5701. || प्रथम कहानी || रलप्रभा की कथा; रत्नप्रभा का स्वकथित वृत्तान्त; राजा सस्वशील को कथा; विक्रमतुंग राजा की कथा

5701. || प्रथम कहानी || रलप्रभा की कथा; रत्नप्रभा का स्वकथित वृत्तान्त; राजा सस्वशील को कथा; विक्रमतुंग राजा की कथा

रत्नप्रभा नाम सप्तमो क्षम्बकः

इदं गुरुगिरीन्द्रजाप्रणयमन्दरान्दोलना-त्पुरा किल कथामृतं हरमुखाम्बुघेरुद्गतम् ।
प्रसह्य रसयन्ति ये विगतविघ्नलब्धर्द्धयो घुरं दघति वैबुधीं भुवि भवप्रसादेन ते ।।

रत्नप्रभा नामक सप्तम लम्बक

नगेन्द्र-नन्दिनी पार्वती के प्रबल प्रणय-मन्दराचल के मन्थन द्वारा शिवजी के मुख रूपी समुद्र से निकले हुए इस कथा-रूपी अमृत का जो लोग आदर और आग्रहपूर्वक पान करते हैं, वे शिवजी की कृपा से निविघ्न सिद्धियों को प्राप्त कर, दिव्य पद लाभ करते हैं।

प्रथम तरंग

मंगलाचरण

शिव और पार्वती की प्रेम-क्रीडा के समय शिव का केश ग्रहण करते हुए पार्वती के हाथों के नलों में प्रतिविम्बित अनेक चन्द्रमाओं से युक्त उनका (शिव का) मस्तक आपका कल्याण करे ।।१।।¹

मदजल से गीली और सिकुड़ी हुई सूंड़ को फैलाकर मानों सिद्धि प्रदान करते हुए गण-पति आपकी रक्षा करें ॥२॥

रलप्रभा की कथा

पूर्वोक्त प्रकार से प्राणप्यारी मदनमंबुका के साथ धूमधाम से विवाह करके सफलमनोरथ युवराज नरवाहह्नदत गोमुत्र आदि मन्त्रियों के साथ कौशाम्बी नगरी में सुख-पूर्वक निवास करने लगा ॥३-४।।

एक वार, मदोन्मत्त कोयल के कूकने से मनोहर, लताओं को नचाते हुए मलय पवन से मुरभित और गुनगुनाते हुए भौरों के गुंजन से मुखरित वसन्त-समय के प्राप्त होने पर, राज-कुमार, अपने साथी मन्त्रियों के साथ, उद्यान-विहार के लिए गया ॥५-६॥

उद्यान-विहार करके जाया हुआ और प्रमन्नता से विकसित नेत्रोंवाला तपन्तक महमा युवराज के पास जाकर बोला- ॥७॥

'युवराज ! यहाँ से कुछ समीप ही मैंने आकाश से उतरकर अशोक-वृक्ष के नीचे सड़ी किसी कन्या को देखा है॥८॥

सहेली के साथ आई हुई और अपनी कान्ति से दिशाओं को प्रकाशित करती हुई उमी कन्या ने मेरे पास आकर तुम्हें बुलाने के लिए मुझे तुम्हारे पास भेजा है' ॥९॥

यह सुनकर नरवाहनदत्त, अपने साथी मन्त्रियों के माथ उस कन्या को देखने के लिए शीघ्र हो अशोक वृक्ष के नीचे गवा ॥१०॥

वहाँ उसने जन-लोचनों के लिए भ्रमरी के समान, लाल ओठोंवाली एवं उभरे हुए स्तनों से शोभित उस सुन्दरी को देखा ॥११॥

पुष्पराग के समान गौर अंगोंवाली, अपनी छाया से सन्ताप हरनेवाली और सुन्दर आकृतिवाली वह सुन्दरी उस उपवन की साक्षात् देवी-सी मालूम हो रही थी ॥ १२॥

युबराज उसके समीप गया और प्रणाम करती हुई उसका अभिनन्दन किया। उस दिव्य कन्या के रूप के आर्कषण से उसकी आँखें स्तब्य हो गई ॥१३॥

तदनन्तर सबके बैठ जानेपर युवराज के सचिव गोमुख ने उससे पूछा- 'हे कल्याणी ! तू कौन है और यहाँ किसलिए आई है?' ॥१४॥

यह सुनकर अलंवनीय कामदेव की आज्ञा से लज्जा को त्यागकर नरवाहनदत्त के मुल-कमल को प्रेमामृत बरसाती हुई तिरछी आंखों से बराबर निहारती हुई वह कन्या अपना वृत्तान्त इस प्रकार कहने लगी- ।॥१५-१६॥

