5904. || चतुर्थ कहानी || नरवाहनवल का मृगया-वर्णन; चार दिव्य पुरुवों की कथा; नरवाहनदत्त का श्वेतद्वीप में जाना और विष्णु-सेवा की प्राप्ति; नरवाहनदत्त का नारिकेलद्वीप में जाना; समुद्र वैश्य की कथा; राजा चमरवाल की कथा; राजा बहुसुवर्ण की कथा; अर्थवर्मा और भोगवर्मा बनिये की कथा;
5904 . || चतुर्थ कहानी || नरवाहनवल का मृगया-वर्णन; चार दिव्य पुरुवों की कथा; नरवाहनदत्त का श्वेतद्वीप में जाना और विष्णु-सेवा की प्राप्ति; नरवाहनदत्त का नारिकेलद्वीप में जाना; समुद्र वैश्य की कथा; राजा चमरवाल की कथा; राजा बहुसुवर्ण की कथा; अर्थवर्मा और भोगवर्मा बनिये की कथा; चतुर्थ तरंग नरवाहनदत्त का मृगया-वर्णन तदनन्तर, परम स्नेही गोमुख आदि मन्त्रियों के साथ पिता बत्सराज के घर में रहता हुआ और मान के विश्न को सहन न कर मकने के कारण प्रेम से नष्ट ईर्ष्यावाली अनुरागिणी अलंकारवती के साथ विहार करता हुआ नरवाहनदत्त, पीछे बैठे हुए गोमुख के साथ रथपर बैठकर मृगया-वन (शिकारगाह) को गया ।॥१-३॥ आगे-आगे चलते हुए नवीन ब्राह्मण सेवक प्रलम्बबाहु के तथा अपने सैनिकों के साथ वह आखेट करने लगा ॥४॥ रथ के घोड़ों के, पूरे प्राण लगाकर भागे जाने पर भी, प्रलम्बबाडू, उनके वेग को जीतकर, सदा उनके बागे ही रहता था ।।५।। नरवाहनदत्त, रथ में बैठकर सिंह, व्याघ्र आदि पशुओं को मारता था; किन्तु प्रसम्ब बाहु, पैदल हो चलता हुआ तलवार से हो उन्हें मार डालता था ।।६।। नरवाहनदत्त, प्रलम्बबाहु के कौतुक को, देख-देखकर आ...