51001 || प्रथम कहानी || नरवाहनवत्त की कथा, एक भारवाहक (मजदूर) की कथा, भद्रघट को कथा व आल-जाल की कथा

51001 || प्रथम कहानी || नरवाहनवत्त की कथा, एक भारवाहक (मजदूर) की कथा, भद्रघट को कथा व आल-जाल की कथा

शक्तियश नामक दशम लम्बक

प्रथम तरङ्ग

मंगलाचरण

हम गणेशजी के उस सुंडादंड को प्रणाम करते हैं, जिसे शत्रु (विघ्न) रोक नहीं सकते, जिम पर सिन्दूर पुना है और जो पापों (विध्नों) का नाश करने के लिए दूर से ही ही तलवार के समान है ॥१॥

त्रिपुरासुर का नाश करने के लिए धनुष पर बाग चढ़ाते हुए और बाण के साथ साथ व्याकुल व्याकुल होते हुए शिव के नेत्रों में अधिक चमकोला तीसरा नेत्र आपकी रक्षा करे ।।२।।

शत्रु (हिरण्यकशिपु) के वध में नृसिह भगवान् की लाल और टेड़ी नखों की पंक्ति तथा दृष्टि आप लोगों के पापों को दूर करे ।।३।।

नरवाहनवत्त की कथा 

इस प्रकार, सपत्नीक नरवाहनदत्त, कौशाम्बी नगरी में मन्त्रियों के सहित सुख-पूर्वक रहता था ।॥४॥

एक बार नरवाहनदत्त की ही उपस्थिति में सभा (दरबार) में बैठे हुए उसके पिता वत्सराज के पास उसी नगरी का निवासी एक वैश्य आया ।।५।।

रत्नदत्त नामक उस वैश्य ने द्वारपाल के सूचित करने पर सभा में आकर और राजा को प्रणाम करके इस प्रकार निवेदन किया- ।।६।।

एक भारवाहक (मजदूर) की कथा

महाराज, इस नगरी में वसुधर नाम का एक दरिद्र भारवाहक है। आज वह अकस्मात् ही लेता-देता और खाता-पीता दीखता है।॥७७॥

एक-बार उसकी इस स्थिति को जानने की इच्छा से मैंने उसे खूब खिला-पिलाकर और नशे में मत्त बनाकर पूछा, तो उसने यह बताया- ॥८।।

'मैंने राजभवन के द्वार पर रत्नों से भरा एक कंकण (हाथ का आभूषण) पाया और उसमें से एक रत्न निकालकर मैंने बेच दिया ।।९।।

उस रत्न को मैंने, हिरण्यवृप्त नामक जौहरी के पास एक लाख दीनार मूल्य पर बेचा। इसी कारण मैं आनन्द कर रहा हूँ' ।।१०।।

ऐसा कहकर उसने आपके नाम से अंकित उस कंकण को मुझे दिखाया, इसीलिए मैंने महाराज में निवेदन किया है।॥११॥

यह सुनकर वत्सराज ने कड़े के साथ उस भारवाहक (मजदूर) को और रत्न के साथ साथ हिरण्यगुप्त वैश्य को वहाँ बुलवाया ।।१२।।

और, उस कंकण को देखकर राजा ने अपने-आप ही कहा 'ओह! अब स्मरण आ गया, यह कंकण मेरे नगर-भ्रमण करते समय हाथ से निकलकर गिर गया था' ।॥१३॥

तब सभासदों ने उस भारवाहक से राजा के सामने ही पूछा कि 'राजा के नाम खुदे हुए इस कंकण को तूने कहाँ से चुराया ?' तब वह बोला-बोझा ढोकर जीवन-निर्वाह करनेवाला मैं राजा के नाम के अक्षर को कैसे जान सकता हूँ? दरिद्रता के दुःख से जले हुए मैंने इसे ले लिया ।।१४-१५।।

भारवाहक के ऐसा कहने पर, रत्न खरीदने के अपराधी हिरण्यगुप्त ने, कहा, 'मैंने बाजार में बिना जोर-दबाव के अधिक मूल्य देकर इस रत्न को इनसे खरीदा है' ॥१६॥

इस रत्न पर राजा का कोई चिह्न नहीं है। इमलिए, मैंने खरीदा और इसने मूल्य के रूप में पाँच हजार रुपये मुझसे लिये ॥१७।।

