5708. || अष्टम कहानी || कर्पूरिका की कथा; इन्दीवरसेन और अनिच्छासेन की कथा

5708. || अष्टम कहानी || कर्पूरिका की कथा; इन्दीवरसेन और अनिच्छासेन की कथा

अष्टम तरंग

कर्पूरिका की कथ।

किमी एक दिन, नरवाहनदत्त, अपनी उत्कण्ठिता प्यारी रत्नप्रभा को 'शीघ्र ही बाऊंगा'-ऐसा आश्वासन देकर, पिता बत्मराज तथा अन्य मित्रों के साथ हाथी-घोड़ों की सेना लेकर शिकार खेलने के लिए जंगलों में गया ॥ १-२॥

वह मृगया-क्रीडा-रूप लता नरवाहनदत्त के लिए प्रसन्नता का कारण बन गई।

वह मृगया-भूमि बरे-बड़े हाथियों के कुम्भम्वनों को फाड़नेकाले मारे हुए मिहों के नवों से गिरे हुए मोतियों में, ऐसी मालूम हो रही थी, मानों उसमें बीज बोये गये हैं। भालों में मारे गये बाघों के बिखरे हुए दाड़ों से. अंकुरित हुई के समान मालूम होती थी। मारे हुए हरिणों के शरीर में निकलकर फैले हुए रक्त से, मानों लाल पल्लवों में युक्न मालूम हो रही थी। बाणों से बीधे गये सूअरों से, मानों गुच्छों से भरी हुई और शरभों¹ के गिरे हुए शरीरों से. मानों फलवाली मालूम हो रही थी। उस भूमिमें भयंकर सनसनाहट के माय बाण छूट रहे थे। ऐमी वह जंगली मृगया-भूमि (शिकारगाह) विचित्र शोभा धारण कर रही थी ॥३-६।।

कुछ देर बाद यककर विश्राम करके नरवाहनदत्त घोड़े पर सवार एकमात्र गोमुख के माथ दूसरे जंगल में प्रवेश कर गया ॥७॥

वहाँ जाकर उसने गोफग से गोली फेंकने का खेल प्रारम्भ किया। इतने में ही उस मार्ग में कोई तपस्विनी आ पड़ी। नरवाहह्मदत्त के हाथ में छूटी हुई एक गोली उस तपस्विनी के सिर में जा लगी। तब वह तपस्विनी कुछ रोप करके बोली-॥८-९॥

'अभी तुम्हें ऐसी मस्ती है. तो जब कर्फ्यूरिका को पत्नी बना लोगे, तब न जाने कितना अधिक मद बढ़ जायगा ॥१०॥

यह सुनकर और घोड़े में उतरकर नरवाहनदत्त तपस्विनी के पैरों पर गिरकर बोला- ।।११।।

'हे माता ! मैंने तुमको देखा नहीं। वैवसंयोग से ही गोली तुम्हें लगी। दया करो। मेरी उद्दण्डता को क्षमा करो' ॥१२॥

यह सुनकर तपस्विनी बोली- 'बेटा! मुझे क्रोष नहीं है। ऐसा कहकर वह नरवाहनदत्त को आशीर्वाद देकर सान्त्वना देने लगी ॥१३॥

तब नरवाहनदत्त ने उस तपस्विनी को सत्यवादिनी, ज्ञानवती और सच्ची तपस्विनी समझकर नम्रता से पूछा- ॥१४।।

'हे भगवती ! तुमने यह कर्पूरिका नाम किसका कहा। यदि मुझ पर प्रसन्न हो, तो उसे बताओ। उसे जानने के लिए मुझे बहुत कौतुक है' ।॥१५॥

ऐसा कहते हुए और प्रणाम करते हुए उससे तापमी ने कहा- 'समुद्र के पार कर्पूर-संभव² नाम का द्वीप है॥१६॥

वहाँ नाम के समान गुणोंवाला कर्पूरक नाम का राजा है। उसकी कर्पूरिका नाम की मुन्दरी कन्या है ।। १७।

वह कन्या इतनी सुन्दरी है कि समुद्र ने अपनी पहली कन्या (लक्ष्मी) के देवताओं द्वारा अपहरण कर लिये जाने के कारण उसकी इस दूसरी बहन को मानों इस द्वीप में छिपाकर रखा है॥१८॥

पुरुषों से द्वेष रखनेवाली वह कन्या विवाह करना नहीं चाहती; किन्तु तुम्हारे जाने पर वह तुम्हारी कामना पूरी करेगी ॥१९॥

