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Showing posts from September, 2023

5.202. || दूसरी कहानी || राजा सहस्त्रनीक, रानी मृगावती के विवाह व उदयन के जन्म की कथा

5.202. || दूसरी कहानी || राजा सहस्त्रनीक, श्रीवत्त व रानी मृगावती के विवाह व उदयन के जन्म की कथा द्वितीय तरंग उस दिन राजा (सहस्रानीक) कुछ दूर रास्ता चलकर किसी जंगली तालाब के किनारे पड़ाव डालकर ठहर गया ॥ १॥ उस शिविर में सन्ध्या के समय सेवा के लिए आये हुए संगतक नामक कथा कहने ( कहानी सुनाने) वाले सेवक' से राजा ने कहा ॥ २ ॥ मृगावती के मुखकमल का दर्शन करने के लिए उत्सुक मेरे मन को बहलानेवाली कोई कथा ( कहानी ) सुनाओ ॥ ३॥ तब मंगलक ने कहा- 'राजन् ! क्यो व्यर्थ संताप करते हो । शाप के नष्ट होते ही तुम्हारा महारानी के साथ समागम सुनिश्चित है ॥४॥ हे स्वामिन्! जीवन में मनुष्य को अनेक संयोग और वियोग हुआ करते है। इस सम्बन्ध में तुमको मैं एक कहानी सुनाता हूँ, सुनो' ॥५॥ श्रीवत्त और मृगांकवती की कथा मालव देश में यज्ञसेन नाम का एक ब्राह्मण था । उस सज्जन ब्राह्मण के दो लोकप्रिय पुत्र थे ॥ ६ ॥ उनमें एक कालनेमि के नाम से और दूसरा विगतभय नाम से प्रसिद्ध हुआ ||७|| पिता की मृत्यु के पश्चात् वे दोनों भाई बाल्यावस्था के अनन्तर विद्या प्राप्ति के लिए पाटलिपुत्र नगर को गये ॥ ८ ॥ वहाँ पर विद्या प्राप्ति ...

5.201. || पहली कहानी || राजा सहस्त्रनीक, रानी मृगावती के विवाह व उदयन के जन्म की कथा

5.201. || पहली कहानी || राजा सहस्त्रनीक, रानी मृगावती के विवाह व उदयन के जन्म की कथा कथामुख नामक द्वितीय लम्बक  ( मङ्गल - श्लोक का अर्थ ग्रन्थारम्भ के प्रथम पृष्ठ पर देखना चाहिए ) प्रथम तरंग राजा सहस्त्रनीक की कथा पार्वती के प्रथम आलिंगन के समय उत्पन्न शिवजी के स्वेद-कण आपकी रक्षा करे; जो स्वेद-कण ऐसे मालूम होते है, मानो कामदेव ने शिवजी के नेत्र की अग्नि के भय से उनपर वारुणास्र छोड़ा हो ' ॥ १ ॥ कैलाश में शिवजी के मुख मे, पुष्पदन्त गण को, पृथ्वी पर वररुचि के रूप में अवतीर्ण पुष्प-दन्त से. काणभूति को, काणभूति से गुणाढ्य को और गुणाढ्य से राजा सातवाहन को क्रमशः प्राप्त इस विद्याधर- कथा रूपी अमृत को सुनिए । २-३  ॥ स्वर्ग के अभिमान को दूर करने के लिए विधाता द्वारा उसी के समान पृथ्वी पर निर्माण किया गया वत्स नामक देश है ||४|| उस देश के मध्यभाग में अत्यन्त समृद्ध कौशाम्बी नाम की नगरी भूमि की कणिका (कर्णभूषण) के समान है ॥ ५ ॥ उस नगरी में पाडव वंश मे उत्पन्न शतानीक नामक राजा राज्य करता था, जो जनमेजय का पुत्र, परीक्षित का पोत्र और अभिमन्यु का प्रपौत्र था। इस वंश का आदि पुरुष अर्जुन ...

