5.303. || तृतीय कहानी || वत्सराज; पुरूरवा व उर्वशी; विहितसेन व तेजोवती ; सोमप्रभा व गुहसेन; इन्द्र व अहल्या की कथा

5.303. || तृतीय कहानी || वत्सराज; पुरूरवा व उर्वशी;  विहितसेन व तेजोवती ; सोमप्रभा व गुहसेन; इन्द्र व अहल्या की कथा

तृतीय तरंग

वत्सराज की कथा (चालू)

किसी एक दिन एकान्त में वत्सराज ने वामवदत्ता और पद्मावती के साथ पान क्रीडा करके गोपालक, रुमण्वान् और वसन्तक के साथ यौगन्धरायण को बुलाया और गुप्त गोष्ठी करने लगा ।।१-२।।

उस अवसर पर अपने विरह के प्रसग मे वत्मराज ने उन सब के सुनते रहने पर यह कथा कहना प्रारम्भ किया ।।३।।

पुरूरवा और उर्वशी की कया

प्राचीन युग में परमवैष्णव (विष्णु-भक्त) पुरूरवा नाम का राजा था। पृथ्वी के समान स्वर्ग में भी उसकी बेरोक-टोक गति थी ।।४।।

एक बार नन्दन-उद्यान मे घूमते हुए उसे उर्वशी अप्सरा ने देखा, जो कामदेव के सम्मोहन नामक दूसरे अस्त्र के समान थी ।।५।।

पुरूरवा को देखते ही उर्वशी संज्ञाहीन (बेहोश हो गई। उसके कारण रम्भा आदि उसकी सखियों का हृदय काँपने लगा ॥६॥

राजा पुरूरवा भी, लावण्य-रस की निर्झरिणी के समान उर्वशी को देखकर भी जो उसका आलिंगन प्राप्त न कर सका; उस प्यास से मानो मूच्छित हो गया ।।७।।

राजा को इस प्रकार सन्तप्त जानकर क्षीर-समुद्र में विश्राम करते हुए सर्वज्ञ भगवान् विष्णु ने, दर्शन के लिए आये नारद मुनि को, आदेश दिया ।।८।।

हे देवर्षि ! नन्दन-उद्यान में स्थित राजा पुरूरवा उर्वगी पर मोहित हो गया है और उर्वशी के बिरह को सहन नहीं कर पा रहा है।॥९॥

इसलिए तुम मेरी ओर से इन्द्र के पास जाकर और उसे समझाकर उर्वशी को राजा के लिए तुरन्त दिलवा दो ।।१०।।

भगवान् हरि से इस प्रकार आज्ञापित नारद ने आकर पुरूरवा को होश में लाकर कहा-'राजन् ! उठो, तुम्हारे लिए मुझे भगवान् विष्णु ने भेजा है। वे अपने निश्छल भक्तों के कष्ट की उपेक्षा नही करते ।। ११-१२।

इस प्रकार आश्वामित पुरूरवा के माथ नारद मुनि इन्द्र के पास गये और प्रणाम करते हुए इन्द्र को हरि की आज्ञा सुनाकर, उर्वशी को, राजा पुरूरवा के लिए, दिला दिया ।।१३-१४।।

इस प्रकार उर्वशी का दान, स्वर्ग को निर्जीव करने और उर्वशी को मानों मृत-संजीवन औषधि देने के समान था ।।१५।।

स्वर्गीय पत्नी का ग्रहण करके मर्त्यलोकवासियों की आँखो को आश्चर्य में डालते हुए पुरूरवा उसे लेकर भू-लोक में आ गया ।।१६।।

इस प्रकार कभी नष्ट न होनेवाले पुरूरवा और उर्वशी दोनों, परस्पर आकृष्ट होकर बँधे हुए-मे रहने लगे ।॥ १७॥

एक बार मायाधर नामक अमुरराज के साथ इन्द्र का युद्ध होने पर इन्द्र ने अपनी सहायता के लिए पुरूरवा को बुलाया और पुरूग्वा स्वर्ग को गया ।।१८।।

इम युद्ध में मायाघर के मारे जाने पर इन्द्र के यहाँ उत्सव हुआ, जिसमें सभी स्वर्गीय स्त्रियो ने भाग लिया। उस उत्सव में आचार्य तुम्बुरू के उपस्थित रहते हुए रम्भा नाम की वेश्या नृत्य कर रही थी; उसके नृत्य में कुछ त्रुटि होने पर पुरूरवा ने हँस दिया। उसकी हँसी से चिढ़कर रम्भा ने कहा- 'यह दैव नृत्य है, इसे मैं जानती हूँ। हे मनुष्य ! तू इसे क्या जाने ।।१९-२१॥