हिरण्यगुप्त का यह वचन सुनकर वहाँ बैठा हुआ राजमंत्री यौगन्धरायण बोला-'इस विषय में किसी का दोष नहीं है। दरिद्र और निरक्षर भारवाहक को क्या कहा जा सकता है? दरिद्रता के कारण ही चोरी की जाती है। फिर मिले हुए धन को किसने छोड़ा है ?' ॥१८-१९।।

मूल्य देकर रत्न खरीदनेवाले वैश्य का भी इसमें क्या अपराध है। राजा उदयन ने मन्त्री की बातों का समर्थन किया ॥२०॥

और, भारवाहक द्वारा व्यय कर दिये गये पाँच हजार रुपये वैश्य को देकर उससे रत्न ले लिया और पाँच हजार रुपये खा जानेवाले मजदूर से कंकण लेकर राजा ने, उसे मुक्त कर दिया। वह मजदूर भी अपने घर गया ॥२१-२२॥

यह रत्नदत्त 'विश्वासघाती और दुष्ट है', मन में इस प्रकार समझते हुए भी राजा ने प्रयोजनवश उसका सम्मान किया ।। २३॥

उन सब के चले जाने पर राजा के सम्मुख बैठा हुआ वसन्तक बोला- 'ओह ! भाग्य से मारे हुए व्यक्तियों से मिला हुआ घन भी नष्ट हो जाता है' ।॥२४।।

इस विषय में भद्रघट की भी इस भारवाहक के ही समान स्थिति हुई। सुनिए-

भद्रघट को कथा

पाटलिपुत्र नामक नगर में शुभदत्त नाम का एक लकड़हारा था। वह जंगल से लकड़ी काट-कर लाता और उसे बेचकर अपने परिवार का पालन करता था ।।२५-२६।।

एकबार वह जंगल में दूर तक चला गया और उसने दैवयोग से वहाँ रहनेवाले और दिव्य वस्त्रालंकार धारण किये हुए चार यक्षों को देखा ॥२७॥

उन्हें देखकर डरे हुए शुभदत्त को उन (यक्षों) ने ऐसा-वैसा ही दरिद्र समझकर दया करके कहा- ॥२८॥

'हे भद्र, तू यहाँ हमलोगों के पास सेवक होकर रह। हमलोग बिना किसी कष्ट के तेरे घर का निर्वाह करेंगे ॥२९॥

उनके इस प्रकार कहने पर शुभदत्त ने स्वीकार कर लिया और स्नान आदि कराने के कार्य से उनकी सेवा करने लगा ।।३०।।

तब भोजन का समय आने पर, भोजन के लिए बैठे हुए यक्षों ने उससे कहा कि इस सामने रखे भद्रघट से हमको भोजन लाओ ।॥३१॥

उस घट को अन्दर से सूना देखकर वह चुप खड़ा हुआ कुछ विलम्ब करने लगा। तब वे यक्ष मुस्कराते हुए फिर उससे बोले-॥३२॥

'शुभदस ! तुझे मालूम नहीं है। घड़े के अन्दर हाथ डालोगे, तो जो चाहोगे, इच्छा-नुसार मिलेगा; क्योंकि यह घड़ा इच्छित भोजन-वस्तु देनेवाला है ।। ३३।।

यह सुनकर शुभदत्त ने जैसे ही घड़े के अन्दर हाथ डाला, इच्छित अन्न, पान आदि उसे प्राप्त हुए। उसे उसने उन चार यक्षस्वामियों को खिलाया और उसी से निकालकर स्वयं भी उसने खाया ॥३४-३५॥

इस प्रकार, भक्ति और भय से यक्षों की सेवा करता हुआ शुभदत्त, केवल अपने कुटुम्ब के लिए ही चिन्तित रहता था ।।३६।।

उसके दुःखित परिवार को भी यक्षों ने, स्वप्न में आदेश देकर निश्चिन्त कर दिया, इसलिए शुभदत्त और भी मग्न रहने लगा ।॥३७।।

एक मास के पश्चात् उन यक्षों ने उससे कहा-'हमलोग तेरी सेवा से सन्तुष्ट हैं, बोल तुझे क्या दें ॥३८॥

यह मुनकर वह यक्षों से बोला- 'यदि आपलोग मुझसे प्रसन्न हैं, तो मुझे आप लोग यह घट दें ॥३९॥

तब उससे यक्षों ने कहा-'तू इसे रख न सकेगा; क्योंकि टूट जाने पर यह भाग जाता है, इसलिए दूसरा वर माँग' ।॥४०॥

