5603. || तीसरी कहानी || कलिंगसेना का वृत्तान्त; सोमप्रभा की कथा; कीर्ति सेना की कथा

5603. || तीसरी कहानी || कलिंगसेना का वृत्तान्त; सोमप्रभा की कथा; कीर्ति सेना की कथा

तीसरा तरंग

कलिंगसेना का वृत्तान्त क्रमशः

तदनन्तर प्रात काल होते ही सोमप्रभा ने सस्वी के मनोविनोद के लिए एक डोलची में लकडी की पुतलियों तथा विविध प्रकार के यन्त्रमय खिलौनों को सजाया और उसे साथ लेकर आकाश में विहार करती हुई वह राजकुमारी कलिंगसेना के घर पर पहुँची ॥१-२॥

कलिगसेना भी उसे अती हुई देखकर आनन्द के आँसुओं से भरी हुई उठकर उसके कहने लगी- हे सखि ! तुम्हारे मुख-रूपी त्रियामा (तीन प्रहोंवाली रात) शक्त्यामा पाम गई और उसे गले लगाकर पाम में बैठाकर पूर्ण चन्द्रमा के दर्शन के विना आज की मेरी काली (नौ प्रहरोंवाली गत) के समान व्यतीत हुई ॥३-४।।

न जाने तुम्हारे साथ मेरा पूर्वजन्म का कौन-सा मम्वन्ध है, जिसका कि यह परिणाम है। हे देवि, यदि जानती हो, तो कहो' ॥५॥

यह सुनकर सोमप्रभा उस राजपुत्री से इस प्रकार कहने लगी- 'मुझे इतना ज्ञान नहीं है। मैं पूर्वजन्म को स्मरण करनेवाली नहीं हूँ ॥६॥

इस विषय को मुनि लोग भी नहीं जानते; जो जानते भी हैं, तो उन्होंने पूर्वजन्म में ऐसा ही पुण्य किया होता है कि जिससे वे दूसरों के पूर्वजन्म की बात जानते हैं' ॥ ७॥

इस प्रकार प्रेम और विश्वास से सोमत्रभा को मधुर कहती हुई कलिंगसेना ने, एकान्त में, कौतुक के साथ पूछा ॥८॥

'हे सुलक्षणे, हे सखि, यह तो बता कि सुन्दर चरित्रवाली तूने अपने जन्म से किस देवजाति के बंश को मोती के समान धन्य किया है। संसार के कानों के लिए सुनने में अमृत के समान तेरा नाम क्या है ? इस बाँस की डोलची को क्यों लाई है और इसमें क्या वस्तु है ।॥९-१०॥ 

कलिंगसेना के स्नेह-भरे वचन सुनकर सोमप्रभा क्रम से सब कहने लगी ॥११॥

सोमप्रभा की कथा 

तीनों लोक में विख्यात मय नाम का एक असुर है। उसने अपने आसुरी भाव को छोड़-कर भगवान् विष्णु की शरण ली ॥१२॥

विष्णु से अभयदान प्राप्त कर उसने इन्द्र की सुधर्मा नामक सभा का निर्माण किया। इसलिए उसे देवताओं का पक्षपाती मानकर वैत्यगण उस पर क्रोध करने लगे ।।१३।।

उनके भय से उसने विन्ध्यपर्वत मे एक मायामय गुहा-मन्दिर का निर्माण किया। वह बड़े-बड़े असुरों के लिए अगम्य और अनेक आश्चयों से भरा है ॥१४॥

उस मय नामक असुर की हम दो ब्रह्मचारिणी कन्याएँ हैं। बड़ी स्वयंप्रभा नाम की कुमारी घर में रहती है ॥१५॥

मैं उसकी सोमत्रभा नाम की छोटी कन्या हूँ और कुबेर के पुत्र नलकूबर को दी गई हूँ। मेरे पिता ने मुझे अनेक मायामन्त्र सिखाये है। तुम्हारे प्रेम से लाये गये यन्त्रमय खिलौनों से यह डोलची भरी है ।।१६-१७।।

ऐसा कहकर उसने डोलची को खोलकर लकडी की बनी हुई अनेक पुतलियाँ उसे दिखाई ॥१८॥

कोई पुतली, कुंजी घ्माने से आकाश में उड़कर उसकी आज्ञा में फूलों की माला ले आई। कोई इसी प्रकार पानी ले आई, कोई नाचने लगी और कोई बातचीत करने लगी ।। १९-२०।।

इस प्रकार के महान् आश्चर्यों से उमने कुछ समय तक कलिगसेना का मनोविनोद करके पुतलियों को डोलची में रख दिया। तदनन्तर उत्कंठित कलिंगसेना से पूछकर सोमप्रभा पति की सेवा के लिए आकाश-मार्ग से अपने घर चली गई ॥ २१-२२॥

कलिंगसेना उन पुतलियों के आश्चर्य को देखकर इतनी हर्षित हुई कि वह अपनी भूख को भी भूल गई। उस दिन उसने भोजन नहीं किया। प्रसन्नता से निराहार रह गई ॥ २३॥

यह देखकर उसकी माता ने रोग की शंका से उसे आनन्द नामक वैद्य को दिखाया और आनन्द ने उसकी भली भाँति परीक्षा करके बताया ॥२४।।

