5901. || सप्तम कहानी || नरवाहनदत्त की कथा; अलंकारवती की कथा; राम और सीता की कथा; राजा पृथ्वीरूप और रानी रूपलता की कथा; नरवाहनदत्त और अलंकारवती का विवाह;
5901. || सप्तम कहानी || नरवाहनदत्त की कथा; अलंकारवती की कथा; राम और सीता की कथा; राजा पृथ्वीरूप और रानी रूपलता की कथा; नरवाहनदत्त और अलंकारवती का विवाह; अलंकारवती नामक नवम लम्बक [ प्रस्तुत प्रारम्भिक श्लोक का अर्थ सप्तम लम्बक के प्रथम तरंग के प्रारम्भ में देखें।] प्रथम तरंग मंगलाचरण निशुम्भ दैत्य के भार से झुकी हुई पृथ्वी के ऊपर टेड़े डाँडोल होते हुए पर्वत, मानों जिसके नृत्य करने पर प्रणाम करते हुए-से प्रतीत होते हैं, ऐसे गजानन को हम नमस्कार करते हैं।॥१॥ नरवाहनदत्त की कथा (क्रमागत) वत्सराज उदयन का पुत्र नरवाहनदत्त, विद्यावर-राजाओं के चरित्रों को सुनता हुआ और उनसे (बकवर्ती होने के पूर्व हो) प्रणाम किया जाता हुआ, पिता के घर में, विलास के दिन, व्यतीत कर रहा था ॥२॥ एक चार राजकुमार, अपनी बड़ी सेना लेकर, मन्त्री गोमुख के साथ, शिकार खेलने के लिए वन में गया। कुछ समय के पश्चात वह सेना को पीछे छोड़कर गोमुख के साथ अकेले ही घने जंगल में चला गया ।॥३॥ वहाँ उसे दाहिनी आँख के फड़कने से किसी शुभ भविष्य की सूबना मिली। कुछ ही समय में उसने दिव्य वीणा-स्वर-मिश्रित संगीत सुना ॥४...