रत्नप्रभा का स्वकथित वृत्तान्त

तीनों लोकों में प्रसिद्ध हिमाचल नाम का पर्वतराज है। अनेक शिखरोंवाले उस हिमालय का, चमकती हुई मणियों की प्रभा से शोभित तथा चन्द्रमा से चमकता हुआ एक बड़ा शिकार है, जिसका विस्तार आकाश के समान असीम और अनन्त है ।।१७-१८॥

उस पर्वत की स्थलियाँ, वृद्धावस्था और मृत्यु को दूर करनेवाली तया शिव की कृपा से प्राप्त होनेवाली ओषधियों और सिद्धियों का कोप (खजाना) हैं ॥१९॥

विद्याधरों के समूह की कान्ति से पीत वर्णवाले, जिसके शिखर, मुमेरु पर्वत के शिखरों की शोभा को नीचा दिखाते है॥२०॥

वहाँ कांचनश्रृंग नाम का सुर्वणमय नगर है, जो स्वर्ण और रत्नों की प्रभाओं से नदा चमकता हुजा सूर्य के निवास स्थान के समान मालूम होता है ॥२१॥

अनेक कोसों में फैले हुए उस नगर में हेमप्रभ नाम का विद्याधरों का राजा है, जो शिव में दृढ भक्ति रखता है॥२२॥

उस हेमप्रभ की अनेक पत्नियों में अलंकारप्रभा नाम की पत्नी उसी प्रकार प्रधान है, जिस प्रकार चन्द्रमा की पत्नियों में रोहिणी ॥२३॥

वह धार्मिक राजा हेमप्रभ, प्रातः काल उठकर स्नान करके उस महारानी के साथ गौरी-समेत शिव की विधिवत् पूजा करता है ।॥२४॥

और, प्रतिदिन मत्त्यंलोक में आकर दरिद्र ब्राह्मणों को रत्नो के साथ एक लाख स्वर्ण की मुहरे दान करता है।॥२५॥

मुनियों के समान नियमित व्रत करनेवाला वह राजा दान करने के अनन्तर अपनी नगरी में आता और राज्य कार्यों को देखता है, तब अम्न-जल ग्रहण करता है।॥२६॥

इस प्रकार, बहुत विन व्यतीत होने पर भी उसे पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई। एक बार उसे इस बात पर गम्भीर चिन्ता उत्पन्न हो गई ॥२७।।

उसे अत्यन्त चिन्तित देखकर रानी अलंकारप्रभा ने उसकी उदासी का कारण पूछा ॥२८॥

प्रश्न सुनकर राजा ने कहा- देवि! मुझे सभी प्रकार की सम्पत्ति प्राप्त है, किन्तु एक पुत्र का अभाव मेरी चिन्ता का कारण हो रहा है ।॥२९॥

मैंने एक पुत्रहीन सत्त्ववान् मनुष्य की कथा सुनी थी, उसके स्मरण बाने पर बाज चिन्ता बढ़ गई है' ।॥३०॥

'वह कैसी कथा है?' इस प्रकार रानी के पूछने पर राजा ने संक्षेप से वह कथा इस प्रकार सुनाई ॥३१॥

राजा सस्वशील को कथा

चित्रकूट नामक नगर में ब्राह्मणों की सेवा में निरत ब्राह्मणवर नामक यथार्थ नामवाला राजा या ॥३२॥

उसका सत्त्वशील नामक एक विजयी और पुद्ध में सहायता करनेवाला भक्त सेवक था। उसे राजा प्रतिमास एक सी स्वर्ण मुद्रा वेनन के रूप में देता था ।॥३३॥

किन्तु परम उदार उस सत्त्वशील के लिए इतना धन पूरा नही होता था; क्योंकि पुत्र न होने के कारण वह उस बन को दान कर देता था ।॥ ३४॥

वह सोचता था कि विधि ने मेरे मनोविनोद के लिए एक पुत्र नहीं दिया, केवल दान इने का व्यसन दिया, वह भी धन के विना ॥ ३५॥

संसार में पुराने और सूखे वृक्ष या पत्थर का जन्म होना अच्छा है; किन्तु दान का व्यसनी होकर दरिद्र होना अच्छा नहीं ।॥३६॥

ऐसा सोचते हुए सस्वशील ने घूमते-धामते दैवयोग से अपने उद्यान में कोष (खजाना) प्राप्त किया ।। ३७।।