'किसी अत्यन्त हर्ष के कारण इसकी भूख नष्ट हो गई; रोग से नहीं। विकसित नयनों-वाला हँसता हुआ इसका मुख भी यही बताता है' ।॥२५॥

ऐसा सुनकर उसकी माता ने उससे हर्ष का कारण पूछा तो उसने सारी घटना अपनी माता को सुना दी ॥२६॥

तदनन्तर अच्छी सहेली की मित्रता से प्रसन्न कलिंगसेना का अभिनन्दन करके माता ने समयानुकूल भोजन कराया ॥ २७॥

अनन्तर एक दिन इस घटना को जाननेवाली सोमप्रभा एकान्त में कलिंगसेना से मिलकर कहने लगी ॥२८॥

मैंने अपने सर्वज्ञ पति से तेरा सारा वृत्तान्त सुनाकर प्रति दिन तेरे पास आने की आज्ञा ले ली है।॥॥२९॥

इसलिए तू भी अपने माता-पिता से आज्ञा लेकर मेरे यहाँ चलने की तैयारी कर। ऐसा होने पर तू भी मेरे साथ स्वच्छन्दतापूर्वक भ्रमण कर सकेगी ॥३०॥

ऐसा कहती हुई सोमप्रभा कलिंगसेना का हाथ पकड़कर उसे अपने माता-पिता के पास ले गई ॥३१॥

वहाँ जाकर उसने अपनी सहेली सोमप्रभा के नाम और कुल आदि का परिचय देते हुए अपने माता-पिता को दिखलाया ॥ ३२॥

माता तारादत्ता को भी उसे दिखाया और वे दोनों कलिगसेना के कथनानुसार सोमप्रभा को देखकर प्रसन्न हुए ॥३३॥

सोमप्रभा की आकृति में प्रसन्न वे दोनों अन्यन्त स्नेह से सोमप्रभा का स्वागत सत्कार करके बोले- 'बेटी ! इस कलिंगसेना को हमने तुम्हारे हाथ सौप दिया है। अब तुम दोनों अपनी इच्छानुसार खेलो' ।॥ ३४-३५।।

उनके वचनों से प्रसन्न होकर सोमप्रभा और कलिंगसेना वहाँ से निकलीं ॥ ३६॥

तदनन्तर वह राजा द्वारा बनवाये गये बिहार का विहार (सैर) करने चलीं और मायामय यन्त्रों की डोलची भी लाई। वहाँ विहार में सोमप्रभा ने यन्त्र के बने यक्ष को बुद्ध की पूजा का सामान लाने की आज्ञा दी। वह यक्ष सोमप्रभा के अज्ञानुसार लम्बा रास्ता तय करके रत्न, मोती और सोने के कमल आदि लेकर आ गया ।। ३७-३९।।

उन रत्नों, मोतियों और स्वर्णकमलों से पूजा करके सोमप्रभा ने बुद्ध भगवान् की मूत्ति को सुन्दरता से अलंकृत कर दिया, यह सुनकर राजा कलिंगदत्त अपनी रानी के साथ वहाँ आया और उसने यन्त्रों के सम्बन्ध में सोमप्रभा से पूछा ॥४०॥

तब सोमप्रभा ने राजा से कहा- 'राजन् ! पहले समय में मेरे पिता ने ऐसी-ऐसी कूट-यन्त्र आदि की अनेक कारीगरी की थी। उन्हीं के बनाये ये यन्त्र हैं। इनमें पंचभूतों के समुदाय मे बनाया हुआ एक जगत् यन्त्र है। इसके अतिरिक्त ये और यन्त्र हैं। इनका अलग-अलग परिचय आप सुनें ॥४१-४३।।

एक यन्त्र पृथ्वी-तत्त्वप्रधान है, जो द्वार आदि को बन्द कर देता है। इस यन्त्र द्वारा बन्द क्रिये गये द्वार किसी में भी नहीं खुल सकते ॥४४।।

दूसरे, इस जल-नत्त्वप्रधान यन्त्र का आकार मजीव-सा प्रतीत होता है। तीसरा तेजस्तत्त्व प्रधान यन्त्र ज्वाला फेंकता है।॥४५॥

चौथा, वात-तत्त्वप्रधान यन्त्र, आने-जाने, चलने-फिरने आदि की क्रिया करता है। पाँचवाँ, आकाश-तत्त्वप्रधान यन्त्र, आकाश में होनेवाला वार्तालाप करता है ॥४६॥

मैंने पिता से इन यन्त्रों को प्राप्त किया है; किन्तु अमृत की रक्षा करनेवाले चत्र्यन्त्र का रहस्य मेरे पिता ही केवल जानते हैं, दूसरा नहीं ॥४७॥

जब सोमत्रभा इस प्रकार राजा से यन्त्रों का विवरण कर रही थी, उसी समय मानों उसकी बातों का समर्थन करने के लिए बजाये जाते हुए शंखों की ध्वनि हुई ॥४८॥

तब भोजन के लिए राजा के पूछने पर और अपने योग्य भोजन राजा से मँगा देने के लिए कहकर तथा उससे आज्ञा लेकर सोमप्रभा कलिंगसेना को साथ ली हुई यन्त्र-निर्मित विमान से अपने घर की ओर चली और अपनी सहेली कलिंगसेना को अपनी बड़ी बहिन स्वयंप्रभा के पास ले गई ॥४९-५१॥

