5802. || द्वितीय कहानी || चन्द्रप्रम की सभा में मय दानव का आगमन; सूर्यप्रभ के दरबार में नारद मुनि का आगमन; काल बाह्मण को कथा; कलावती की कथा; महल्लिका का प्रेम;
5802. || द्वितीय कहानी || चन्द्रप्रम की सभा में मय दानव का आगमन; सूर्यप्रभ के दरबार में नारद मुनि का आगमन; काल बाह्मण को कथा; कलावती की कथा; महल्लिका का प्रेम;
द्वितीय तरंग
चन्द्रप्रम की सभा में मय दानव का आगमन
एक बार दरबार में सूर्यप्रभ तया चन्द्रप्रम के मन्त्रियों के सहित बैठे-बैठे सिद्धार्थ के साथ बातचीत के प्रसंग में मय का नाम आते ही दरबार-भवन की भूमि बीच में सहसा फट पड़ी ॥१-२॥
फटी हुई भूमि के दरार से पहले शब्द उत्पन्न हुआ, तदनन्तर सुगन्धित वायु निकली और उसके पश्चात् उसमें से मयामुर का जाविर्भाव हुआ ।।३।।
वह दानव (मयासुर) पर्वताकार था। उसके काले और ऊँचे शिर-रूपी शिखर पर (पीले वर्ण की) केण-रूपी महौषधियाँ मानों जल रही थी, और रक्त बस्त्र-रूपी धातु शरीर पर दीख रहे थे ॥४॥
रात्रा चन्द्रप्रभ द्वारा समुचित सत्कार प्राप्त करने के बाद सिहासन पर स्थित दानवराज मय इस प्रकार बोला- ॥५॥
"आपने वे पार्थिव भोग (आनन्द) तो भोग लिये। जब अन्य दिव्य भोगों के भोगने का समय आ गया है। अतः, उसके लिए उद्योग प्रारम्भ कीजिए ।।६।।
दूतों को मेजकर अपने सम्बन्धी बन्धुओं को बुलवाइए। तब विद्याषरों के राजा सुमेरु से मिलेंगे ॥७७॥
तदनन्तर श्रुतशर्मा को जीतेंगे और आकाशचारियों का साम्राज्य प्राप्त करेंगे। सुमेरु नामक विद्याधर राजा, हमारी सहायता के लिए मम्बन्धी की भावना से तैयार बैठा है। 'सूर्यप्रभ की रक्षा करना और उसे अपनी कन्या प्रदान करना', शिवजी ने इस प्रकार का आदेश उसे पहले से ही दे रखा है" ।॥८-९॥
मयामुर के ऐमा कहने पर चन्द्रप्रभ ने सब बन्धु-राजाओं के पास आकाशचारी प्रहस्त, प्रभास आदि दूतों को उन्हें बुलाने के लिए भेज दिया ॥१०॥
तदनन्तर मय दानव की आज्ञा में सूर्यप्रभ ने जिन पत्तियों और मन्त्रियों को इन्द्रजाल आदि विद्याएं नहीं मिलाई थी, उन सबको अपनी विद्याएँ सिखा दी ॥११॥
सूर्यप्रभ के दरबार में नारद मुनि का आगमन
इतने में ही, जब सभा में यह चर्चा चल रही थी, तभी अपने तपःप्रभाव से दिशाओं को प्रकाशित करते हुए नारदमुनि आकाश से उतरे ॥१२॥
अव्यं लेकर आसन पर विराजमान नारद मुनि ने, राजा चन्द्रप्रभ से कहा- 'राजन्, मुझे इन्द्र ने भेजा है और यह सन्देश दिया है कि मुझे ज्ञात हुआ है कि आप लोगों ने शिवजी की आज्ञा से और मव दानव को सहायता से अज्ञानवश मानवशरीरधारी सूर्यप्रभ को समस्त विद्याधरों का चक्रवर्ती बनाने का प्रयत्न प्रारम्भ किया है।॥१३-१५॥
यह उचित नहीं है। यह पद मैंने श्रुतशर्मा को दिया है। वह विद्याधर कुल-रूपी क्षीर-सागर का चन्द्रमा है और कुल-परम्परा से उसे यह पद प्राप्त है ।॥१६॥
हमारे विरोधी (शत्रु) के रूप में यदि तुम भर्म-विरुद्ध कार्य करोगे, तो वह अवश्य ही तुम्हारे विनाश के लिए होगा ॥१७॥
पहली बार भी रुद्र-यश करते हुए मैंने तुमसे कहा था कि पहले अश्वमेघ यज्ञ करो, ऐसा मेरे कहने पर भी तुमने वह नहीं किया ।।१८।।
तुम दूसरे देवताओं की परवाह न करके केवल एक यद्र की आशा से जो कुछ घमंड के साथ कर रहे हो, वह तुम्हारे हित के लिए न होगा' ।॥१९॥
नारदजी के ऐसा कहने पर दानबराज मय हँसकर बोला- हे महामुनि, देवेन्द्र ने जो कहा है, वह उचित नहीं है। वह जो कहता है कि सूर्यप्रभ मनुष्य है, यह मिथ्या-कयन है। इस बात को दामोदर-संग्राम में इन्द्र ने नहीं देख लिया था कि वह अलौकिक मानव है? मनुष्य सत्त्ववान् प्राणी है, अतः वह सभी सिद्धियों का अधिकारी है। क्या राजा नहुष आदि ने, इन्द्र-पद की सिद्धि नहीं प्राप्त की थी? और भी, इन्द्र जो यह कहता है कि श्रुतशर्मा को हमने विद्याधर-चक्रवर्ती का पद प्रदान किया है तथा वह पद उसके कुलक्रम से चला आ रहा है, यह भी विरुद्ध बात है। महेश्वर शिव जिसके दाता हैं, उनमें किसी प्रकार की प्रामाणिकता की क्या आवश्यकता है? दूसरे, बड़ा भाई होने के कारण हिरण्याक्ष को इन्द्र-पद मिलना चाहिए था, उस पर उसने कैसे अपना अधिकार कर लिया ? ॥२०-२४॥
और भी, इन्द्र ने जो यह सन्देश दिया कि इस प्रकार हमारी तुम्हारे साथ शत्रुता ठन जायगी, यह भी ठीक नहीं; क्योंकि इन्द्र केवल अपने हठ के कारण हमसे मत्रुता रखता है। फिर, इसमें अधर्म की भी कौन-सी बात है। हम तो शत्रु पर विजय प्राप्त करके क्षात्र धर्म का पालन ही कर रहे हैं, न कि उसके समान मुनि-पत्नी¹ का अपहरण कर रहे हैं और न उसके समान ब्रह्महत्या² ही कर रहे है ॥२५-२६॥
और, इन्द्र जो कहता है कि अश्वमेघ यज की आज्ञा की अवहेलना करके हमने देवताओं का अपमान किया है, यह भी उसका प्रलाप-मात्र है; क्योंकि रुद्र-यज्ञ कर लेने पर फिर अन्य यज्ञों का क्या महत्त्व रह जाता है ॥२७॥
देवाधिदेव महादेव की अर्चना कर लेने पर किस देवता की अर्चना नहीं हो जाती ? बह जो कहता है कि बन्द्रप्रभ की एकमात्र आस्था शिव पर ही है और वह उसके हित के लिए नहीं है, यह भी अनुचित है ॥२८॥
जहाँ स्वयं शिवजी उद्यत हैं, वहां अन्य देवताओं की बात ही क्या? सूर्य के उदय होने पर अन्य तेज-समूह क्या फीके नहीं पड़ जाते ? ॥२९॥
इसलिए हे मुनिवर, तुम जाकर यह सब देवराज इन्द्र से कहो। हम अपना प्रस्तुत कार्य करते हैं और वह भी जो चाहे, करें ॥३०॥
मवासुर द्वारा इस प्रकार कहे गये देवर्षि नारद प्रतिसन्देश लेकर देवराज इन्द्र के समीप गये ॥३१॥
नारद मुनि के चले जाने पर इन्द्र के सन्देश से शंकित राजा चन्द्रप्रभ से मयासुर ने कहा- ॥३२॥
'तुम्हें इन्द्र से या श्रुतशर्मा से तनिक भी भय नहीं करना चाहिए। हमारी शत्रुता के कारण यदि श्रुतशर्मा अपनी ओर से युद्ध में देवताओं को लायेगा, तो महाराज प्राङ्गाद की अध्यक्षता में हम असंख्य दानव तुम्हारे पक्ष में तैयार है।॥ ३३-३४॥
हम पर प्रसन्न शिवजी को कृपा के लिए तैयार रहने पर तीनों लोकों में किस बेचारे की शक्ति है कि वह हमारा सामना कर सके ॥ ३५।।
इमलिए, हे वीरो, इस कार्य के लिए उद्योग करो।' मय द्वारा इम प्रकार कड़े गये वे सभी प्रसन्न होकर उसकी बातों को मान गये ॥३६॥
तदनन्तर, दूत द्वारा भेजे गये सन्देश के अनुमार बीरमट आदि सभी मित्र, बन्धु क्रमशः शाकल नगर में आने लगे ॥ ३७।।
राजा चन्द्रप्रभ द्वारा उनका स्वागत-सत्कार और अन्यान्य प्रबन्ध कर लेने पर मयासुर ने राजा चन्द्रप्रभ में फिर कहा-॥३८॥
'हे राजन्, आज रात्रि को रुद्र की महाबलि की तैयारी करो। तदनन्तर, मैं जैमा कहूंगा, वैसा करना ॥३९॥
मय के वचन मुनकर राजा चन्द्रप्रभ ने रुद्रबलि की सामग्री तैयार करा दी और रात को जंगल में जाकर मय के उपदेशानुमार चन्द्रप्रभ ने स्वयं भक्तिपूर्वक बलिदान किया ॥४०-४११॥
राजा जब बनिदान के अंगभूत हवन कार्य में नि.शंक होकर लगा हुआ था, तभी अग्नि में भूत गणों का अध्यक्ष नन्दी माक्षात् मामने प्रकट हुआ ॥४२॥
राजा द्वारा विधिवत् पूजन कर लेने पर प्रसन्न नन्दी ने कहा- 'राजन्, स्वयं भगवान् शंकर ने मेरे मुख से यह आदेश दिया है कि तुम्हें मेरी कृपा के कारण मैकड़ोइन्द्रों से भी भय न होना चाहिए। सूर्यप्रभ आकागचारी विद्याधरी का चक्रवर्ती राजा अवश्य होगा' ।॥ ४३-४४ ॥
इस प्रकार, शंकर की आशा सुनकर और बलि को स्वीकार करके भूतगणों के साथ नन्दी अन्तहिन हो गये ॥४५॥
तब राजा चन्द्रप्रभ, अपने पुत्र के उदय में पूर्ण विश्वस्त होकर और बलि-क्रिया को समाप्त करके मय के साथ अपने नगर को लौट आया ॥४६॥
प्रातःकाल महारानी, पुत्र और मन्त्रियों के साथ एकान्त में बैठे हुए राजा चन्द्रप्रभ से मय ने कहा- ॥४७
