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5.204. || चतुर्थ कहानी || वत्सराज उदयन व लोहजंघ की कथा

5.204. || चतुर्थ कहानी || वत्सराज उदयन व लोहजंघ की कथा चतुर्थ तरंग वत्सराज उदयन की कथा (क्रमशः) इसी बीच वत्सराज के भेजे हुए दूत ने उसका प्रतिसन्देश चंडमहासेन के पास पहुँचा दिया ।।१।। उदयन के सन्देश को सुनकर चंडमहासेन ने सोचा कि वह आत्माभिमानी वत्सराज उदयन यहाँ आना नहीं चाहता। मैं भी कन्या को उसके यहाँ नहीं भेज सकता। इसमें मेरी लघुता होगी। इसीलिए चतुराई से कैद कर ही उसे यहाँ बुलाता हूँ ऐसा सोचकर चंड-महासेन ने मन्त्रियों से मन्त्रणा करके अपने हाथी नडागिरि के समान ही एक यन्त्रमय हाथी बनवाया। उसके पेट मे योग्य योद्धाओ को छिपाकर उसे विन्ध्याचल के घोर जंगल में रखवा दिया ।। २-५।। राजा उदयन के शिकारी भृत्यो ने जंगल में घूमते हुए उम यन्त्र-हस्ती को दूर से देखा और राजा उदयन मे निवेदन किया- 'महाराज, हमने विन्ध्या रण्य में घूमता हुआ एक महान् हाथी देखा है। ऐमा हाथी इस विशाल भूमडल में नहीं देखा गया। लम्बे-चौडे एवं विशाल-काय वह जगम विन्ध्य पर्वन के समान आकाग में व्याप्त हो रहा है। शिकारी गुप्तचरों की बात सुनकर राजा उदयन, अत्यन्त प्रगन्न हुआ और उसने उन्हें सुवर्ण-मुद्राओ के पुरस्कार देकर विदा किया...