राजा ने कहा- 'उर्वशी के सम्पर्क से जो कुछ मैं जानता हूँ, उसे तुम्हारे गुरु तुम्बुरू भी नहीं जानते'। यह सुनकर तुम्बुरू ने क्रोध में भरकर राजा को शाप दिया कि जबतक कृष्ण की आराधना न करोगे तबतक उर्वशी से तुम्हारा वियोग हो जायगा ।। २२-२३॥

शाप को सुनकर राजा पुरूरवा ने, अकाल में बज्रपात के समान यह शाप उर्वशी को कह सुनाया ।। २४।।

तदनन्तर अकस्मात् गन्धों ने तुम्बुरू की आज्ञा से आकर गुप्त रूप से उर्वशी का अपहरण कर लिया ।। २५।।

पुरूरवा ने इसे शाप का फल ममझ कर वदरिकाश्रम में जाकर भगवदाराधन प्रारम्भकिया ।।२६।।

गन्धर्व-लोक में राजा के वियोग मे मन्तप्त उर्वशी, निर्जीव-सी, सोई-सी, चित्रलिखित-सी, एव मज्ञाहीन होकर पढ़ रही। वह गाप के अन्त की आशा पर अवलम्बित विरह से लम्बी रात्रियों में चकवी के समान तड़पती-मी रहती, किन्तु प्राणों से विरक्त न हुई ॥ २७-२८।।

इधर पुरूरवा ने भगवान् विष्णु को तप से प्रसन्न किया। भगवान् की कृपा से गन्धर्वो ने उसकी उर्वशी को छोड दिया ॥ २९।।

शाप के अन्त मे पुन प्राप्त हुई उर्वशी के साथ राजा भूलोक में स्वर्गीय आनन्द का उपभोग करता था ।। ३०।।

इस प्रकार कथा सुनाकर राजा के चुप होने पर उर्वशी की विरह-वेदना की सहन-शक्ति को जानकर वासवदत्ता मन-ही-मन लज्जित हुई ॥३१॥

राजा के द्वारा युक्तिपूर्वक उपालम्भ दी गई वासवदत्ता को कुछ लज्जित देखकर उसे आश्वासन देने के लिए यौगन्धरायण ने कहा ॥ ३२॥

विहितसेन और तेजोवती की कथा

हे राजन् ! यदि तुमने यह कथा न सुनी हो तो सुनो। भू-लोक में लक्ष्मी के निवास भवन के समान तिमिरा नाम की समृद्ध नगरी है।॥ ३३।।

उसमें विहितसेन नाम का राजा राज्य करता था। उसकी रानी तेजस्वती भूतल की अप्सरा थी। उसके कंठालिंगन में सलग्न-हृदय वह राजा, अपने शरीर पर कुरते का आवरण भी सहन नही करता था ।।३४-३५।।

एक बार राजा को जीर्ण ज्वर हुआ। वैद्यों ने उस रानी के साथ मिल्ने से मना कर दिया ।।३६।।

देवी के सम्पर्क से रहित उस राजा का रोग, भीतर-ही-भीतर बढ़ने लगा; जो औषधियों के उपचार से असाध्य हो गया। 'भय, शोक या अभिघात से सम्भव है, राजा का रोग अच्छा हो सके' ऐमा वैद्यों ने एकान्त में मन्त्रियों से कहा। मन्त्रियो ने सोचा कि राजा अत्यन्त जीवट वाला है, एक बार पीठ पर भीपण सर्प के गिरने पर और शत्रुओं के रनिवास तक घुस आने पर भी, जो नडरा, उसे किस प्रकार डराया जा सकता है। इसके लिए कोई उपाय नहीं सूझता। हमारी बुद्धि काम नहीं करती ॥३७-४०॥

इस प्रकार सोच-विचार कर मन्त्रियों ने रानी के साथ परामर्श करके और उसे कपड़े से ढककर राजा में कह दिया कि 'महारानी मर गई ।॥४१॥

इस भीषण शोक-सवाद में राजा का हृदय मथित और व्यथित हो गया और शोक-विह्वल राजा का हृदय-रोग नष्ट हो गया ।।४२।।

उम रोग-रूपी वित्ति गे छूट जाने पर मन्त्रियां ने दूगरी सुख-मत्ति के गमान महारानी को राजा के लिए भेट कर दिया ।।४३।।

