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5603. || तीसरी कहानी || कलिंगसेना का वृत्तान्त; सोमप्रभा की कथा; कीर्ति सेना की कथा

5603. || तीसरी कहानी || कलिंगसेना का वृत्तान्त; सोमप्रभा की कथा; कीर्ति सेना की कथा तीसरा तरंग कलिंगसेना का वृत्तान्त क्रमशः तदनन्तर प्रात काल होते ही सोमप्रभा ने सस्वी के मनोविनोद के लिए एक डोलची में लकडी की पुतलियों तथा विविध प्रकार के यन्त्रमय खिलौनों को सजाया और उसे साथ लेकर आकाश में विहार करती हुई वह राजकुमारी कलिंगसेना के घर पर पहुँची ॥१-२॥ कलिगसेना भी उसे अती हुई देखकर आनन्द के आँसुओं से भरी हुई उठकर उसके कहने लगी- हे सखि ! तुम्हारे मुख-रूपी त्रियामा (तीन प्रहोंवाली रात) शक्त्यामा पाम गई और उसे गले लगाकर पाम में बैठाकर पूर्ण चन्द्रमा के दर्शन के विना आज की मेरी काली (नौ प्रहरोंवाली गत) के समान व्यतीत हुई ॥३-४।। न जाने तुम्हारे साथ मेरा पूर्वजन्म का कौन-सा मम्वन्ध है, जिसका कि यह परिणाम है। हे देवि, यदि जानती हो, तो कहो' ॥५॥ यह सुनकर सोमप्रभा उस राजपुत्री से इस प्रकार कहने लगी- 'मुझे इतना ज्ञान नहीं है। मैं पूर्वजन्म को स्मरण करनेवाली नहीं हूँ ॥६॥ इस विषय को मुनि लोग भी नहीं जानते; जो जानते भी हैं, तो उन्होंने पूर्वजन्म में ऐसा ही पुण्य किया होता है कि जिससे वे दूसरों के ...