5.107. || सातवीं कहानी || शर्ववर्मा, राजा शिवि और माल्यवान की पूर्वकथा

5.107. || सातवीं कहानी || शर्ववर्मा, राजा शिवि और माल्यवान की पूर्वकथा

सप्तम तरंग

शर्ववर्मा की कथा

( कातन्त्रकालापक व्याकरण की उत्पत्ति)

शर्मा के सफल हो जाने पर प्रतिज्ञानुसार तीनों भाषाओं के छोड़ देने के कारण मौन धारण करके मै राजा के समीप आया। उस समय वहाँ पर किसी ब्राह्मण ने राजा के सामने स्व-रचित श्लोक पढ़ा ॥ १ ॥

राजा ने उस श्लोक को विशुद्ध संस्कृत भाषा में स्वयं अनूदित किया। इस कारण सभा में बैठे हुए सभी सदस्य अत्यन्त प्रसन्न हुए ॥ २॥ 

तब राजा ने शर्ववर्मा से नम्रता के साथ कहा कि 'स्वामि कार्तिक ने आप पर जो कृपा की है; इसका वृत्तान्त स्वयं अपने मुख से कहिए ॥३॥

राजा की इस कृपा से आप्यायित होकर शर्ववर्मा ने कहा- 'महाराज, मैं उस समय यहाँ से निराहार और मौनी होकर निकल पड़ा ॥४॥

जब स्वामि कार्तिक के मन्दिर का मार्ग कुछ ही शेष रह गया, तब मैं कठोर तप (निराहार ) से दुर्बल होकर थका हुआ अचेतन ( बेहोश ) होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा ॥५॥ तब मुझे अचेतनावस्था मे ऐसा लगा कि हाथ में शक्ति (अस्त्र) लिये हुए कोई पुरुष मुझे कह रहा है — 'पुत्र, उठो, तुम्हारा सब कार्य सफल होगा' || ६ ||

अमृतवर्षा से सिक्त-सा मैं उस समय चैतन्य हुआ । भूख-प्यास नष्ट हो जाने के कारण मैं पुनः स्वस्थ सा हो गया ॥ ७॥ भक्ति भाव से भरा हुआ में देवस्थल पर पहुँचकर और स्नान करके मन्दिर के आन्तरिक भाग मे जाकर कुछ व्याकुल हो गया ॥ ८ ॥

मन्दिर के अन्तर्गृह में स्कन्द स्वामी ने मुझे दर्शन दिये। उनके दर्शन होते ही मेरे मुंह में साक्षात् मुर्त्तिमती सरस्वती ने प्रवेश किया || ९ ||

तदनन्तर भगवान् स्कन्द ने अपने छहों मुखकमलो से 'सिद्धो वर्णसमाम्नायः यह सूत्र कहा ॥ १० ॥ यह सुनकर मानव-स्वभाव-सुलभ चचलता से मैंने इसके आगे का सूत्र स्वयं अपनी कल्पना के आधार पर कह दिया ॥ ११॥

मेरे स्वयं सूत्र बोल देने पर स्कन्द स्वामी ने कहा कि यदि तुम मानव स्वभाव- सुलभ चंचलता से स्वयं न बोल बैठते, तो यह मेरा बनाया हुआ व्याकरण-शास्त्र, पाणिनीय व्याकरण को नीचा दिखा देता ॥ १२ ॥ अब यह स्वल्प विस्तार के कारण कातन्त्र के नाम से प्रसिद्ध होगा। मेरे वाहन मयूर के पखो के नाम पर इसका दूसरा नाम कालापक या कलाप भी होगा' ॥ १३॥ 

ऐसा कहकर और अभिनव एवं संक्षिप्त व्याकरण को प्रकाशित करके स्कन्ददेव ने मुझसे फिर कहा - ||१४|| 'वह तुम्हारा राजा (सातवाहन) पूर्वजन्म मे परम तपस्वी कृष्ण नाम का ऋषि था और भरद्वाज मुनि का शिष्य था ।। १५ ।। एक बार वह कृष्णमुनि अपनी ओर आसक्त किसी मुनि कन्या को देखकर सहसा कामवश हो गया ।। १६ ।।