अपने नौकरों की सहायता से, बह सत्त्वशील अपरिमित स्वर्ण और रत्नों से भरे हुए खजाने को, अपने घर उठवा ले गया ।॥३८॥

इतना धन प्राप्त करके वह सुख-भोग करता, दान देता और मृत्यों तथा मित्रों को बांटता हुआ सुख से रहने लगा ॥३९॥

उसके वैभव को देखबार उसके कुटुम्बियों ने पता लगा लिया कि इसे कहीं खजाना हाय लगा है। अतः, ईष्र्यावश उन्होंने राजा से जाकर सारा समाचार सुना दिया ॥४०॥

राजा ने पहरेदार को भेजकर सत्त्वशील को बुलवाया। यह भी राजमवन के आँगन में बाकर एक कोने में खड़ा हो गया। वहाँ पर एकान्त में उसने हाथ में ली हुई छड़ी की नोक से मिट्टी की कच्ची, भूमि, बड़े-खड़े खोद डाली और उसे वहाँ पर ताँबे के पड़े में भरी हुई मुहरों का खजाना दीस पढ़ा ॥४१-४२॥

वह खजाना क्या मिला मानों देव ने 'इसे देकर राजा को संतुष्ट करो', इस प्रकार का प्रकाश दिया ॥४३॥

सत्त्वशील ने उस गड़े को मिट्टी से भर दिया और द्वारपाल के साथ राजा के सन्मुख उप-स्थित हुआ। उसके प्रणाम करने पर राजा ने स्वयं कहा- ॥४४॥

'मुझे मालूम हुआ है कि तुम्हें खजाना मिला है। उसे हमें सौंप दो ॥४५॥

यह सुनकर सत्त्वशील नम्रभाव से बोला कि 'महाराज ? पहले मिला हुआ खजाना समर्पण कहें या जाज का मिला हुआ ? ॥४६॥

राजा ने कहा-'अभी प्राप्त धन-भाण्डार मुझे दो।' सत्त्वशील ने राजा को एकान्त में ले जाकर तुरन्त देखा हुना धन-भाण्डार दे दिया ॥४७॥

राजा ने प्रसन्न होकर कहा- 'पहले भाण्डार को तुम आनन्द से भोगो।' इस प्रकार सन्तुष्ट राजा से आज्ञा पाकर मत्त्वशील अपने घर आया ॥४८॥

घर आकर अपुत्रता के दुःख को किसी प्रकार भुलाता हुजा सत्त्वशील दान और भोग से भाण्डार को लुटाता हुआ अपने नाम को चरितार्थ करने लगा ॥४९॥

विद्याधर-राजा हेमप्रभ ने कहा कि 'इस प्रकार सत्त्वशील की कथा स्मरण करके पुत्र न होने की चिन्ता से दुःखी हूँ ॥५०॥

पति हेमप्रभ से इस प्रकार कही गई रानी अलंकारप्रभा उससे बोली- ।॥५१॥

'यह सच है कि उदार हृदयवालों की दैव भी सहायता करता है। क्या दूसरा स्वर्ण-भाण्डार देकर देव ने सत्त्वकील की संकट के समय सहायता नहीं की ? ॥५२॥

इसी प्रकार, तुम भी अपने सत्व के प्रभाव से इच्छित फल प्राप्त करोगे।' इस सम्बन्ध में उदाहरणस्वरूप विक्रमतुंग नामक राजा की कथा सुनों ॥५३॥

विक्रमतुंग राजा की कथा

पृथ्वी का अलंकारस्वरूप पाटलिपुत्र नाम का नगर है, जिसमें पूर्ण कान्तिवाली नाना प्रकार की मणियाँ जड़ी हुई हैं।॥५४।।

प्राचीन समय उस नगर में विक्रमतुंग नाम का सत्त्वशील राजा था, जो दान देने में माचकों से और बुद्ध में शत्रुजों से कभी पराङ्मुल नहीं हुजा ॥५५॥

किसी समय यह राजा शिकार खेलने के लिए जंगल में गया। वहाँ उसने बिल्वफल (बेल) से होम करते हुए किसी ब्राह्मण को देखा ॥५६।।

उसे देखकर पूछने की इच्छा होने पर मी, राजा, उसे छोड़कर शिकार के लिए सेना के साथ आगे चला गया ।॥५७॥

उछलते-गिरते हाथों से मारे जाते हुए गेंदों के समान, मुगों और सिंहों से चिर काल तक खेलकर लौटे हुए राजा ने उसी स्थान पर होम करते हुए ब्राह्मण को देखा और समीप जाकर प्रणाम करके उससे होम का फल पूछा ।।५८-५९।।