कलिंगसेना ने वहाँ उस स्वयंप्रभा को जटाजूट धारण किये हुई, माला पहिने हुई, लटकती हुई स्फटिक की मालावाली और अत्यन्त स्वच्छ श्वेत वस्त्र से लिपटी हुई, मानों हँसती हुई पार्वती के समान कामभोग-रूपी महाभोग के लिए उग्र तप. क्रिया करती हुई देखा ।।५२-५३।।

स्वयंप्रभा ने भी सोमप्रभा द्वारा परिचित कराई गई राजकुमारी कलिंगसेना का फला-हार देकर स्वागत सत्कार किया ॥५४।।

तब सोमप्रभा ने कहा- 'सखि, इन फलों के खाने से, कमलिनी को नष्ट करनेवाली हिमवर्षा के समान तुम्हारे सुन्दर रूप को नष्ट करनेवाली वृद्धावस्था कभी नही आयेगी ।॥५५॥

इसीलिए मैं तुम्हें यहाँ लाई हूँ। तब तुरन्त अमृतवर्षा से सींची हुई-सी कलिगसेना ने उन फलों को खाया ।।५६।।

वहाँ कौतुक से घूमते हुए उसने उस नगर के उद्यान को देखा, जिसमे सोने के कमलों से खिली हुई बावलियाँ थीं, अमृत के गमान स्वादिष्ठ फत्रोंवाले वृक्ष थे, हंह्म आदि विचित्र पक्षियों से वह उद्यान भग था। वह उद्यान शून्य में मणियों के स्तम्भों का भ्रम उत्पन्न कर रहा था और शून्य में दीवारों की कथा तथा दीवारों में शून्यता का भ्रम उत्पन्न कर रहा था। पानी में स्थल को और स्थल में पानी की प्रनीति उत्पन्न कर रहा था। मय दानव की माया से निर्मित इस प्रकार का वह नगर एक अपूर्व नवीन संभार के समान था ॥५८-६०।।

इस नगर में किमी ममय सीता को ढूंढते हुए बन्दर घूम आये थे; किन्तु स्वयंप्रभा की कृपा से चिरकाल के पश्चात् उन्हे बाहर निकलने का अवसर मिला था ।।६१।।

इस नगर को भली-भाँति देखने से चकित और वृद्धावस्था से मुक्त कलिगसेना को लेकर और स्वयप्रभा से आज्ञा लेकर, सोमप्रभा, यन्त्रनिर्मित वायुयान द्वारा तक्षशिला को गई ।।६२-६३॥

वहाँ जाकर कलिगसेना ने सब वृत्तान्त माता-पिता को सुनाया, इससे वे दोनों और कालिगसेना भी अत्यन्त सन्तुष्ट हुए ।।६४।।

इस प्रकार उन दोनों सखियों के मिलते-जुलते अनेक दिनों के बीतने पर एक बार सोमप्रभा ने कलिगसेना से कहा ।।६५।।

जबतक तू विवाहित नही है, तभी तक मेरी तेरी मित्रता है। फिर तेरे पतिगृह में चले जाने पर मेरी तेरी मित्रता कैसे रहेगी। मैं वहाँ कैसे आऊँगी ॥६६॥

सहेली के पति को न देखना चाहिए और न उसे स्वीकार ही करना चाहिए। दूसरी बात यह है कि भेड़ के मांस को भेड़िये के समान, सास, बहू के मांस को खा जाती है। मैं इस सम्बन्ध में तुझे कोसिसेना की एक कथा सुनाती हूँ ॥ ६७-६८।।

कीर्तिसेना की कथा

पाटलिपुत्र में धनिकों में श्रेष्ठ, यथार्थ नामवाला घनपालित नाम का एक वणिक् रहता था। उसकी कीर्तिसेना नाम की एक कन्या थी, जो रूप में असाधारण और बनिये को प्राणों से भी अधिक प्यारी थी ।।६९-७०॥

घनपालित ने अपने ही समान धनी मगध के वैश्य देवसेन को वह कन्या दे दी ।।७१।।

अत्यन्त सज्जन और सच्चरित्र देवसेन की माता बड़ी दुर्जन थी और देवसेन के पिता के मर जाने के कारण वही गृह-स्वामिनी थी ॥७२॥

वह सास, देवसेन की पत्नी अर्थात् अपनी बहू कीर्तिसेना से जलती रहती थी और पति के पीछे उसे कष्ट दिया करती थी ।॥ ७३।।

बेचारी कीर्तिसेना अपनी उस दुर्दशा को अपने पति से नहीं कह सकती थी। दुष्ट सास के वश में पड़ी हुई बहू की स्थिति अत्यन्त दु.खद होती है ।॥७४॥

एक बार उसका पति बन्धुओं की प्रेरणा से व्यापार करने के लिए वलभी नगरी को जाने के लिए उद्यत हुआ ।।७५।।

तब कीर्तिसेना ने पति से कहा- 'आर्यपुत्र ! इतने दिनों तक तो तुमसे मैंने नहीं कहा ।।७६।।

