5.105. || पांचवी कहानी || उपकोशा व पाणिनि की कथा
5.105. || पांचवी कहानी || पंचम तरंग वररुचि की कथा (चालू): वररुचि का वैराग्य ऐसा कहकर वररुचि ने फिर कहना प्रारम्भ किया कि कुछ समय के अनन्तर योगनन्द काम, क्रोध आदि के वशीभूत हो गया || १ || वह योगनन्द गजेन्द्र के समान उन्मत्त हो गया और उसे कुछ भी न सूझता था । आकस्मिक रूप से प्राप्त हुई लक्ष्मी किसे उन्मत्त नही बना देती ॥२॥ तब मैंने सोचा कि राजा अनियन्त्रित स्थिति में हो रहा है। इसके कार्यों की चिन्ता से आक्रान्त होकर मेरा कर्त्तव्य, भ्रष्ट हो रहा है। अतः, अपनी सहायता के लिए क्यों न शकटाल का उद्धार करूँ ? यदि वह राजा के विरुद्ध आक्रमण करेगा भी, तो मेरे रहते क्या कर सकता है ।। ३-४।। इसलिए मैंने प्रार्थना करके शकटाल को अन्धकूप से निकलवाया। कारण यह कि ब्राह्मण जाति स्वभावतः कोमल होती है ॥५॥ 'वररुचि के रहते हुए योगनन्द पर विजय नहीं किया जा सकता। अतः इस समय बेंत के समान नम्र नीति धारण करके कुछ समय की प्रतीक्षा करनी चाहिए ॥ ६ ॥ ऐसा सोचकर शकटाल मेरी सम्मति से पुनः मन्त्रि-पद प्राप्त कर राज्यकार्य करने लगा ॥७॥ किसी समय योगनन्द नगर से बाहर गया और पाँचों अंगुलियों से मिले हुए हाथ को उसने गंगाजी...