इसलिए, बेटा ! तुम वहाँ जाओ, तो इस सुन्दरी को प्राप्त करोगे; किन्तु जाते हुए तुम्हें मार्ग में अनेक असह्य कष्ट होंगे ॥२०॥

किन्तु तुम उन कष्टों से घबराना नहीं। उनका परिणाम अच्छा ही होगा। ऐसा कहकर वह तपस्विनी अदृश्य हो गई ॥२१॥

तदनन्तर नरवाहनदत्त उसकी वाणी से उत्पन्न मदन की आज्ञा से आकृष्ट होकर अपने साथी गोमूल से बोला- 'आओ, कर्पूरसम्भव नगर में कर्फ्यूरिका के पास चले। उसे विना देखे मैं एक क्षण भी नहीं रह सकता' ।॥२२-२३।।

यह सुनकर गोमुख बोला- 'स्वामी! अधिक साहस न करो। कहाँ समुद्र ! कहाँ वह नगर ! कहाँ इतना लम्बा रास्ता और कहाँ वह कन्या ! ॥२४॥

एकमात्र नाम सुनकर ही दिव्य स्त्रीजनों को छोड़कर विना प्रयोजन से मन्देहजनक उस मनुष्य-कन्या के पीछे दौड़ रहे हो ? ॥२५॥

गोमुख से इस प्रकार कहा गया वह बत्सराज का पुत्र बोला- 'उस तपस्विनी का वचन झूठा नहीं हो सकता ॥२६॥

इसलिए, मुझे उसे प्राप्त करने के लिए अवश्य जाना पड़ेगा। ऐसा कहकर घोड़े पर चढ़-कर युवराज आगे चल पड़ा ॥२७॥

वह गोमुल, न चाहता हुआ भी उसके पीछे चल पड़ा। कहना न माननेवाले स्वामी का भी सेवकों को विवश होकर अनुगमन करना ही चाहिए ॥२८॥

उबर बत्सराज भी शिकार खेलकर अपनी नगरी को लौटा। वह समझ रहा था कि सेना आदि के मध्य युबराज भी आया होगा। नगरी में पहुंचकर खोजने पर जब युवराज का पता नहीं चला। तब वे उदयन आदि सब रत्नप्रभा के समीप गये ॥२९-३१॥

पहले तो रत्नप्रभा भी व्याकुल हुई, किन्तु अपनी विद्या से ध्यान करके उसके द्वारा अपने प्रिय का समाचार जानकर व्याकुल श्वशुर से बोली ॥३२॥

वन में किती तपस्विनी द्वारा कॉरिका नाम की राजकुमारी का पता पाकर आर्यपुत्र उमे प्राप्त करने के लिए करिसम्भव नामक नगर में गये हैं, इमलित अ.प लोग चिन्ता न करें। यह मैंने अपनी विद्या के प्रभाव से जाना है' ।॥३३-३४।॥

ऐसा कहकर रत्नप्रभा ने परिवार-साहित वत्सराज को शान्ति प्रदान की ॥३५॥

और फिर, रत्नप्रभा ने दूसरी विद्या का प्रयोग किया कि मार्ग में नरवाहनदत को किसी प्रकार का क्लेश न हो। पति का हित बाहनेवाली अच्छी स्त्रियाँ, ईर्ष्या को हृदय में स्थान नही देती ॥३६॥

इवर बोड़े की पीठ पर बैठा हुआ नरवाहनदत्त, गोमुख के साथ जंगल का बहुत-सा मार्ग पार कर गया ।॥३७॥

उने अकस्मात् ही मार्ग में एक कुमारी ने आकर कहा- में मायावती नाम की विद्या हूँ। रत्नप्रभा द्वारा प्रेरित हूँ। मार्ग में अदृश्य रूप से तुम्हारी रक्षा करती हूँ। तुम निश्चिन्त होकर जाओ।' ऐसा कहकर वह विद्या उसके देखते-देखते ही अदृश्य हो गई ॥३८-३९॥

तब उस विद्या के प्रभाव से भूख-प्यास से रहित रास्ते को पार करता और रत्नप्रभा की प्रशंसा करता हुआ नरवाहनदत्त आगे चला ॥४०॥

सांयकाल वन में एक निर्मल तालाब मिला। वहाँ नरवाहनदत्त ने, गोमुख के साथ स्नान करके अत्यन्त मीठे फलों का आहार कर जल-पान किया ॥४१॥