'हे राजन्, सुनो मैं तुम्हें बहुत दिनों से छिपाया हुबा एक रहस्य बताता हूँ। तू मेरा पुत्र है और महाबलवान् सुनीय नाम का दानव है और सूर्यप्रभ सुमुण्डीक नाम का तेरा छोटा भाई है। तुम दोनों देवताओं द्वारा युद्ध में मारे जाने पर इस जन्म में पिता-पुत्र के रूप में उत्पन्न हुए हो ॥४८-४९॥
इसलिए, मैंने तुम्हारा दानव-गरीर दिव्य बोषधियों और घृत से लेप करके मुरक्षित रखा है।।५०।।
इसलिए, गुफा के मार्ग में पाताल में प्रवेश करके मेरी बताई हुई युक्ति से अपने शरीर में प्रवेश करो ॥५१॥
पहले उम दानव-शरीर में प्रवेश करके तेज, पराक्रम और बल में तुम इतने अधिनः बढ़ जाओगे, जिसमे कि युद्ध में आकाशचारियों पर विजय प्राप्त कर लोगे ॥५२॥
और, यह सूर्यप्रभ नामक मुमुण्डीक उमी सुन्दर शरीर से चिरकाल तक विद्याधरों का चक्रवर्ती होगा ॥५३॥
राजा सूर्यत्रम ने, मय के मुख से ऐसा मुनकर, 'ठीक है' कहकर, उसकी आजा को स्वीकार किया, किन्तु मन्त्री सिद्धार्थ ने कहा- ॥५४॥
'हे दानवश्रेष्ठ, राजा के दानव-दारीर में प्रवेश करने पर 'क्या यह मर गया, इम भ्रम में पड़े हुए लोगों को धीरज कैसे बंधेगा ? ॥५५॥
और. दूसरे शरीर को धारण करके परलोकवासी आत्मा के समान यह हन लोगों को भूल जायगा, तो यह कौन और हम कौन, अर्थात् हमारे इसके सभी सम्बन्ध टूट जायेंगे ।॥५६॥
सिद्धार्थ की बात सुनकर मयामुर ने कहा- 'योग की क्रिया द्वारा उस पूर्ण शरीर में स्वतन्त्रता में प्रवेश करते हुए तुम उसे प्रत्यक्ष रूप से देखो। इस प्रकार यह आप लोगों को नहीं भूलेगा ॥५७-५८॥
इसका कारण मुनो। जो व्यक्ति मृत्यु के वश में होकर मर जाता है, वह नवीन गर्भ में जाकर पिछला सब कुछ भूल जाता है और मृत्यु, रोग आदि कष्टों से पीड़ित होकर कुछ भी स्मरण नहीं कर पाना ।॥५९॥
जो व्यक्ति, स्वेच्छापूर्वक स्वतन्त्र रूप से दूसरे शरीर में योग की युक्ति से प्रवेश करता है, वह पहले अन्तःकरण में प्रवेश कर इन्द्रियों में प्रवेश करता है। उसका मन और उसकी बुद्धि ठीक रहते हैं। जैसे कोई व्यक्ति, एक घर से दूसरे घर में प्रवेश करता है, वैसे वह व्यक्ति एक शरीर से दूसरे शरीर में प्रवेश करता है और पहले छोड़े हुए घर को नहीं भूलता। यह ज्ञानवान् योगेश्वर सब कुछ स्मरण रखता है ।।६०-६१॥
इसलिए, तुम लोग शंका न करो। प्रत्युत, तुम्हारा यह राजा जरा-मरण-रहित दिव्य और महाबलवान् शरीर धारण करेगा ॥६२॥
तुम सभी दानव भी रसातल में प्रवेश करके अमृतपान से दिव्य देहबारी और रोग-रहित हो जाओगे ॥६३॥
मयामुर के यह वचन सुनकर उसकी बात को सभी ने मान लिया और उसके विश्वास से संका-रहित होकर वे सब सहमत हो गये ।।६४।।
मयामुर के कथनानुसार, दूसरे दिन, राजा चन्द्रप्रभ, चन्द्रभागा³ और इरावती नदी के मंगम पर सब राजाओं के साथ गया ।। ६५।।
वहाँ वह सेना-महित सब राजाओं को ठहराकर और सूर्यप्रभ की सभी रानियों को उनकी संरक्षकता में रखकर मयासुर द्वारा निदिष्ट गुफा में सूर्यप्रभ तथा सिद्धार्य आदि मन्त्रियों एवं अपनी गनियों के सहित प्रवेश कर गया ।॥ ६६-६७७।
उस गुफा में जाकर उसने दूर से एक देव-मन्दिर को देखा और उन सब के साथ वह उस मन्दिर में गया ।॥६८॥
उधर जो राजा, सूर्वप्रभ की प्रतीक्षा में गुफा के द्वार पर ठहरे थे, उनपर अपनी सेना के माथ विद्याधर आकाश-मार्ग में टूट पड़े ॥६९॥
उन विद्याषरों ने अपनी मायाओं (विद्याओं) से उन सब को बाँधकर सूर्वप्रभ की सभी पन्नियों का हरण कर लिया और इसके बाद ही आकाशवाणी हुई ।।७०।।
'अरे पाषी श्रुतशर्मन्, यदि तू चक्रवर्ती सूर्यप्रन की इन पत्नियों का स्पर्श भी करेगा, तो उमी क्षण सेना के साथ मर जायगा ॥७१॥
इसलिए इन स्त्रियों को माता के समान देखते हुए सम्मान के साथ इनकी रक्षा कर। इसी लिए, मैंने अभी तुझे मारकर इन्हें नहीं छुड़ाया है ॥७२॥
इसमें कुछ कारण है, अतः ये अभी दूसरे स्थान पर रहें।' आकाशवाणी के ऐसा कहकर बन्द हो जाने पर के सभी विद्याधर भाग गये ॥७३॥
और, वीरभट आदि राजा अपनी कन्याओं का प्रत्यक्ष अपहरण देखकर परस्पर युद्ध करके प्राणत्याग करने के लिए उद्यत हो गये ॥७४।।
'इन कन्याओं का नाश न होगा, तुम लोग फिर इन्हें प्राप्त करोगे, इसलिए मरने का साहस न करो, तुम्हारा कल्याण हो' ॥७५॥
इस प्रकार की आकाशवाणी ने उनके मरण-प्रयत्न को शान्त कर दिया और वे पहले की भाँति चन्द्रप्रभ की प्रतीक्षा में वहीं रुके रहे ॥७६॥
इसी बीच पाताल के उस देवमन्दिर में बैठे हुए और अपने बन्धु-बान्धवों से घिरे हुए चन्द्रप्रभसे मयासुर ने कहा- ৷৷৩৩৷৷
'हे राजन्, एकाग्रचित्त होकर मुनो। मैं तुम्हें अत्यन्त उत्तम बोग का उपदेश दूंगा, जिसके द्वारा दूसरे शरीर में प्रवेश किया जा सकता है' ।॥७८॥
ऐसा कहकर उसने चन्द्रप्रभ को रहस्य के साथ साक्य और योग द्वारा परकाय-प्रवेश का उपदेश दिया ॥ ७९।।
वह योगीन्द्र कहने लगा- 'यह सिद्धि है और यह वह स्वतन्त्र ज्ञान है, जो ऐश्वर्य और अणिमा आदि अष्ट सिद्धियों को देनेवाला हैं ।॥८०॥
इम ऐश्वयं को प्राप्तकर देवता मोक्ष को भी नहीं चाहते। इमी की प्राप्ति के लिए अन्य मनुष्य जप-तप का क्लेश उठाते है ।॥८१॥
और वे उदाराशय व्यक्ति, मिलते हुए स्वर्ग सुख को भी नहीं चाहते। मैं इस सम्बन्ध में एक कथा कहता हूँ, मुनी-॥८२॥
काल बाह्मण को कथा
प्राचीन समय में काल नाम का एक ब्राह्मण या, उसने पुष्कर तीर्थ में जाकर दिन-रात जप करता प्रारम्भ किया ॥८३॥
जप करते हुए उसे दो सौ दिव्य वर्ष व्यतीत हो गये, तब उसके शिर से एक अविरल ज्योति-र्घारा फूट पड़ी ॥८४॥
हजारों सूयों से भी अधिक उस प्रचंड ज्योति ने, आकाग में उठकर सिद्ध, विद्याधर आदि आकाशचारियों की गति को रोक दिया और तीनों लोक उस ज्वाला के तेज से झुलसने कने ॥८५॥
तब ब्रह्मा, इन्द्र आदि देवता उस ब्राह्मण के समीप आकर बोले, हे बहह्यन्, तुम्हें जो भी अभीष्ट हो, उसे लो। तुम्हारे तप के तेज से तीनों लोक जल रहे हैं' ।॥८६॥
उस ब्राह्मण ने कहा- 'मैं नहीं चाहता हूँ कि जप को छोड़कर अन्यत्र कहीं मेरा मन न लगे। इसके अतिरिक्त में कुछ वर नहीं चाहता' ।॥८७॥
उन देवताओं के बहुत आग्रह करने पर तंग आकर वह ब्राह्मण उत्तर दिशा में हिमालय के पास जाकर फिर जप करने लगा ॥८८॥
वहाँ भी जब उसका असह्य तेज उसी प्रकार प्रज्वलित हुआ, तब इन्द्र ने उसकी तपस्या में विघ्न करने के लिए उसके पास अप्सराजों को भेजा ॥८९।।
किन्तु, उस ब्राह्मण ने उन्हें तूण के समान समझकर उनकी उपेक्षा कर दी, तो उस सिद्ध के पास देवताओं ने मृत्यु को भेजा ॥९०॥
मृत्यु ने उससे कहा, हे ब्राह्मण, मनुष्य इतने दिनों तक नहीं जीते, इसलिए इन आत्मा को छोड़ो और ईश्वरीय मर्यादा का उल्लंघन मत करो ॥९१॥
यह सुनकर ब्राह्मण ने कहा कि 'यदि मेरे आयुष्य की अवधि पूर्ण हो गई, तो मुझे क्यों नहीं ले जाता, प्रतीक्षा क्यों कर रहा है। हे पाणवाले, मैं स्वयं प्राणों को न छोडूंगा।' इस प्रकार, अपनी इच्छा से शरीर छोड़नेवाला में आत्मघाती बनूंगा ॥९२-९३॥
इम प्रकार कहते हुए उस ब्राह्मण को तपःप्रभाव के कारण जब काल न ले जा मका, तब वह विवश होकर जहाँ से आया था, वहीं लौट गया ।॥९४॥
तब इन्द्र को पश्चात्ताप हुआ और वह, काल को जीतनेवाले उस ब्राह्मण को बलपूर्वका अपने हाथों से उठाकर स्वर्ग में ले गया ॥९५॥
स्वर्ग में जाकर भी उसके भोगों ने विरक्त और जप में लीन उस ब्राह्मण को देवताओं ने पृथ्वी पर उतार दिया। वह ब्राह्मण फिर हिमालय की ओर चला गया ।।९६॥
वहाँ पर इन्द्र आदि देवताओं ने बार-बार वर मांगने के लिए उसमे कहा। किन्तु, उमने एक न मानी। उनने में ही उस मार्ग से राजा इक्ष्वाकु आ निकन्ना ॥९७॥
