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5701. || प्रथम कहानी || रलप्रभा की कथा; रत्नप्रभा का स्वकथित वृत्तान्त; राजा सस्वशील को कथा; विक्रमतुंग राजा की कथा

5701. || प्रथम कहानी || रलप्रभा की कथा; रत्नप्रभा का स्वकथित वृत्तान्त; राजा सस्वशील को कथा; विक्रमतुंग राजा की कथा रत्नप्रभा नाम सप्तमो क्षम्बकः इदं गुरुगिरीन्द्रजाप्रणयमन्दरान्दोलना-त्पुरा किल कथामृतं हरमुखाम्बुघेरुद्गतम् । प्रसह्य रसयन्ति ये विगतविघ्नलब्धर्द्धयो घुरं दघति वैबुधीं भुवि भवप्रसादेन ते ।। रत्नप्रभा नामक सप्तम लम्बक नगेन्द्र-नन्दिनी पार्वती के प्रबल प्रणय-मन्दराचल के मन्थन द्वारा शिवजी के मुख रूपी समुद्र से निकले हुए इस कथा-रूपी अमृत का जो लोग आदर और आग्रहपूर्वक पान करते हैं, वे शिवजी की कृपा से निविघ्न सिद्धियों को प्राप्त कर, दिव्य पद लाभ करते हैं। प्रथम तरंग मंगलाचरण शिव और पार्वती की प्रेम-क्रीडा के समय शिव का केश ग्रहण करते हुए पार्वती के हाथों के नलों में प्रतिविम्बित अनेक चन्द्रमाओं से युक्त उनका (शिव का) मस्तक आपका कल्याण करे ।।१।।¹ मदजल से गीली और सिकुड़ी हुई सूंड़ को फैलाकर मानों सिद्धि प्रदान करते हुए गण-पति आपकी रक्षा करें ॥२॥ रलप्रभा की कथा पूर्वोक्त प्रकार से प्राणप्यारी मदनमंबुका के साथ धूमधाम से विवाह करके सफलमनोरथ युवराज नरवाहह्नदत गोमुत्र आदि मन्त्रियों...