जब माता (सास) तुम्हारे यहाँ रहते हुए मेरी दुर्दशा करती रहती है, तब तुम्हारे परदेश जाने पर मुझ पर क्या-क्या अत्याचार करेगी, यह मैं नहीं कह सकती' ।॥७७॥

यह सुनकर घबराया हुआ और उसके प्रेम से डरा हुआ वैश्य अपनी माता को प्रणाम करता हुआ कहने लगा-॥७८॥

'माता, मेरे जाने पर अब कीर्तिसेना तुम्हारे हाथ है। उससे रूखा व्यवहार न करना; क्योंकि यह ऊँचे कुल की कन्या है' ।।७९।।

यह सुनते ही त्योरी चढ़ाकर माता देवसेन से बोली- ॥८०॥

'तू ही इससे पूछ ! मैंने इसका क्या किया है। यह मेरे विरुद्ध तुझे उभाड़ती है और यह स्त्री हमारे घर में फूट डालनेवाली है। मेरे लिए तो तुम दोनों समान हो ॥८१॥

यह सुनकर वह सज्जन वैश्य चुप हो गया। सच है, प्रेम और कपट से भरे हुए माता के वाक्य से कौन नहीं ठगा जाता ॥८२॥

घबराहट से मुस्कराती हुई कीर्तिसेना भी उस समय चुप रही। दूसरे दिन देवसेन बलभी को चला गया ॥८३॥

उसके चले जाने के पश्चात् विरह-ऋष्ट से जर्जरित कीर्तिसेना की सास ने धीरे-धीरे उसकी दासियों को निकाल दिया ।।८४।।

और, अपने घर की पुरानी दासी के साथ सलाह करके कीर्तिसेना को धोखे से कोठरी के अन्दर बुलाकर नंगी कर दिया और बोली- ॥८५॥

'पापिन ! मेरे लड़के को मुझसे अलग करती है' ऐसा कहकर, उसके केश पकडकर उस दामी की सहायता से लातों, घूसों, दाँतों और नखों से मारने, काटने और नोचने लगी ।। ८६।।

और, उसे घर के उस तहखाने के अन्दर ढकेलकर बाहर से लकडी की दृढ अर्गला से बन्द कर दिया; जिस तहग्बाने से पूर्वजों का सारा संचित धन निकाल लिया गया था ॥८७॥

दिन बीतने पर मिट्टी के एक पात्र में आधा पात्र भात, वह उसे खाने के लिए दिया करती थी ॥८८॥

उसे तहखाने में बन्द करके साम ने सोचा कि पति के दूर रहने पर यह इस प्रकार स्वय मर जायगी, तो कुछ दिनों के बाद कहूंगी कि वह भाग गई ॥८९॥

इस प्रकार पापिन साम द्वारा तहखाने में बन्द की गई कीत्तिसेना सोचने लगी ॥९०॥

'मेरा पति धनी है और मैं स्वयं अच्छे और ऊँचे कुल में उत्पन्न हुई, सौभाग्यवती हूँ और चरित्र भी शुद्ध है। फिर भी मुझे सास के प्रभाव से ऐसी विपत्ति भोगनी पड़ रही है ॥ ९१॥

ठीक है कि परिवारवाले इसीलिए कन्या के जन्म की निन्दा करते है; क्योंदिः कन्या-जीवन सास, ननद और विधवापन से दूषित हो जाता है' ।॥९२।।

ऐसी सोचती हुई कीर्तिसेना को उस तहखाने में अकस्मात् एक खुरपी (भूमि खोदने का औजार विशेष) मिल गई. मानों वह निकाला हुआ उसके हृदय का काँटा हो ॥९३॥

उस लोहे की खुरपी से वह तबतक सुरंग खोदती रही, जबतक वह अपने रहने के भवन में न निकल गई ।॥९४।।

तदनन्तर उस सुरंग-पथ से अपने कमरे में निकली हुई कीत्तिसेना ने वहाँ पहले के रखे हुए दीपक के सहारे उस घर को देखा; मानों उसने अपने बढ़ते हुए धर्म के बलपर उसे अलोकित कर दिया हो ॥९५।।

वहाँ से वह अपने वस्त्र और स्वर्णाभूषण आदि लेकर निशान्त (अत्यन्त प्रभात) में गुप्त रूप से निकलकर नगर से बाहर चली गई ।॥९६॥

'ऐमी स्थिति में मुझे पिता के घर न जाना चाहिए लोग क्या कहेंगे और कैसे विश्वास करेंगे ?' ।॥९७॥

इसलिए मुझे अपनी युक्ति से पति के पास ही जाना चाहिए; क्योंकि पतिव्रताओं के लिए पति ही इस लोक में और परलोक में गति है ॥९८॥

उसने ऐसा सोचकर वहाँ तालाब में स्नान करके पूर्णरूप से राजपुत्र का वेश बनाया और बाजार में सोना बेचकर, उसका मूल्य लेकर उस दिन उसी नगर के किसी बनिये के घर में रात्रि व्यतीत की ।।९९।।