तब वह ब्राह्मण, राजा को आशीर्वाद देकर बोला- 'मैं नागशमों नाम का ब्राह्मण हूँ। इस होम का फल सुनो ॥६०॥

इस बिल्व के होम से जब अग्नि प्रसन्न होती है, तब कुण्ड से सोने के बिल्व निकलते हैं ॥६१।।

और, तब अग्नि प्रकट होकर स्वयं वरदान देती है। मुझे बिल्यों का होम करते हुए बहुत समय व्यतीत हो गया, किन्तु मुझ अभागे पर अभी तक अग्नि प्रसन्न नहीं हुई।' उसके ऐसा कहने पर धीरसत्त्वशाली राजा उससे बोला- ॥६२-६३॥

'यदि ऐसा है, तो एक बिल्व मुझे दो, में उसका होम करता हूँ और तुम्हारी अग्नि को अभी प्रसन्न करता हूँ ॥६४॥

ब्राह्मण ने राजा से कहा- 'अनियमित और अपवित्र अवस्था में तुम आग को कैसे प्रसन्न करोगे, जब कि नियमपूर्वक अनुष्ठान करने और पवित्र स्थिति में रहनेवाले मुझपर वह प्रसश्न नहीं है ।॥६५॥

राजा ने कहा- ऐसी बात नहीं है। तुम चिन्ता न करो। तुम मुझे एक बिल्ब दो और आश्चर्य देखो' ॥६६।।

तब ब्राह्मण ने आश्चर्य के साथ राजा को बिल्व दिया और राजा दृढ चित्त से मन-ही-मन बोला- हे अग्निदेव! यदि तुम मेरे बिल्व होम से प्रसन्न न होगे, तो मैं अपना सिर तुम्हारे लिए होम कर दूँगा।' ऐसा कहकर उसने बिल्व को होम दिया ॥६७-६८॥

बिल्व का होम करते ही हाथों में स्वर्ण का बिल्व लिये हुए अग्निदेव कुष्ठ से प्रकट हुए, मानों के राजा के दृढ सत्त्व का फल लेकर आये हों ॥६९॥

और हृदय सजा से बोले- 'तुम्हारे इस सत्त्व से में प्रसन हूँ। बर माँगो' ।॥७०॥

यह सुनकर महावीर राजा प्रणाम करता हुजा बोला- मेरे लिए दूसरा और वर क्या चाहिए, पहले उस ब्राह्मण का मनोरय पूर्ण करो' ॥७१॥

राजा की बात सुनकर अत्यन्त प्रसन्न अग्नि ने कहा कि यह ब्राह्मण, महाधनपति होगा और मेरी कृपा से तुम्हारा भाण्डार और लक्ष्मी दोनों कमी क्षीण न होंगे। इस प्रकार, वर देते हुए अग्नि से ब्राह्मण बोला- ।।७२-७३।।

'भगवन् ! स्वेच्छाविहारी राजा से तुम इतना शीघ्र प्रसन्न हो गये और कठोर नियम तथा व्रत करनेवाले मुझसे न हुए, यह क्या बात है ? ॥७४॥

तब अग्नि ने कहा- 'यदि मैं दर्शन न देता, तो वह महासत्त्वशाली राजा अपना सिर काटकर मुझ में होम देता ॥७५॥

उत्कट सत्त्ववाले व्यक्तियों को सिद्धियाँ शीघ्र प्राप्त होती हैं और हे ब्राह्मण ! तुम्हारे ऐसे मन्द सत्त्ववालों को सिद्धियाँ देर से प्राप्त होती हैं ॥७६॥

ऐसा कहकर अग्निदेव के अन्तर्धान होने पर नागशर्मा राजा से आज्ञा लेकर चला गया और वह क्रमशः महाधनी हो गया ॥७७॥

राजा भी अपनी अद्भुत सत्त्वशीलता के कारण सेवकों से स्तुति किया जाता हुआ पाटलिपुत्र नगर को गवा ॥७८॥

एक बार एकान्त में बैठे हुए राजा के समीप शत्रुंजय नामक द्वारपाल ने कहा- 'महाराज ! अपना नाम दत्तशर्मा बताता हुआ एक ब्रह्मचारी बाह्मण आपसे एकान्त में कुछ निवेदन करने के लिए द्वार पर आया है' ॥७९-८०।।

