5.304. || चतुर्थ कहानी || वत्सराज का कौशाम्बी में पुनरागमन; ग्वालों की कथा;
5.304. || चतुर्थ कहानी || वत्सराज का कौशाम्बी में पुनरागमन; ग्वालों की कथा; वत्सराज को खजाना और सिहासन की प्राप्ति; वत्सराज का दिग्विजय के लिए विचार; वीर विदूषक ब्राह्मण को कथा; चतुर्थतरंग वत्सराज का कौशाम्बी में पुनरागमन तदनन्तर एक दिन वत्सराज ने अपनी पत्नियो तथा मन्त्रियों के साथ लावाणक से कौशाम्बी की ओर प्रस्थान किया ।। १।। असमय में उछलती हुई समुद्र की लहरों के समान कोलाहल से दिशाओं को गुजित करती हुई उसकी सेनाओं ने माथ ही प्रस्थान किया ।।२।। यदि सूर्य उदयाचल पर्वत के साथ आकाश में गमन करे तो हाथी पर बैठे हुए राजा उदयन की उपमा उससे दी जा सके¹ ।॥३॥ सिर पर लगे हुए श्वेत छत्र से ऐसा मालूम होता था कि राजा ने सूर्य के तेज को जीत लिया था; इसलिए प्रसन्न होकर चन्द्रमा मानो छत्र के व्याज से राजा की सेवा कर रहा था ।।४।। उस सर्वोपरि विराजमान (हाथी पर बैठे हुए) तेजस्वी उदयन के चारों ओर सामन्तगण, इस प्रकार चक्कर लगा रहे थे; जैसे अन्य ग्रह, ध्रुव-नक्षत्र के चारों ओर भ्रमण करते है ॥५॥ राजा के पीछे हथिनियो पर बैठी हुई दोनो रानियां, लक्ष्मी और पृथ्वी के समान, राजा का अनुगमन कर रही थी ।।६।।...