यक्षों के इस प्रकार कहने पर भी जब शुभदत्त ने नहीं माना, तब उनलोगों ने उसे भद्रघट दे दिया ॥४१॥

तब वह प्रसन्न शुभदल, उन लोगों को प्रमाण करके और घड़े को उठाकर तेजी के साथ अपने घर आया और अपने कुटुम्ब को आनन्दित किया ॥४२॥

वहाँ घर पर छिपकर वह उस घड़े से भोजन-सामग्री निकालकर दूसरे पात्रों में रख-कर अपने कुटुम्बियों के साथ खाता था ।॥४३॥

बोल उठाने के भार से मुक्त और विविध प्रकार के भोगों को भोगता हुआ वह एक बार जब मद्यपान करके नशे में चूर हो रहा था, तभी उसके बन्धुओं ने उससे पूछा कि तुम्हें भोगने के लिए यह लक्ष्मी कहाँ से मिली ? ॥४४।।

वह मूर्ख, मुख से कुछ उन्हें न बताकर अभिमान के मद से मनचाहा फल देनेवाले उस घट को ही कन्धे पर लेकर नाचने लगा ।॥४५॥

नशे में झूमते और नाचते हुए उसके पैर फिसल जाने के करण कन्धे से पृथ्वी पर गिर-कर वह बड़ा टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर गया ।॥४६॥

तदनन्तर, वह घड़ा, फूटने पर भी फिर उसी तरह का होकर उन यक्षों के पास ही पहुँच गया और वह शुभदत फिर विषाद-युक्त होकर अपनी (लकड़हारे की) स्थिति में आ गया ।॥४७।।

इस प्रकार मद्यपान करने की बुरी आदतों से अभागे व्यक्ति, अच्छी सम्पत्ति पाकर भी उसे रख नहीं सकते ॥४८॥

राजा उदयन, इस प्रकार वसन्तक से भद्र घट की हास्यपूर्ण कहानी सुनकर स्नान, आहार आदि क्रिया में लग गया ।॥४९।।

नरवाहनदत्त भी, स्नान करके और पिता के समीप ही भोजन करके वही रह गया। सायंकाल में अपने मित्रों, मन्त्रियों के साथ अपने भवन को गया ।॥५०॥

अपने भवन में रात्रि के समय पलंग पर पड़े हुए, निद्रा-रहित नरवाहनदन को उसका मित्र मरुभूति, अन्य सभी मन्त्रियों को सुनाते हुए बोला 'स्वामिन्, ऐसा प्रतीत होता है कि आज दासी (वेश्य) से संगम करने की इच्छा से तुमने रानियों को नहीं बुलाया और न उस दासी को ही बुलाया, इसीलिए तुम्हें नींद नहीं आ रही है ।। ५१-५२।।

तुम सब कुछ समझते हुए भी वेश्याओं का साथ क्यों नहीं छोड़ते ? वेश्याओं के हृदय में सद्भाव नहीं रहता। इस सम्बन्ध में एक कथा सुनो ॥५३॥

आल-जाल की कथा

इस पृथ्वी पर चित्रकूट नाम का बहुत धन-सम्पन्न नगर है। वहाँ रत्नवर्मा नाम का एक बड़ा ही धनपति वैश्य था ।।५४।।

ईश्वर की आराधना से उसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ, इसलिए उसने उसका नाम ईश्वर-वर्मा रख दिया ॥५५।।

पढ़े-लिखे और जवानी में पैर रखते हुए उस पुत्र को देखकर रत्नवर्मा ने सोचा- ।।५६।।

'ब्रह्मा ने इस संसार में यौवन से अंधे धनवालों के लिए वेश्या को धन और प्राणों का हरण करनेवाला सुन्दर रूपशाली नरक बना दिया है ॥५७।।

इसलिए, इस पुत्र को वेश्याओं के छल-कपट सीखने के लिए किसी कुट्टनी को सौंप देता हूँ, जिससे कि यह वेश्याओं द्वारा ठगा न जा सके' ॥५८॥

ऐसा सोचकर वह रत्नवर्मा, अपने पुत्र ईश्वरवर्मा को साथ लेकर यमजिल्ला नाम की कुट्टनी के पास गया ।॥५९॥

वहाँ उसने मोटी ठुड्डीवाली, लम्बे दाँतोंवाली, बीच में बैठी हुई (चिपटी) नाक-वाली कुट्टनी को अपनी पुत्री को इस प्रकार की शिक्षा देते हुए देखा ॥६०॥