इसी कारण मुनियों ने उसे शाप दिया और पृथ्वी पर मानव (सातवाहन) के रूप में अवतीर्ण हुआ और वही मुनि कन्या उसकी महारानी के रूप में अवतीर्ण हुई है ।। १७ ।। इस प्रकार यह राजा सातवाहन, ऋषि का अवतार है। तुम्हें देखते ही तुम्हारी इच्छा से समस्त विद्याओं को प्राप्त कर लेगा ।। १८ ।।

पूर्वजन्म के उत्तम संस्कारों से प्राप्त सिद्धि के कारण भाग्यशाली व्यक्तियों के प्रयोजन, विना कष्ट या विष के ही सिद्ध हो जाते हैं ।। १९ ।। 

ऐसा कहकर कार्तिकेय स्वामी के अन्तर्धान हो जाने पर मैं भी मन्दिर से बाहर आया । बाहर आने पर मन्दिर के पुजारियो ने प्रसाद के रूप में मुझे चावल प्रदान किया ॥ २० ॥

महाराज, मैं भी वहाँ से चलकर यहाँ आ गया; किन्तु आश्वर्य यह है कि मार्ग में प्रतिदिन खाये जाने पर भी चावल अन्त तक उतना ही रहा; जितना पुजारियों ने दिया था ॥ २१ ॥ इस प्रकार अपना वृत्तान्त सुनकर शर्ववर्मा के मौन होने पर प्रसन्न राजा सातवाहन स्नान करने के लिए उठा ।। २२ ।।

तब मैं मौनी रहने के कारण राजकार्य तथा सासारिक व्यवहारी से पृथक् रहता था । इसलिए न चाहते हुए भी, राजा से प्रणाम द्वारा अपने जाने की इच्छा प्रकट करता हुआ, मै दो शिष्यों के साथ उस नगर से निकलकर तपस्या करने के विचार से विन्ध्यवासिनी देवी के दर्शन के लिए आया ॥ २३-२४॥

स्वप्न में विन्धवासिनी देवी के आदेश से उनके द्वारा भेजा हुआ में तुम्हे देखने के लिए, इस भीषण विन्ध्य जगल में प्रविष्ट हुआ ॥ २५ ॥ भीलों के कथनानुसार यात्रियों के साथ किसी प्रकार यहाँ पहुँचा और इन बहुत से पिशाचों को देखा ||२६||

मैंने बैठे-बैठे ही पिशाचों के परस्पर वार्त्तालाप से इनकी पिशाच भाषा सीखी, दूर जो मेरे मौन छोड़ने का कारण है, क्योंकि यह भाषा संस्कृत, प्राकृत तथा लोकभाषा से विलक्षण चौथी भाषा थी ॥२७॥ इस पैशाची भाषा को जानकर और तुम्हें उज्जैन गया हुआ सुनकर प्रतीक्षा कर रहा था कि इतने में तुम आ ही गये ||२८||

तुम्हें यहां आये हुए देखकर चौथी भूत (पैशाची भाषा मे तुम्हारा स्वागत करके मैने पूर्व जन्म का स्मरण किया। यह मेरे इस मानुष्य जन्म का वृत्तान्त है ॥ २९ ॥

गुणाढ्य के इस प्रकार कहने पर काणभूति ने उससे कहा- 'मैने तुम्हारा यहाँ आगमन आज रात को जिस प्रकार जाना, उसे सुनो ॥३०॥ भूतियर्मा नामक राक्षम मेरा मित्र है, जो दिव्य-दृष्टि है। मैं उसे देखने के लिए उज्जयिनी नगरी मे उसके निवासस्थान उद्यान में गया था । ३१ ॥

वहां मैंने उससे अपने शाप के अन्त के सम्बन्ध मे पूछा, तो उसने कहा 'दिन में हमलोगों का प्रभाव नही रहता। इसलिए ठहरो । रात मे तुम्हे बता दूँगा ||३२|| अतएव मैं दिन-भर वहां रहा और रात होने पर प्रसंगतः राक्षस से पूछा कि 'रात मे लोगों के प्रभाव के बढ़ने और हर्षित होने का क्या कारण है ? ' ॥ ३३॥

तुम भूतिवर्मा राक्षम ने कहा 'प्राचीन समय मे ब्रह्मा के प्रश्न पर शंकर ने जो कहा था, वह मैं तुम्हें सुनाता हूँ ॥३४॥ 

दिन मे सूर्य के तेज से पराभूत इन यक्ष, राक्षसों और पिशाचों का प्रभाव क्षीण हो जाता है। अत ये रात में प्रभावशाली होकर हर्षित होते हैं । । ३५ ॥

