5.303. || तृतीय कहानी || वत्सराज; पुरूरवा व उर्वशी; विहितसेन व तेजोवती ; सोमप्रभा व गुहसेन; इन्द्र व अहल्या की कथा
5.303. || तृतीय कहानी || वत्सराज; पुरूरवा व उर्वशी; विहितसेन व तेजोवती ; सोमप्रभा व गुहसेन; इन्द्र व अहल्या की कथा तृतीय तरंग वत्सराज की कथा (चालू) किसी एक दिन एकान्त में वत्सराज ने वामवदत्ता और पद्मावती के साथ पान क्रीडा करके गोपालक, रुमण्वान् और वसन्तक के साथ यौगन्धरायण को बुलाया और गुप्त गोष्ठी करने लगा ।।१-२।। उस अवसर पर अपने विरह के प्रसग मे वत्मराज ने उन सब के सुनते रहने पर यह कथा कहना प्रारम्भ किया ।।३।। पुरूरवा और उर्वशी की कया प्राचीन युग में परमवैष्णव (विष्णु-भक्त) पुरूरवा नाम का राजा था। पृथ्वी के समान स्वर्ग में भी उसकी बेरोक-टोक गति थी ।।४।। एक बार नन्दन-उद्यान मे घूमते हुए उसे उर्वशी अप्सरा ने देखा, जो कामदेव के सम्मोहन नामक दूसरे अस्त्र के समान थी ।।५।। पुरूरवा को देखते ही उर्वशी संज्ञाहीन (बेहोश हो गई। उसके कारण रम्भा आदि उसकी सखियों का हृदय काँपने लगा ॥६॥ राजा पुरूरवा भी, लावण्य-रस की निर्झरिणी के समान उर्वशी को देखकर भी जो उसका आलिंगन प्राप्त न कर सका; उस प्यास से मानो मूच्छित हो गया ।।७।। राजा को इस प्रकार सन्तप्त जानकर क्षीर-समुद्र में विश्राम करते हुए सर्वज्ञ ...