'बेटी, धन से ही सबकी पूजा होती है। विशेष करके वेश्या-प्रेमी व्यक्ति धन नहीं रख सकता। अतः, वेश्या को प्रेम से दूर रहना चाहिए। राग (प्रेम) वेश्या और सायंकालीन सन्ध्या के लिए दोषों का अग्रदूत है, इसलिए सुशिक्षिता वेश्या को नटी के समान कृत्रिम प्रेम प्रदर्शित करना चाहिए ॥६१-६२॥

पहले तो उसे अपने प्रति। आसक्त व्यक्ति का मनोरंजन करना चाहिए, तब उसका रक्त और उसके बाद उसका धन दुहुना चाहिए उसका धन दुह लेने पर उसे त्याग देना चाहिए और यदि उसे घन मिल जाय, तो फिर उसे दुहुना चाहिए ॥६३॥

जो वेश्या मुनियों के समान, युवक मे, बालक में, वृद्ध में, कुरूप में और सुन्दर में समान भाव रखती है, वह परम अर्थ (प्रचुर धन) प्राप्त करती है' ।॥६४।।

अपनी कन्या को इस प्रकार की शिक्षा देती हुई कुट्टनी के पास वह रत्नवर्मा गया और उसके स्वागत-सत्कार करने पर उसके पास जाकर बैठ गया ।।६५।।

और कहने लगा हे आर्यें, मेरे इस पुत्र को वेव्याओं की कला सिखाओ। जिससे यह चतुर नागरिक बन सके। इसकी शिक्षा के मूल्य-रूप में एक सहस्र दीनार तुझे देता हूँ।' यह सुनकर उसने वैश्य की बात स्वीकार कर ली ।।६६-६७।।

तदनन्तर, वह दीनार देकर और पुत्र ईश्वरवर्मा को उसे सौंपकर रत्नवर्मा अपने घर आ गया ।॥६८॥

तत्पश्चात् ईश्वरवर्मा, एक वर्ष तक यमजिल्ह्वा के घर में रहकर शिक्षा ग्रहण करके सोलहवाँ वर्ष प्राप्त होने पर अपने पिता के घर लौट आया ॥६९॥

घर आकर वह पिता से बोला 'धर्म' और 'अर्थ' ये दोनों पुरुषार्थ, अर्थ से ही सिद्ध होते हैं। अर्थ की उपासना से बढ़कर दूसरी कोई उपासना नहीं है।॥७०॥

इस प्रकार कहते हुए पुत्र पर शिक्षित होने का विश्वास करके उसने उसे प्रसन्नतापूर्वक व्यापार के लिए पाँच करोड़ मुद्रा का माल दिया ॥७१॥

उसे लेकर वह वैश्य का पुत्र, व्यापारियों के दल के साथ, शुभ दिन में स्वर्णद्वीप जाने की इच्छा से चला ।॥७२॥

रास्ते में उसे मकर कटी नामक एक वेश्या मिली उसकी पुत्री से रतन वर्मा झांसे में आकर प्रेम करने लगा।

उसके मित्र अर्थव्यवस्था ने उसे अनेक बार समझाने का प्रयास किया किंतु।

उसके सौन्दर्य, नृत्य, संगीत आदि पर मुग्ध ईश्वरवर्मा को वहाँ रहते-रहते दो महीने बीत गये ॥८८॥

तब तक वह सुन्दरी को दो करोड़ मुद्रा का धन दे चुका था। तब उसका मित्र अर्थदत एकान्त में आकर उससे कहने लगा- ॥८९॥

'मित्र, इतने प्रयत्न से प्राप्त की गई उस कुट्टनी की शिक्षा क्या डरपोक की अस्त्र-विद्या के समान समय पर ही निष्फल हो गई ॥९०॥

यदि तुम इस वेश्या के प्रेम में सच्ची भावना का अनुभव कर रहे हो, तो यह समझना उचित है कि मरुस्थल की मृगतृष्णा में जल अवश्य है ।।९१।।

इसलिए, यह सारा धन जबतक समाप्त नहीं होता, तबतक यहाँ से निकल चलें। तुम्हारे पिता इस सारे घन का अपव्यय जानकर कभी तुम्हें क्षमा नहीं करेंगे' ।॥९२॥