दूसरे दिन, वलभी जाने के लिए उद्यत समुद्रसेन नामक वैश्य से उसने बात की और सेवक के साथ जाते हुए समुद्रसेन के साथ राजकुमार का वेष धारण की हुई कीत्तिसेना, पह‌ले पये हुए पति को प्राप्त करने के लिए वलभी को चली गई ॥१००-१०२॥

अपना परिचय देती हुई वह उम वैश्य से कहने लगी कि 'कुटुम्ब के लोगों से तंग आकर तुम्हारे साथ अपने आत्मीय व्यक्ति के पास जा रहा हूँ, यह सुनकर उस वैश्यपुत्र ने भी 'यह कोई कुलीन और भद्र राजपुत्र है', ऐसा समझकर मार्ग में उनकी यथोचित सहायता की ।। १०३-१०४।।

व्यापारी वैश्यों का वह दल, मार्ग शुल्क अथवा चुंगोकर की अधिकता से बचने के लिए, उस मार्ग को छोड़कर अन्य जंगली मार्ग को पकड़कर, चलनेवाले अधिक व्यक्तियों के मार्ग से चला ।। १०५।।

कुछ दिनों के पश्चात् वह दल घोर जंगल के मुहाने पर पहुँचकर ठहर गया। उसी समय यमराज की दूती के समान एक शृगाली ने भयंकर रूप से रोना प्रारम्भ किया ॥१०६।।

उस अपशकुन को समझनेवाले वैश्य व्यापारियों ने चोर-डाकुओं आदि के आक्रमण की शंका से सावधान होकर, रक्षकदल के सिपाहियों के शस्त्र लेकर तैयार हो जाने पर, शत्रुओं की प्रथम सेना-पंक्ति के समान अधकार के चारों ओर फैल जाने पर, पुरुषवेशधारिणी कीत्तिसेना मोचने लगी-॥१०७-१०८।।

पापियों के कर्म मन्तान द्वारा बढ़ते हैं। अर्थात्, उनके पापों का फल सन्तान को भोगना पड़ता है। देखो, सास द्वारा लाई गई विपत्ति इस समय मेरे प्रति फलित हो रही है ॥ १०९॥

मैं सबसे पहले मृत्यु के समान साम के क्रोध से खाई गई फिर दूसरे गर्भवास के समान तहखाने में बन्द की गई ॥११०॥

दैववश पुनर्जन्म के समान वहाँ से निकली। अब आज यहाँ आकर पुनः जीवन के ही सन्देह मे पड़ गई ॥१११।।

यदि मैं चोर-डाकुओं द्वारा मारी गई, तो मेरी वैरिन सास मेरे पति से कहेगी कि वह किसी पर आसक्त होकर घर से निकल गई थी ॥११२॥

यदि वस्त्रों का हरण होने पर मेरे स्त्रीत्व का ज्ञान लोगों को हो गया, तो इससे मेरी मृत्यु अच्छी होगी। चरित्र का नाश अच्छा नहीं ।॥११३॥

इसलिए मुझे अपने चरित्र की ही रक्षा करनी चाहिए। इस वैश्यमित्र की नहीं। सतीत्व-रक्षा ही स्त्रियों का मुख्य धर्म है, मित्र आदि नहीं ।॥ ११४॥

ऐसा निश्चय करके अपने बच्चने के लिए स्थान ढूंढ़ते हुए उसने एक वृक्ष के बीच बना हुआ गुफा के समान एक गड्‌ढा देखा; मानों कृपाकर पृथ्वी ने उसे छिपने के लिए स्थान दिया हो ॥११५॥

उसमें घुसकर और घाम-पत्तो आदि से शरीर को ढंककर, पति-मिलन की अभिलाषा रखती हुई वह वहाँ छिप गई ॥११६।।

तब आधी रात के समय शम्त्र-सज्जित डाकुओं की बड़ी सेना ने व्यापारियों के दल को घेर लिया ॥११७॥

फलत. वहाँ घोर वर्षाकाल के समान घमासान युद्ध छिड़ गया, जिसमें चिल्लाते हुए डाकू काले बादलों के समान थे, शस्त्रों के संघर्ष से निकली हुई अग्नि विद्युत् का काम कर रही थी और रुधिर की घोर वर्षा हो रही थी ॥ ११८ ॥

बलवान् डाक रक्षकों के साथ गमुद्रसेन व्यापारी को मारकर उसका सारा धन और मामान लूटकर ले गये ॥११९।।

उम घमासान युद्ध के समय भीषण चीत्कार सुनकर भी कीत्तिसेना, जो मरी नही, उसमें केवल उसका भाग्य ही कारण था ॥१२०॥

तब रात बीतने और सूर्य के उदय होने पर वह कीर्तिसेना वृक्ष के बीच के गड्‌ढे से बाहर निकली ॥१२१॥

पति की एकमात्र भक्ति और अपने सतीत्व के तेज की दृढ़ता से अपनी रक्षा करनेवाली पतिव्रताओं की आपनि में देवता अवश्य उनकी रक्षा करते हैं ॥१२२॥

क्योंकि, उस निर्जन वन में शेर ने भी उसे देखकर छोड़ दिया, किन्तु कहीं से आते हुए किसी तपस्वी ने उसे नहीं छोड़ा ॥ १२३॥

