5.201. || पहली कहानी || राजा सहस्त्रनीक, रानी मृगावती के विवाह व उदयन के जन्म की कथा

5.201. || पहली कहानी || राजा सहस्त्रनीक, रानी मृगावती के विवाह व उदयन के जन्म की कथा

कथामुख नामक द्वितीय लम्बक 

( मङ्गल - श्लोक का अर्थ ग्रन्थारम्भ के प्रथम पृष्ठ पर देखना चाहिए )

प्रथम तरंग

राजा सहस्त्रनीक की कथा

पार्वती के प्रथम आलिंगन के समय उत्पन्न शिवजी के स्वेद-कण आपकी रक्षा करे; जो स्वेद-कण ऐसे मालूम होते है, मानो कामदेव ने शिवजी के नेत्र की अग्नि के भय से उनपर वारुणास्र छोड़ा हो ' ॥ १ ॥

कैलाश में शिवजी के मुख मे, पुष्पदन्त गण को, पृथ्वी पर वररुचि के रूप में अवतीर्ण पुष्प-दन्त से. काणभूति को, काणभूति से गुणाढ्य को और गुणाढ्य से राजा सातवाहन को क्रमशः प्राप्त इस विद्याधर- कथा रूपी अमृत को सुनिए । २-३ 

॥ स्वर्ग के अभिमान को दूर करने के लिए विधाता द्वारा उसी के समान पृथ्वी पर निर्माण किया गया वत्स नामक देश है ||४||

उस देश के मध्यभाग में अत्यन्त समृद्ध कौशाम्बी नाम की नगरी भूमि की कणिका (कर्णभूषण) के समान है ॥ ५ ॥

उस नगरी में पाडव वंश मे उत्पन्न शतानीक नामक राजा राज्य करता था, जो जनमेजय का पुत्र, परीक्षित का पोत्र और अभिमन्यु का प्रपौत्र था। इस वंश का आदि पुरुष अर्जुन था; जिसने शिवजी के स्तम्भ के समान बाहुदंडों का पराक्रम देखा था ।। ६-७।।

उस शतानीक की दो रानियाँ थी। एक (पृथ्वी) रत्नों को उत्पन्न करती थी; किन्तु दूसरी ने पुत्र को उत्पन्न नहीं किया ॥ ८ ॥ एक बार शिकार खेलने के सिलसिले मे उस राजा का वन में शांडिल्य मुनि के साथ परिचय हुआ ॥ ९ ॥

शांडिल्य मुनि ने कौशाम्बी में आकर पुत्र की इच्छावाले राजा की रानी को मन्त्र से पवित्र चरु' खिलाया ॥ १०॥ शाडित्य मुनि की कृपा से शतानीक को सहस्रानीक नामक पुत्र उत्पन्न हुआ; उससे पिता ऐसा शोभित हुआ, जैसे विनय से गुण शोभित होता है ॥। ११॥

क्रमशः शतानीक, सहस्रानीक को युवराज बनाकर, केवल राज्यसुख भोगने के लिए राजा रह गया । राज्यकार्य की चिन्ता से मुक्त हो गया था ।। १२ ।। कुछ समय के अनन्तर असुरो के साथ युद्ध प्रारम्भ होने पर इन्द्र ने सहायता की इच्छा से उसके लिए अपने सारथी मातलि को दूत बनाकर भेजा ।। १३ ।।

तब शतानीक, राज्य शासन का समस्त भार युगन्धर नाम के मुख्यमंत्री सुप्रतीक नामक प्रधान सेनापति तथा युवराज सहस्रानीक पर देकर मातलि के साथ इन्द्र के समीप गया ।। १४-१५ ।। इन्द्र के देखते-देखते यमदंष्ट्र आदि बहुत से असुरों को उस युद्ध में मारकर वह राजा शतानीक स्वयं भी मर गया ॥ १६॥

मातलि द्वारा उसका शव राजधानी में ले आने पर महारानी उसके साथ सती हो गई और राजलक्ष्मी ने उसके पुत्र सहस्रानीक का आश्रय लिया। (अर्थात्, सहस्रानीक राजा बन गया ) ।।१७।। आश्चर्य है कि सहस्रानीक के पिता के सिहासन पर बैठते ही, भार से राजाओ के सिर झुक गये, अर्थात् सिहासन को नम्र होना चाहिए, किन्तु राजाओं के शिर नम्र हो गये, यह आश्चर्य है ! ।। १८ ।।