'उसे बुलाओ-राजा की इस प्रकार आज्ञा पाने पर द्वारपाल उसे ले आया। वह भी राजा को 'स्वस्ति' कहकर और प्रणाम करके बैठ गया ।।८१।।

और बोला- 'महाराज! मैं किसी चूर्ण मिलाने की मुक्ति द्वारा ताँबे से तुरन्त उत्तम सोना बनाना जानता हूँ ॥८२॥

बह युक्ति गुरु ने मुझे बताई है और मैंने उसकी अनेक बार परीक्षा की है, जिससे सोना बन गया ।॥८३॥

उस ब्रह्मचारी के ऐसा कहने पर राजा ने ताँबा मंगवाया। उसके पिघल जाने पर ब्रह्मचारी ने उसमें चूर्ण डाला। उसमें चूर्ण डालते ही किसी छिपे हुए देवता ने अदृश्य रूप से उस चूर्ण का अपहरण कर लिया। अग्नि की कृपा से राजा ने उस अदृश्य यक्ष को देख लिया ॥८४-८५॥

चूर्ण न मिल सकने के कारण वह ताँबा सोना न बन सका। इस प्रकार, तीन बार करने पर भी ब्रह्मचारी का प्रयत्न निष्फल ही रहा ॥८६॥

तब राजा ने दुःखित ब्रह्मचारी से उस चूर्ण को लेकर स्वयं पिघले हुए ताँबे में डाला और उससे सोना बन गया ॥८७॥

राजा के चूर्ण डालने पर यक्ष ने उसका अपहरण नहीं किया और मुस्कराकर चला गया ।॥८८॥

इस घटना से आश्चर्य चकित उस ब्रह्मचारी के पूछने पर राजा ने यक्ष की बात उसे कह सुनाई ॥८९॥

तब राजा ने उस ब्रह्मचारी से चूर्ण बनाने की मुक्ति सीख ली और उसका विवाह कराकर पालन-पोषण की व्यवस्था कर दी ॥९०॥

और, उस युक्ति से सोना बनाकर राजा ने अपने भाण्डार को समृद्ध कर लिया ।॥९१॥

इस प्रकार, डरा हुआ या प्रसन्न ईश्वर उम्र सत्त्ववालों को सिद्धि प्रदान करता ही है॥९२॥

इसलिए 'हे महाराज ! तुमसे गम्भीर सत्त्वशाली और कौन दाता है। अतः, शिव तुम्हें पुत्र प्रदान करेंगे। शोक मत करो' ॥९३॥

इस प्रकार, रानी अलंकारप्रभा के उदार वचन सुनकर राजा हेमप्रभ प्रसन्न हुआ और उसकी बातों पर उसने विश्वाम किया ॥९४॥

राजा ने अपने उत्साह-भरे हृदय से शिव की आराधना से पुत्र की प्राप्ति को सम्भव समझा ॥९५।।

तब दूसरे दिन राजा हेमध्भ, रानी के साथ स्नान करने के बाद शिव की पूजा करके और बाह्मणों को नौ करोड़ सोने की मुद्राएँ दान करके पुत्र प्राप्ति के लिए निराहार होकर शिव के सन्मुख तप करने के लिए बैठ गया और उसने यह निश्चय कर लिया कि या तो देह त्याग करूँगा अथवा शंकर को प्रसन्न करूँगा ।।९६-९७।।

तप में बैठे हुए उसने भगवान् गिरिजापति की इस प्रकार स्तुति की 'शरण में आये हुए उपमन्यु को स्वेच्छा से दुग्ध-समुद्र दान करनेवाले, संमार की उत्पत्ति, रक्षा और प्रलय करने-बाले हे शंकर ! तुम्हें प्रणाम है। हे आकाश आदि अष्टमूत्ति धारण करनेवाले गौरीपति ! तुम्हें प्रणाम है।॥९८-९९।।

है निरन्तर खिले हुए हृदय-कमल में निवास करनेवाले, निर्मल मानस-सरोवर के कलहंस शम्भु ! तुम्हें प्रणाम है।॥१००॥


हे दिव्य प्रकाशचारी निर्मल जल-स्वरूप, हे निर्दोष व्यक्तियों से देखे जानेवाले अत्यन्त आश्चर्यमय शिव! तुम्हें प्रणाम है। हे आधे शरीर में गिरिजा को धारण करनेवाले, विशुद्ध ब्रह्मचारिन् ! हे संकल्पमात्र से विश्व की रचना करनेवाले और स्वयं विश्वस्वरूप ! तुम्हें प्रणाम है ।॥१०१-१०२॥