तपस्वी ने उसका वृत्तान्त जानकर और उसे धैर्य प्रदान कर कमंडलु से जल पिलाया तथा उसे आगे जाने का मार्ग बताकर वह कहीं अलक्षित हो गया ।।१२४।।

तब मानों अमृत-पान करके तृप्त हुई-सी पतिव्रता कीर्तिसेना भूख और प्यास से रहित हो गई और तपस्वी द्वारा प्रदर्शित पथ से आगे बढ़ चली ।। १२५॥

कुछ मार्ग चलने पर, 'एक रात और क्षमा करो', मानों कर (हाथ और किरण) फैला-कर इस प्रकार कहते हुए सूर्य के अस्त हो जाने पर वह एक विशाल जंगली वृक्ष में घर के समान बने हुए खोखले भाग में घुस गई और दूसरी लकड़ी से उसका द्वार बन्द कर दिया ।। १२६-१२७।।

प्रदोषकाल में उसने द्वार के छिद्र से झांककर देखा कि एक भीषण राक्षसी छोटे-छोटे बच्चों के साथ आई ॥१२८।।

उसे देखकर कीर्तिसेना जैसे ही यह सोचने लगी कि अन्यान्य सभी विपत्तियों से पार हो आज मैं इससे खाई जाऊँगी, इतने में ही वह राक्षसी वृक्ष पर चढ गई ।।१२९।।

उसके बच्चे भी उसके पीछे चढ़ गये और माँ से कहने लगे- 'हम लोगों को कुछ भोजन दो' ।॥१३०।।

तब वह राक्षसी उन छोटे बच्चों से बोली- 'बेटा! मैंने महाश्मशान में जाकर भी आज कुछ भोजन नहीं पाया। डाकिनियों के दल से भी माँगा। इस दु.ख से मैंने भैरव से भी प्रार्थना की ॥१३१-१३२॥

उस भैरव ने मेरा नाम-गोत्र पूछकर यह आज्ञा दी कि 'हे भयंकरि, तू खरदूषण के वंश में उत्पन्न हुई और कुलीन है, अतः यहाँ से समीप स्थित वसुदत्तपुर को जा। वहाँ वसुदत्त नाम का महा धार्मिक राजा है, जो इस जंगल के पास रहकर इस सारे जगल की रक्षा करता है, मागे-शुल्क लेता है और चोरों को पकड़ता है।॥१३३-१३५।।

एक बार शिकार खेलने की थकावट से वह जंगल में सो गया। उस समय अज्ञात अवस्था मे एक गोजर (कनखजूरा, मादा) उनके कान में शीघ्रता से घुस गया ॥ १३६॥

उसने बहुत दिनों के बाद राजा के शिर के भीतर प्रसव किया। इस रोग से गलते-गलते उस राजा की केवल हड्डियाँ और नसें ही शेष रह गई हैं, अर्थात् शीघ्र ही मरने-वाला है ॥१३७॥

वंद्य उसके रोग को नहीं जानते। यदि और भी कोई उसे न जानेगा, तो राजा शीघ्र ही मर जायगा ।। १३८॥

तुम उस मरे हुए राजा का मांस अपनी माया से प्राप्त करके खाना। उसके खाने से छह महीनों तक तृप्त रहोगी, भूख न लगेगी ।। १३९॥

इस प्रकार भैरव ने भी मुझे भाग दिया। लेकिन वह लम्बी अवधि का है। तो बताओ बेटो, आज मैं क्या करूँ ?' ॥१४०।।

राक्षसी के इस प्रकार कहने पर वे बच्चे कहने लगे 'माता! क्या उस रोग को जान लेने पर और उसके दूर हो जाने पर राजा जीवित रहेगा ? ॥१४१।।

और यह भी बताओ कि राजा का ऐसा रोग कैसे दूर हो सकता है'। तब वह राक्षसी बच्चों से कहने लगी- 'रोग को जानकर उसे दूर कर देने पर राजा अवश्य जी जायेगा। यह भी सुनो कि यह महारोग कैसे दूर होगा ॥१४२-१४३॥

पहले उसके शिर को गर्म घी से चुपड़कर दोपहर की कड़ी गर्मी में बहुत देर तक उसे सुलाना चाहिए। तब उसके कान में बाँस की पोली नली लगाकर और दूसरा शिरा जल से भरे घड़ के ऊपर रखे हुए मिट्टी के पात्र में लगा देना चाहिए। तब पसीना और धूप की गर्मी से व्याकुल, अतएव ठंडक चाहते हुए वे कीड़े कान के मार्ग से बाँस की नली में होकर ठंडे घड़े में गिर जायेंगे। इस प्रकार वह राजा महारोग से छुटकारा पा जायगा' ।॥१४४-१४७।।

राक्षसी बच्चों को इस प्रकार कहकर चुप हो गई और उसी वृक्ष के खोखले में बैठी हुई कीर्तिसेना ने सब सुन लिया ॥१४८॥

यह सुनकर वह सोचने लगी कि 'यदि मैं इस विपत्ति से बच गई, तो जाते ही इस युक्ति से राजा को बचा लूंगी' ।॥१४९॥

वह इस जंगल के किनारे रहकर बहुत कम मार्ग-शुल्क लेकर जंगल से जानेवालों की रक्षा करता है। इसी सुविधा के कारण सभी व्यापारी इसी मार्ग से आते-जाते हैं ।॥१५०॥

