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5709. || नवम कहानी || नरवाहनदत्त का साहस; राज्यधर बढ़ई की कथा; मानपरा और अर्थलोभ की कथा; नरवाहनदत्त का कर्पूरसंभव द्वीप के प्रति प्रस्थान

5709. || नवम कहानी || नरवाहनदत्त का साहस; राज्यधर बढ़ई की कथा; मानपरा और अर्थलोभ की कथा; नरवाहनदत्त का कर्पूरसंभव द्वीप के प्रति प्रस्थान नवम तरंग नरवाहनदत्त का साहस तव प्रात काल, उस तालाब के किनारे में उठकर आगे के लिए प्रस्थान करते हुए नरवाहनदत्त ने मन्त्री गोमुख से कहा- ॥१॥ "मित्र ! आज रात को स्वप्न में श्वेत वस्त्र धारण किये हुई, कोई दिव्यरूपा एक कुमारी ने मुझसे कहा- ॥२॥ 'बेटा! निश्चिन्त रहा। यहाँ से शीघ्र ही तुम समुद्र-तट के जंगलों में स्थित आश्चर्यमय बड़े नगर को जाओगे ।।३।। वहाँ विधाम करके विना कष्ट के ही करसम्भव द्वीप (टापू) में पहुंचोगे और वहाँ कर्फ्यूरिका नाम की राजकुमारी को प्राप्त करोगे ॥४॥ ऐसा कहकर वह अन्तर्धान हो गई और मैं भी उसी क्षण जग उठा ॥५॥ ऐसा कहते हुए युबराज से प्रसन्न गोमुख ने कहा- 'महाराज ! तुम्हारे ऊपर देवताओं की कृपा है। अतः, जवश्य ही तुम्हारा मनोरथ शीघ्र सफल होगा' ।॥६॥ गोमुख से इस प्रकार प्रोत्साहित नरवाहनदत्त, गोमुख के साथ जल्दी-जल्दी रास्ता चलने लगा ।।७।। और, चलते-चलते क्रमशः समुद्र तट पर स्थित पर्वताकार बट्टालिकाओं, गलियों एवं नगर-द्वारों तथा...