उसने देवताओं से सब समाचार जानकर उस जापक ब्राह्मण से कहा- 'यदि तुम देवताओं से वर नहीं लेते हो, तो मुझसे माँगो' ।॥९८॥
यह सुनकर जापक ब्राह्मण हँसकर बोला कि 'जब मैं देवताओं से भी वर नहीं माँग रहा हूँ, तव तुझे क्या वर देने का सामध्ये है' ।।१९।।
ऐसा कहते हुए ब्राह्मण से राजा इक्ष्वाकु ने कहा कि 'यदि मैं वर देने में असमर्थ हूँ, तो तू ही मुझे वर दे दे' ।।१००।।
तब वह जापक ब्राह्मण कहने लगा मांग, जो वर तू चाहता है, मैं अवश्य ही दूंगा।' यह सुनकर राजा मन में सोचने लगा कि 'मैं देता हूँ और यह ब्राह्मण लेता है, यह क्रम तो उचित है; किन्तु यह विपरीत क्रम है कि यह दे और में हूं ॥१०१-१०२॥
इस प्रकार की शंका करता हुजा राजा जब बिलम्ब कर रहा था, तब दो ब्राह्मण परस्पर झगड़ते हुए वहाँ आ पहुँचे ॥ १०३॥
वे दोनों वहाँ राजा को उपस्थित देखकर न्याय कराने के लिए उनमें से एक बोला-राजन्, इसने दक्षिणा के साथ मुझे गौ दी हैं' ॥१०४।।
उसे लौटाते हुए मुझसे यह अपने हाथ से क्यों नहीं लेता ? तब दूसरा ब्राह्मण बोला- 'मैंने पहले कभी दान नहीं लिया है और न मुझे यह आवश्यक है। अतः, मैं क्यों तू?' यह सुनकर राजा ने कहा कि 'वादी शुद्ध नहीं है। वह स्वयं दान लेकर फिर दाता को हठपूर्वक गी क्यों देता है ?' राजा के ऐसा कहने पर बीच में ही इन्द्र ने कहा- हे राजन्, जब इस प्रकार का न्याय तुम जानते हो, तब इस जापक ब्राह्मण से वर की याचना करके मिनते हुए उसे क्यों नहीं लेते ।।१०५-१०८॥
तब राजा ने निरुत्तर होकर ब्राह्मण से कहा- 'भगवन्, अपने किये जप का आचा फल मुझे दे दो' ॥१०९॥
'ठीक है, मेरे जप का आधा फल तुम्हें मिले जापक ब्राह्मण ने राजा को इस प्रकार बर दे दिया ॥११०॥
इस फल के प्रभाव से उस राजा ने समस्त लोकों में गति (जाने की शक्ति) प्राप्त को और उस ब्राह्मण ने शिव नाम के देवलोक को प्राप्त किया ॥१११॥
इस प्रकार, अनेक कल्पों तक भिन्न-भिन्न लोकों में रहकर और पुनः पृथ्वी पर आकर स्वतन्त्रतापूर्वक योगाभ्यास से अक्षय सिद्धि प्राप्त की ॥११२॥
इस प्रकार, विद्वज्जन स्वर्ग आदि भोगों से विमुख रहकर केवल सिद्धि-प्राप्ति का ही लक्ष्य रखते है। वह सिद्धि तुमने प्राप्त कर ली है, अब तुम स्वतन्त्र हो। अब अपने पूर्व शरीर में प्रवेश करो ।॥११३॥
योगदान करनेवाले मय द्वारा इस प्रकार कहा गया चन्द्रप्रभ, अपनी रानियों, पुत्र और मन्त्रियों सहित अत्यन्त प्रसन्न हुआ ।॥११४॥
तब मय दानव, राजा चन्द्रप्रभ को सब परिवार के साथ दूसरे पाताल में ले गया और पुत्र, पत्नी आदि के साथ उसे एक दिब्य गृह में प्रवेश कराया ।। ११५॥
उम गृह के भीतर उन सबने उत्तम शय्या पर सोये हुए के समान एक दिव्य पुरुष को देना ॥११६॥
यह बड़ी-बड़ी ओपधियों और चूत से लिपा हुआ-सा था और आकृति के विकृत हो जाने से डरावना-सा प्रतीत होता था। मुँह लटकाये दैत्यराज की कन्याओं ने वह घिरा हुआ था ।।११७।।
तब मय ने चन्द्रप्रभ से कहा-'यह बही तुम्हारा पहला शरीर है। इसमें प्रवेश करों ॥११८॥
तदनन्तर, बन्द्रप्रभ ने मय की बताई हुई योग-युक्ति से अपने शरीर को त्याग कर उस शरीर में प्रवेया किया ॥११९॥
उसकी आत्मा के प्रवेश करने पर वह सोया हुआ शरीर जंभाई लेकर और धीरे-धीरे आँले खोलकर नींद से जगे हुए के समान उठ खड़ा हुबा⁴ ॥१२०॥
'हमारे भाग्य से राजा मुनीथ पुनः जीवित हो उठे, इस प्रकार पूर्व-पत्नियाँ कोलाहल करने लगीं ॥१२१॥
इधर चन्द्रप्रभ के निर्जीव शरीर को गिरा हुआ देखकर सूर्यप्रभ आदि सभी सहसा लिग्न हो उठे ॥१२२॥
चन्द्रप्रभ (सुनीच) ने मानों सोए हुए से उठकर पिता मय को सामने देखकर उसके चरणो में प्रणाम किया ॥१२३।।
मय ने भी प्रेम से उसका आलिंगन करके उससे पूछा, 'बेटा! क्या पिछले दो जन्मों का अब स्मरण करते हो ?' ॥१२४॥
उसने कहा-'स्मरण करता हूँ।' इतना ही नहीं। उसने बन्द्रप्रभ-जन्म में और मुनीष-जन्म में जो कुछ भी हुआ था, सब सुना दिया ॥ १२५॥
तदनन्तर, उसने पूर्व जन्म की रानियों एवं सूर्यप्रभ आदि के नाम लेकर तथा उसके भी पुत्र की दानवी पत्नियों के भी इसी प्रकार नाम ले-लेकर आश्वासन दिया ॥ १२६॥
और, चन्द्रप्रभ के निर्जीव शरीर को ओषधियों और घी से लेपकर युक्तिपूर्वक सुरक्षित कर दिया कि सम्भव है कभी काम आवे ॥१२७॥
तब पूर्ण विश्वस्त होकर सूर्यप्रभ आदि ने प्रणाम करते हुए उनका अभिवादन किया ॥१२८॥
अत्यन्त हृषित मयासुर उन सब को उस नगर से दूसरे सोने के नगर में ले गया ॥ १२९॥
उसमें जाकर उन सब ने हीरे से बनी हुई एक स्वच्छ सुन्दर बावली देखी, जो अमृत रस से भरी थी। सभी उसके किनारे बैठ गये ।।१३००॥
और, ये सुनीय की दानवी स्त्रियों द्वारा लाये गये मणिमय पात्रों में अमृत रस का पान करने लगे ।॥१३१।।
उस अमृत-पान मात्र से सभी लोग सोकर उठे हुए-से महान् बल और पराक्रम से युक्त दिव्य शरीरधारी हो गये ॥१३२॥
तब मयासुर ने चन्द्रप्रम (सुनीष) से कहा- 'बानो बेटा! बहुत दिनों के पश्चात् बपनी माता के दर्शन करो' ।॥ १३३॥
'ठीक है। चलिए', सुनीथ के ऐसा कहने पर आगे-आगे चलता हुआ ममासुर सूर्यप्रभ आदि के साथ चौथे पाताल में गया ।।१३४।।
उस लोक में भिन्न-भिन्न चित्रों और धातु के बने हुए नगरों को देखते हुए वे सम्पूर्ण सोने के बने हुए नगर में गये ॥ १३५।।
वहाँ उन लोगों ने रत्नों के खंभों पर बने हुए और समस्त सम्पत्तियों से भरे हुए गृह में मय की पत्नी को देखा, जिसका नाम लीलावती था। वह अपने सुन्दर रूप से देवांगनाओं को भी नीचा दिखा रही थी ॥१३६-१३७७।
वह सुनीथ को देखते ही घबराकर उठी और सुनीय भी प्रणाम करके उसके चरणों पर गिर पड़ा ॥१३८॥
तदनन्तर बहुत दिनों बाद मिले हुए पुत्र का आलिंगन करके उसकी माता उसको पुनः मिलाने के कारण अपने पति के वृद्धि-कौशल की प्रशंसा करने लगी। तब मयासुर ने कहा-देवि, तेरा वह दूसरा पुत्र मुमुष्टीक, तेरे उस पुत्र (सुनीथ) का पुत्र सूर्यप्रभ होकर सड़ा है ॥१३९-१४०॥
इसे शिवजी ने इसी शरीर से विद्याधरों का भावी चक्रवर्ती बनाया है।' तदनन्तर, माता उसे उत्कंठा-भरी दृष्टि से देखने लगी। तब वह भी अपने मन्त्रियों के साथ उसके चरणों पर गिर पड़ा ॥१४१-१४२।।
'केवल सुमुण्डीक के शरीर से क्या करना है बेटा! तुम इसी शरीर से अच्छे लगते हो', इस प्रकार आशीर्वाद देकर लीलावती बोली- ।॥ १४३॥
इन पुत्रों की पुनः प्राप्ति के हर्षमय अवसर पर मय ने अपनी कन्या मन्दोदरी और विभीषण का स्मरण किया। स्मरण करते ही वे दोनों वहाँ उपस्थित हो गये ।।१४४
उत्सव के समय का सत्कार-सम्मान प्राप्त करके विभीषण अपने श्वशुर मयासुर से बोला- हे दानवराज ! यदि मेरी बात मानें, तो कहूँ, दानवों में एक तुम्हीं पुण्यवान् और कल्याणमय जीवन व्यतीत कर रहे हो। तुम्हें देवताओं के साथ निष्कारण बैर न करना चाहिए। उनके साथ बैर करके हानि के सिवा कुछ लाभ नहीं है। युद्ध में देवताओं ने ही असुरों को मारा, असुरों ने देवतानों को नहीं ॥१४५-१४७॥
यह सुनकर मय ने विभीषण से कहा- 'हम कवरवस्ती बैर नहीं कर रहे हैं, किन्तु इन्द्र के निरर्थक हठ का सहन कैसे करें, तुम ही बताबो ॥१४८॥
देवताओं ने जिन बसुरों को मारा है, वे प्रमादी थे। बलि, प्रलाद आदि सावधान असुर नहीं मारे गये ॥ १४९।।
मय द्वारा इस प्रकार कहा गया विभीषण सबसे मिलकर उसी समय मन्दोदरी को साथ लेकर लंका को लौट गया ॥ १५०॥
तदनन्तर, मुनीथ और सूर्यप्रभ को साथ लेकर राजा बलि को देखने के लिए बह दानवराज तीमरे पाताल को गया ॥१५१॥
स्वर्ग से भी अधिक सुन्दर उस लोक में उन्होंने हार और मुकुट धारण किये हुए तथा दैत्यों और दानवों से घिरे हुए राजा बलि को देखा ॥१५२॥
