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51001 || प्रथम कहानी || नरवाहनवत्त की कथा, एक भारवाहक (मजदूर) की कथा, भद्रघट को कथा व आल-जाल की कथा

51001 || प्रथम कहानी || नरवाहनवत्त की कथा, एक भारवाहक (मजदूर) की कथा, भद्रघट को कथा व आल-जाल की कथा शक्तियश नामक दशम लम्बक प्रथम तरङ्ग मंगलाचरण हम गणेशजी के उस सुंडादंड को प्रणाम करते हैं, जिसे शत्रु (विघ्न) रोक नहीं सकते, जिम पर सिन्दूर पुना है और जो पापों (विध्नों) का नाश करने के लिए दूर से ही ही तलवार के समान है ॥१॥ त्रिपुरासुर का नाश करने के लिए धनुष पर बाग चढ़ाते हुए और बाण के साथ साथ व्याकुल व्याकुल होते हुए शिव के नेत्रों में अधिक चमकोला तीसरा नेत्र आपकी रक्षा करे ।।२।। शत्रु (हिरण्यकशिपु) के वध में नृसिह भगवान् की लाल और टेड़ी नखों की पंक्ति तथा दृष्टि आप लोगों के पापों को दूर करे ।।३।। नरवाहनवत्त की कथा  इस प्रकार, सपत्नीक नरवाहनदत्त, कौशाम्बी नगरी में मन्त्रियों के सहित सुख-पूर्वक रहता था ।॥४॥ एक बार नरवाहनदत्त की ही उपस्थिति में सभा (दरबार) में बैठे हुए उसके पिता वत्सराज के पास उसी नगरी का निवासी एक वैश्य आया ।।५।। रत्नदत्त नामक उस वैश्य ने द्वारपाल के सूचित करने पर सभा में आकर और राजा को प्रणाम करके इस प्रकार निवेदन किया- ।।६।। एक भारवाहक (मजदूर) की कथा महाराज, इस ...