उम प्राणदायिनी रानी को राजा बहुत मानने लगा और बुद्धिमान् राजा ने, छिपी हुई रानी पर क्रोध भी नही किया ।। 6611

है ।।४५।। पति की हिनैपिता ही महारानीपन है। केवल राजा को प्रसन्न रखना ही रानीपन नही

मन्त्रिपन भी वही है- राज-कार्य की समुचित चिन्ता रखना। राजा की 'हाँ-में-हाँ' मिलाना तो केवल नौकरी-मात्र है ।।४६।।

इसीलिए विरोधी मगधराज से मन्धि करने तथा समस्त पृथ्वी पर विजय करने के लिए हमलोगो ने, यह यत्न किया ।॥४७॥

अत आपकी भक्ति के कारण असह्य वियोग को सहन करनेवाली महारानी वासवदत्ता ने अपराध नही किया; प्रत्युत्त पूर्ण उपकार ही किया ॥४८॥

प्रधान मन्त्री के वचन सुनकर वत्सराज ने अपने को अपराधी समझा और इस घटना पर सन्तोष प्रकट किया और कहा- आपलोगो मे प्रेरित मूत्तिमती नीति के समान महारानी ने मुझे सारी पृथ्वी प्रदान की ।।४९-५०।।

मैंने जो कुछ कहा, वह प्रेम के अतिशय के कारण कहा - 'प्रेम से अन्धे हृदयवाले लोगों में विचार करने की शक्ति कहाँ हो सकती है?' ॥५१॥

इस प्रकार वत्सराज ने महारानी की लज्जा और उस दिन को एक साथ ही समाप्त कर दिया ।।५२।।

दूसरे ही दिन, समाचार जानकर मगध-नरेश ने दूत भेजा। उसने वत्सराज से उसका सन्देश कहा कि तुम्हारे मन्त्रियों ने हमें धोखा दिया। इसलिए ऐसा न करना कि हमारा संसार शोक-मय हो जाय ।।५३-५४।।

यह सुनकर वत्सराज ने उस दूत को प‌द्मावती के पास भेज दिया। वासवदत्ता के सन्मुख नम्रता प्रकट करनी हुई प‌द्मावती ने भी उसी के पास आकर सन्देश सुनाने के लिए उस दूत को दर्शन दिया। नम्रता ही मती स्त्रियों का व्रत है ।।५५-५६।।

दूत ने राजा का संदेश कहा- 'बेटी! छल-कपट से वत्सराज, तुम्हे विवाह करके ले गये, तुम्हारा पति, दूसरी स्त्री में अधिक अनुराग रखता है 'इस शोक से मैंने कन्या के पिता होने का फल पा लिया।' इस प्रकार पिता का सन्देश सुनाते हुए दूत से प‌द्मावती ने कहा- 'हे भद्र' मेरे वचन से पिता और माता का निवेदन करना कि आपलोग शोक क्यो करते है। आर्यपुत्र (मेरे पति) मुझ पर अत्यन्त दया और स्नेह रखते है। वासवदत्ता भी बहिन के समान मुझसे स्नेह रखती है। यदि अपने सत्य के समान मेरे जीवन की रक्षा चाहते हो तो तुम्हे आर्यपुत्र (उदयन) के प्रति वैमनस्य न रखना चाहिए ।॥५७-६०।। 1

इस प्रकार प‌द्मावती के द्वारा पिता के प्रति सन्देश दिये जाने पर, वासवदत्ता ने, आतिथ्य सत्कार करके दूत को विदा किया ।। ६१।।

दूत के चले जाने पर प‌द्मावती, अपने पितृगृह की बातो का स्मरण करके कुछ अनमनी-सी हो गई। उसे अनमनी देखकर वासवदत्ता के द्वारा बुलाये गये विदूषक वसन्तक ने वहाँ आकर कहानी कहना प्रारम्भ किया ।।६२-६३।।

सोमप्रभा और गुहसेन की कथा

पृथ्वी का अलंकार पाटलिपुत्र नाम का एक नगर है। वहाँ पर धर्मगुप्त नाम का एक घनी व्यापारी वैश्य रहता था। ॥६४।॥

उसकी चन्द्रप्रभा नाम की पत्नी एक बार गर्भवती हुई और उसने एक सर्वांग सुन्दरी कन्या उत्पन्न की ।। ६५।।

अपनी अनुपम कान्ति से प्रसूति गृह को आलोकित करती हुई वह कन्या उत्पन्न होते ही स्पष्ट वाणी में वार्तालाप करने लगी और उठने-बैठने लगी ॥६६॥