वे सुनीय आदि सभी राजा बलि के चरणों पर गिरे और उसने भी उन सब का समुचित स्वागत-सम्मान किया ॥१५३॥
भय दानव द्वारा समस्त वृत्तान्त जानकर प्रसन्न हुए राजा बलि ने शीघ्र ही प्रह्लाद तया अन्य दूसरे दानवों को बुलवाया ।॥१५४।।
सुनीथ आदि ने उनके चरणों पर गिरकर प्रणाम किया और वे सभी उन विनम्र लोगों को देखकर आनन्द-विभोर हो गये ॥ १५५॥
तब बलि ने कहा- 'यह हमारा सुनीथ पृथ्वी पर बन्द्रप्रभ के रूप में जन्म लेकर अपने शरीर में आकर पुनर्जीवित होगया ।॥१५६॥
सुमुण्डीक का अवतार यह सूर्यप्रम भी आया है। शिवजी ने इसे विद्याघरों का भावी चक्रवर्ती बनाया है।।१५७॥
उसके यज्ञ के प्रभाव से मेरे बन्धन ढीले हुए हैं। अतः, इन दोनों के पुनः प्राप्त होने पर हम लोगों का अभ्युदय ही होनेवाला है' ।॥१५८॥
बलि के बचन सुनकर उसका गुरु शुक्र बोला' 'धर्म का बाचरण करो। सत्य-मार्ग पर रहने से अवनति कदापि नहीं होती ।। १५९॥
अतः, धर्म का व्यवहार करो, यह मेरा बचन मानी।' यह सुनकर सभी दानवों ने धर्म से चलने का नियम बना लिया ॥१६०।।
सातों पातालों के राजा वहाँ एकत्र हुए और सुनीष की पुनःप्राप्ति की प्रसन्नता से बलि ने महान् उत्सव मनाया १६१॥
इसी बीच फिर नारद मुनि वहाँ बा पहुंचे। पूजा सत्कार प्राप्तकर बैठने के बाद उन्होंने दानवों से कहा- ॥१६२॥
'मुझे इन्द्र ने मेजा है। उसने बाप लोगों से कहा है कि सुनीथ की पुनःप्राप्ति से मुझे परम सन्तोष हुआ ।।१६३॥
इसलिए अब फिर बिना कारण बैरन करो और मेरे पक्ष के श्रुतशर्मा से भी विरोध न करो' ॥ १६४॥
इस प्रकार, इन्द्र का सन्देश सुनाते हुए नारद मुनि से प्रह्लाद ने कहा 'सुनीय के पुनर्जीवन से इन्द्र को सन्तोय हुआ, यह अनुचित नहीं है। किन्तु, हम अकारण विरोध नहीं कर रहे हैं। आज ही हमने अपने गुरु के सामने प्रतिज्ञा की है ।।१६५-१६६।॥
श्रुतशर्मा, यदि इन्द्र के पक्ष का आधार लेकर हमारे विरुद्ध चलता है, तो इसमें हमारा क्या दोष ? सूर्यप्रभ के पक्षपाती देवताओं के देव महादेव ने उससे विद्याधर-चक्रवर्ती होने का आदेश दिया है; क्योंकि इसने बहुत पहले उनकी आराधना की थी ।। १६७-१६८।।
इस प्रकार ईश्वर के आदेश से प्राप्त इस कार्य में हम क्या करें। इसलिए, इन्द्र का ऐसा कहना अकारण और असंगत हैं' ।। १६९।।
दानवेन्द्र प्रह्लाद से इस प्रकार कहे गये नारद मुनि, इन्द्र को कोसते हुए, अलक्षित हो गये ॥ १७०।।
उसके जाने पर शुक्राचार्य ने दानवेन्द्र प्रह्लाद से कहा- 'इस काम में इन्द्र की शत्रुता स्थिर मालूम होती है; किन्तु महादेव के हमारे पक्ष में दृढतापूर्वक स्थिर रहने पर वह क्या करेगा ? विष्णु पर उसकी आशा व्यर्थ है, उससे क्या होना है?' ॥१७१-१७२॥
शुक्राचार्य की इन बातों का दानवों ने अनुमोदन किया और बलि तथा प्रह्लाद से आज्ञा लेकर वे सब अपने-अपने घर गये ।। १७३।।
इसके बाद प्रह्लाद के चौथे पाताल में अपने घर जाने पर राजा बलि भी सभा-भवन से उठकर अपने भवन को चले गये ॥ १७४१।
उनके जाने पर सुनीय, सूर्यप्रभ आदि सभी राजा बलि को प्रणाम करके उसी समय अपने घर आ गये ॥१७५।।
हाँ आकर व भोजन-पान आदि के समय उनके साथ सम्मिलित होकर उसकी माता लीलावती ने उसने कहा - ॥१७६।।
'बेटा, तुम यह तो जानते ही हो कि तुम्हारी ये पत्नियाँ बड़ों की बेटियाँ है, जिनमें तेजस्वती धनाधिप कुबेर की, मंगलावती गंधर्वराज तुम्बुरु की कन्या है ॥१७७॥
और चन्द्रप्रभ के जन्म में प्रभास नामक बसु की कन्या का तुमने परिणय क्रिया है, जिसका नाम वसुमती है ।॥१७८॥
बेटा, इन तीनों को तुम्हें समान दृष्टि से देखना चाहिए।' ऐसा कहकर उसने उसकी तीनों प्रधान पत्नियों को उसे सौंप दिया ॥१७९॥
तब उस दिन सुनीय ने बड़ी पत्नी तेजस्वती के साथ रात्रि को अपने शयन-भवन में प्रवेश किया ॥१८०॥
वहाँ पर सुनीथ को उसका सम्भोग-मुख पहले से अनुभूत होने पर भी सर्वथा नवीन प्रतीत हुआ ॥१८१॥
पत्नी-रहित सूर्यप्रत्र, अपने मित्र मन्त्रियों के साथ दूसरे कमरे में पलंग पर अकेला ही सो गया ।॥१८२॥
'जो अपनी प्राणप्यारी पत्नियों को बाहर छोड़कर नकेला ही सो रहा है, ऐसे स्नेहहीन के पास जाकर क्या लाभ ? ऐसा सोचकर ही मानों नींद सूर्यप्रभ के समीप नहीं आई ॥ १८३॥
राज्य-कार्य की चिन्ता में मग्न प्रहस्त के समीप भी नींद मानीं इसी ईर्ष्या के कारण ही नहीं आई। और, सभी सूर्यप्रभ के चारों ओर सुख से सो रहे थे ॥ १८४॥
कलावती की कथा
तबतक सूर्यप्रभ और प्रहस्त ने, एक महेली के साथ कमरे में प्रवेश करती हुई अनुपम मुन्दरी कन्या को देखा ॥१८५।।
उसके सौन्दर्य के सामने मेरी सुरांगना-सुष्टि मलिन न होजाय, इसलिए मानों ब्रह्मा ने उस कन्या को बनाकर पाताल में छिपा रखा था ।।१८६।।
जब सूर्वप्रभ, यह सोष ही रहा था कि यह कौन होगी, तबतक उस कन्या ने भवन के भीतर सोए हुए उसके मित्रों को एक-एक करके देखना प्रारम्भ किया ।। १८७।।
उन सब में चक्रवर्ती के लक्षण न देखकर और उन सबके बीच में सोए हुए सूर्यत्रम में उन लक्षणों को पाकर अपनी सहेली से वह कन्या बोली- 'सलि, वह यह है, जल से ठंडे हाथों से इसके पैरों को छुओ और इसे जगाजों ॥१८८-१८९॥
यह सुनकर सहेली ने उसी प्रकार उसे जगाया और जान-बूझकर सोए हुए सूर्यप्रभ ने भी धीरे-धीरे जाँले खोलीं ॥ १९०॥
और, उन दोनों कन्याओं को देखकर कहा-'तुम दोनों कौन हो, यहाँ क्योंकर माई हो। यह सुनकर उसकी सखी ने कहा- 'महाराज, सुनिए। दूसरे पाताल में विजयी राजा बमील है; जो हिरण्याक्ष का पुत्र है और बहुत बलवान् है ।।१९१-१९२॥
यह उसी राजा बमील की प्राणों से भी प्यारी कन्या कलावती है। वह राजा अमील उस दिन बलि के पास जाकर जब लौटा, तब उसने कहा कि 'अहोभाग्य है हमारा, जिसे आज पुनर्जीवित सुनीष को पुनः देखा और सुमुण्डीक के अवतार सूर्यप्रभ को भी देखा ।। १९३-१९४॥
इस युवक सुमुण्डीक सूर्यप्रभ को शिवजी ने विद्याधरों का भावी चक्रवर्ती बनाया है। इसलिए, यहाँ आये हुए मुमुण्डीक का आनन्द-पूर्ण सम्मान करता हूँ, अपनी कन्या कलावती को सूर्यप्रभ के लिए देता हूँ। सुनीथ का और हमारा गोत्र एक है, अतः उसे देना उचित नहीं है। सूर्यप्रभ उसका पुत्र है, किन्तु राजा के जन्म में, असुर के जन्म में नहीं। अतः, सुनीय के पुत्र का सम्मान उसी का सम्मान हैं ।। १९५-१९७।।
पिता के ये बचन सुनकर तुम्हारे रूप से आकृष्ट होकर तुम्हें देखने के कौतूहल से यह मेरी सली यहाँ आई है ।॥१९८॥
महेली के इस प्रकार कहने पर उसके कथन का रहस्य जानने के लिए सूर्यप्रभ कृत्रिम नींद में सो गया ।॥१९९।।
तदनन्तर बह कन्या जागते हुए प्रहस्त के समीप धीरे से गई और सहेली द्वारा सारा वृनान्त उसे कहलाकर बाहर चली गई ।॥२००।।
प्रहस्त भी अपनी शय्या से उठकर सूर्यप्रभ के पास गया और बोला- 'राजन्, जागते हो या नहीं। मूर्वप्रभ ने भी अधखुली आँखों से कहा-॥२०१।।
'मित्र, जागता हूँ। मुझ अकेले को आज नींद कहाँ ? एक विशेष बात तुमसे कहता हूँ, तुमसे छिपाकर ही क्या करना है।॥ २०२॥
अभी-अभी एक सहेली के साथ आई हुई एक कन्या को मैने देखा, जिसके समान सुन्दरी कन्या तीनों लोको में नहीं है।॥ २०३॥
वह मेरे मन को चुराकर क्षण भर में हो अदृश्य हो गई। तू उसे अभी जाकर ढूंड। यहीं कही होगी' ।॥२०४।।
सूर्यप्रभ द्वारा इस प्रकार कहा गया प्रहस्त बाहर निकला और सहेली के साथ खड़ी उत्त कन्या को देखकर इस प्रकार कहने लगा- 'मैंने तुम्हारे अनुरोध से अपने स्वामी को जगा दिया है, जब तुम मेरे अनुरोध से उसे फिर वर्शन दो ॥२०५-२०६॥
आंतों को सफल करनेवाले उसके सुन्दर रूप को देख लो। देखने से ही वश में किया हुआ वह भी तुम्हें देख से ॥२०७॥
सोकर उठे हुए उसने मुझे तुम्हारी बात सुनाई, तो उसने कहा कि उसे कहीं से भी लाकर दिखाओ, नहीं तो जीवित न रहूँगा ।॥२०८॥