5.108. || आठवीं कहानी || राजा सातवाहन द्वारा कथा के प्रचार के लिए कथापीठ की रचना

5.108. || आठवीं कहानी || राजा सातवाहन द्वारा कथा के प्रचार के लिए कथापीठ की रचना अष्टम तरंग इस प्रकार गुणाढ्य के अनुरोध में काणभूति ने अपनी पिशाच भाषा में सात कथाओंवाली वह दिव्य कथा सुनाई, जो उसने पुष्पदन्त ( वररुचि) से सुनी थी ॥ १ ॥ गुणाढ्य ने सात वर्षों में सात लाख छन्दो में पंशाची भाषा में कही गई कथा को लिखा ||२|| इस कथा को कही विद्याधर हरण न कर ले और घोर जंगल में स्याही न मिलने के कारण महाबुद्धिमान् गुणाढ्य ने उसे अपने रक्त से लिखा ॥ ३ ॥ इस कथा को सुनने के लिए आये हुए सिद्ध विद्यावर आदि से भरा हुआ आकाश ऐसा मालूम होता था, जैसे चंदवा टंगा हो ॥४॥ गुणाढ्य द्वारा उस समस्त महाकथा के लिखे जाने पर उसे देखकर काणभूति शापमुक्त होकर अपनी पूर्वगति को प्राप्त हुआ; अर्थात् यक्ष हो गया ||५|| काणभूति के साथ जो उसके साथी पिशाच इस दिव्य कथा को सुन रहे थे; वे भी इसे सुनकर स्वर्ग चले गये ॥ ६ ॥ तदनन्तर महाकवि गुणाढ्य ने यह सोचा कि शाप का अन्त बताते हुए पार्वती ने मुझसे कहा था कि पृथ्वी पर इस कथा का प्रचार करना। तो अंब मैं इसका प्रचार कैसे करूँ और इसे किसे समर्पित करूँ, जो इसका प्रचार कर सके ।।७-८ ॥ तदनन...

5.107. || सातवीं कहानी || शर्ववर्मा, राजा शिवि और माल्यवान की पूर्वकथा

5.107. || सातवीं कहानी ||  शर्ववर्मा,  राजा शिवि और  माल्यवान की पूर्वकथा सप्तम तरंग शर्ववर्मा की कथा ( कातन्त्रकालापक व्याकरण की उत्पत्ति) शर्मा के सफल हो जाने पर प्रतिज्ञानुसार तीनों भाषाओं के छोड़ देने के कारण मौन धारण करके मै राजा के समीप आया। उस समय वहाँ पर किसी ब्राह्मण ने राजा के सामने स्व-रचित श्लोक पढ़ा ॥ १ ॥ राजा ने उस श्लोक को विशुद्ध संस्कृत भाषा में स्वयं अनूदित किया। इस कारण सभा में बैठे हुए सभी सदस्य अत्यन्त प्रसन्न हुए ॥ २॥  तब राजा ने शर्ववर्मा से नम्रता के साथ कहा कि 'स्वामि कार्तिक ने आप पर जो कृपा की है; इसका वृत्तान्त स्वयं अपने मुख से कहिए ॥३॥ राजा की इस कृपा से आप्यायित होकर शर्ववर्मा ने कहा- 'महाराज, मैं उस समय यहाँ से निराहार और मौनी होकर निकल पड़ा ॥४॥ जब स्वामि कार्तिक के मन्दिर का मार्ग कुछ ही शेष रह गया, तब मैं कठोर तप (निराहार ) से दुर्बल होकर थका हुआ अचेतन ( बेहोश ) होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा ॥५॥ तब मुझे अचेतनावस्था मे ऐसा लगा कि हाथ में शक्ति (अस्त्र) लिये हुए कोई पुरुष मुझे कह रहा है — 'पुत्र, उठो, तुम्हारा सब कार्य सफल होगा' || ६ || अमृतव...