उस मित्र के इस प्रकार कहने पर ईश्वरवर्मा ने कहा-'सच है, वेश्या पर विश्वास न करना चाहिए, किन्तु यह सुन्दरी ऐसी अविश्वास्य नहीं है' ।॥९३॥

यह तो मुझे एक क्षण भी न देखकर प्राण छोड़ देगी। इसलिए, यदि चलना है, तो उसे चलकर समझाओ' ।॥९४।।

ईश्वरवर्मा से इस प्रकार कहा गया अर्थवर्मा उस सुन्दरी के पास गया और उसकी माता मकरकटी के सामने ही उससे बोला- ।॥९५।।

'यह सच है कि ईश्वरवर्मा पर, तुम्हारा असाधारण प्रेम है। किन्तु, व्यापार के लिए स्वर्णद्वीप जाना भी अब आवश्यक हो गया है ।।९६।।

वहाँ से यह धन कमायेगा, तो बहुत समय तक तुम्हारे पास रहेगा। इसलिए, उसे जाने दो' ।।।९७।।

यह सुनकर आँखों में आँसू भरकर ईश्वरवर्मा के मुँह की ओर देखती हुई सुन्दरी अर्थदत्त से बोली-॥९८॥

'आपलोग ही जानें, मैं क्या कहूँ। अन्त देखे बिना कौन किसका विश्वास करता है? भाग्य जो न कराये ॥९९॥

यह सुनकर उसकी माता कहने लगी- 'यह तुम्हारा प्रेमी, धन कमाकर फिर आयगा, यह तुझे छोड़ेगा नहीं' ।॥१००॥

उसकी माता ने इस प्रकार उसे आश्वासन देकर और उससे सम्मति करके रास्ते में पड़नेवाले एक गुप्त कुएँ में जाल बंधवा दिया ॥१०१॥

तब ईश्वरवर्मा का चित्त संशय में पड़ गया। उधर उसके शोक से ही मानों सुन्दरी के भोजन आदि की मात्रा भी घट गई। अर्थात्, उसने शोक प्रकट करने के लिए अपना खाना-पीना कम कर दिया ॥१०२॥

अब नाचने, गाने और बजाने में वह उतना प्रेम प्रदर्शित नहीं करती थी। ईश्वरवर्मा उसे विविध प्रकार से धीरज और आश्वासन देता था ।।१०३।।

तदनन्तर, मित्र के बताये हुए दिन, वह ईश्वरवर्मा, सुन्दरी के घर से यात्रा के लिए निकला और कुट्टनी ने यात्रा के सगुन आदि करके मंगलाचार किया ।।१०४।।

रोती हुई सुन्दरी माता के साथ उस कुएँ तक उसे पहुँचाने के लिए गई, जिसके ऊपर जाल बँधा हुआ था ॥१०५।।

तदनन्तर, जब ईश्वग्वर्मा, सुन्दरी को लौटाकर आगे चला, तब सुन्दरी ने अपने को उस बँधे हुए जालवाले कूप में गिरा दिया ॥१०६।।

तव 'हाय मालकिन ! हाथ बेटी! 'इम प्रकार की चिल्लाहट उसकी सेविकाएँ और माता करने लगीं। चिल्लाहट सुनकर मित्र के साथ वह वैश्यपुत्र लौट आया और अपनी प्रेयसी को कुएं में गिरा जानकर मूच्छित हो गया ।॥१०७--१०८।।

तदनन्तर. प्रलाप के साथ कन्पा के लिए शोक प्रकट करती हुई मकरकटी ने, पहले से ही साधे हुए अपने सेवको को रस्सी के सहारे उस कूप में उतारा। उन्होंने 'भाग्य से जी रही है, जी रही है, इस प्रकार कहकर सुन्दरी को कुएँ से बाहर निकाला। वह अपने को मुर्दे के समान बनाये हुए थी। लोटे हुए ईश्वरवर्मा से उसने टूटे-फूटे शब्दों में धीरे-धीरे कुछ अस्पष्ट-सी बात कहो ।।१०९-१११।।

कुछ समय के पश्चात् स्वस्थ हुई उस प्रेयमी को लेकर ईश्वरवर्मा, प्रसन्नचित्त होकर अपने अनुयायियों के साथ लौटकर फिर सुन्दरी के ही घर में आ गया ।॥११२।।

और, सुन्दरी के प्रेम का विश्वास प्राप्त कर उसने अपने जन्म को सफल समझा तथा उसकी प्राप्ति को ही अर्थप्राप्ति समझकर यात्रा का विचार त्याग दिया ॥११३॥