इसलिए मैं तुम्हारे पास आया हूँ। तुम आओ और स्वयं उसे देखो'- प्रहस्त से इस प्रकार कही गई वह कन्या, लज्जावश पुनः शयन-गृह में न जा सकी और इधर-उधर करते हुए उसे प्रहस्त हाथ से पकड़कर सूर्यप्रभ के समीप ले गया ॥ २०९-२१० ॥
सूर्यप्रभ ने भी पास में आई हुई उसे देखकर कहा-अरी कठोर हृदयवाली, क्या, तुम्हें यह उचित है, जो आज तुमने किया है ॥ २११॥
तुमने मोए हुए मेरे हृदय को चुरा लिया है। इसलिए तुम्हें पकड़कर मँगाया है। अरी चोरिन ! अब तुम्हे न छोड़गा' ॥२१२॥
यह सुनकर उसकी चतुर सहेली बोली- 'इस बात को पहले ही समझकर इसके पिता ने इम चोर को तुम्हारे लिए अर्पण करने का निश्चय कर लिया है, इसलिए इसे दंड देने के लिए आपको कौन रोक सकता है? इसे अब चोरी के अनुसार दंड क्यों नहीं देते?' ॥२१३-२१४।॥
यह सुनकर सूर्यप्रभ ने जैसे ही आलिंगन करना चाहा, वैसे ही लजाकर वह कलावती बोली- 'आर्यपुत्र, ऐसा न करो, मैं जभी कन्या हूँ ॥२१५॥
तब प्रहस्त ने कहा-'हे देवि, किसी प्रकार की शंका न करो। सभी प्रकार के विवाहों में गान्धर्व विवाह उत्तम है ॥२१६॥
प्रहस्त के ऐसा कहने पर और उसके साथ सभी के बाहर निकल जाने पर मूर्यप्रभ ने उसी समय कलावती को गान्धवं विधि से पत्नी बना लिया ॥ २१७७॥
और उस पाताल-कन्या के साथ मनुष्यों के लिए दुर्लभ एवं अवर्णनीय आनन्द का भोग करने लगा ।।२१८॥
रात्रि व्यतीत होने पर और कलावती के अपने घर चले जाने पर सूर्यप्रभ, मुनीथ और मय के पास गया ।॥२१९॥
वे सब मिलकर फिर प्रह्लाद के समीप गये। सभा में बैठे हुए प्रह्लाद ने सबका समुचित सम्मान करके मय से कहा- 'सुनीम की पुनः प्राप्ति की प्रसन्नता में हमलोगों को उत्सव मनाना चाहिए, इसलिए मेरा विचार है कि हमलोग सब एक साथ भोजन करें ।॥ २२०-२२१॥
'ऐसा ही करें, इससे हानि क्या है? मय ने उत्तर में कहा। तब प्रह्लाद ने दूतों को भिजवा-कर सभी पातालों में दैत्यों और दानवों को निमन्त्रण प्रेषित करवा दियः ॥ २२२॥
तदनन्तर क्रमशः सभी पाताल के दैत्यों और दानवों के सरदार वहाँ आने लगे। सबसे पहले राजा बलि अगणित असुरों के साथ आया, उसके बाद अमील नामक दैत्यराज तथा महा बलवान् दुरारोह नामक दैत्यराज आये। सुमाय, तन्तुकच्छ, विकटाक्ष, प्रकम्पन, घूमकेतु और महामाय नामक दैत्यराज भी सहस्रों अनुयायियों के साथ वहाँ बाये। सारा सभा-भवन, परस्पर नमस्कार करते हुए उनसे भर गया और अपने-अपने पद के क्रमानुसार बैठे हुए उनका प्रह्लाद ने स्वागत किया ॥२२३-२२६॥
भोजन का समय आने पर वे सब मय आदि के माथ गंगा स्नान करके भोजन के लिए विशाल भवन में एकत्र हुए ॥२२७॥
यह भोजन-भक्न, चार सौ कोस तक फैला हुआ या, इसकी भूमि सोने और रत्नों से जड़ी हुई थी। इसमें रत्नों के खंभे लगे हुए थे और अनेक रंगों के मणियों के भोजन-पत्र सजे हुए थे ॥२२८॥
वहाँ पर मय मुनीय और सचिवों के साथ सूर्यप्रभ आदि सहित समस्त असुरों ने नाना प्रकार के भक्ष्य, भोज्य, लेह्य आदि षड्रस पदार्थों का भोजन किया और अन्त में विविध पेय पदायों का पान किया ॥२२९-२३०।।
भोजन-पान के पश्चात् वे सब, रत्नों में जगमगाते हुए सभा-मंडप में बैठे और दैत्यों एवं दानवी की कन्याओ का नाच देखने लगे ॥ २३१॥
महल्लिका का प्रेम
इसी नाच के प्रसंग में प्रलाद की आज्ञा से नाचती हुई उसकी कन्या महल्लिका को सूर्वप्रभ ने देखा ॥२३२॥
वह महल्लिका, अपनी अद्भुत कान्ति में चारों दिशाओं को प्रकाशित कर रही थी और आँखों के लिए अमृन की वर्षा कर रही थी। ऐसा लगता था, मानों चन्द्रमा की मूत्ति पाताल देखने के कौतुक से वहाँ उत्तर आई हो ॥२३३॥
यह मस्तक पर सुन्दर तिलक लगाए हुए थी, पैरो में सुन्दर नूपुर, पायजेब आदि पहने हुए थी। उसका मुम्ब मुस्कराता हुआ था. मानों ब्रह्मा ने उसे नृत्यमयी ही बनाया था ॥२३४॥
घुंघराले बालों, शुभ्र दाँतों और वक्षःस्थल को घेरे हुए स्तन-मंडलों से वह मानों नवीन नृत्य की सृष्टि कर रही थी ।॥२३५॥
उस सुन्दरी ने देखते ही अन्य स्त्रियों से हरण किये हुए सूर्यप्रभ के मन का हठात् हरण कर लिया ॥२३६॥
उस महल्लिका ने, असुरेन्द्रों के मध्य बैठे हुए सूर्यप्रभ को इस प्रकार देखा, मानों शिव के द्वारा कामदेव के भस्म किये जाने पर विधाता ने दूसरे कामदेव की रचना को हो ॥ २३७॥
उसे देखते ही महल्लिका का मन ऐसा विचलित हुमा कि मानों उसके इस अविनय को देखकर क्रोध से, आंगिक अभिनय, भ्रष्ट-सा हो गया ।॥२३८॥
सभा में बैठे हुए सभी सदस्यों ने उन दोनों को समझ लिया और 'राजकुमारी यक गई है, ऐसा कहकर उस दृश्य को स्थगित कर दिया ॥२३९॥
वह महल्लिका भी सूर्यप्रम को तिरछी दृष्टि से देखती हुई पिता से जाने की आज्ञा पाकर, सभी सदस्यों को प्रणाम करके घर चली गई ॥२४०।।
सभी दानवराज भी, नृत्य के उपरान्त अपने-अपने घरों को चले गये। सायंकाल होने पर सूर्यप्रभ भी अपने निवास स्थान पर लौट बाया ॥२४१॥
रात होने पर पुनः शयन-गृह में आई हुई कलावती के साथ वह सो गया और उसके साथी मन्त्री, भवन के बाहर अन्यत्र सो गये ॥२४२॥
इसी बीच सूर्यप्रभ से मिलने की लालसा से महल्लिका भी घबराती हुई दो सखियों को साथ लेकर वहाँ आई ॥२४॥
कमरे के अन्दर जानी हुई उसे देखकर अकस्मात् जग पड़े सूर्यप्रभ के मन्त्री प्रज्ञाड्य ने उमे देखा ॥२४४।।
और उसे पहचानकर कहा-'रुको, रुको। मैं अन्दर जाकर और लौटकर आता हैं ।॥२४५।।
'हमे बयां रोका गया और आप सब लोग बाहर क्यों हैं' महल्लिका के इस प्रकार प्रश्न करने पर प्रज्ञाड्य ने कहा- 'क्या स्वतन्त्रता से सोए हुए किसी व्यक्ति के पास एकाएक चला जाना उचित है?' हमारे स्वामी किमी व्रत (नियम) के कारण अकेले सो रहे हैं।॥२४६-२४७।।
'अच्छा भीतर जाओ' लज्जिता महल्लिका के इस प्रकार कहने पर, प्रज्ञाड्य अन्दर गया ।॥२४८।।
वहाँ कलावती को सोती देखकर उसने सूर्यप्रभ को जगाकर अपनी इच्छा से बाई हुई महल्लिका का समाचार दिया ॥२४९॥
यह सुनकर सूर्यप्रभ धीरे से उठकर बाहर निकल आया और दो सखियों के साथ आई हुई महल्लिका से बोला- ।॥२५०।।
'आपने इस अभ्यागत अतिथि को अपने शुभागमन से कृतार्थ किया, जब आप इस स्थान को भी कृतार्थ करें, यह आसन स्वीकार कीजिए' ॥२५१॥
यह सुनकर महल्लिका दोनों सलियों के साथ बैठ गई। सूर्यप्रभ भी प्रज्ञाढ्य के साथ सामने बैठ गया ।॥२५२।।
बैठकर उसने कहा- हे सुन्दरी, तुमने समा में अन्तिम समय सभासदों को सम्मान-सहित देखती हुई यश्चपि मेरा अपमान किया है, तथापि चंचलनयने, तुम्हारे सौन्दर्य के समान ही तुम्हारे नृत्य से मेरी आँखें सफल हो गई है।॥ २५३-२५४।।
सूर्वप्रभ द्वारा इस प्रकार कही गई वह प्रह्लाद की कन्या बोली- 'इसमें मेरा अपराध नहीं है. इसमें तो उसी का अपराध है, जिसने मेरे अभिनय को विकृत करके मुझे लज्जित किया है।' यह सुनकर सूर्यप्रभ ने हर्ष से कहा-'मेरी विजय हुई' ॥२५५-२५६।।
और उसका हाय अपने हाथ से पकड़ लिया, जो मानों बलात्कार के भय से पसीने-पसीने होकर काँप रहा था ॥२५७॥
'आर्यपुत्र, छोड़ो, अभी में कुमारी हूँ और पिता के बदश में हूँ।' ऐसा कहती हुई राजपुत्री को प्रज्ञाड्य ने कहा- 'देवि, क्या कन्याओं का गान्धर्व विवाह नहीं होता? पिता तुम्हारे हार्दिक भाव को जानकर अब दूसरे को प्रदान नहीं करेंगे ॥ २५८-२५९॥
वे इस सूर्यप्रभ का सम्मान अवश्य करेंगे। इसलिए घबराओ नहीं, तुम्हारा मिलन। व्यर्थ न हो ॥२६०॥
उघर बाहर जब प्रजाव्य इस प्रकार महल्लिका से कह रहा था, इसी बीच अन्दर सोई हुई कलावती जग उठी। उसने शय्या पर सूर्यप्रभ को न देखकर कुछ समय प्रतीक्षा की और फिर घबराकर वह बाहर निकल आई ।।२६१-२६२॥
