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5604. || चौथी कहानी || मदनबेग विद्याधर की कथा; कलिगसेना के विवाह को कथा; वत्सराज की संक्षिप्त कथा; तेजस्वती की कथा; हरिशर्मा ब्राह्मण की कथा;

5604. || चौथी कहानी || मदनबेग विद्याधर की कथा; कलिगसेना के विवाह को कथा; वत्सराज की संक्षिप्त कथा; तेजस्वती की कथा; हरिशर्मा ब्राह्मण की कथा;  चौथा तरंग मदनबेग विद्याधर की कथा तदनन्तर अपने घर को गई हुई सोमप्रभा को पीछे की ओर से देखने के लिए, राजमार्ग के किनारे, अपने भवन की छत पर खड़ी कलिंगसेना को दैवयोग से समीप स्थित मदनवेग नामक विद्याधरों के युवक सरदार ने देखा ।।१-२।। अपने अनुपम रूप से तीनों लोकों को जीतनेवाली कामरूपी ऐन्द्रजालिक की जादुई छड़ी के समान उस कलिंगसेना के रूप को देखकर मदनवेग क्षुब्ध हो गया ॥ ३॥ जहाँ मानव-कन्या का ऐसा रूप है, वहाँ विद्याधरियों और अप्सराओं की क्या कथा ।।४।। अतः यदि यह मेरी स्त्री न हुई, तो मेरे जीवन से क्या लाभ ? किन्तु मैं विद्याधर होकर मानवी का संग कैसे कर सकता हूँ ।।५।। ऐसा सोचकर उसने प्रज्ञप्ति नामक विद्या का व्यान किया। वह विद्या सजीव उपस्थित होकर मदनवेग से इस प्रकार कहने लगी- ॥६॥ 'वास्तव में यह कन्या मानुषी नहीं है। यह शापच्युत अप्सरा है; जो राजा कलिगदत्त के यहाँ उत्पन्न हुई है' ।॥७७॥ ऐसा सुनकर मदनवेग अपने घर गया और सब कार्यों से विरक्त होकर का...