जहाँ देवताओं और बाह्मणों का पूजन समुचित रूप से नहीं होता या जहाँ अनुचित और भ्रष्ट रूप से भोजन किया जाता है, वहां ये प्रबल हो जाते हैं ॥ ३६ ॥ जहाँ अमांसभोजी (पतिव्रता स्त्री) रहती है, वहाँ ये नहीं जाते और पवित्र वीर तथा प्रबुद्ध व्यक्तियों को भी कभी नही छेड़ते ||३७||

ऐसा कहकर भूतिवर्मा उसी समय बोला- 'जाओ! तुम्हारे शापमोक्ष का कारण गुणाढ्य आ गया है।' यह मालूम होते ही मैं यहाँ आया और तुम्हें देखा। अब मैं पुष्पदन्त द्वारा कही हुई उस कथा को सुनाता हूँ ।। ३८-३९ ।।

किन्तु मुझे यह एक कौतूहल (जिज्ञासा) है कि वह पुष्पदन्त के नाम से और तुम माल्यवान हो नाम से कैसे प्रसिद्ध हुए, अर्थात् नामकरण का कारण बताओ ॥ ४० ॥

पुष्पदन्त की पूर्वकथा

काणभूति के प्रश्न को सुनकर गुणाढ्य ने उससे कहा- गंगा के तटपर बहुसुवर्ण नाम का एक गाँव है ॥ ४१||

उस गाँव में गोविन्ददत्त नाम का विविध शास्त्रों को जाननेवाला ब्राह्मण रहता था। उसकी अग्निदत्ता नाम की परम पतिव्रता पत्नी थी ॥ ४२ ॥ उस ब्राह्मण ने उस ब्राह्मणी से पाँच पुत्र उत्पन्न किये। वे सभी मूर्ख, किन्तु सुन्दर और अभिमानी थे ॥ ४३ ॥ 

कुछ समय के अनन्तर गोविन्ददत्त के घर पर दूसरी अग्नि के समान (क्रोधी) वैश्वानर नाम का एक ब्राह्मण आया ।।४४ ।। उस समय गोविन्ददत्त के कहीं बाहर रहने पर उस अतिथि ने घर मे आकर उसके पुत्रों का अभिवादन किया ॥ ४५ ॥

इन ब्राह्मणकुमारों ने उस अतिथि के आगत स्वागत में और अभिवादन के उत्तर मे केवल हँस दिया। इस प्रकार के व्यवहार से क्रुद्ध होकर वह ब्राह्मण उनके घर से निकल चला ॥४६॥

इसके अनन्तर ही आये हुए गोविन्ददत्त ने इस प्रकार क्रुद्ध ब्राह्मण से पूछा और क्षमा-प्रार्थना आदि द्वारा अनुनय-विनय किया ॥४७॥

'तुम्हारे पुत्र मूर्ख है; अतएव पतित है और उनके सम्पर्क में रहने के कारण तुम भी पतित हो । अतः तुम जैसे पतित के यहाँ मैं भोजन न करूंगा। उसके लिए मुझे प्रायश्चित्त करना होगा ब्राह्मण ने उसे इस प्रकार कहा ॥ ४८ ॥

तब गोविन्ददत्त ने शपथपूर्वक कहा कि मैं इन कुपुत्रों का कभी स्पर्श नहीं करता । गोविन्ददत्त की भार्या ने भी उसी प्रकार कहा । तब वैश्वानर ने किसी प्रकार उनका आतिथ्य ग्रहण किया ।।४९-५०।।

इस घटना को देखकर गोविन्ददत्त का एक पुत्र देवदत्त अपनी इस स्थिति पर ग्लानि के कारण पश्चात्ताप करने लगा ॥५१॥माता-पिता के द्वारा इस प्रकार दूषित ( तिरस्कृत) जीवन को देखकर और विरक्त होकर देवदत्त तपस्या के लिए बदरिकाश्रम को चला गया ॥ ५२॥

वह देवदत्त बदरिकाश्रम में, पहले पत्ते खाकर, फिर धूमपान करके शिवजी को प्रसन्न करने की इच्छा से चिरकाल तक तपस्या करता रहा ॥५३॥