कन्या की इस स्थिति से चकित और व्याकुल स्त्रियों का कोलाहल सुनकर डरता हुआ धर्मगुप्त, प्रसूतिगृह में आया। धर्मगुप्त ने आकर प्रणाम करने के अनन्तर उसी समय एकान्त में उस कन्या से पूछा- 'हे देवि तू कौन मेरे घर में अवतीर्ण हुई है?' ।।६७-६८।।

वह कन्या बोली- 'तू मुझे किसी को देना नहीं, मैं तेरे घर में रहकर ही कल्याण करती रहेंगी' ।।६९।।

यह सुनकर भयभीत बनिये ने, उस कन्या को घर में ही छिपाकर रख दिया और बाहर उसके मर जाने की घोषणा कर दी। इस प्रकार सोमप्रभा नाम की वह कन्या मनुष्य-शरीर और दिव्य कान्ति के साथ क्रमश. घर मे ही बढ़ने लगी ॥७०।।

अपने घर की खिड़की से एक बार प्रसन्नता के कारण वसन्तोत्सव देखती हुई उस कन्या को गुहचन्द्र नामक वैश्यपुत्र ने देख लिया ॥ ७१।।

लगे हुए कामदेव के भाले की नोक के समान हृदय में धंसी हुई उसे देखकर वह मूच्छित-सा हो गया और अत्यन्त कठिनता से घर पहुँच सका ।। ७२।।

काम-वेदना से अत्यन्त अस्वस्थ उस गृहचन्द्र ने, अत्यन्त आग्रह करने पर, अपनी अस्वस्थता के कारण अपने मित्र के द्वारा माता-पिता को कह‌ह्वाया ।।७३।।

तब उसका पिता, पुत्र-स्नेह के कारण उस कन्या की मॅगनी करने के लिए धर्मगुप्त के घर पर गया ।।७४।।

इस प्रकार अपनी वधू बनाने के लिए कन्या की प्रार्थना करते हुए गुह्रसेन को धर्मगुप्त ने यह कहकर निराश कर दिया कि 'मेरे यहाँ कन्या कहाँ है ? वह तो होकर मर गई' ।।७५।।

गुहसेन ने कन्या को घर में छिपाये हुए धर्मगुप्त को और कामज्वर से पीड़ित अपने पुत्र को देखकर गुहसेन ने सोचा- मैं इस विषय में राजा से सहायता लेता हूँ, उसे प्रेरित करता हूँ; क्योंकि मैं पहले राजा की सेवा कर चुका हूँ। राजा अवश्य ही मेरे मरणासन्न पुत्र को कन्या दिलवा देगा' ।॥७६-७८॥

ऐसा निर्णय करके और एक उत्तम रत्न राजा को भेट करके उसने राजा से अपनी इच्छा प्रकट की ॥७९।।

सजा का भी उसके प्रति स्नेह था, अतः उसने नगर के कोतवाल को गुहसेन के साथ कर दिया और उसने उसके साथ धर्मगुप्त का घर घेर लिया तथा साथ ही, सर्वनाश की शंका से भयभीत धर्मगुप्त के प्राणों ने उसके गले को घेर लिया ।।८०-८१।।

पिता की इस स्थिति को देखकर सोमप्रभा ने उससे कहा कि 'तुम मुझे दे दो, मेरे लिए यह उपद्रव हो रहा है, किन्तु यह शर्त लगा दो कि मेरा पति, मुझे शैया पर कभी न चढ़ावे' । ऐसी मौखिक शतं तुम समधी से करा लो ।।८२-८३।।

कन्या के इस प्रकार कहने पर धर्मगुप्त ने शतं के साथ कन्या का देना स्वीकार कर लिया। गुहुसेन ने मन-ही-मन हँसते हुए उसकी शर्त स्वीकार कर ली कि किसी प्रकार मेरे लड़के का विवाह तो हो, फिर देखा जायगा ।।८४-८५।।

तदनन्तर गुहमेन का पुत्र गुचन्द्र, विवाह करके सोमप्रभा को लेकर अपने घर आ गया ।॥८६।।

सायकाल होने पर मुहमेन ने, अपने पुत्र से कहा कि 'बेटा, तुम इसे शैय्या पर चढ़ा लो। किमकी पत्नी शैया पर नही चढती ॥८७॥