तब वहीं जमकर रहते हुए ईश्वरवर्मा को, उसके मित्र अर्थदत्त ने, फिर उससे कहा-'मित्र, मोह में पड़कर तुमने फिर अपना नाश कर लिया ॥११४।।

कूप में गिरने से तुम्हें सुन्दरी के स्नेह का विश्वास नहीं कर लेना चाहिए। कुट्टनी की कपट-रचना को ब्रह्मा भी नहीं समझ सकता ॥११५॥

पिता का धन, नष्ट करने के बाद उनसे क्या कहोगे और कहाँ जाजोगे ? इसलिए, यदि अपना कल्याण चाहते हो, तो अब भी यहाँ से निकल चलो' ॥११६॥

उस युवक ने मित्र का कहना न मानकर शेष तीन करोड़ मुद्रा भी व्यय कर डाली ।।११७।।

सारा धन समाप्त होने पर कुट्टनी कमरकटी ने, ईश्वरवर्मा को सेवकों (नौकरों) द्वारा अर्धचन्द्र (गरवनिया) दिलवाकर निकलवा दिया ॥११८॥

तब अर्थदत्त आदि उसके साथियों ने, अपने नगर में जाकर उसके पिता को सम्पूर्ण समाचार यथावत् सुना दिया ॥११९॥

यह समाचार सुनकर व्यापारियों का चौधरी रत्नवर्मा, अत्यन्त दुःखी होकर यमजिह्वा कुट्टनी के पास जाकर बोला- ॥१२०॥

'तूने इतना घन लेकर मेरे पुत्र को शिक्षा दी और मकरकटी ने, सरलता के साथ उससे पाँच करोड़ मुद्रा ठग ली' ॥१२१॥

इस प्रकार कहकर उसने पुत्र का सम्पूर्ण समाचार उसे सुना दिया। तब उस वृद्धा कुट्टनी यमजिह्वा ने कहा- ॥१२२॥

'अपने पुत्र को तुम यहाँ बुलवाओ। मैं उसे ऐसी शिक्षा दूंगी कि वह मकरकटी का सारा धन (सर्वस्व) हरण कर लेगा' ।॥ १२३॥

कुट्टनी यमजिह्वा के इस प्रकार प्रतिज्ञा करने पर रत्नवर्मा ने, पुत्र के हितैषी मित्र अर्थदत्त को दान आदि का प्रलोभन देकर ईश्वरवर्मा को बुलाने के लिए भेजा ॥१२४-१२५॥

वह अर्थदत्त, उस कांचनपुर में जाकर ईश्वरवर्मा से फिर बोला कि 'तूने मेरी बात नहीं मानी। आज वेश्या का सच्चा प्रेम तूने देख लिया। पाँच करोड़ मुद्रा देकर अर्धचन्द्र पाया। कौन बुद्धिमान् वेश्या में और बालू में स्नेह (प्रेम और तेल) चाहता है ।।१२६-१२८॥

तुम्हें क्या कहूँ? यह वस्तु का स्वाभाविक धर्म है। चतुर और वीर व्यक्ति तभी तक कल्याण के भागी होते हैं, जबतक स्त्री की विलास-वासना में नहीं पड़ते। इसलिए, अब चलो और अपने पिता के शोक को दूर करो' ।॥ १२९- १३०।।

वह ईश्वरवर्मा, अर्थदत्त के इस प्रकार समझाने और आशा दिलाने पर, किसी प्रकार पिता के पास लाया गया ॥१३१॥

उसका पिता, एकमात्र पुत्र के स्नेह के कारण. उसे फिर यमजिल् कुट्टनी के पास ले गया ।॥१३२॥

पूछने पर ईश्वरवर्मा ने, सुन्दरी के कूप में गिरने और घनक्षय आदि का सारा वृत्तान्त अर्थदत्त के मुँह से पिता को सुना दिया ॥१३३।।

तब यमजिह्वा बोली कि मैं ही इसकी अपराधिनी हूँ, जो मैंने वेश्याओं की भाषा इसे नहीं सिखाई ॥१३४।।

मकरकटी ने, कूप के अन्दर जाल बंधवा दिया था, उसी पर सुन्दरी गिरी और मरी नहीं ।। १३५।।

तो अब इसका भी उपाय है, ऐसा कहकर कुट्टनी ने अपने 'आल' नामक बन्दर को वहाँ बुलवाया ।।१३६।।