असुर विजय के उपलक्ष में किये गये उत्सव के समय इन्द्र ने अपने मित्र के पुत्र सहस्रानीक को मातलि द्वारा ( रथ भेजकर ) स्वर्ग मे बुलवाया ।। १९ ।।

स्वर्ग में रहते हुए सहस्रानीक, प्रियतमाओं के साथ नन्दन-वन में विहार करते हुए देवताओं को देखकर, अपने लिए अनुकूल पत्नी की चाह मे, कुछ शोकयुक्त-सा हो गया ॥ २० ॥ इन्द्र ने राजा शतानीक के मनोभाव को समझकर कहा- 'राजन्! शोक न करो, तुम्हारी इच्छा पूर्ण होगी ॥ २१ ॥

राजन् ! तुम्हारे पूर्वजन्म की भार्या, जो तुम्हारे अनुरूप है; पृथ्वी पर जन्म ले चुकी है। इस वृत्तान्त को कहता हूँ सुनो ॥ २२ ॥

रानी मृगावती के विवाह की कथा

प्राचीन समय में पितामह (ब्रह्मा) का दर्शन करने के लिए मैं उनकी सभा में गया था। मेरे ही पीछे विघूम नाम का एक वसु भी सभा में आ गया ।। २३ ।।

हमारे वहाँ बैठे रहते ही अलम्बुषा नाम की एक अप्सरा ब्रह्मा के दर्शनार्थ वहाँ आई, उसका वस्त्र वायु से कुछ खिसक कर, इधर-उधर हो गया ।। २४ ।

उसे देखकर वह विधूम वसु कामातुर हो गया और वह (अलम्बुषा ) भी उसके रूप की ओर आंखों के खिच जाने से स्तब्ध-सी ( ठगी-सी) रह गई ।। २५ ।।

उन दोनो की इस स्थिति को देखकर ब्रह्मा ने मेरी ओर देखा, मैंने भी उनके अभिप्राय को समझकर, क्रुद्ध होकर उन दोनों को शाप दिया ॥ २६ ॥

शाप यह दिया कि 'तुम्हारा जन्म, मर्त्यलोक में पति-पत्नी के रूप में होगा। इस शाप के कारण हे राजन्, तुम चन्द्रवंश में राजा शतानीक के पुत्र हुए और वह अप्सरा अयोध्या के राजा कृतवर्मा की मृगावती नामक कन्या के रूप में अवतीर्ण हुई है। वही तुम्हारी पत्नी होगी ।।२७-२८-२९॥

राजा के स्नेहयुक्त हृदय में पहले से ही सुलगता हुआ मदनानल, इन्द्र की बातों से प्रेरित होकर तुरन्त प्रज्वलित हो उठा ।। ३० ।। तदनन्तर इन्द्र के द्वारा भली भांति स्वागत प्राप्त करके इन्द्र के ही रथ से भेजा गया राजा सहस्रानीक, मातलि के साथ अपनी नगरी को लौट आया ॥ ३१ ॥

जाते हुए राजा से तिलोत्तमा नाम की अप्सरा ने प्रेमपूर्वक कहा - 'हे राजन् ! जरा ठहरो, मैं तुमसे कुछ कहूँगी ॥३२॥ मृगावती के ध्यान में निमग्न राजा ने तिलोत्तमा का कथन नही सुना । इसलिए उसने लज्जित होकर राजा को शाप दिया ॥ ३३ ॥

'हे राजन् | जिस मृगावती से आकृष्टचित्त होकर तू मेरी बात नहीं सुन रहा है, उसका तुझे चौदह वर्षों तक वियोग होगा ।। ३४ ।।

तिलोत्तमा के शाप को मातलि ने सुना राजा ने नहीं। प्रिया के लिए उत्सुक वह राजा रथ से कौशाम्बी और मन से अयोध्या पहुँचा ।। ३५ ।। राज्य में पहुँचकर राजा ने मृगावती के सम्बन्ध मे इन्द्र से सुना हुआ समस्त वृत्तान्त उत्सुक मन से युगन्धर आदि मन्त्रियों को कह सुनाया ।। ३६ ।। और विलम्ब को न सहन कर सकनेवाले राजा ने उस कन्या (मृगावती) की मँगनी के लिए अयोध्या में राजा कृतवर्मा के समीप दूत भेजा ।। ३७।।

दूत द्वारा सहस्रानीक के सन्देश को सुनकर राजा कृतवर्मा ने हर्ष से यह संवाद अपनी रानी कलावती से कहा ॥ ३८ ॥ रानी ने भी कहा कि 'राजन् ! मृगावती को सहस्रानीक के लिए अवश्य देना चाहिए। यह बात स्वप्न में मुझे किसी ब्राह्मण ने कही है, ऐसा मालूम होता है ।। ३९ ।।