इस प्रकार, स्तुति करते हुए और तीन दिनों तक उपवास किये हुए राजा से प्रसन होकर शिव ने दर्शन देकर कहा- 'राजन् ! उठो। तुम्हारे वंश का प्रवत्तंक बालक उत्पन्न होगा और गौरी की कृपा से तुम्हें एक उत्तम कन्या भी होगी ।॥१०३-१०४।।

वह कन्या तुम विद्याघरों के होनेवाले चक्रवर्ती नरवाहनदत्त की महारानी बनेगी' ।॥१०५॥

ऐसा कहकर शिव के अन्तर्धान होने पर वह विद्याषरों का राजा, प्रातःकाल प्रसन्न-चित्त होकर उठा और उसने अपनी महारानी अलंकारप्रभा को स्वप्न का समाचार सुनाकर आनन्दित किया, रानी ने भी स्वप्न में पार्वती के द्वारा इसी प्रकार के वरदान प्राप्त करने का समाचार सुनाया ॥१०६-१०७।।

राजा ने उठकर स्नान करके शिव की पूजा की और दान किया तथा व्रत का पारणोत्सव किया। कुछ दिन व्यतीत होने पर रानी अलंकारप्रभा ने गर्भ धारण किया ॥१०८-१०९॥

वह रानी मधु से सुगन्धिन और चंचल नेत्र-भ्रमरवाले पाण्डुरवणं कमल के समान मुख से राजा को आनन्दित करने लगी ॥११००।

तदनन्तर प्रसिद्ध और प्रशंसनीय जन्मवाले पुत्र को रानी ने इस प्रकार उत्पन्न किया, जैसे आकाश सूर्य को उत्पन्न करता है ॥१११॥

उत्पन्न होते ही उस कुमार ने अपने फैलते हुए तेज से उस प्रसूति गृह को मानों सिन्दूर से लाल कर दिया ॥११२॥

पिता हेमप्रभ ने, शत्रुकुल को भय देनेवाले उस पुत्र का नाम आकाशवाणी के आज्ञानुसार वज्रप्रभ रला ।।११३।।

तब वह बालक, पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान अपने कुल-रूपी समुद्र को बढ़ाने के लिए क्रमशः बढ़ने लगा ।॥ ११४॥

तदनन्तर राजा हेमप्रभ की रानी अलंकारप्रभा ने पुनः थोड़े दिनों में ही गर्भ धारण किया ॥११५।।

वह गर्भवती रानी रनिवास में सिहासन पर बैठी हुई सचमुच रनिवास के रल-सी मालूम होती थी ।।११६।।

गर्म के कारण होनेवाली इच्छा की पूत्ति के लिए वह अपनी विद्या के प्रभाव से व्योम-यान की कल्पना करके आकाश में विचरण करती थी ॥ ११७।।

गर्म का समय (दस महीने) पूरा होने पर रानी ने कन्या को उत्पन्न किया। उस कन्या के वर्णन में इतना कहना ही पर्याप्त है कि उस का जन्म पार्वती की कृपा से हुआ था ॥ ११८॥

उसके उत्पन्न होने पर शिव की आजा का अनुसरण करनेवाली यह आकाशवाणी हुई कि 'यह नरवाहनदत्त की भावी पत्नी होगी ॥११९॥

राजा ने पुत्रोत्पत्ति के समान ही उसका जन्म-महोत्सव मनाया और उस कन्या का नाम रत्नप्रभा रखा ॥१२०॥

राजा ने उस कन्या को अपनी विद्याओं से शिक्षित कर दिया। वह कन्या घर में बढ़ने लगी और उसका प्रकाश चारों दिशाओं में फैलने लगा ॥ १२१॥

तदनन्तर राजा ने उस कुमार को बुद्ध-विद्याजों में निपुण देखकर उसका विवाह करके उसे युवराज बना दिया ॥१२२॥

पुत्र पर राज्य-भार देकर राजा हेमप्रभ निश्चिन्त और सुखी था; किन्तु कन्या के विवाह की एक चिन्ता उसके हृदय में जगी हुई थी ॥ १२३॥

एक बार वह राजा अपने पास बैठी हुई विवाह-पोग्य कन्या को देखकर समीप में स्थित रानी अलंकारप्रभा से बोला- ॥ १२४॥

हे महारानी ! तीनों लोकों में कुल के अलंकार-रूपें होने पर भी कम्या, महान् लोगों के लिए भी अत्यन्त दुःखदायिनी होती है ।।१२५।।