बाहर आकर अपने पति की महल्लिका के साथ देखकर उसे कुछ कोष, कुछ लज्जा और कुछ भय हो आया ॥ २६३॥
मल्लिका भी उसे देखकर कुछ डरी तथा कुछ लज्जित हुई और सूर्यप्रभ तो चित्र में लिखा-सा निश्चल हो गया ।॥२६४।।
'मुझे सबने देख लिया है, अब मैं यहाँ से भागू, तो कैसे? कैसे लज्जा करूँ और कैसे ईर्ष्या प्रकट करूँ ऐसा सोचकर कलावती महल्लिका के पास ही आ बैठी ।।२६५॥
और उसने बोली- 'मन्त्रि, कुशल तो है? तुम इस रात में इस प्रकार यहाँ कैसे आई हो ?' तब महल्लिका, ईर्ष्या के साथ उससे बोली- 'यह लोक तो मेरा है और मेरा घर भी यहीं है। तू दूसरे पाताल-गृह से यहाँ आई है। इसलिए तू मेरी अतिथि है' ।।२६६-२६७।।
यह सुनकर कलावती हँसकर बोली- 'यह तो सत्य ही दीख रहा है कि तू यहाँ बाये हुए सबका या कित्ती विशेष अतिथि का भातिथ्य सत्कार करती है' ॥२६८४
कलावती द्वारा इस प्रकार कही गई महल्लिका बोली- 'यदि मैंने प्रेम से तुम्हें कुछ कह दिया, तो तुम द्वेष से कठोर बातें क्यों कर रही हो? है निर्लज्जे, गया मैं तेरी तरह निर्लज्ज हूँ ? ॥२६९-२७०।।
कि माता-पिता द्वारा विना दिये हुए ही दूर से दूसरे के घर में आकर रात के समय एकान्त में दूसरे की शय्या पर अकेली सोई हूँ ? ॥२७१॥
मैं तो अपने पिता के अतिथि से अपनी दो सखियों के साथ आतिथ्य सत्कार के रूप में मिलने आई हूँ। जब हम लोगों को रोककर यह मन्त्री बन्दर गया, तभी मैंने जान लिया था, फिर तुमने उसे स्वयं ही स्पष्ट कर दिया ॥२७२-२७३।।
महल्लिका द्वारा इस प्रकार फटकारी गई कलावती तिरछी बौर क्रोष से, कड़ी दृष्टि से सूर्यप्रभ को देखती हुई वहां से चली गई ॥ २७४॥
तब महल्लिका ने सूर्यप्रभ से कहा-'हे बहुतों के प्यारे, अब मैं भी जाती हूँ, और इस प्रकार कहकर वह चली गई ।।२७५।।
उस समय मन से हीन सूयंत्रन भी लिन्न हो गया, यह उचित ही था; क्योंकि दोनों प्रेयसियों पर आसक्त उसका मन भी उन्हीं के साथ चला गया था ।॥ २७६॥
इसके पश्चात् कलावती के कलह करके चले जाने पर उसकी चेष्टा जानने के लिए सूर्यप्रभ ने शीघ्र ही उठकर प्रभास नामक अपने मन्त्री को मेजा ॥२७७॥
उघर महलिल्का का समाबार जानने के लिए प्रहस्त मन्त्री को मेजा और स्वयं प्रज्ञाढ्य के साथ उनके आने की प्रतीक्षा करने लगा ॥२७८॥
तदनन्तर, कलावती का समाचार लेकर प्रभास उसके पास आया और पूछने पर बोला-'मैं अपनी विद्या के प्रभाव से अदृश्य होकर कलावती के वासस्थान दूसरे पाताल में उसके घर पर गया ।॥ २७९-२८०।।
वहाँ मैंने बाहर बैठी हुई दो सेविकाओं की बातचीत खूनी। उनमें एक कहने लगी- 'अरी, आज कलावती घबराई हुई-सी क्यों है?' तब दूसरी ने कहा- 'तलि, इसका कारण सुनो। सुमुण्डीक का अवतार आज चौथे पाताल में हैं ।॥२८१-२८२॥
उसका नाम सूर्यप्रभ है और अपने सौन्दर्य से वह कामदेव-विजयी है। कलावती ने गुप्त रूप से जाकर उसे आत्मसमर्पण कर दिया है। आज रात में इसके पास जाने पर राजा प्रह्लाद की कन्या महल्लिका भी स्वयं वहाँ आ गई ॥२८३-२८४।।
तब उसके साथ सपत्नी-डाह से कलह करके आई हुई कलावती आत्मघात के लिए तैयार हुई, यह देखते ही उसकी बहन सुखावती ने उसे बचाया ॥२८५।।
तब कमरे में जाकर, बाट पर पड़कर और समाचार सुनकर पस्त हुई बहन के माथ अब बह पड़ी है ।।२८६॥
सेविकाओं की ये बातें सुनकर और उसी अदृश्य रूप से भीतर जाकर समान रूपवाली उन दोनों बहनों को मैंने देखा ॥२८७७॥
जबतक प्रभास सूर्यप्रभ को एकान्त में यह समाचार कह ही रहा था कि इतने में ही प्रहस्त भी वहाँ आ गया ॥२८८॥
सूर्यप्रभ के पूछने पर प्रहस्त ने कहा-'जब मैं यहाँ से महल्लिका के निवाम-गृह में पहुँचा, तब वह भी दो सनियां के साय खिन्नचित्त होकर वहां पहुंची। मैं अपनी विद्या के प्रभाव से अदृश्य होकर उसके भवन में गया। वहाँ मैंने उसी के समान रूपवाली उसकी बारह सवियों को देखा ॥२८९-२९०
वे सभी सखियाँ रत्नों के सुन्दर पलंग पर बैठी हुई उसे घेरकर बैठ गई। उनमें एक उसमे कहने लगी-॥२९१।।
'मति, तू सहमा दुःखी क्यों हो रही है. विवाह के प्रस्तुत होने पर भी तुझे यह विनता क्यों ही रही हैं ।॥ २९२॥
यह मुनकर कुछ सोचती हुई प्रह्लाद-पुत्री बोली- मेरा विवाह कहाँ हो रहा है। मुझे किसे दिया गया और तुझसे किमने कहा' ।॥२९३।।
उसके ऐसा प्रश्न करने पर सभी सखियाँ बोलीं- 'प्रातःकाल तुम्हारा विवाह है और तुम्हें सूर्यप्रभ को दिया गया है। तुम्हारे पीछे यह तुम्हारी माता महारानी ने यह कहा है और विवाह-मंगल के कार्यों में हम लोगों की नियुक्ति कर दी गई है।॥२९४-२९५॥
इसलिए तू धन्य है, जिसका पति सूर्यप्रभ है। जिसके रूप के लोभ से सुन्दरियों को रात में नीद नहीं आती ।।२९६॥
हम लोगों को तो यह दुःख हो रहा है कि अब तू कहाँ होगी और हम कहाँ ? उस सुन्दर पति को पाकर तू हमें भूल जायगी' ॥२९७॥
सखियों की बातें सुनकर महल्लिका बोली- 'क्या तुमलोगों ने उसे देखा है और क्या तुम्हारा मन उस पर आया है?' यह सुनकर वे सब बोलीं- 'हाँ, उसे भवन से हम लोगों ने देखा है। कौन ऐमी स्त्री है, जिसका मन उसे देखकर हाथ से न निकल जाता हो' ।। २९८-२९९॥
तव महल्लिका उमसे कहने लगी 'यदि ऐसी बात है, तो मैं पिता से कहूंगी कि वह तुम लोगों को भी उसके लिए दे दे। इससे तुम लोगों के साथ मेरा वियोग भो न होगा और हम लोगों का महवास भी बना रहेगा। ऐसा कहती हुई महल्लिका गे घबराई हुई मत्रियाँ बोली- 'नहीं सग्थि, ऐसा न करना। यह ठीक नहीं। इमसे हम लोगों को लज्जा है। ऐसा कहती हुई सम्मियों से अगुरराज की कन्या फिर बोली- ।।३००-३००।।
'इसमें अनुचित क्या है? क्या उसे एकमात्र मुझसे ही विवाह करना है? उसे सभी दैत्यों और दानवों के राजा अपनी-अपनी कन्याएँ देंगे और भी बनेक राजाओं की विवाहित कन्याएँ मर्त्यलोक में है नथा, बहुत-मी विद्याधर-कन्याओं में भी वह अभी विवाह करेगा ।।३०३-३०४।।
उनके बीच तुम भी यदि उमस विवाहित हो जाओगी, तो मेरी बया हानि है, बल्कि हम नव साँवा मिलवार आनन्द के साथ रहूँगी। तुम लोगों को लज्जा क्यों है. यह सब तो में वाम्नी ॥३०५-३०६ ॥
तुम पर आमक्त वित्तवाली उसकी जब यह स्वतन्त्र बानचीत हो रही थी, तब मैं उमी अदुर रुप में तुम्हारे पाम चन्ना आया ॥३०७।।
प्रहरन के मूल ने गह गब ममाचार सुनकर सूर्यप्रभ ने गया पर जागने-जागते ही रात बिताई ॥३०८॥
प्रात काल ही सुनीथ, मय और सब मन्त्रियों के साथ सूर्यप्रभ, असुरराज प्रह्लाद से मिलने के लिए उनकी सभा में गया ॥३०९॥
तब दैत्यराज प्रह्लाद ने, आदर के साथ सुनीथ से कहा- 'मैं अपनी कन्या महल्लिका को इस सूर्यप्रभ के लिए देता हूँ ॥३१०॥
नयांकि, इसका भी आतिथ्य सत्कार और तुम्हारा भी प्रिय मुझे करना है। 'यह सुनकर सुनीथ ने प्रह्लाद की बात का सादर समर्थन किया ॥३११।।
तदनन्तर, अपने प्रकाश से रत्न स्तम्भों की कान्ति बढ़ाती हुई मध्य में जलती हुई विवाह-वेदी पर सूर्यप्रभ को बैठाकर प्रह्लाद ने उसे अपनी कन्या महल्लिका दे दी ।। ३१२-३१३॥
और, देवताओं से जीतकर लाये हुए रत्नों और महामूल्य मणियों के शिखरों के ढेर उस कन्या और जामाता को दहेज में प्रदान किये ।।३१३-३१४।।
तब महल्लिका ने पिता से स्वतन्त्रतापूर्वक कहा- 'पिताजी, मेरी उन बारह सक्षियों को भी इन्हें दे दो' ।॥३१५॥
तब प्रह्लाद ने कहा- बेटी, वे कन्याएँ मेरे भाई के द्वारा अपहरण करके बन्दिनी बनाई गई है, इसलिए वे उसी के आधीन हैं। अतः, उनमें से किसी का मेरा दान करना उचित नहीं है ।॥३१६॥
विवाहोत्सव सम्पन्न होने के पश्चात् दिन व्यतीत होने पर (रात्रि में) सूर्यप्रभ, महल्लिका के साथ शयनागार में गया और विविध हास-विलास तथा काम-भोग के साथ रात्रि व्यतीत की ॥३१७-३१८॥