5.106. || छठी कहानी || गुणाढ्य, चूहे से धनी बने सेठ, मूर्ख सामवेदी ब्राह्मण , देवी उद्यान व राजा सातवाहन की कथा

5.106. || छठी कहानी || गुणाढ्य, चूहे से धनी बने सेठ, मूर्ख सामवेदी ब्राह्मण , देवी उद्यान व  राजा सातवाहन की कथा षष्ठ तरंग वररुचि के चले जाने पर उसका मित्र विन्नहृदय माल्यवान् नामक गण, मर्त्यशरीर में गुणाढ्य नाम से विख्यात होकर वन में घूमता हुआ, संस्कृत आदि तीन भाषाओं को प्रतिज्ञापूर्वक छोड़कर और सातवाहन राजा की सेवा करके विन्ध्यवासिनी भगवती के दर्शन के लिए आया ।।१२।। विन्ध्यवासिनी की आज्ञा से उसने विन्ध्यारण्य मे काणभूति को देखा। काणभूति को देखते ही गुणाढ्य को अपनी पूर्व जाति का स्मरण हो गया और वह मानों अकस्मात् जाग उठा ॥ ३॥ संस्कृत, प्राकृत एव देशीय ( अपभ्रंश ) — इन तीनो भाषाओं को छोड़कर पैशाची भाषा मे अपना नाम सुनाकर वह काणभूति से बोला ॥४॥ मित्र काणभूते, पुष्पदन्त से सुनी हुई उस दिव्य कथा को शीघ्र सुनाओ; जिसके सुनने पर मैं और तुम दोनों एक साथ ही शाप से मुक्त हो जायेंगे ||५|| गुणाढ्य की कथा यह सुनकर कामभूति ने गुणा से कहा- हे स्वामिन् ! उस दिव्य कथा को तो मै सुनाता हूँ। किन्तु मुझे एक महान् कौतूहल है ॥ ६ ॥ वह यह कि पहले आप अपने जीवन का वृत्तान्त सुनाओ। इस प्रकार काणभूति के प्रार्...

5.105. || पांचवी कहानी || उपकोशा व पाणिनि की कथा

5.105. || पांचवी कहानी ||  पंचम तरंग वररुचि की कथा (चालू): वररुचि का वैराग्य ऐसा कहकर वररुचि ने फिर कहना प्रारम्भ किया कि कुछ समय के अनन्तर योगनन्द काम, क्रोध आदि के वशीभूत हो गया || १ || वह योगनन्द गजेन्द्र के समान उन्मत्त हो गया और उसे कुछ भी न सूझता था । आकस्मिक रूप से प्राप्त हुई लक्ष्मी किसे उन्मत्त नही बना देती ॥२॥ तब मैंने सोचा कि राजा अनियन्त्रित स्थिति में हो रहा है। इसके कार्यों की चिन्ता से आक्रान्त होकर मेरा कर्त्तव्य, भ्रष्ट हो रहा है। अतः, अपनी सहायता के लिए क्यों न शकटाल का उद्धार करूँ ? यदि वह राजा के विरुद्ध आक्रमण करेगा भी, तो मेरे रहते क्या कर सकता है ।। ३-४।। इसलिए मैंने प्रार्थना करके शकटाल को अन्धकूप से निकलवाया। कारण यह कि ब्राह्मण जाति स्वभावतः कोमल होती है ॥५॥ 'वररुचि के रहते हुए योगनन्द पर विजय नहीं किया जा सकता। अतः इस समय बेंत के समान नम्र नीति धारण करके कुछ समय की प्रतीक्षा करनी चाहिए ॥ ६ ॥ ऐसा सोचकर शकटाल मेरी सम्मति से पुनः मन्त्रि-पद प्राप्त कर राज्यकार्य करने लगा ॥७॥ किसी समय योगनन्द नगर से बाहर गया और पाँचों अंगुलियों से मिले हुए हाथ को उसने गंगाजी...