रानी की सम्मति प्राप्त कर प्रसन्नचित्त राजा ने, दूत को, मृगावती का नाचना गाना तथा उसका अप्रतिम रूप दिखाया ॥ ४० ॥ अनुकूल समय में राजा कृतवर्मा ने कमनीय ललित कलाओं की एकमात्र आधार चन्द्रमा की मूर्तिमयी प्रतिमा के समान सुन्दरी उस कन्या मृगावती को विधिपूर्वक राजा शतानीक के लिए दे दिया ।।४१।। 

जिस प्रकार शास्त्र और बुद्धि का संगम परस्पर आदान-प्रदान के लिए होता है, उसी प्रकार सहस्रानीक और मृगावती का समागम भी परस्पर गुणों के आदान-प्रदान के लिए हुआ ||४२ || कुछ समय के अनन्तर राजा के मन्त्रियों के पुत्र उत्पन्न हुए। प्रधान मंत्री युगन्धर का पुत्र यौगन्धरायण, सेनापति सुप्रतीक का पुत्र रुमण्वान् और राजा के नर्म सचिव (विदूषक) का पुत्र वसन्तक नामक हुआ ।।४३-४४ ।।

कुछ दिनों के अनन्तर राजा सहस्रानीक की पीले मुखवाली पत्नी मृगावती ने भी गर्भ- धारण किया ।। ४५ ।। गर्भ धारण के अनन्तर रानी ने रुधिर से भरी हुई क्रीड़ा-वापी मे गोता लगाने की इच्छा उस राजा से प्रकट की, जिसे ( राजा को) देखते-देखते उसकी आँखे तृप्त नही होती थीं ॥ ४६ ॥

धार्मिक राजा सहस्रानीक ने रानी की इच्छा पूर्ति के लिए लाख आदि लाल वस्तुओं के लाल रस से भरी बावली बनवाई; जो रक्त से भरी मालूम होती थी ।। ४७ ।।

उस लाल वापी में स्नान करती हुई लाल लाख के रस से लिपटी हुई रानी को देखकर गरुड़ वंश के किसी पक्षी' ने, मांसपिड समझकर उठा लिया ॥ ४८ ॥ गरुड़वंशीय पक्षी द्वारा उड़ाकर ले जाई गई रानी को ढूंढने के लिए व्याकुलचित्त राजा सहस्रानीक का धैर्य नष्ट हो गया ।। ४९ ।।

उस पक्षी ने केवल रानी को ही नहीं, रानी के प्रति अनुरक्त राजा के चित्त का भी हरण कर लिया। इसी कारण राजा मूच्छित होकर पृथ्वी पर गिर गया ॥ ५०॥  कुछ समय के अनन्तर राजा के सचेत होने पर अपने प्रभाव से स्थिति को समझकर मातलि, आकाश मार्ग से उतरकर राजा के पास आया ॥ ५१॥

मातलि ने राजा को आश्वासन देते हुए पूर्व समय में तिलोत्तमा द्वारा दिये गये शाप का वृत्तान्त और चौदह वर्ष की अवधि का समाचार सुनाया। राजा के कुछ स्वस्थ होने पर मातलि पुन. स्वर्ग को चला गया ।। ५२ ।।

'हा प्रिये, अब उस पापिन तिलोत्तमा का मनोरथ पूर्ण हो गया - इस प्रकार शोक-विह्वल राजा विलाप करता रहा ।। ५३ ।। तिलोत्तमा के शाप का समाचार जानता हुआ और मन्त्रियों द्वारा समझाया बुझाया गया राजा किसी प्रकार आश्वस्त हुआ || ५४ ॥

उधर वह पक्षिराज भी रानी को उड़ाकर ले गया; किन्तु जीवित देखकर उसने उदय पर्वत पर उसे ( रानी को) छोड दिया ।। ५५॥ छोड़कर पक्षी के चले जाने पर, शोक और भय से व्याकुल रानी ने दुर्गम पर्वत पर अपने को अनाथ पाया ॥५६॥ अनन्तर एक वस्त्र पहने हुई जंगल में रोती हुई उस एकाकिनी रानी को खाने के लिए एक भारी अजगर तैयार हुआ ॥५७॥