दूसरे दिन प्रातःकाल अपने सम्यो के साथ प्रह्लाद के सभा में पधारने पर अमील नामक दानवराज ने उनसे कहा- ।।३१९।।
'आज आप सब लोगों को मेरे घर पर पधारना चाहिए; क्योंकि मैं वहाँ राजा सूर्वप्रभका आतिथ्य सत्कार करूँगा ॥३२०।।
यदि आप लोग उचित समझें, तो मैं अपनी कन्या कलावती को भी उसे दूँ।' उसके इस प्रस्ताव को सभी ने, ठीक है, कहकर स्वीकार कर लिया और सभी उठकर मय, सुनीथ और सूर्यप्रभ के साथ दूसरे पाताल में गये ॥३२१-३२२॥
वहाँ पर राजा अमील ने अपनी कन्या कलावती का सूर्यप्रभ के साथ विधिपूर्वक पाणिग्रहण करा दिया ॥३२३।।
तदनन्तर, सभी असुरों के सहित सूर्यप्रभ ने प्रह्लाद के घर में भोजन करके विविध भोगों के साथ दिन व्यतीत किया ॥ ३२४।।
दूसरे दिन, इसी प्रकार दुरारोह नामक असुरराज ने, अपने पाँचवें रसातल में सभी लोगों को निमंत्रित किया ॥३२५॥
और उसने अपनी कुमुदावती नाम की कन्या को औरों के समान विधिपूर्वक सूयप्रभ को दान कर दिया ॥३२६॥
तदनन्तर सूर्यप्रभ, मित्र-मंडल के साथ विविध सुलों के भोगों में दिन बिताकर रात को कुमुदावती के शयन-गृह में गया ।॥३२७॥
वहाँ उसने नव संगम में उत्कंठित स्निग्ध और मुग्ध उस त्रैलोक्यसुन्दरी कुमुदावती के साथ विनोद-वार्ता में रात बिताई ॥३२८॥
प्रातःकाल ही तन्तुकच्छ नामक सातवें पाताल के राजा ने प्रल्हाद आदि को सादर निमन्त्रित किया और वह निमन्त्रण देकर सबको अपने घर ले गया ॥ ३२९॥
वहाँ पर, तन्तुकच्छ ने, कुन्दन-सी गौरवर्ण, रत्नालंकारों में अलंकृत अपनी सुन्दरी कन्या मनोवती सूर्यप्रभ को प्रदान की ॥३३०।।
सूर्यप्रभ ने, अत्यन्त सुखद उन दिन को बिता कर मनोवती के माथ नवीन आलिंगन से मधुर रात्रि भी व्यतीत की ॥३३१॥
दूसरे दिन, उसी प्रकार सबको निमन्त्रण देकर सुमाय नामक असुरराज सबको अपने छठे पानाल में ले गया ।॥३३२॥
वहाँ पर उसने भी दूब के समान श्याम रंगवाली काम की सजीव मूत्ति-सी मुभद्रा नाम की करना सूर्यप्रभ को प्रदान की ॥३३३॥
ओर, सूर्यप्रभ भी उस दिन उसी चन्द्रवदनी पोडशी दयामा के साथ रहा ॥३३४।।
उसके दूसरे दिन, राजा बली गुर्यप्रभ को अपने तीसरे पाताल में ले गया और नये मूंगे के मभान रंगवाली वामन्ती लता के समान यौवन में भरी सुन्दरी नाम की कन्या उसे प्रदान की। सूर्यप्रभ ने दिव्य भांगो में भरे हुए उस लोक में गुन्दरी के विनोद में दिन व्यतीत किया ॥३३५-३३७।।
दूगरे दिन चौथे पाताल में गये हुए राजकुमार सूर्यप्रभ को मयासुर फिर अपने घर ले गया ॥ ३३८॥
उसके लोक में उसकी माया से रत्नों के विचित्र महल बने हुए थे और प्रतिक्षण उनकी नई-नई झिलमिल झलक दीख रही थी ॥ ३३९।।
मय ने भी वहाँ पर जगत् के लिए आश्चर्यजनक रूपवाली और मूत्तिमयी शक्ति के समान अपनी सुमाया नाम की कन्या उसे प्रदान की ॥३४०।।
सूर्यप्रभ के मनुष्ण होने के कारण उसे कन्या देना मय ने अनुचित नहीं समझा। वह सफल सूर्यप्रभ, उगके (सुमाया के) साथ सुख-विलाम करने लगा ॥३४११॥
यह राजा, अपनी विद्या के प्रभाव से अनेक देह धारण करके सभी असुर-कन्याओं के साथ एक ही समय में पृथक् पृथक् रहने लगा ॥३४२॥
किन्तु, असली शरीर से तो वह असुरराज प्रह्लाद की कन्या महल्लिका के साथ रहता था ।।३४३।।
एक बार, रात्रि के समय बातचीत के प्रसंग में सूर्यप्रभ ने, कुलीना महल्लिका से पूछा-'प्रिये, उस दिन रात में तेरे साथ जो सहेलियाँ आई थीं, वे कौन और कहाँ की थी, अब उन्हें मैं नहीं देख रहा हूँ। वे कहाँ गई ॥३४४-३४५।।
यह सुनकर महल्लिका ने कहा- 'अच्छा किया, मुझे स्मरण करा दिया। वे दो ही नहीं, बल्कि वे मेरी बारह हमजोली सहेलियाँ हैं ।॥३४६॥
उन्हें मेरे चाचा स्वर्ग से अपहरण करके लाये थे। उनमें एक अमृतप्रभा और दूसरी केशिनी ये दोनों पर्वत मुनि की कन्याएं हैं। तीसरी कालिदी और चौथी मुद्रिका तथा पाँचवीं सुन्दर नयनों बाली दर्षकमाला ये तीनों महामुनि देवल की कन्याएँ हैं। छठी सौदामनी, सातवीं उज्ज्वला ये दोनों हाहा नाम के गन्धर्व की कन्याएँ हैं। आठवी पोवरा हुहू नाम के गन्धर्व की कन्या है। नवी काल की अंजनिका नाम की कन्या है ।। ३४७-३५१।।
पिगल से उत्पन्न दसवीं कन्या केसरावली है। ग्यारहवीं कम्बल की कन्या मालिनी है और मदानसा नाम की बारहवीं कन्या वसु की है, जो अप्सराओं में उत्पन्न हुई है। वे सभी मेरे विवाह के समय पहले पाताल में ले जाई गई। उन्हें मैं तुम्हारे लिए दूंगी, जिससे मैं उनके साथ रहकर सदा सुली रह सकूं ।॥ ३५२-३५४।।
मैंने उनसे ऐसी प्रतिज्ञा भी की है और उन पर स्नेह भी इसी प्रकार का है। उन्हें आपको देने के लिए मैंने पिताजी से भी कहा था, किन्तु उन्होंने भाई की अपेक्षा करके आपको उस समय उन्हें नहीं दिया' ।॥ ३५५।।
यह सुनकर सूर्यप्रभ लज्जित-सा होकर बोला- 'प्यारी, तुम प्रभावशालिनी और उदार आपायवाली हो। तुम यह कर सकती हो, में कैसे करूँ ? ॥३५६॥
इस प्रकार सूर्यप्रभ के कहने पर महल्लिका क्रोध से बोली- 'मेरे ही सामने प्रतिदिन नई-नई स्त्रियों से विवाह कर रहे हो बौर मेरी सहेलियों को नहीं चाहते ! ।॥३५७।।
मैं उनके वियोग में एक क्षण भी मनोरंजन नहीं कर सकती।' - महल्लिका के ऐसा कहने पर सूर्यप्रभ ने उसकी बात मान ली ॥३५८॥
तब प्रह्लाद की पुत्री ने उसे पहले पाताल में ले जाकर उन सब कन्याओं को क्रमशः उसे दे दिया। सूर्यप्रभ ने भी उन दिव्यांगनाओं का रात्रियों में क्रमशः उपभोग करना प्रारम्भकिया ॥३५९-३६०॥
प्रातः काल ही सूर्यप्रभ ने, महल्लिका से पूछकर प्रभाग द्वारा उन कन्याओं को रसातल में पहुँचवाकर छिपा दिया ॥३६१॥
वह स्वयं भी अदृश्य होकर महल्लिका के साथ वहाँ जाता था। एक बार मभा में प्रह्लाद ने, मय एवं मुनीय से कहा कि तुम सब, दिति और दनु मानाओं का दर्शन करने के लिए जाओ ।।३६२-३६३॥
'जो आज्ञा' कहकर मय, मुनीय और सूर्यप्रभ तीनों रसातल से निकलकर यथासम्भव असुरों के साथ, घ्यान करते ही उपस्थित भूतासन विमान पर बैठकर, सुमेरु शिखर पर स्थित कश्यप के आश्रम को गये ॥३६४।।
वहाँ पर आदर के साथ ऋषियों द्वारा सूचित करने पर वे लोग एक साथ बैठी हुई दिति और दनु को देखकर प्रसन्न हुए और क्रमशः वे लोग उनके चरणों पर मस्तक रखकर प्रणाम करने लगे ॥३६५।।
उन दोनों असुरों और दानवों की माताओं ने अपने साथियों के साथ आये हुए पुत्र मय को देखकर आदर प्रकट किया और प्रसन्नतापूर्वक आंसू बहाते हुए आशीर्वाद दिया ॥३६६॥
और कहा-'पुत्र, पुनर्जीवित सुनीथ के साथ तुम्हें देखकर हम दोनों को अपार आनन्द हुआ। हमारे नेत्र सफल हुए और हम तुम्हें पुण्यवान् (धन्य) समझती है और सूर्यप्रभ के रूप में दिव्य तेज-घारी, असाधारण गुणों से युक्त और भावी कल्याण से पूर्ण सुमुण्डीक को देखकर सन्तोष के कारण हम लोगों का आनन्द शरीर में नहीं समा रहा है।।३६७-३६८।।
हे पुत्रो, अब तुम शीघ्र उठो और आर्यपुत्र कश्यप प्रजापति का दर्शन करने जाओ। उनके दर्शन से तुम्हारी कार्यसिद्धि होगी और उनकी बातों का मानना तुम्हारे कल्याण के लिए होगा' ॥३६९॥
इस प्रकार, माताओं के आदेश को पाकर मथ आदि सभी ने उसी प्रकार दिव्य आधम में जाकर कश्यप प्रजापति के दर्शन किये ॥ ३७०।।
मुनि का रंग पिधले हुए विशुद्ध सोने के समान था, उनका मुख दिव्य दीप्ति से दमकता था। अग्नि-ज्वाला के समान पीत वर्ण की उनकी जटाएँ थीं और वे स्वयं भी अग्नि के समान दुर्धर्ष थे ॥ ३७१॥
वे सब उनके समीप जाकर क्रमशः उनके चरणों में गिर पड़े। तदनन्तर, मुनि भी उन्हें बार-बार आशीर्वाद देते हुए सन्तोष और प्रसन्नता से बोले-॥३७२॥