श्वसुर की ऐसी बात सुनकर सोमप्रभा ने क्रोव से अपनी तर्जनी अगुली को यमराज की आज्ञा के समान घुमाया ॥८८॥

वह की उम घूमती हुई उगली का देखकर ससुर के प्राण उसी समय निकल गये। पिता के मरने पर गुहचन्द ने भी समझा कि यह स्त्री महामारी के रूप में मेरे घर आ गई है ।।८९-९०।।

अतः उनका सेवन न करके घर में रहती हुई भी उससे दूर रहकर मानों असिधारा-व्रत का पालन करता था ।। ९१।।

उस दुःख से दुखो गुहचन्द्र, सासारिक भोगो से विरक्त होकर प्रतिदिन व्रत करता और ब्राह्मणो को भोजन कराता था ।।९२।।

उसकी दिव्यरूप-धारिणी स्त्री भी मौनव्रत धारण करती हुई भोजन किये हुए ब्राह्मणों को दक्षिणा देती थी ॥९३।।

एक दिन, भोजन के लिए आये हुए एक बूढ़े ब्राह्मण ने, संसार को चकित करनेवाले अनुपम सौन्दर्यशालिनी उम स्त्री को देखा। और एकान्त मे गुहचन्द्र से पूछा कि 'यह बालिका तुम्हारी कौन है ? मुझे बताओ' ।।९४-९५॥

आग्रहपूर्वक बार-बार पूछने पर गुहचन्द्र ने दुःखित मन से उस मोमप्रभा का सारा वृत्तान्त सुना दिया ॥९६॥

सारा समाचार मुनकर उस पर दयालु ब्राह्मण ने उसे कहा कि 'मैं तुम्हें अग्नि की उपामना का मन्त्र देता हूँ, जिगमे तुम्हारी कामना पूरी होगी' ॥९७।।

इस प्रकार एकान्त मे जप करते हुए गुहचन्द्र के सम्मुख अग्नि के मध्य में एक पुश्ष निकला ।।९८।।

वह ब्राह्मण-हयी अग्नि देवता, चरण में पड़े हुए गृहचन्द्र से बोला- 'आज मैं तुम्हारे घर मे भाजन करूँगा और गन में यही रहूँगा, और तुम्हे तत्त्व बताकर तुम्हारा कार्य सिद्ध करूंगा ॥००-१००11

इस प्रकार दूसरे ब्राह्मणों की भाँति गृहवन्द्र के यहां भोजन करके वह ब्राह्मण उसी के पाम सावधानता में एक पहर तक सांगा। कुछ समय के अनन्तर घर के सब लोगो के गाढी निद्रा से मां जाने पर गहचन्द्र की स्त्री मांमप्रभा रान में घर में निकली ॥१०१-१०२।।

उसी समय उम ब्राह्मण ने गुह्वन्द्र को जगाया और कहा कि 'आओ, अपनी स्त्री का हाल देखा'। योगशक्ति से उसे और अपने को भौरे का रूप बनाकर उसके घर से निकली हुई उसकी स्त्री को दिखाया ।।१०३-१०४।।

वह सुन्दरी, घर से निकलकर, नगर के बाहर दूर तक चली गई। वह ब्राह्मण भी गुह-चन्द्र के साथ उसके पीछे-पीछे चला ।।१०५।।

नगर के बाह्र गुचन्द्र ने, विशाल विस्तृन तनोवाले, तथा छायावाली गाग्वाओं मे यक्त और निकलती हुई मधुर संगीत-ध्वनि से युक्त एक वट वृक्ष को देखा। उस वृक्ष के नीचे उसने वीणा और बाँसुरी के मधुर स्वर से युक्त दिव्य सगीत-ध्वनि सुनी। उस वृक्ष की एक विशाल शाखा पर अपनी पत्नी (सोमत्रभा) के समान आकृतिवाळी दिव्यकन्या को एक ऊँचे आसन पर बैठे हुए देखा। वह दिव्यकन्या, अपनी उज्ज्वल कान्ति से चाँदनी को जीत रही थी और उसके दोनो आर धवल चाँवर डुल रहे थे। वह कन्या मानों चन्द्रमा के लावण्य-कोष (खजाने) की अधिष्ठात्री देवी थी ॥१०६-१०९।।

गुहचन्द्र ने देखा कि उसकी पत्नी सोमप्रभा भी वृक्ष पर चढ़कर उसी प्रकार उसके आधे आसन पर जा बैठी ॥ ११०॥

उस समय एक समान सौन्दर्यवाली उन दोनों कन्याओं को एक साथ बैठे देखकर गृहचन्द्र को वह रात तीन चन्द्र वाली दीखती थी ।।१११॥