मृन समुद्रसेन ने भी कहा था कि मेरा पति इसी मार्ग से आवेगा ॥ १५१॥

इसलिए जंगल के किनारे वसुदत्तपुर को जाती हूँ और वहाँ राजा को नीरोग करके पति के आगमन की प्रतीक्षा करती हूँ' ।॥१५२॥

ऐसा सोचते हुए उसने कठिनता से वह रात व्यतीत की। प्रात. काल राक्षसी के चले जाने पर वह खोखले से बाहर निकली ॥ १५३।।

पुरुष-वेष धारण करके जंगल के मध्य से जाती हुई उसने अपराह्न में एक ग्वाले को देखा ।।१५४।।

एक ओर उसकी सुकुमारता और दूसरी ओर लम्बे और बीहड़ जंगली मार्ग को देखकर दयार्द्र होते हुए ग्वाले से कीर्तिसेना ने पूछा- 'बताओ, यह कौन-सा देश है?' ॥१५५॥

ग्वाले ने कहा-'यह राजा वसुदत्त का वसुदत्तपुर है, जो सामने दीख रहा है।॥१५६॥

यहाँ का राजा भी रुग्ण है और मरणासन्न है। यह सुनकर कीर्तिसेना ने कहा-'यदि मुझे कोई उस राजा के पास ले जावे तो मैं उसकी बीमारी दूर करना जानता हूँ' ।॥१५७-१५८॥

यह सुनकर ग्वाला बोला- मैं उसी नगर में जा रहा हूँ। तुम मेरे साथ माओ, मै तुम्हारे लिए यत्न करता हूँ' ॥१५९॥

कीर्तिसेना ने कहा-'ठीक है।' तब वह ग्वाला पुरुष-वेशवाली कीर्तिसेना को वसुदत्त-पुर में ले गया ।। १६०।।

ग्वाले ने वहाँ जाकर दुःखित द्वारपाल से सब कुछ निवेदन किया और उस शुभलक्षणा को उसे सौप दिया ।। १६१॥

द्वारपाल ने भी राजा से निवेदन किया और उसकी आज्ञा से उस सर्वांगसुन्दरी को वह राजा के पास ले गया ॥ १६२॥

रोगाकान्न राजा वमुदत भो उन अद्भुत वैद्य को देखकर प्रसन्न और विश्वस्त हो गया ।।१६३।।

'यदि तुम मेरे इस रोग को दूर करोगे, तो मैं तुम्हें इस राज्य का आधा भाग दे. दूंगा ।।१६४।।

स्वप्न में मैने देखा है कि एक स्त्री मेरे शरीर पर से काला कम्बल हटा रही है। इनसे समझता हूँ कि तुम निश्चय ही मेरी बीमारी दूर करोगे ' ॥१६५॥

यह गुनकर कीर्तिसेना कहने लगी- 'राजन्, आज तो दिन चला गया। अतः कल तुम्हारा रोग दूर करूँगा, अधीर न होना' ।।१६६।।

ऐसा कहकर उसने राजा के शिर पर गाय का घी मलवाया, उससे उमे नींद आ गई और तीव्र वेदना कम हो गई ।।१६७।।

'वंद्य के रूप में यह कोई देवता आया है' - इस प्रकार कहकर सभी राजपुरुष, उसकी प्रशंसा करने लगे ।।१६८।।

महारानी ने भी अनेक प्रकार से उसका स्वागत-सम्मान किया और रात को उस वैद्य के लिए पृथक् सोने का प्रबन्ध कर दिया ॥ १६९॥

दूसरे दिन, मध्याह्न में, मन्त्रियों और राजाओं के सामने ही, राक्षसी से सुनी हुई उस आश्चर्यजनक युक्ति से कीत्तिसेना ने, कान के मार्ग से सभी गोजरों या कनखजूरों को बाहर निकाल दिया और घी-दूध आदि से राजा को हृष्ट-पुष्ट बना दिया ॥१७०-१७२॥

क्रमशः राजा के रोगमुक्त और स्वस्थ होने पर और घड़े में उन जीवों को देखकर किसे आश्चर्य नहीं हुआ ? ॥१७३॥

राजा भी, अपने मस्तक से निकले हुए उन कीड़ों को देखकर त्रस्त हुआ-सा सोचने लगा और प्रसन्न हुआ। उसने अपना पुनर्जन्म माना ।।१७४।।

तदनन्तर उत्सव करके स्नान किये हुए राजा ने कीर्तिसेना की पूजा की। भेंट में आधा राज्य लेने से इनकार कर देने पर कीर्तिसेना को राजा ने गाँव, हाथी, घोड़े और सोने आदि से सत्कृत किया ।।१७५।।

महारानी और मन्त्रियों ने अपनी-अपनी ओर से स्वर्ण और वस्त्रों के उपह। रों के ढेर लगा दिये; क्योंकि वह उनके प्रभु को प्राणदान करनेवाला पूज्य वैद्य था ।।१७६।।

पति की प्रतीक्षा करती हुई कीर्तिसेना ने उनके दिये हुए उपहारों को उन्हें ही लौटाते हुए कहा कि मैं अभी व्रत में हूँ, इसलिए अभी न लूंगा ।।१७७॥

