5708. || अष्टम कहानी || कर्पूरिका की कथा; इन्दीवरसेन और अनिच्छासेन की कथा
5708. || अष्टम कहानी || कर्पूरिका की कथा; इन्दीवरसेन और अनिच्छासेन की कथा अष्टम तरंग कर्पूरिका की कथ। किमी एक दिन, नरवाहनदत्त, अपनी उत्कण्ठिता प्यारी रत्नप्रभा को 'शीघ्र ही बाऊंगा'-ऐसा आश्वासन देकर, पिता बत्मराज तथा अन्य मित्रों के साथ हाथी-घोड़ों की सेना लेकर शिकार खेलने के लिए जंगलों में गया ॥ १-२॥ वह मृगया-क्रीडा-रूप लता नरवाहनदत्त के लिए प्रसन्नता का कारण बन गई। वह मृगया-भूमि बरे-बड़े हाथियों के कुम्भम्वनों को फाड़नेकाले मारे हुए मिहों के नवों से गिरे हुए मोतियों में, ऐसी मालूम हो रही थी, मानों उसमें बीज बोये गये हैं। भालों में मारे गये बाघों के बिखरे हुए दाड़ों से. अंकुरित हुई के समान मालूम होती थी। मारे हुए हरिणों के शरीर में निकलकर फैले हुए रक्त से, मानों लाल पल्लवों में युक्न मालूम हो रही थी। बाणों से बीधे गये सूअरों से, मानों गुच्छों से भरी हुई और शरभों¹ के गिरे हुए शरीरों से. मानों फलवाली मालूम हो रही थी। उस भूमिमें भयंकर सनसनाहट के माय बाण छूट रहे थे। ऐमी वह जंगली मृगया-भूमि (शिकारगाह) विचित्र शोभा धारण कर रही थी ॥३-६।। कुछ देर बाद यककर विश्राम करके नरवाहनदत्त घोड़े ...