इस दृश्य को देखकर गुहचन्द्र सोचने लगा कि 'क्या यह स्वप्न है या भ्रम है अथवा दोनों है। मेरे सन्मार्ग-वृक्ष की जो विद्वत्संगति-रूपी मंजरी है, उसी में यह उचित फल देने वाला पुष्पोद्गम हुआ है'। वह जब ऐसा मोच ही रहा था कि उन दोनों दिव्य कन्याओ ने अपने योग्य भोजन करके आसव (मद्य) का पान प्रारम्भ किया। 'बहिन ! आज मेरे घर में कोई अति तेजस्वी ब्राह्मण आया है। इस कारण मैं शकित हो रही हूँ। अत. शीघ्र ही घर जाती हूँ।' ऐसा कहकर मोमप्रभा, दूसरी से पूछकर वृक्ष पर से नीचे उतरी ॥११२-११६।।

यह सब कुछ देखते हुए भ्रमर के रूप में विद्यमान गुहचन्द्र और ब्राह्मण पहले ही घर पर आकर रात में पहले के समान सो गये ।। ११७-११८।।

तव उम ब्राह्मण ने, स्वस्थतापूर्वक गुहचंद्र से कहा कि 'देखा तुमने, यह तुम्हारी पत्नी देव-जाति की है, मनुष्य जाति की नही। उसकी दूसरी बहिन को भी तुमने देख लिया, अतः दिव्य स्त्री, मनुष्य के साथ सगम कैसे चाहेगी? इसलिए इसकी सिद्धि के लिए मैं तुम्हे द्वार पर लिखने योग्य मन्त्र बताता हूँ। उसका प्रभाव बढ़ानेवाले बाहरी उपचार (उपाय) भी तुम्हे बताता हूँ। जैसे आग अकेले ही जलती है और जलाने की शक्ति रखती है, यदि उसे वायु मिल जाय तो क्या कहना ? उसी प्रकार अकेला मन्त्र ही सिद्धि प्रदान करता है, यदि उसके साथ और उपाय भी किये जायें तो फिर क्या कहना है?' ऐसा कह कर, गुचन्द्र को मन्त्र बताकर और उमकी युक्ति समझाकर वह ब्राह्मण, प्रातःकाल ही अन्तर्धान हो गया ।। ११९-१२३।।

गुहचन्द्र ने भी पत्नी के गृह-द्वार पर वह मन्त्र लिख दिया और सायकाल ब्राह्मण के बताये उपाय का प्रयोग किया। तदनन्तर गुहचन्द्र अपनी पत्नी के देखते-ही-देखते खूब सजधज के साथ किसी वेश्या में वार्तालाप करने लगा ।। १२४-१२५।।

उस वेश्या को देखकर मन्त्र के प्रभाव से मौन सोमप्रभा ने गुहचन्द्र को बुलाकर ईर्ष्या के माथ पूछा कि यह कौन है? गुहचन्द्र ने उससे झूठ ही कहा कि 'यह एक वेश्या है, जो मुझसे प्रेम करती है और मैं भी इससे प्रेम करता हूँ, अब उसी के घर जा रहा हूँ' ।।१२६-१२७॥

तब भौंहें चढ़ाकर आँखे तिरछी करके और बाये हाथ से उसे रोक कर सोमप्रभा ने हा-'हूँ, अब मैंने समझा, वेश्या के यहाँ जाने के लिए तुमने यह वेष पहना है, अब तुम वहाँ न जाओ, मेरे पास आओ, मैं तुम्हारी पत्नी हूँ' ।। १२८-१२९॥

रोमांच, कंपन और व्याकुलता से भरी एवं मन्त्ररूपी दूत द्वारा प्रेरित उस सोमप्रभा के ये वचन सुनकर गुहचन्द्र उसके कमरे में जाकर मन से भी दुर्लभ दिव्य भोगकर सुख अनुभव करने लगा ।।१३०-१३१।।

इस प्रकार मन्त्र-द्वारा मिद्ध की गई सप्रेम और दिव्य स्थिति को छोड़कर रहती हुई सोमप्रभा को उसे प्राप्त कर गृहचन्द्र सुखपूर्वक रहने लगा ।।१३२।।

इस प्रकार यज्ञ, दान आदि शुभ कर्मों के प्रभाव से दिव्यता को प्राप्त कर शाप-भ्रष्ट होने के कारण स्त्रियां गृहिणी का पद प्राप्त करती है।॥१३३॥