यह रत्नप्रभा शिक्षिता, रूपवती और विद्याओं की जानकार होने पर भी वर न मिलने के कारण मुझे दुःख दे रही हैं ।॥१२६॥

रानी ने कहा कि 'देवताओं ने इसके नरवाहनदत्त की महारानी होने की आकाशवाणी की है, अतः हमारे उस भावी चक्रवर्ती को इसे क्यों नही दे देते ?'।॥ १२७॥

रानी से इस प्रकार कहे गये राजा हेमप्रभ ने उससे कहा- 'ठीक है। वह कन्या धन्य है, जो नरवाहनदत्त को पति-रूप में प्राप्त करे। वह कामदेव का अवतार है; किन्तु उसने अभी दिव्यता नहीं प्राप्त की। अतः, मैं उसकी विद्या-प्राप्ति की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। (विद्या प्राप्त होने पर वह दिव्य विद्याधर हो जायगा ॥१२८-१२९॥

इस प्रकार पिता के मुख से काम के मोहन-मन्त्रों के समान उन अक्षरों के कान में आने पर रत्नप्रभा उस पत्ति द्वारा चित्त हरण कर लेने पर, व्याकुल-सी, मूच्छित-सी सोई-सी, और लिखी हुई-सी हो गई ।।१३०-१३१॥

तब वह कन्या, माता-पिता को प्रणाम करके और किसी प्रकार उठकर अपने निवास-भवन में चली गई और अत्यन्त चिन्ता से भ्याकुल होकर किसी प्रकार बड़ी देर के बाद सो गई ॥१३२॥

तब स्वप्न में उसे दयामयी पार्वती ने कहा- 'बेटी! कल शुभ दिन है। अतः, तुम स्वयं कौशाम्बी में जाकर अपने पति को देखना। तब तुम्हारा पिता म्ययं वहाँ आकर तुम्हारा विवाह करेगा'। पार्वती के उस प्रकार के आदेश को उसने प्रातःकाल उठकर अपनी माता से कह सुनाया ॥१३५॥

माता की आजा पाकर और अपनी विद्या के प्रभाव में मब कुछ जानकर वह उद्यान में स्थित अपने पति को देखने के लिए अपने नगर से चली ॥ १३६॥

'हे आर्यपुत्र ! तुम मुझे वही रत्नप्रभा समझो, जो उत्कण्ठित होकर तुम्हारे पास आई है। आगे तुम जैसा समझो ॥१३७॥

इस प्रकार, उसके अमृत को नीचा दिलानेवाले मधुर वचन को सुनकर और नेत्रों के लिए अन्त के समान उस विद्याधरी के सुन्दर रूप को देखकर नरवाहह्मदत्त विधाता की निन्दा करने लगा कि उसने, मारा शरीर ही नेत्रमय और कर्णमय क्यों नहीं बना दिया कि उसे में देखता ही रहता और उसके बचन सुनता ही रहता ॥ १३८-१३९।।

और बोला- 'मैं धन्य हूँ। आज मेरा जन्म गफल हुआ कि तुमने प्रेम से मेरे पास अभिगमन किया ।॥ १४०॥

इस प्रकार, उन दोनों के परस्पर नवीन प्रेम के कारण वार्तालाप करते हुए ही अकन्मात् आकाश में विद्यावरों की सेना दीख पड़ी ।॥ १८११॥

'यह मेरे पिता आये' रलप्रभा के इस प्रकार कहते ही राजा हेमप्रभ, अपने पुत्र के साथ आकाश से तुरन्त उतरा ॥ १४२॥

वह राजा हेमप्रभ, अपने पुत्र ववप्रभ के साथ स्वागत करते हुए नरवाहनदत्त के पास आया ॥१४३॥

जबतक वे परस्पर शिष्टाचार करते हुए मिल रहे थे, इतने में ही उनका आगमन जानकर वत्सराज उदयन भी अपने मंत्री के साथ वही आ गया ।॥ १४४॥

अतिथि-सत्कार प्राप्त करने के बाद राजा हेमप्रभ ने, उदयन को, रत्नप्रभा के पूर्व कथनानुसार सारा, वृत्तान्त सुनाया ॥ १४५।।

बौर कहा कि 'मैंने विद्या के प्रभाव से यह जान लिया कि मेरी कन्या यहाँ जाई है और सब भी मैं जानता हूँ ॥१४६॥

यह कुमार नरवाह्नदत्त जब वकवर्ती होगा, तब इसको भी ऐसा विमान होगा। आप लोग कुछ ही समय में रत्नप्रभा के साथ अपने पुत्र को यहाँ आया हुआ देखोगे ॥१४७-१४८।।