'मुझे अत्यन्त आनन्द हो रहा है कि मैंने तुम सब सन्तानों को आज देखा। हे मय, तू प्रशंसनीय है। तू सभी विद्याओं का जानकार है और सत्पथ से विचलित नहीं हुआ है। मुनीय, तू भी धन्य है कि तूने गये हुए जीवन को पुनः प्राप्त किया। हे सूर्यप्रभ, तू भी धन्य है कि आकाराचारी विद्याधरों का चक्रवर्ती बनेगा ॥ ३७३।।
तुम लोगों को धार्मिक मार्ग का अनुसरण करना चाहिए और हमारी बातों को ममझना चाहिए। इससे तुम अत्युत्तम ऐश्वर्य प्राप्त करके शाश्वत मुख प्राप्त करोगे और शत्रुओं से पहले के समान पराजय भी तुम्हारा न होगा। धर्म का उल्लंघन करनेवाले अमुर विष्णु के चक्र के वशीभूत हुए थे ॥३७८॥
हे मुनीय, वे देवताओं से मारे गये असुर ही मानव-शरीर लेकर पृथ्वी पर अवतीर्ण हुए हैं। जो तुम्हारा छोटा भाई सुमुण्डीक था, वह अब सूर्यप्रभ के रूप में अवतीर्ण हुआ है ॥३७५।।
और भी, इसके मित्र असुर इस जन्म में इसके बन्धु-बान्धव हुए हैं, जो पाम्बर नाम का महाअसुर या, वह प्रहस्त नाम से सूर्यप्रभ का मन्त्री हुआ है ।॥ ३७६।।
त्रिशिरा नाम का जो असुर था, वह मयेका सिद्धार्थ नाम का मन्त्री हुआ है। वातापि नाम का जो अमुर या, वह प्रज्ञाड्य नाम से इसका मन्त्री हुआ है।॥ ३७७।।
उलूक नाम का दानव ही इसका शुभंकर नाम का मित्र हुआ है। वोतिभीति नाम का इसका मित्र पहले काल नामक दानव था और यह भास नाम का इसका मन्त्री भी वृषपर्वा नाम का दानव था, और प्रभास नाम का मित्र पहले प्रबल नामक दैत्य था। इस रत्नमय महासत्त्वशाली ने देवतओं की प्रार्थना की उपेक्षा कर अपने शरीर को खण्ड-खण्ड कर अवतार लिया, जिससे समस्त प्रकार के रत्न पैदा हुए। इससे संतुष्ट चण्डिका ने इसे दूसरे शरीर के अनुकूल कर दिया, जिससे यह अपने शत्रुओं के लिए महा दुःसह हो गया ।॥३७८-३८१॥
पूर्वजन्म में सुन्द और उपसुन्द नाम के जो दानव थे, वे अब सर्वदमन और भयंकर नाम से उसके मन्त्री और मित्र हुए हैं ।॥३८२॥
हयग्रीव और विकटाक्ष नाम के जो दो असुर थे, वे स्थिरबुद्धि और महाबुद्धि नाम से इसके मन्त्री उत्पन्न हुए हैं ॥३८३॥
और भी जो सूर्यप्रम के यवसुर आदि अन्य बन्धु है, वे सब पूर्वजन्म के ही असुर हैं, जिन्होंने इन्द्र आदि देवताओं को अनेक बार जीता था ॥३८४।।
इस प्रकार तुम्हारा पक्ष क्रमशः बढ़ा है। धैर्य रखो। धर्म का आचरण करने से तुम लोग परम समृद्धि प्राप्त करोगे' ॥३८५॥
कश्यप ऋषि के इस प्रकार कहते हुए ही अदिति आदि दक्ष की कन्याएँ, जो ऋपि की पत्नियाँ थी, वे मध्याह्नकालीन धर्मक्रिया के लिए वहाँ आकर उपस्थित हुई ॥३८६॥
मय आदि के, मुनि के आशीर्वाद प्राप्त करते हुए प्रणाम करने पर और पत्नियों को आह्निक क्रिया करने की आज्ञा देने पर लोकपालों के साथ इन्द्र भी वहाँ आ गया ।। ३८७७॥
पत्नियों के साथ मुनि को प्रणाम करके मय आदि से प्रणाम किया गया इन्द्र, सूर्यप्रभको देखकर कोष से बोला- ॥ ३८८।।
'मालूम होता है, यही लड़का है, जो विद्याधर-चक्रवर्ती बनना चाहता है। तो यह इतने थोड़े में ही सन्तुष्ट क्यों हो गया, इन्द्र-पद क्यों नहीं चाहता ?' ॥३८९॥
तव मय ने कहा- हे देवराज, ईश्वर (शिव) ने तुम्हारे लिए देवताओं का चक्रवर्ती पद और इसके लिए विद्याधरों का चक्रवर्ती पद बनाया है' ।॥३९०।।
मय के इन वचनों को सुनकर ईर्ष्या से जलता हुआ इन्द्र हँसकर बोला- 'इस प्रकार लक्षणोंवाली आकृति के लिए विद्याधर-चक्रवर्ती का पद बहुत छोटा है' ।॥३९१॥
तब मय ने कहा कि 'जहाँ विद्याधरों का चक्रवर्ती श्रुतशर्मा हो सकता है, वहां यह आकृति अव निःसन्देह इन्द्र-पद के योग्य है' ।॥३९२॥
ऐसा कहते हुए मय पर क्रुद्ध इन्द्र वजा को उठाकर स्वयं खड़ा हो गया। इतने में ही कश्यप मुनि के क्रोध से हुङ्कार करने पर वह रुका ॥ ३९३॥
धिक्कार करती हुई और क्रोष से लाल मुखवाली दिति, दनु आदि मुनि-पत्नियाँ भी क्रुद्ध हो उठीं। तब यह देखकर शाप के भय से डरा हुआ इन्द्र भी नीचे मुंह करके बहीं बैठ गया ॥३९४।।
पत्नियों के साथ देवों और असुरों के पिता कश्यप मुनि के चरणों में गिरकर उन्हें प्रसन्न करने के लिए स्तुति करता हुआ इन्द्र बोला ।।३९५।।
'भगवन्, मैंने श्रुतशर्मा को जो विद्याधरों का चक्रवर्ती-पद दिया है, उसे यह सूर्यप्रभ हरण करना चाहता है।।३९६॥
और यह मय, उसकी सब प्रकार की सहायता के लिए सन्नद्ध है।' यह सुनकर दिति और दनु के साथ प्रजापति कश्यप ने इन्द्र से कहा- 'इन्द्र, तुम्हें श्रुतशर्मा प्यारा है, और शिवजी का प्यारा सूर्वप्रभ है। यद्यपि मैं नहीं चाहता, फिर भी शिवजी ने मय को आज्ञा दी है, तो बब तुम्हीं बताओ, इसमें मय का क्या दोष है ? यह मय, धर्म-मार्ग पर चलनेवाला और शान-विज्ञान-युक्त है और गुरुओं के आगे विनम्र है। यदि तुम इसका अहित करते, तो मेरो कोषाग्नि तुम्हें भस्म कर देती ! तुम इसके ऊपर अपनी सामथ्य नहीं दिखा सकते। क्या तुम इसके प्रभाव को नहीं जानते ? ॥३९७-४००।।
पत्नियों-सहित मुनि के ऐसा कहने पर और इन्द्र के लज्जा से मुँह नीचा कर लेने पर इन्द्र की माता अदिति बोली- 'धुनशर्मा कैसा है? उसे लाकर दिखाओ तो सही ॥४०१॥
ऐसा सुनकर इन्द्र ने मातलि को उसी क्षण वहाँ बुलाकर बाज्ञा दी और विद्याधरों के चक्रवर्ती श्रुतशर्मा को वहीं बुलाया। प्रणाम करते हुए श्रुतशर्मा और सूर्यप्रभ को देखकर कश्यप ऋषि की पत्नियों ने कश्यप-प्रजापति से पूछा 'इन दोनों में सुन्दर रूप और लक्षणोंवाला कौन है?' ॥४०२-४०३॥
तदनन्तर कश्यप मुनि ने कहा- 'यह बुतशर्मा सूर्यप्रभ के मन्त्री प्रभास के भी समान नहीं है। इस अनुपम सूर्यप्रभ के समान यह कहाँ से हो सकता है' ।॥४०४١١
सूर्वप्रभ तो उन लक्षणों से युक्त है, जिनसे कि उद्योग करने पर उसे इन्द्रत्व की प्राप्ति भी दुर्लभ नहीं हैं ।॥४०५।।
इस प्रकार कश्यप ऋषि के वचन पर सबने श्रद्धा प्रकट की। तब महषि ने इन्द्र के सुनते हुए मय को यह वरदान दिया- १४०६ ॥
'हे पुत्र, इन्द्र के शस्त्र उठा लेने पर भी तूने जो महिष्णुता दिखलाई, अर्थात् तनिक भी कोष या लेशमात्र भी विकार प्रकट नहीं किया, इस कारण तेरे सभी अंग वामय हो जायेंगे। और तू कभी मारा नहीं जायगा। तेरे ये दोनों पुत्र सुनीथ तथा सूर्यप्रभ भी महाबलशाली और शत्रुओं के लिए सदा अजेय रहेंगे' ।॥४०७-४०८॥
यह सुवासकुमार, जो चन्द्रमा के समान सुन्दर मेरा पुत्र है, आपत्ति के समय या रात्रि के समय ध्यान करते ही उपस्थित होकर तुम्हारी सहायता करेगा ।॥४०९।।
मुनि के ऐसा कहने पर उनकी पत्नियों, अन्य ऋषियों तथा लोकपालों ने उसी सभा में भय आदि को वरदान दिये ॥४१०।।
तब इन्द्र की माता अदिति ने कहा-'हे इन्द्र, उद्दंडता छोड़ो, मय को प्रसन करो। नम्रता के फल को तुमने देखा कि आज मय ने कितने ही अच्छे वर प्राप्त किये' ॥४११॥
यह सुनकर इन्द्र ने मय को हाथों से पकड़कर प्रसन्न किया। उस समय श्रुतशर्मा, सूर्यप्रभके आगे दिन में निकले हुए चन्द्रमा के समान निष्प्रभ लग रहा या ।। ४१२॥
तदनन्तर, लोकपालों के साथ देवराज इन्द्र ने ऋषि को प्रणाम करके अपने लोक को प्रस्थान किया और मय आदि भी मुनि की आज्ञा से प्रस्तुत कार्य को सफल बनाने के लिए उसके आश्रम से अपने निवासस्थान को चले गये ॥४१३॥
महाकवि श्री सोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के सूर्वप्रभ नामक लम्बक का द्वितीय तरंग समाप्त
*******************************************
1. यह इन्द्र का गौतम-पत्नी अहिल्या के साथ समागम-रूपी अनाचार पर व्यंग्य है।--अनु०
2. यह बाह्मण वृत्रासुर को मारने पर व्यंग्य है। अनु०
3. पंजाब की दो प्रसिद्ध नदियाँ चन्द्रभागा चेनाब और इराक्ती-राबो। अनु०
4. चीन देश में उस प्रकार के विचार बलले थे, ऐसा वहाँ को कथाओं से प्रतीत होता है। बौद्ध लोग ऐसे विचारों को बहाँ से गये हों, ऐसा संभव है। अनु०
Comments
Post a Comment