देवता और ब्राह्मणो की पूजा मज्जनों के लिए कामधेनु के समान है। उससे क्या प्राप्त नही होता ? अर्थात् सब कुछ प्राप्त होता है। जिस प्रकार आँधी अत्यन्त ऊँचे दिव्य स्थान पर जन्म लेनेवाले पुष्पों के अध पान का कारण होती है, उसी प्रकार तुम्हारे लिए पाप-कर्म अश्व पात के कारण होते है ।।१३४-१३५।।

राजकुमारी से इम प्रकार कहा गया विदूषक वसन्तक बोला- इस प्रसग मे मैंने अहल्या की कथा सुनी है, सुनो ॥ १३६॥

इन्द्र और अहल्या की कथा

प्राचीन युग मे त्रिकालज्ञ गौतम नामक एक महामुनि थे। अप्सराओं से भी अधिक रूपवती अहल्या नाम की उनकी पत्नी थी ।।१३७।।

एक बार उसकी सुन्दरता पर मोहित हो इन्द्र ने उससे एकान्त की प्रार्थना की, क्योंकि वैभव से अधे राजाओ की बुद्धि अनुचित कार्यों की ओर दौड़ जाती है। इन्द्र को चाहती हुई उस मूर्खा ने, उसके प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया, तप के प्रभाव से इस बात को जानकर गौतम मुनि, उसी समय वहां आ गये। उनके भय से इन्द्र ने उसी समय मार्जार (बिल्ली) का रूप धारण कर लिया, तदनन्तर गौतम ने अहल्या से पूछा कि यहाँ कौन है ? उसने अपभ्रंश भाषा मे सत्य का ध्यान रखते हुए कहा यह 'मज्जार"¹ है! हँसते हुए मुनि ने कहा कि सचमुच यह तुम्हारा जार है ऐसा कहकर मुनि ने उसे शाप दिया, परन्तु उसने सत्य का ध्यान रखते हुए छल से कहा था, इसलिए मुनि ने उसके शाप का अन्त भी कहा ।।१३८-१४१॥

'हे दुराचारिणी ! बन में घूमते हुए रामचन्द्र के दर्शन पर्यन्त तू पत्थर हो जा' साथ ही इन्द्र को भी शाप दिया कि जिस स्त्री-वराग'² के लोभ से तूने पाप किया है, उस अंग के तेरे शरीर में हजारो चिह्न हो जायेंगे। इस प्रकार दोनो को शाप दे कर मुनि स्वेच्छा से तपस्या करने चले गये। अहल्या भी कठोर शिला बन गई, इन्द्र का शरीर, भी चारों ओर से स्त्री-योनि के चिन्हों से भर गया। दुश्चरित्रता किसकी दुर्गति का कारण नहीं होती ।।१४२-१४७।।

इसी प्रकार मनुष्य, जीवन में जो भी कुकर्म करता है, उसका फल उसे जीवन में ही भोगना है। जो जैसा बीज बोता है, वैसा ही फल प्राप्त करता है ।। १४८।।

इसलिए उदार चित्तवाले व्यक्ति दूसरों के विरुद्ध कार्यों में प्रवृत्त नहीं होते। उच्च कोटि के व्यक्तियो का यह स्वाभाविक नियम है ।।१४९।।

तुम दोनो महारानियां पूर्वजन्म की दिव्य बहिने हो, किसी शाप के कारण मर्त्यलोक में आ गई हो, उसी प्रकार तुम दोनों के हृदय परस्पर सन्देह-रहित एवं शुद्ध है ।। १५०।।

वसन्तक से इस प्रकार सुनकर दोनो रानियो के हृदय में जो थोड़ी ईर्ष्या की क्षीण रेखा-सी थी, वह भी उन्होने मिटा दी ।। १५१।।

महारानी वासवदत्ता भी पति को दोनों के लिए समान मानकर प‌द्मावती को इसमें उसी प्रकार उद्यत रखती थी, जैसे आत्महित मे ।। १५२।।

मन मे कुछ शकित मगध नरेश ने भी रानी की महानुभावता का परिचय उसके भेजे हुए दूतो से जानकर सन्तोष प्रकट किया ।।१५३।।

किसी दिन, महामन्त्री यौगन्धरायण, महारानियो तथा अन्य स्नेही मित्रों के साथ बैठे हुए वत्सराज के समीप आकर बोला- 'महाराज ! अब कौशाम्बी क्यो नही चलते ? अब तो ठगे हुए भी मगब-नरेश से किसी प्रकार की शंका नहीं है ।। १५४-१५५।।