जब उसकी तीव्र तपस्या से सन्तुष्ट होकर शिवजी ने दर्शन दिये, तब उसने उनसे उनका ही अनुचर होने का वर मांगा ।। ५४ ।। 'विद्याओं का अध्ययन करो ओर ससार के भोगों को भोगों, तब तुम्हारी कामना सिद्ध होगी' - शिवजी ने उसे ऐसी आज्ञा दी ।। ५५ ।।

शिवजी का आदेश प्राप्त कर देवदत्त विद्याध्ययन के लिए पाटलिपुत्र नामक नगर में आया और वेदकुभ नामक अध्यापक की विधिपूर्वक सेवा करके पढ़ने लगा ॥ ५६ ॥

जब वह गुरु गृह में विद्याध्ययन करता हुआ सेवा कर रहा था, तब किसी समय कामातुरा गुरु-पत्नी ने हठपूर्वक उसका वरण कर लिया। खेद हैं कि स्त्रियों की चित्तवृत्ति चंचल होती है ॥५७॥

इस प्रकार काम व्याकुल देवदत्त पाटलिपुत्र को छोड़कर सावधानी के साथ प्रतिष्ठान नगर को चला गया ॥ ५८ ॥ वहाँ पर उसने बूढ़ी भार्यावाले एक वृद्ध गुरु से प्रार्थना करके विद्याओं का अध्ययन किया ॥ ५९ ॥ प्रतिष्ठान में रहते हुए विद्वान् सुन्दर देवदत्त को एक बार नगर के राजा सुशर्मा की श्री नामक कन्या ने देखा, जो स्वर्ग से अवतीर्ण दूसरी लक्ष्मी के समान थी ॥ ६० ॥

उसने भी खिड़की पर खड़ी उस कन्या को इस प्रकार देखा, मानों विमान पर बैठकर विहार 'करती हुई चन्द्रमा की अधिष्ठात्री देवी हो ॥ ६१ ॥

कामकीलित दृष्टि से परस्पर आबद्ध उन दोनों का वहाँ से हटना अशक्य हो गया ।। ६२ ।। तब राजकन्या ने कामदेव की मूर्तिमान् आज्ञा के समान एक अंगुली से 'यहाँ समीप आओ' ऐसा संकेत किया ।। ६३ ।।

इधर देवदत्त राजभवन की तरफ गया, उधर वह रनिवास से बाहर आई और उसने दाँतों तले फूल दबाकर फिर उसकी ओर फेंका ।। ६४ ।।

राजपुत्री के गुप्त संकेत ( इशारे ) को न समझकर देवदत्त कर्त्तव्यमूढ़ होकर गुरुगृह को आया ।। ६५ ।।

घर आकर संकोचवश कुछ कहने में असमर्थ वह देवदत्त काम संताप से अन्दर-ही-अन्दर जलता एवं ठगा हुआ-सा मूक हो गया ॥ ६६॥

बुद्धिमान् आचार्य ने काम विकारों से उसकी स्थिति को समझकर युक्ति से उससे पूछा, तो उसने जो कुछ हुआ था, सब कह डाला ॥ ६७॥

वृत्तान्त सुनकर चतुर आचार्य ने कहा- - 'दाँत से फूल फेकते हुए उसने तुम्हें संकेत - किया है।।६८||

कि जो यह पुष्पो से शोभित पुष्पदन्त नाम का देव मन्दिर है, उसमें मेरी प्रतीक्षा करना । इस समय जाओ ।। ६९॥ गुरु से यह सुनकर और संकेत का अर्थ समझकर उस युवक ने शोक का परित्याग कर दिया और उस मन्दिर के अन्दर जाकर उसकी प्रतीक्षा मे बैठ गया ॥ ७०॥

वह राजकुमारी भी अष्टमी तिथि के कारण अकेली ही पुष्पदन्तेश्वर के दर्शन करने को मन्दिर मे आई और अन्दर गई ॥ ७१ ॥

मन्दिर में जाकर उसने द्वार के किवाड़ के पीछे उस प्रियतम को देखा। उसने भी उठकर उसे सहसा गले लगा लिया ||७२ ||

राजपुत्री ने पूछा कि आश्चर्य है, तुमने संकेत को कैसे जान लिया। उसने कहा- 'मैंने नही, मेरे गुरु ने जाना'। यह सुनकर राजकन्या क्रोध करके उससे बोली- 'मुझे छोड़ो, तुम मूर्ख (गँवार) हो' । ऐसा कहकर गुप्त बात के प्रकट हो जाने के भय से वह राजगृह को चली गई ।।७३-७४ ।।