उसके आगे अपना एक हजार दीनार रखकर बन्दर से वह बोली कि इसे निगल जा। वह शिक्षित बन्दर देखते ही उसे निगल गया ।।१३७॥

'बेटा, इसे बीस दीनार दो, इसे पच्चीस दो, इसे साठ दो और हमें सौ दो' इस प्रकार भिन्न-भिन्न प्रकार के व्यय-भागों में यमजिह्वा द्वारा दिलाये हुए दीनारों को उस बन्दर ने उगलकर दे दिया ॥१३८-१३९॥

बाल नामक बन्दर की यह युक्ति दिखाकर कुट्टनी फिर वोली-'बेटा, ईश्वरवर्मा, तुम इस बन्दर के बच्चे को ले लो। और फिर, उस सुन्दरी के घर में पहले की भाँति रहना प्रारम्भ कर दो। और, व्यय के लिए इसी प्रकार समय-समय पर बन्दर से धन माँगा करना ॥१४०-१४१।।

तब वह सुन्दरी चिन्तामणि के समान इस बन्दर को अपना सर्वस्व देकर भी तुमसे लेना चाहेगी ॥१४२॥

इस प्रकार, उसका धन लेकर और इससे दो दिनों का व्यय निकलवाकर तुम शीघ्र ही उससे दूर चले जाना' ॥१४३॥

ऐसा कहकर, उस यमजिह्वा ने उस बन्दर को ईश्वरवर्मा के लिए दे दिया। और, उसके पिता ने भी दो करोड़ रुपये का धन उसे दिया ॥१४४।।

यह सब लेकर ईश्वरवर्मा फिर से कांचनपुर गया और दूत के द्वारा पहले उसे (सुन्दरी वेश्या को) सूचित करके उसके घर पर गया ॥ १४५।।

उस सुन्दरी ने, ईश्वरवर्मा को फिर सब साधनों से युक्त देखकर मित्र के साथ उसका स्वागत-अभिनन्दन किया और उसे गले से लगाकर पूवर्वत् प्रेम प्रदर्शित किया ॥१४६॥

ईश्वरवर्मा ने भी, उस समय की उचित बातों से उसे विश्वास दिलाकर अपने मित्र अर्थदत्त से कहा कि 'आल' बन्दर को ले आओ ॥ १४७॥

'अच्छा', कहकर अर्थदत्त बन्दर को ले आया। पहले से ही एक हजार दीनारों को निगले हुए बन्दर से ईश्वरवर्मा ने कहा- 'बेटा बाल, दो सौ भोजन-पानी के लिए और एक सौ पान-इत्र गदि के लिए, इस प्रकार तीन सौ दीनार दो ॥१४८-१४९॥

एक सौ माता मकरकटी को ब्राह्मणों को बाँटने के लिए और हजार में से शेष सौ सुन्दरी को दे दो ॥ १५०॥

ईश्वरवर्मा से, इस प्रकार कहे गये बन्दर ने, उसी प्रकार उगल-उगलकर पहले निगले हुए दीनारों को उन-उन व्ययों के लिए दे दिया ॥१५१॥

इस प्रकार, ईश्वरवर्मा से कहा गया बन्दर एक पक्ष तक व्यय के लिए प्रतिदिन दीनार देता रहा ॥१५२॥

यह देखकर मकरकटी और सुन्दरी ने सोचा-ओह! ईश्वरवर्मा को बन्दर के रूप में यह चिन्तामणि सिद्ध है ॥१५३॥

जो प्रतिदिन इसे एक हजार दीनार देता है, यदि इसे ही यह हमें दे दे, तो हमारा मनोरण ही सिद्ध हो जाय ॥१५४।।

माता से सुन्दरी ने इस प्रकार विचार करके एकान्त में भोजन के बाद सुखपूर्वक बैठे हुाए ईश्वरवर्मा से उस बन्दर की माँग की ।।१५५।।

'यदि मुझ पर तेरी कृपा या सच्चा प्रेम है, तो इस आल को मुझे दे दो।' यह सुनकर ईश्वरवर्मा बनावटी हंसी हंसता हुआ बोला- ॥१५६॥ 