सहसा दिखकर अन्तहित हुए किसी दिव्य पुरुष ने अजगर को मारकर उस शुभ भविष्य- वाली रानी की रक्षा की ।। ५८ ।। रानी ने दुःख के कारण स्वयं मरने की इच्छा से जंगली हाथी के सामने अपना शरीर फेक दिया (अपने को डाल दिया ), किन्तु मानों दया से उसने भी रानी की रक्षा की ।। ५९ ।। आँखों के सामने पड़ी हुई रानी को हिस्र जन्तु (हाथी) ने नहीं मारा, यह आश्चर्य है ! ईश्वर की इच्छा से क्या नहीं हो सकता ॥ ६० ॥

इसके अनन्तर गर्भभार से अलसाती हुई और पतन (गिरकर प्राण देने) के लिए तैयार वह कोमल बालिका फुट-फूटकर रोने लगी ॥ ६१ ॥

उसके करुण क्रन्दन को सुनकर फल-मूल संग्रह करते हुए एक मुनिपुत्र ने मूर्तिमती शोक-देवता के समान उस रानी को देखा ॥ ६२ ॥ दयालु मुनिकुमार रानी से सब वृत्तान्त सुनकर और उसे किसी प्रकार धीरज बँधाकर, जमदग्नि ऋषि के आश्रम में ले गया ॥ ६३ ॥

वहाँ पर उसने मूर्त्तिमान् आश्वासन के समान, तेज से उदयाचल पर मानों बालार्क (शिशू सूर्य) को स्थिर करते हुए जमदग्नि को देखा ।। ६४ ।।

शरणागतों पर दया करनेवाले दिव्यदृष्टि ऋषि ने पैरों पर पड़ी हुई एवं वियोग-दुःख से पीड़ित रानी को कहा- 'बेटी ! अपने पिता के वंश को चलानेवाला तेरा पुत्र इसी आश्रम में उत्पन्न होगा और पति के साथ तेरा मिलना भी होगा। अत. शोक मत करो ।।६५-६६ ।।

जमदग्नि मुनि द्वारा इस प्रकार आश्वस्त पतिव्रता मृगावती ने प्रिय पति के मिलन की आशा के साथ-साथ उस आश्रम में निवास स्वीकार किया ॥ ६७ ॥

उदयन के जन्म की कथा

कुछ दिनों के बीतने पर सदाचारिणी मृगावती ने सत्संगति सदाचार के समान अनेक गुणों से युक्त पुत्ररत्न उत्पन्न किया ॥ ६८ ॥

पुत्र के उत्पन्न होते ही मृगावती के चित को आश्चर्य और हर्ष देनेवाली आकाशवाणी हुई यह उदयन नाम का महायशस्वी राजा उत्पन्न हुआ है। इस (रानी) का बालक, समस्त विद्याधरों का राजा होगा ।।६९-७० ।।

तब वह बालक उदयन, उस तपोवन में अपने साथ उत्पन्न हुए मित्रों के समान सद्गुणों के साथ-साथ बढ़ने लगा ॥ ७१ ॥ जमदग्नि ऋषि ने उसके सभी क्षत्रियोचित संस्कार करने के अनन्तर उसे सभी विद्याओं में और धनुर्वेद ( शस्त्रविद्या) में शिक्षित किया ॥ ७२ ॥

उसकी माता मृगावती ने स्नेह के कारण सहस्रानीक के नाम से अंकित कंकण (हाथ के कड़े) को अपने हाथ से निकालकर उसके हाथ में पहना दिया ।। ७३ ।। किसी समय हिरण के शिकार के प्रसंग में घूमते हुए उदयन ने जंगल में एक शबर' (एक भील) के द्वारा बलपूर्वक पकड़े हुए सर्प को देखा ।। ७४ ।। उस सुन्दर सर्प पर दयालु होकर उदयन ने किरात (शबर) से कहा- 'मेरे कहने से तुम इस सॉप को छोड़ दो ।। ७५ ।।

तब उस जंगली ने कहा- 'स्वामी, यह मेरी जीविका का साधन है। मैं अत्यन्त निर्धन व्यक्ति हूँ। 'साँपों को खेलाता हुआ जीवित रहता हूँ ॥ ७६ ॥ पहले सर्प के मर जाने के कारण मैंने सारे जंगल में ढूंढते ढूंढते बड़ी कठिनाई और मन्त्र तथा औषधि के बल से इसे पाया और पकड़ा है ॥ ७७ ॥

सँपेरे की बात सुनकर त्यागी उदयन ने माता का दिया हुआ कड़ा, सपेरे को (साँप के बदले मे ) दे दिया और उसने साँप को छोड़ दिया ॥७८॥