देवदत्त भी एकान्त में जाकर प्राप्त होकर चली गईं प्रियतमा का स्मरण करता हुआ वियोग- अग्नि से विनष्ट जीवन-सा हो गया ।। ७५ ।। पूर्व- तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी ने अपने भक्त को इस प्रकार पीड़ित देखकर उसकी अभीष्ट सिद्धि के लिए पचशिख नामक गण को आज्ञा दी ।।७६ ॥ पंचशिख नामक गण ने उसे आश्वासन दिया । देवदत्त को स्त्री वेश धारण कराया और स्वयं बूढ़े ब्राह्मण का रूप धारण किया ॥७७॥

तब वह पंचशिख स्त्री-वेशधारी देवदत्त को साथ लेकर उस सुन्दरी के पिता राजा सुशर्मा के पास जाकर बोला ॥७८॥ मेरा लड़का कहीं चला गया है, मैं उसे खोजने के लिए जा रहा हूँ, अतः तुम मेरी इस स्नुषा (पतोहू) को धरोहर (अमानत ) के रूप में रख लो ।। ७९ ।।

यह सुनकर राजा सुशर्मा ने ब्राह्मण के शाप के भय से उस युवा को स्त्री समझकर सुरक्षित कन्या के महल में रखवा दिया ॥८०॥ पंचशिख के चले जाने पर वह ब्राह्मण कुमार, देवदत्त, अपनी प्रियतमा के भवन में, स्त्री-वेश धारण करके रहता हुआ अत्यन्त विश्वासपात्र बन गया ।। ८१ ।।

एक बार रात को उसे अत्यन्त उत्सुक देखकर देवदत्त ने अपने को प्रकट करके गान्धर्व विधि से उससे विवाह कर लिया ॥ ८२ ॥

वह राजकन्या जब गर्भिणी हो गई, तब उस ब्राह्मण ने पंचशिख गण को स्मरण किया और स्मरण करते ही वह आ गया, तब देवदत्त को गुप्त रूप से ले गया ॥ ८३ ॥ तब प्रातःकाल पंचशिख पहले के समान ब्राह्मण का वेश बनाकर और उस जवान के स्त्री वेश को हटाकर राजा सुशर्मा के पास जाकर बोला- 'राजन् ! आज मुझे लड़का मिल गया । अब मेरी स्नुषा (पतोहू) को लौटा दो ॥८४-८५ ॥

जब राजा को यह पता चला कि वह ब्राह्मण स्नुषा कही भाग गई, तब वह ब्राह्मण के शाप के भय से मन्त्रियों को बुलाकर परामर्श करने लगा ॥ ८६ ॥ राजा ने मन्त्रियों से कहा- 'यह ब्राह्मण नही, कोई देवता है, जो मेरी परीक्षा लेने या वचना के लिए आया है। देखा जाता है, प्राय ऐसी बातें सर्वदा हुआ करती हैं ॥ ८७॥

राजा शिवि की कथा

इस बारे में मुझे एक प्राचीन कथा याद आती है–
इसी प्रकार प्राचीन युग में परम तपस्वी, दयालु, दाता, धीर एवं समस्त प्राणियों को अभय देनेवाला शिवि नामक राजा हुआ । उसकी परीक्षा के लिए स्वयं इन्द्र ने बाज का रूप धारण करके कबूतर - रूपधारी धर्म का पीछा किया ।।८८-८९ ।।

कबूतर ने बाज के भय से राजा शिवि की गोद में शरण ली। तब बाज मनुष्य की बोली में राजा से बोला- ।।९०॥

'राजन्! यह कबूतर मेरा भक्ष्य है। मैं भूखा हूँ। यदि तुम इसे नहीं छोड़ते, तो मुझे मरा हुआ समझो । इस प्रकार मेरी हिंसा करके तुम्हें कौन-सा धर्म प्राप्त होगा ? ॥९१॥

तब शिवि ने उससे कहा कि 'यह मेरी शरण में आ गया है, इसलिए इसे अब छोड़ नहीं सकता। तुम्हारी क्षुधा - निवृत्ति के लिए इसके समान दूसरा मांस देता हूँ' ॥ ९२ ॥