रात को वहाँ घोड़ों को घास देकर और वृक्ष के नीचे बाँधकर गोमुख के साथ सोने के लिए बड़े पेड़ पर चढ़ा ॥४२॥

उसकी विशाल शाखा पर सोये हुए उसने डरे हुए घोड़ों की हिनहिनाहट से जागकर नीचे आये हुए एक सिह को देखा ॥४३॥

उसे देखकर घोड़ों की रक्षा के लिए नीचे उत्तरने को उद्यान युवराज को देखकर गोमुख बोला- 'शरीर का ध्यान न करके और मुझसे सम्मति भी न करके तुम उतरने की चेष्टा कर रहे हो। राजा का मूल गरीर है और वही राज्य का मूल मन्त्र है। तुम मनुष्य होकर नख और दांतोंवाले पशुओं से युद्ध करने के लिए क्यों तैयार हो रहे हो? इसी शरीर की रक्षा के लिए हम दोनों इस समय वृक्ष पर चढ़े हुए हैं।' गोमुख की इन बातों से युवराज रुक गया ।।४४-४६١١

घोड़े को मारने हुए शेर पर उसने ऊपर से ही छुरी मारी और वह छूरी सिंह के शरीर में बँग गई ॥८॥

छुरी में मारे जाने पर भी सिह ने उस घोड़े को मारकर दूसरे घोड़े को भी मार डाला ॥४८॥

तब वत्सेश्वर-पुत्र युवराज ने गोमुख से तलवार लेकर उसे ऊपर से ही फेंककर शेर के दो टुकड़े कर दिये। और नीचे उतरकर सिह के गरीर में तलवार खींचकर और फिर वृक्ष पर चढ़कर उसने वह रात बिताई ॥४९-५०।।

प्रातःकाल वृक्ष से उतरकर नरवाहनदत्त, गोमुख के साथ नर्पूरिका की ओर चल पड़ा ॥५१॥

शेर के द्वारा वाहनों के मारे जाने के कारण पैरों से ही चलते हुए नरवाहनदत्त का मनोरंजन करने के लिए गोमुख ने मार्ग में कहा-॥५२॥

इन्दीवरसेन और अनिच्छासेन की कथा

'स्वामी ! मैं इस समय के प्रसंग में तुम्हें एक कथा सुनाता हूँ। उसे सुनो इस पृथ्वी पर अपने सौन्दयं से अलका (कुबेरनगरी) को जीतनेवाली ऐरावती नाम की एक नगरी है। उस नगरी में परित्यागसेन नाम का राजा था, उसकी प्राणों के समान प्यारी दो रानियाँ थी ॥५३-५४॥

उनमें से एक अधिकसंगमा नाम की राजा के मन्त्री की कन्या थी और दूसरी, काव्यालंकारा किसी राजवंश की कुमारी थी ॥५५।।

वह राजा, उन दोनों रानियों के साथ पुत्र-प्राप्ति की कामना से पार्वती अम्बिका की जाराधना करता हुआ निराहार रहकर और कुशा पर सोकर तपस्या करने लगा ॥५६॥

उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भक्तवत्सला भवानी ने उसे स्वप्न में स्वयं दर्शन देकर और दो फल देकर आज्ञा दी 'उठो! अपनी स्त्रियों को ये दो फल खाने के लिए दो। इसके प्रभाव से हे राजन् ! उन दोनों के दो पुत्र उत्पन्न होंगे' ।।५७-५८॥

ऐसा कहकर गौरी अन्तहित हो गई। राजा उठा और प्रातःकाल दोनों हाथों में दो फल देखकर प्रसन्न हुआ। राजा ने स्वप्न के समाचार से उन दोनों रानियों को आनन्दित किया और स्नान, पूजन आदि करके व्रत का पारण किया ।।५९-६०।।

रात को राजा ने अधिकसंगमा रानी के महल में जाकर उसे फल दिया और उसने उसे त्रा लिया ।।६१।।

राजा के मुख्य मन्त्री की कन्या होने के गौरव के कारण राजा उम रात को उसी रानी के पास रह गया और दूसरी रानी के लिए रखे हुए फल को सिरहाने रख दिया। राजा के सोये रहने पर रानी अधिकसंगमा ने उठकर एक साथ दो समान पुत्रों की इच्छा से उस दूसरे फल को भी ऊपर के भाग के पास से ला लिया। स्त्रियों का सौतों के प्रति द्वेष स्वाभाविक ही होता है ॥६२-६५।।