कंकण लेकर सँपेरे के चले जाने पर प्रसन्न वह सर्प उदयन के सम्मुख मनुष्य रूप में खड़ा होकर प्रणाम करके कहने लगा ॥ ७९ ॥

'मैं बसुनेमि नामक नाग, वासुकि नाग का बड़ा भाई हूँ, तुमने मेरी रक्षा की है, अतः मुझसे अत्यन्त रमणीय स्वरवाली और श्रुतिभागों से विभक्त यह वीणा ग्रहण करो। साथ ही, कभी न कुम्हलानेवाली यह माला तथा तिलक-युक्ति के साथ कभी न सूखनेवाली यह पान की लता भी ग्रहण करो' ॥। ८०-८१ ।।

उदयन उस वीणा को लिये हुए माता की आंखों में मानों अमृत बरसाते हुए जमदग्नि के आश्रम में आया ॥ ८२ ॥ इस बीच वह सँपेरा भी जंगल में घूमता-घामता दैवयोग से उदयन द्वारा प्राप्त उस सुवर्ण- कंकण को बाजार में बेचता हुआ पकड़ा गया ॥ ८३ ॥

उस (कंकण ) पर राजा का नाम लिखा होने के कारण सिपाही उसे पकड़कर राजभवन में ले गये ॥ ८४ ॥ राजभवन में, 'तुमने यह कडा कहाँ पाया, इस प्रकार शोक संतप्त राजा सहस्रानीक ने उस सँपेरे से पूछा ॥ ८५ ॥

राजा के पूछने पर सँपेरे भील ने उदय पर्वत पर सॉप पकड़ने से लेकर यहाँ तक का सारा वृन्तान्त राजा कह सुनाया ॥ ८६ ॥ भील द्वारा यह समाचार जानकर और पत्नी के उस कंकण को पहचानकर राजा सहस्रानीक विचारो के हिडोले मे झूलने लगा ॥ ८७॥

'राजन् ! तुम्हारा शाप नष्ट हो गया है। तुम्हारी रानी मृगावती, पुत्र के साथ, उदय पर्वत पर जमदग्नि के आश्रम में है।' इस प्रकार की आकाशवाणी ने वियोग की अग्नि में जलते हुए राजा को इस प्रकार आनन्दित कर दिया, जैसे ग्रीष्मकाल की जलधारा, मयूर को आनन्दित कर देती है ।।८८-८९ ॥

तदनन्तर प्रिया मिलन की उत्कंठा से दीर्घाभूत उस दिन के किसी प्रकार बीतने पर दूसरे दिन प्रात काल, बेचैन राजा सहस्रानीक, प्रियतमा को प्राप्त करने के लिए उसी सपेरे (भील) को पथ-प्रदर्शक बनाकर अपनी सेनाओ के साथ उदयाचल के आश्रम की ओर चला ।। ९० ॥

प्रथम तरंग समाप्त




★★★★★
१. शिवजी के तृतीय नेत्र की अग्निज्वाला से कामदेव भस्म हो गया था। अतः पुमः उनके संगम के समय उसने आग बुझाने के लिए अग्नि-विरोधी वारुणास्त्र का रखना आवश्यक समझा, जो जलमय है। नववधू के नव समागम में स्वेद का अधिक मात्रा में होना स्वाभाविक है। अतः कवि ने उस पर जलमय वारुणास्त्र को सुन्दर उत्प्रेक्षा की है।

२. श्रद्धेय और प्रामाणिक व्यक्तियों द्वारा कही गई बातें आदरणीय होती हैं, ऐसी शिष्ट - परम्परा है। उसी के अनुसार इस विद्याधर- कथा की प्रामाणिकता के लिए गुणाढ्य ने उसकी महत्वपूर्ण परम्परा की सूचना दी है कि यह कथा मेरी कल्पित नहीं, प्रत्युत इसका उद्गम भगवान् शिव के मुख से हुआ है। अनु०

३. चरु –> चावल, चीनी और दूध मिला हुआ हवन- द्रव्य ।

४. अरेबियन नाइट्स में सिंदबाद जहाजी की कहानी में ऐसे पक्षी का वर्णन आता है। कुछ लोग इसे कल्पित पक्षी मानते हैं। पर्वतों में ऐसे पक्षी दीखते हैं; जो बड़े-बड़े साँपों और पशुओं के बच्चों को उठा ले जाते हैं। -- अनु०

५. उस पर्वत पर मुनि अपने तेजस्वी मुखमण्डल से उदीयमान सूर्य की भाँति चमकते रहते थे। - अनु०

६. 'शबर' एक प्रकार की जाति है, जिसे सपेरा भी कहते हैं।

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