5802. || द्वितीय कहानी || चन्द्रप्रम की सभा में मय दानव का आगमन; सूर्यप्रभ के दरबार में नारद मुनि का आगमन; काल बाह्मण को कथा; कलावती की कथा; महल्लिका का प्रेम;
5802. || द्वितीय कहानी || चन्द्रप्रम की सभा में मय दानव का आगमन; सूर्यप्रभ के दरबार में नारद मुनि का आगमन; काल बाह्मण को कथा; कलावती की कथा; महल्लिका का प्रेम; द्वितीय तरंग चन्द्रप्रम की सभा में मय दानव का आगमन एक बार दरबार में सूर्यप्रभ तया चन्द्रप्रम के मन्त्रियों के सहित बैठे-बैठे सिद्धार्थ के साथ बातचीत के प्रसंग में मय का नाम आते ही दरबार-भवन की भूमि बीच में सहसा फट पड़ी ॥१-२॥ फटी हुई भूमि के दरार से पहले शब्द उत्पन्न हुआ, तदनन्तर सुगन्धित वायु निकली और उसके पश्चात् उसमें से मयामुर का जाविर्भाव हुआ ।।३।। वह दानव (मयासुर) पर्वताकार था। उसके काले और ऊँचे शिर-रूपी शिखर पर (पीले वर्ण की) केण-रूपी महौषधियाँ मानों जल रही थी, और रक्त बस्त्र-रूपी धातु शरीर पर दीख रहे थे ॥४॥ रात्रा चन्द्रप्रभ द्वारा समुचित सत्कार प्राप्त करने के बाद सिहासन पर स्थित दानवराज मय इस प्रकार बोला- ॥५॥ "आपने वे पार्थिव भोग (आनन्द) तो भोग लिये। जब अन्य दिव्य भोगों के भोगने का समय आ गया है। अतः, उसके लिए उद्योग प्रारम्भ कीजिए ।।६।। दूतों को मेजकर अपने सम्बन्धी बन्धुओं को बुलवाइए। तब विद्याषरों के राजा सु...