 कन्या-सम्बन्ध नामक सन्धि से मगधेश वाधित हो गया है, अतः विरोध करके प्राणों से भी अधिक प्यारी पुत्री से कैसे हाथ धो लेगा ।। १५६।।

उसे अपने सत्य का पालन करना चाहिए और तुम्हें भी। वास्तव में तुमने तो उसे ठगा नहीं। उसके लिए जो कुछ किया, मैंने किया; किन्तु वह भी उसके लिए दुःखकारक नही है ।।१५७।।

इतने दिनो तक मैं गुप्तचरों से यह जानने का यत्न कर रहा था कि वह इस घटना के कारण विरुद्ध-क्रिया तो नही कर रहा है। इसीलिए हम इतने दिनो तक यहाँ ठहरे भी रहे ॥ १५८।। इस प्रकार उत्तरदायित्व की रक्षा करनेवाले यौगन्धरायण के कहते ही मगधराज का दूत वहाँ आ पहुँचा ।। १५९।।

पट्टेदार के द्वारा सूचना प्राप्त होने पर उसी ममय अन्दर बुलाये गये और प्रणाम करके बैठे हुए मगध दूत ने निवेदन किया ।।१६०।।

रानी प‌द्मावती द्वारा भेजे गये जवाबी सन्देश से सन्तोष प्रकट करते हुए मगधेश ने, महाराजा को यह कहा है- 'अधिक कहने की आवश्यकता नही, मैंने सब कुछ जान लिया है, तुम पर प्रसन्न हूँ, जिस कार्य के लिए यह सब प्रयत्न किया गया है, उसे प्रारम्भ करो। मैं तो तुम्हारे लिए नम्र हूँ, अर्थात् अब तुम्हारा साथी हूँ ।।१६१-१६२।।

उदयन ने, मगधेश के इस स्पष्ट निर्देश का अभिनन्दन किया। यह सन्देश मानो यौगन्धरायण के नीति-वृक्ष के डगे हुए पुष्प के समान था ।। १६३।।

तब यौगन्धरायण ने उदयन के द्वारा प‌द्मावती को वही बुलाकर उसके साथ ही दूत को उपहार, पुरस्कार आदि के द्वारा सत्कृत करके विदा किया ।।१६४।।

इसके अनन्तर ही उज्जयिनी से चन्द्रमहासेन का भी दूत आ गया, नियमानुसार राजा के सामने पेश होकर और प्रणाम करके बोला-महाराज ! तुम्हारी वास्तविक स्थिति को जानते हुए राजा चन्द्रमहामेन ने प्रसन्नता के साथ सन्देश दिया है कि तुम्हारा महत्त्व इसी से विदित होता है कि तुम्हारा मन्त्री यौगन्धरायण है। इससे अधिक और क्या कहा जाय। बेटी वासवदत्ता भी धन्य है, जिसके कारण सज्जन-समाज में हमारा सिर ऊँचा हुआ है। मेरे लिए प‌द्मावती वासवदत्ता से दूसरी नही है। उन दोनों का हृदय एक ही है, इसलिए शीघ्र अपने उद्योग का प्रारम्भकरो ।। १६५-१६९।।

अपने श्वसुर के इस प्रकार के वचन सुनकर वत्सराज का हृदय आनन्द से भर गया, महारानी वासवदत्ता पर प्रेम बढ़ गया और मन्त्री यौगन्धरायण पर भी स्नेह दृढ हो गया ।।१७०।।

तदनन्तर दोनों महारानियों के साथ उस दूत को सम्मान सहित विदा करके उत्साहित-हृदय वत्सराज ने मन्त्रियों से परामर्श करके दिग्विजय-यात्रा के प्रबन्ध में कौशाम्बी जाने का निश्चय किया ।।१७१।।

महाकवि श्री सोमदेव भट्ट-रचित कथा सरित्सागर के लावाणक लम्बक का तृतीय तरंग समाप्त

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1. अपभ्रंश भाषा में मार्जार (बिल्ली) का रूप 'मज्जार' होता है और संस्कृत में उसका अर्थ; 'मत् मेरा, जार यार' यह अर्थ होता है। अतः अहल्याने अपभ्रंश भाषा में जो असत्य कहा था; संस्कृत भाषा में वह सत्य होगया कि 'मेरा जार' है। 138

2. वर उत्तम, अंग, स्त्री की जननेन्द्रिय । 147

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