'यह मेरे पिता का सर्वस्व है, इसलिए इसे मैं नहीं दे सकता।' इस प्रकार कहते हुए ईश्वरवर्मा से सुन्दरी ने कहा- 'मैं तुम्हें पाँच करोड़ मुद्रा देती हूँ, इसे मुझे दे दो।' तब ईश्वरवर्मा, मानों निश्चय करके बोला- 'यदि तू मुझे अपना सर्वस्व दे दे या सारा नगर भी दे दे, तो भी मैं इसे नहीं दे सकता। करोड़ों से क्या होता है।॥ १५७-१५९।।

यह सुनकर सुन्दरी बोली- 'मैं अपना सर्वस्व तुम्हें दे दूंगी। मुझे यह बन्दर दे दे। भले ही माता मुझ पर कुपित हो' ।॥१६०।।

इस प्रकार कहकर सुन्दरी ने ईश्वरवर्मा के पैर पकड़ लिये। तब अर्थवत्त आदि ने, ईश्वरवर्मा से कहा-'दे दो, जाने दो' ।॥१६१।।

ईश्वरवर्मा ने, इस प्रकार (सुन्दरी का सर्वस्व लेकर) उसे देना स्वीकार कर लिया और उस दिन को प्रसन्न सुन्दरी के साथ आनन्द में बिता दिया ॥ १६२॥

प्रातःकाल ही माँगती हुई सुन्दरी को दो हजार दीनार निगले हुए बन्दर ने दे दिये ।। १६३।।

और, उसके मूल्य में सुन्दरी के घर का सर्वस्व लेकर वह व्यापार के लिए स्वर्णद्वीप को चला गया ।।१६४।।

बन्दर को पाकर प्रसन्न सुन्दरी को यह माल, दो दिनों तक माँगने पर दीनार देता रहा ॥१६५॥

तीसरे दिन, प्रेमपूर्वक बार-बार माँगने पर भी जब उसने कुछ नहीं दिया, तब सुन्दरी ने उमे मुक्कों से मारा ॥१६६॥

मुक्कों से मारे गये बन्दर ने क्रोध से उछलकर मारती हुई सुन्दरी और उसकी माता का मुख दाँतों और नम्खों से नोच डाला ॥१६७॥

जब मुँह से बहते हुए रक्तवाली मकरकटी ने डंडों में उस बन्दर को ऐसा मारा, कि वह मर गया ।१६८١١

आल को मृत और अपने सर्वस्व को अपहृत देवकर वह सुन्दरी माता के साथ मरने के लिए तैयार हो गई ।॥१६९॥

"मकरकटी ने कुएँ में जाल लगाकर जिनका धन हण कर लिया था, उस बद्धिमान् ने आल के द्वारा उनका सर्वस्व हरण कर लिया ॥१७०॥

"कुट्टनी ने दूसरे के लिए जाल बिछाया, किन्तु अपने लिए जाल को नहीं समझा", उसका समाचार जाननेवाले सभी लोग, ऐसा कहकर हँसने लगे ॥१७१॥

तब बन्दर से नोंचे गये मुखवाली सुन्दरी को माँ के साथ मरने के लिए उद्यत देखकर उसके कुटम्बियों ने बड़ी कठिनाई से उन्हें रोका ॥१७२॥

वह ईश्वरवर्मा, स्वर्णद्वीप से अधिक धन कमाकर शीघ्र ही लौटकर अपने पिता के पास चित्रकूट नगर में पहुँचा ॥१७३॥

अनन्त धन कमाकर लौटे हुए पुत्र ईश्वरवर्मा को देखकर उसके पिता रत्नवर्मा ने, यमजिह्वा कुट्टनी को पुरस्कार आदि देकर बड़ा उत्सव मनाया ।।१७४।।

वह ईश्वरवर्मा भी वेश्याओं के छल और कपट को देखकर उनसे विरक्त होकर और विवाह करके अपने घर में आनन्दपूर्वक रहने लगा ।। १७५।।

हे राजन् ! इस प्रकार की स्त्री के हृदय में छल-कपट के सिवा सत्य बात का लेश भी नहीं रहता, इसलिए ऐश्वर्य चाहनेवाले व्यक्ति को अर्थसाध्य सूने जंगल के समान भीषण विलासिनी स्त्रियों से प्रेम नहीं करना चाहिए ॥१७६॥

मरुभूति के मुँह से इस प्रकार आल-जाल की कथा सुनकर और उस पर विश्वास करके नरवाहनदत्त गोमुख आदि मन्त्रियों के साथ हँसने लगा ॥१७७।।

महाकवि श्रीसोनदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के शक्तिवश लम्बक का प्रथम तरंग समाप्त

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