सबेरै उठकर उस फल को खोजते हुए राजा से उमने कहा कि 'वह दूसरा फल भी मैने ही ला लिया ॥६६।।

तब दुःखित मनवाला राजा उमके भवन में निकलकर और राजकार्यों में दिन बिताकर रात को दूसरी रानी के भवन में गया ॥६७॥

वहाँ उस रानी के फल मांगने पर राजा ने कहा कि 'मेरे सोये रहने पर तुम्हारी सौत ने छल में उस फल को भी खा लिया ॥६८॥

तब वह रानी काव्यालंकारा पुत्र की उत्पत्ति के कारणभूत उस फलको न पाकर अत्यन्त दुःखी होकर चुप रही ॥६९॥

कुछ समय व्यतीत होने पर वह रानी अधिकसंगमा गर्भवती हुई और दसवें महीने उसने एक साथ दो बालक उत्पन्न किये ।।७०।।

राजा भी उनकी उत्पत्ति से सफलमनोरथ होकर अत्यन्त प्रसन्न हुना और उसने महान् उत्सव किया ॥७१।।

राजा ने उन दोनों में से कमल के समान नेत्रवाले तथा बद्‌द्भुत आकृतिवाले बड़े पुत्र का नाम इन्दीवरसेन रखा ॥७२।।

और, दूसरे छोटे पुत्र का नाम अनिच्छासे न रखा; क्योंकि उसके लिए उसकी माता ने राजा की इच्छा के विरुद्ध फल खा लिया था ॥७३॥

तदनन्तर राजा की दूसरी रानी काव्यालंकारा यह देखकर क्रोष से मरी हुई सोचने लगी-॥७४।।

'ओह ! मेरी इस सौत ने मुझे पुत्र-प्राप्ति से वंचित कर दिया है। इसलिए, इस क्रोष का बदला मुझे अवश्य लेना चाहिए ॥७५॥

अपनी युक्ति से इसके दोनों लड़कों का विनाश करना चाहिए।' ऐसा सोचकर वह अवसर की प्रतीक्षा में उपाय सोचती हुई चुप बैठी रही ॥७६॥

जैसे-जैसे राजा के वे दोनों बालक बढ़ते गए, वैसे ही वैसे उसका क्रोध-रूपी वृक्ष भी बढ़तर रहा ॥७७१।

क्रमशः यौवन अवस्था में आये हुए बलशाली वे दोनों राजकुमार, दिग्विजय की इच्छा से अपने पिता के पास आकर बोले-॥७८॥

'महाराज। हम लोग अस्त्र-शस्त्र विद्या में शिक्षित हो गये और युवावस्था में प्राप्त हो गये, तो हम इन निष्फल भुजाओं को लेकर व्यर्थ क्यों बैठे? विजय की इच्छा न रखनेवाले क्षत्रिय की भुजाओं को और उनके यौवन को धिक्कार है। इसलिए, पिताजी ! हम दोनों को दिग्विजय-यात्रा के लिए आशा प्रदान करें' ।॥७९-८०॥

कुमारों की बातों को सुनकर राजा प्रसन्न हुआ, उसे स्वीकार किया और उनकी दिग्विजय-पात्रा की तैयारी की बऔर उनसे कहा कि 'तुम्हें जब कभी संकट का सामना करना पड़े, तब कष्टहारिणी माता अम्बिका का स्मरण करना। तुम दोनों उसी अम्बिका के दिये हुए हो' ॥८१-८२॥

ऐसा कहकर राजा ने सेना, सामन्त आदि के साथ उन दोनों को विजय-यात्रा के लिए भेज दिया। अपने वृद्ध प्रधान मन्त्री और उन कुमारों के नाना प्रथमसंगम को भी परामर्श बादि देने के लिए साथ भेज दिया। उनकी माता ने प्रस्थान के समय मंगलाचरण किया ॥८३-८४।।

उन दोनों बलवान् भाइयों ने पहले पूर्व दिशा में जाकर दिग्विजय किया ॥८५॥

तब अप्रतिहत शक्तिवाले दोनों वीर अनेक राजाबों को मिलाकर अपने प्रताप और अधिकार जमाकर दक्षिण दिशा को गये ॥८६॥

