वहीं एक ओर सूर्यप्रम ने, स्फटिक के सिहासन पर बैठे हुए, तीन नेत्रोंवाले, हाथ में शूल लिये हुए, चमकते हुए स्फटिक के समान स्वच्छ, पीली जटाओं को बाँचे हुए, सुन्दर अर्धचन्द्र से शोभित मस्तक वाले और पारवं में बैठी हुई भगवती गौरी से शोभित महादेव को देखा उनके समीप जाकर गौरी और शंकर के चरणों में वह नतमस्तक हुआ ।।१९०-१९२॥
तब पीठ को हाथ से थपथपाकर और उठाकर बैठाये गये सूर्यप्रभ से शिवजी ने पूछा-'किसलिए आये हो ?' ॥१९३॥
सूर्वप्रभ ने कहा-'प्रभो, मेरा अभिषेक शीघ्र ही होनेवाला है। अतः आपके वहाँ पधारने की प्रार्थना है।॥१९४।।
तब शिवजी ने उससे कहा- बेटे, तो तुमने इतना कष्ट क्यों उठाया ? मुझे आने के लिए वहीं स्मरण क्यों नहीं कर लिया ? ॥१९५॥
तो ठीक है, मैं आऊँगा, ऐसा कहकर भक्तवत्सल भगवान् ने पास बैठे हुए एक गण को बुलाकर कहा- 'जाओ, इसे (सूर्यप्रभ को) अभिषेक के लिए ऋषभ पर्वत पर ले जाओ।' वह ऋषभ पर्वत विद्यावर-चक्रवृत्तियों का अभिषेक-स्थान है। भगवान् से आज्ञापित गण ने प्रदक्षिणा और प्रणाम किये हुए सूर्यप्रभ को नम्रता-पूर्वक गोद में उठा लिया और उसे ले जाकर ऋषभ पर्वत पर बैठा दिया। अपनी सिद्धि के प्रभाव से बह उसी क्षण वहाँ से अदृश्य हो गया ।।१९६-१९९।।
सूर्यप्रभ जब ऋषभ पर्वत पर ही था, तब उसके सभी मित्र मन्त्री, कामचूडामणि आदि सभी पत्नियाँ, सभी विद्याधरों के राजा, इन्द्र-सहित सभी देवता, मय आदि सभी असुर, याज्ञवल्क्य आदि सभी ऋषिगण तथा सुमेरु और सुवासकुमार आदि वहाँ एकत्र हुए। सूर्यप्रभ ने भी सभी का स्वागत करके उनका यथोचित सम्मान किया और शिवजी के निमन्त्रण का वृत्तान्त सुनकर सभी को प्रसन्न किया। उन सब ने भी उसे इस बात पर बधाई दी ॥२००-२०२॥
तब सूर्य प्रभ के प्रभास आदि मन्त्री मित्र, मणियों और सोने के विविध कलशों में नाना प्रकार की ओषधियों से युक्त, समस्त नदियों, नदों, समुद्रों और तीर्थों का जल वे स्वयं जाकर लाये ॥ २०३॥
उसी अवसर पर भगवती गौरी के साथ शंकर भी वहाँ उपस्थित हुए और सभी देव, असुर, दानव तथा विद्याधर आदि राजाबों ने उनके चरणों में सादर प्रणाम किया ॥२०४॥
तदनन्तर, सभी देव, दानव और विद्यावरों के पुण्याहवाचन का पाठ करने पर समस्त ऋषिगण तथा प्रभास आदि ने लाये गये जलों से विधिपूर्वक सिहासन पर बैठे हुए सूर्यप्रभ का विद्यावर-चक्रवर्ती पद पर अभिषेक किया, मुकुट और पट्ट-बन्धन किया। उस समय आकाश में वाद्यों के साथ देवताओं की दुन्दुभियाँ बज उठीं और सुन्दरी अप्सराएँ नाचगने लीं ॥२०५-२०६१।
तब महषियों के समूह ने कामबूडामणि का भी अभिषेक किया और उसे सूर्यप्रभ की महिषी (वैधानिक महारानी) बनाया ॥२०७॥
अभिषेक-महोत्सव के सम्पन्न होने के पश्चात् देवताओं और असुरों के अपने-अपने स्थानों को लौट जाने पर सूर्यप्रभ ने अपने बन्धुओं और मित्रों के साथ और कुछ दिनों तक अभियेकोत्सव को बढ़ाया ॥२०८॥
तदुपरान्त, कुछ दिनों के पश्चात् उत्तर की बेदी का आया राज्य, शिवजी के आज्ञानुसार घृतशर्मा को देकर तथा अन्य पत्नियों को प्राप्त कर सूर्यप्रभ ने अपने मित्रों के साथ चिरकाल तक विद्यावर राज्य की लक्ष्मी का उपभोग किया ॥२०९॥
इस प्रकार शिवजी को कृपा से, मनुष्य होते हुए भी, सूर्यप्रभ ने, विद्याधरों की राज्य लक्ष्मी प्राप्त की ॥२१०।।
इस क्रम से विद्याधर-श्रेष्ठ वञ्जप्रभ वत्सराज के सम्मुख सूर्यप्रभ की कथा सुनकर और नरवाहनदत्त को प्रणाम करके आकाश में उड़ गया ।।२११॥
उसके चले जाने पर युवराज नरवाहनदत्त, अपनी पटरानी मदनमंचुका के साथ विद्या-घर-चकवर्ती बनने की उत्सुकता लिये हुए पिता बत्सराज के गृह में निवास करने लगा ।॥ २१२॥
सूर्यत्रभ लम्बक का सप्तम तरंग समाप्त।
इति महाकविश्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के सूर्यप्रभ नामक अष्टम लम्बक भी समाप्त
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1. गेंद खेलने का मैदान।
2. युद्ध का मैदान।
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