बाज ने कहा- 'यदि ऐसी बात है, तो अपना मांस मुझे दो।' राजा ने भी प्रसन्न हो 'ऐसा ही सही' यह कहकर इसकी बात को स्वीकार किया ।। ९३ ।। - राजा जैसे-जैसे अपना मांस काटकर तराजू पर चढ़ाता था, वैसे ही जैसे कबूतर भारी होता जाता था ।।९४ ।।

तब राजा ने अपना सारा शरीर तराजू पर चढ़ा दिया और 'साधु-साधु' - इस प्रकार की आकाशवाणी हुई ।। ९५॥

तब इन्द्र और धर्म ने बाज एवं कबूतर का रूप छोडकर और प्रसन्न होकर राजा के शरीर को पहले ही जैसा अक्षत कर दिया ॥ ९६ ॥

इसी प्रकार मेरी परीक्षा करने के लिए यह कोई देवता आया है ।। ९७ ।।

मन्त्रियों से इस प्रकार कहकर भय से नम्र राजा सुशर्मा उस ब्राह्मण रूपी गण से बोला- 'महाराज ! अभय-दान दो ! भली भाँति सुरक्षित वह तुम्हारी स्नुषा (पतोहू) आज की रात किसी माया के द्वारा हरण कर ली गई। क्षमा करो' ! || ९९ ॥

वह ब्राह्मण कठिनाई और दया भाव से बोला- राजन् ! यदि ऐसा है, तो मेरे पुत्र के लिए अपनी कन्या दो' ॥ १०० ॥

यह सुनकर शाप से त्रस्त राजा ने अपनी कन्या देवदत्त को दे दी और तब पचशिख भी शिवलोक को गया ।। १०१ ।।

देवदत्त भी अपनी प्यारी राजकन्या को प्रकाश रूप से प्राप्त करके श्वसुर संपत्ति का आनन्द लेने लगा; क्योंकि राजा को उस कन्या के अतिरिक्त कोई दूसरी सन्तान न थी ।। १०२ ।।

कुछ समय के अनन्तर देवदत्त के पुत्र और अपने दौहित्र महीधर को राज्य में अभिषिक्त करके राजा सुशर्मा अन्तिम अवस्था में वन को चला गया ।। १०३॥

कुछ समय के अनन्तर अपने बालक को राज्य करते हुए देखकर कृतार्थ होकर वह देवदत्त भी उस राजपुत्री के साथ तपोवन में गया ॥ १०४ ॥ देवदत्त तपोवन में पुन: शिवजी की आराधना करके शिवजी को प्रसन्न करके और इस मानव देह को छोड़कर शिव का गण बन गया ।। १०५ ॥ 

प्रिया के दाँतों से फेंके हुए पुष्प से वह सकेत को न समझ सका, अतः उसका नाम पुष्पदन्त हुआ और उसकी पत्नी जया नाम से पार्वती की प्रतिहारी बन गई। अब मेरे नाम का कारण सुनो ।।१०६-१०७।।

माल्यवान की पूर्वकथा

मैं उसी देवदत्त के पिता गोविन्ददत्त का सोमदत्त नामक बालक था ।। १०८ ।।

मैं भी उसी पश्चात्ताप के कारण घर से निकलकर हिमाचल पर तप करने लगा और उस समय बहुत सी पुष्पमालाओं से शिवजी को प्रसन्न करता था ।। १०९॥

उसी प्रकार प्रकट हुए शिवजी से मैंने सांसारिक भोगों की लिप्सा छोड़कर उनके गण होने का वर मांगा ॥ ११० ॥

गिरिजापति शंकर भगवान् ने मुझे यह आदेश दिया कि चूंकि तुमने वन में उत्पन्न हुए पुष्पों की मालाओ से मेरी पूजा की है, अतः तुम माल्यवान् नामक मेरे गण होगे ।। १११ ॥ । तदनन्तर पवित्र मानव शरीर को छोडकर मैं तुरन्त शिवजी का गण बन गया। इस प्रकार स्वयं शिवजी ने मेरा नाम माल्यवान् रखा था ।। ११२ ।।

मैं पार्वती के शाप से इस मर्त्यलोक में पुनः मनुष्यत्व को प्राप्त हुआ। हे काणभूते ! अब तुम शिवजी की कही हुई उस कथा को कहो, जिससे मेरी और तुम्हारी दोनों को शापावस्था समाप्त हो ।। ११३ ।।

महाकवि श्री गोमदेवभट्ट-विरचित कवारित्सागर के कयापीठ लम्बक का सप्तम तरंग समाप्त

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