उनका विजय-समाचार सुनकर उनके माता-पिता अत्यन्त प्रसन्न हुए; किन्तु दूसरी माता काव्यालंकारा द्वेषाग्नि की ज्वाला से भीतर-ही-भीतर अल-मुन गई ॥८७॥

'इन मेरे दोनों लड़कों ने पृथ्वी को जीतकर और मुझे मारकर मेरे राज्य पर अधिकार कर लेने का निश्चय किया है। इसलिए, यदि तुम लोग मेरे सच्चे स्नेही और भक्त हो, तो बिना विवारे इन दोनों को मार डालो।' इस प्रकार, सेना-अधिकारियों के नाम राजा का आज्ञापत्र कायस्थ (मुन्शी) से (घूस देकर) लिखवा लिया और धन देकर सन्देश ले जानेवाले दूत के हाथ काव्यालंकारा ने गुप्त रूप से सेना के शिविर में भेज दिया। दूत ने शिविर में जाकर पत्र दे दिया ॥८८-९२॥

सेनाधिकारियों ने पत्र लेकर और उसे बाँचकर राजनीति को अत्यन्त कठोर जानकर और राजा की आज्ञा को अनुल्लंघनीय समझकर दोनों राजकुमारों को मार डालने के लिए रात्रि के समय सम्मति की और विवश होकर मारने का निश्चय किया ॥९३-९४।।

उन अधिकारियों में एक ने, जो उन बालकों के नाना बूढ़े प्रधान मन्त्री का मित्र या, इस बात की सूचना उसे दी। सूचना पाकर बूड़े प्रधान मन्त्री, उन दोनों नातियों को सावधान करके और अच्छे घोड़ों पर बैठकर उनके साथ रात में ही सेना-शिविर से भाग गया। जंगली मार्ग न जानने के कारण भटकते हुए दोनों राजकुमार और उनका बूड़ा नाना मध्याह्न की धूप में विन्ध्य पर्वत के जंगल में भूख-प्यास से व्याकुल हो गये। उनके दोनों घोड़े प्यास से मर गये और भूख-प्यास के क्लेश से बूड़ा उनका नाना मन्त्री भी उनके देखते-देखते हीं मर गया ।।९५-९९।।

'पिता ने दुष्टा दूसरी माता को प्रसन्न करने के लिए निरपराध हम लोगों को कैसी दशा में पहुंचा दिया'- ॥१००॥

ऐसा सोचते हुए उन दोनों दुःलित भाइयों ने पिता के पूर्व उपदेश का स्मरण करके माता अम्बिका का ध्यान किया ॥१०१॥

भक्तों को शरण देनेवाली माता के स्मरण से वे दोनों भूख-प्यास से रहित बऔर बलवान् हो गये ॥१०२॥

इस प्रकार, माता के चमत्कार से कुछ आशा प्राप्त करके मार्ग न जानते हुए भी वे दोनों विन्ध्यवासिनी देवी की ओर चल पड़े ॥१०३।।

वहाँ पहुँचकर वे दोनों विन्ध्यवासिनी देवी को प्रसन्न करने के लिए उसके सन्मुख निराहार रहकर कठोर तप करने लगे। उधर सेना के अधिकारी जब राजा के आज्ञानुमार राजकुमारों को मारने के लिए एकत्र होकर आये, तब उन्होंने बहुत खोजने पर भी उन राजकुमारों को नहीं देखा और समझ गये कि वे दोनों अपने बूड़े नाना के साथ शिविर से कहीं भाग गये ।।१०४-१०६।।

वे सब गुप्त वार्ता के प्रकट हो जाने के कारण घबराये हुए राजा परित्यागसेन के समीप डरते-डरते आये ॥ १०७॥

और, राजा को उसके लेख दिखाकर सब समाचार सुना दिया। राजा यह सब मुनकर और समझकर क्रोथ करके उनसे बोला- ये लेखपत्र आदि मेरे भेजे हुए नहीं हैं। यह क्या इन्द्रजाल है? मूर्ख, तुम क्या यह नहीं जानते थे कि कठोर तपस्या के प्रभाव से प्राप्त किये हुए बच्चों को मैं स्वयं कैसे मारता ? तुम लोगों ने तो उन्हें मार ही डाला था। केवल अपने पुण्य से वे बच गये हैं। उनके नाना ने भी मन्त्री होने का फल दिखा दिया। ऐसा कहकर उसने उन सब अधिकारियों तथा भागे हुए भी उस मिथ्याचारी लेखक को पकड़वाकर बुलाया और सब को मरवा डाला और ऐसे नीच कार्य करनेवाली पुत्रघातिनी पत्नी काव्यालंकारा को भी गड्‌ढे में डलवा दिया ॥१०८-११३॥