इस प्रकार सभी से सम्मानित वह कीर्तिसेना पुरुष के वेश में कुछ समय तक वहीं ठहर गई ॥१७८॥

वहाँ ठहरे हुए उसने लोगो से सुना कि उसका पति व्यापारी देवसेन, वलभी से उसी मार्ग द्वारा आ गया ।। १७९।।

उस व्यापारिक दल को नगरी में आया हुआ जानकर वह दल की ओर गई। मयूरी जैसे नये मेघ को देखती है, उभी प्रकार उसने उस दल में अपने पति को देखा ॥१८०॥

चिरकालीन उत्कंठा के सन्ताप से गलते हुए आँसुओं का अध्र्घ्य देकर वह पति के चरणों में गिर पड़ी ॥ १८१॥

उस (पति) ने भी उसे देखा और पुरुष के वेश में छिपी हुई उसे उसी प्रकार पहिचाना, जिस प्रकार चन्द्रम। दिन में सूर्य की किरणों से दृष्टिगोचर होता है ॥१८२॥

कीर्तिसेना के मुखचन्द्र को देखकर चन्द्रकान्त के समान देवसेन का हृदय पिघल नहीं गया, यही आश्चर्य है ।।१८३।।

तदनन्तर कीर्तिसेना के इस प्रकार अपने को प्रकट कर देने पर, उसके पतिदेव देवसेन के आश्चर्य चकित हो जाने पर और व्यापारियों के दल के भी यह जानकर विस्मित हो जाने पर चकित राजा बसुदत्त भी स्त्रयं वहाँ आ गया ।। १८४-१८५।।

राजा से पूछी गई कीर्तिसेना ने पति के सामने ही सास की दुश्चरित्रता के अपने सारे वृत्तान्त को कह सुनाया ॥ १८६॥

उसका पति देवसेन, यह सब सुनकर क्रोध, आश्चर्य, क्षमा, विस्मय और हर्ष से भरा हुआ अपनी माता से विमुख हो गया ।।१८७७॥

स्त्रियाँ पतिभक्ति-रूपी रथ पर चढ़ी हुई, चरित्र-रूपी कवच से सुरक्षित धर्म-रूपी सारथी के सहारे बुद्धिरूपी शस्त्र से विजय प्राप्त करती हैं।॥१८८॥

वहाँ एकत्र सभी जन, इस अद्भुत रहस्य को जानकर आनन्द से इस प्रकार कहने लगे ॥१८९।।

राजा ने भी कहा- 'इसने पति के लिए इतना कष्ट उठानेवाली सीतादेवी को भी जीत लिया ॥ १९०॥

इसलिए मुझे प्राणदान देनेवाली यह मेरी घर्म-बहिन है।' इस प्रकार कहते हुए राजा से कीर्तिसेना कहने लगी ॥१९१॥

'महाराज, आप द्वारा दिया गया जो प्रेमोपहार गाँव, हाथी आदि आपके हाथ मेरा है, वह सब आप मेरे पति को दे दें। राजा ने भी प्रसन्न होकर देवसेन का पट्ट बंधन किया ॥ १९२-१९३।।

तदनन्तर वह देवसेन, राजा द्वारा दिये हुए और व्यापार द्वारा अर्जित घनराशि से घनी होकर, अपनी माता को छोड़कर कीर्तिसेना की प्रशंसा करता हुआ उसी वसुदत्तपुर में रहने लगा ।।१९४।।

कीर्तिसेना, अपने असाधारण चरित्र से प्रसिद्ध होकर अपने पति के पुण्य फलों की शरीर-धारिणी मूत्ति के समान अतुल ऐश्वर्य का उपभोग करती हुई सास के दुःख से छूटकर, सुखपूर्वक रहने लगी ।॥ १९५॥

इस प्रकार विधि के भीषण विधानों को सहन करके आपत्ति-काल में भी अपने चरित्र-धन की रक्षा करनेवाली सच्चरित्र स्त्रियाँ अपने आत्मबल से रक्षित होकर अपना तथा अपने पति दोनों का कल्याण करती है ।॥ १९६॥

इसलिए हे राजकुमारी, सास और ननद के कारण स्त्रियों को ऐसी-ऐसी दुर्घटनाओं का लक्ष्य (शिकार) होना पड़ता है। इसलिए मैं तुम्हारे लिए ऐसा पतिगृह चाहती हूँ, जहाँ पापिन सास और दुष्टा ननद न हों ।॥१९७॥

असुरराज मयासुर की पुत्री सोमप्रभा के मुँह से इस आनन्ददायक अद्भुत कथा को सुनकर मनुजेन्द्रपुत्री कलिंगसेना अत्यन्त प्रसन्न हुई ॥१९८॥

इस प्रकार विचित्र कथा का अन्त देखकर ही मानों सूर्य भगवान् के अस्ताचल पर चले जाने पर, सोमप्रभा भी उत्कंठिता कलिंगसेना का आलिंगन करके अपने भवन को गई ॥ १९९॥

तृतीय तरंग समाप्त

१. किसी पुस्तक में मयासुर को शिवभक्त लिखा है। वास्तव में यह शिव भक्त ही था। -अनु०

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