'इस समय हम लोगों को जाने की आज्ञा दो', इस प्रकार वत्सराज से निवेदन करके और उसकी आज्ञा प्राप्त करके अपनी विद्या के प्रभाव से विमान की रचना करके, पुत्र के साथ उस विमान में लज्जा से नीचा मुँह किये हुए नरवाहनदत्त को, उसके मित्र गोमुख आदि के साथ विमान में बिठाकर और वत्सराज के द्वारा प्रेषित यौगन्धरायण को साथ लेकर हेमप्रम अपने कांचनश्रृंग नगर को गया ।।१४९- १५१॥

नरवाहनदत्त ने भी सुवर्णमय और सोने की चारदीवारी में पिरे हुए दवशुर के नगर को देखा, जो चारों ओर निकलती हुई प्रकाश की किरणों से ऐसा शोभित था, मानों जामाता के स्नेह से अपने हाथों को ऊंचा करके फैलाये हुआ था ।॥१५२-१५३।।

उस नगर में पहुँचकर राजा हेमप्रभ ने, शास्त्र-विधि के अनुसार नरवाहनदत्त को अपनी कन्या इस प्रकार दी, जैसे समुद्र ने विष्णु को लक्ष्मी दी थी ॥१५४॥

कन्या के साथ उसने रत्नों के चमकते हुए ढेर दहेज में दिये, जो अनेक विवाहों में प्रज्वलित अग्नियों का भ्रम उत्पन्न कर रहे थे ।। १५५।।

समस्त कांचनपुर नगर में विवाह का उत्सव इस प्रकार हुआ कि ध्वजा (पताका) बाले घर भी ऐसे लग रहे थे, मानों राजा से वस्त्र प्राप्त किये हुए हों ।॥१५६॥

नरवाहनदत्त, विवाहोत्सव के हो जाने पर पत्नी रत्नप्रभा के साथ दिव्य भोगों का भोग करता हुआ उस नगर में रहने लगा ।। १५७।।

वह उस नगरी के दिव्य बाग-बगीचों, वापियों और देव-मन्दिरों में बिहार करता था और विद्या के प्रभाव से रत्नप्रभा के साथ आकाश में भी विचरण करता था ।। १५८।।

इस प्रकार, पत्नी के साथ नरवाहनदत्त ने, उस विद्याधरों के नगर में, कुछ दिनों तक रहकर अपने पिता के पास आने के लिए यौगन्धरायण के साथ सम्मति की ॥१५९॥

तवनन्तर सास के द्वारा मंगल-विधान करने पर बऔर ससुर के द्वारा सम्मानित किया गया नरवाहनदत्त, पुत्र (साले) के सहित अपने ससुर के साथ, अपनी पत्नी और मित्रों को लिये हुए विमान पर बैठकर कौशाम्बी की बोर चला ॥१६०।।

और, शीघ्र ही वत्सराज से किये गये उत्सव से अलंकृत राजधानी में, माताओं की आँखों के लिए अमृत प्रवाहित करता हुआ नरवाहनदत्त, अपने ससुर, साले और पत्नी रत्नप्रभा एवं अपने साथियों के साथ पहुंचा ।।१६१।।

वासवदत्ता के साथ उदयन ने भी, पैरों पर गिरते हुए पुत्र और पुत्रवधू का अभिनन्दन किया और अपने विभव के अनुरूप अपने नये सम्बन्धी हेमप्रभ और उसके पुत्र वाप्रभ का स्वागत-मत्कार किया ।। १६२।।

तदनन्तर हेमप्रभ के, उदयन से आज्ञा लेकर पुत्र के साथ आकाश में उड़कर अपने नगर को विदा होने पर, वह नरवाहनदत्त, मदनमंचुका और रत्नप्रभा के साथ अपने मित्रों से मिलकर मुख से दिन बिताने लगा ।।१६३-१६४।।

महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कयासरित्सागर के कथापीठलम्बक का प्रथम तरंग समाप्त


1. इस मंगलाचरण में संभोग-श्रृंगार रस है। पार्वती स्वाधीनपतिका नायिका है और महाँ उत्प्रेक्षालंकार है। २. युबराज का नर्मसचिव, वसन्तक का पुत्र ।

Comments

Popular posts from this blog

5.201. || पहली कहानी || राजा सहस्त्रनीक, रानी मृगावती के विवाह व उदयन के जन्म की कथा

5.101. || प्रथम कहानी || शिव और पार्वती का संवाद और पार्वती के जन्म की कथा