अत्यन्त द्वेष के कारण बन्धी बुद्धि से विना विचारे जो पाप किया जाता है, उससे विपत्ति क्यों न आयेगी ? ॥११४॥

राजा ने, राजकुमारों के साथ गये हुए सभी अधिकारियों और नौकरों को हटाकर उनके स्थान पर दूसरे व्यक्तियों की नियुक्ति की ॥११५।।

यह सब करके राजा नपनी पत्नी के साथ भगवती अम्बिका का स्मरण करता हुआ और राजकुमारों की खोज कराता हुआ दुःख से पीड़ित रहता था ।।११६।॥

उधर, राजकुमार इन्दीवरसेन, अपने छोटे भाई के साथ विन्ध्यवासिनी की आराधना करता रहा। देवी उसकी कठोर तपस्या से संतुष्ट हुई ॥११७॥

और, स्वप्न में उसे एक सड्ग (तलवार) देकर यह आदेश दिया कि इस खड्ग के प्रभाव से तुम दुर्जय शत्रु का विजय करोगे ॥११८॥

तुम जो कुछ चाहोगे, वह होगा। तुम दोनों इस खड्ग से इष्टसिद्धि प्राप्त करोगे ॥११९॥

ऐसा कह‌कर देवी के अन्तर्धान होने पर जगकर उठे हुए इन्दीवरसेन ने हाथ में खड्ग को देखा ॥१२०॥

तदनन्तर, उस खड्ग से और स्वप्न के समाचार से छोटे भाई को प्रसन्न करके उसने प्रातःकाल जंगली फल आदि से व्रत का पारण (समाप्ति) किया ॥१२१॥

तदनन्तर, देवी को प्रणाम करके देवी की कृपा से स्वस्थ शरीर और मनवाला इन्दीवरसेन, उस खड्ग के साथ भाई को लेकर वहाँ से आगे चला ॥१२२॥

बहुत दूर जाने पर, उसने एक बड़े नगर को देखा, जो सोने के घरों से सुमेरु-शिखर का भ्रम उत्पन्न कर रहा था। उस नगर की गली के द्वार पर उसने एक राक्षस को बैठा हुआ देखा और उससे उस नगर का तथा उसके राजा का नाम पूछा ।।१२३-१२४।।

'यह पौलपुर नाम का नगर है। इसमें यमदंष्ट्र नाम का शत्रुओं का मर्दन करनेवाला हमारा राजा राज्य करता है ।॥ १२५॥

उस राक्षस के ऐसा कहने पर यमबंष्ट्र को मारने की इच्छा से इन्दीवरसेन नगर में घुसने के लिए तैयार हुआ ।।१२६॥

द्वार पर पहरा देते हुए और अन्दर जाने से रोकते हुए उस राक्षस को उसने खड्ग के एक ही प्रहार से सिर काटकर मार गिराया ॥१२७७॥

द्वारपाल को मारकर और राजभवन में जाकर उस शूर ने सिहासन पर बैठे हुए यमदंष्ट्र राक्षस को देखा ॥१२८॥

बड़े-बड़े दाँतों से उस का मुँह भयावना था, बाईं ओर एक सुन्दरी स्त्री बैठी थी और दाहिनी ओर दिव्य स्वरूपवाली एक कुमारी बैठी थी ॥ १२९॥

उस राक्षस को देखकर अम्बिका से पाये हुए लड्ग को खींचकर इन्दीवरसेन ने उसे ललकारा बऔर वह राक्षस भी तलवार लेकर उठ खड़ा हुआ ।।१३०।।

तब दोनों का इन्द्र-युद्ध प्रारम्भ होने पर इन्दीवरसेन के द्वारा बार-बार काटा जाता हुबा मी उसका सिर फिर-फिर जुट जाता था ॥१३१॥

उस राक्षस की इस माया को देखकर उसके पास बैठी हुई और राजपुत्र पर आसक्त हुई कुमारी द्वारा इशारे से सूचित किये गये राजकुमार ने, उसके सिर को काटकर तुरन्त ही एक बड्ङ्ग प्रहार से उसके दो टुकड़े कर डाले ॥१३२-१३३॥

कुमारी के द्वारा ज्ञात राक्षसी माया के नष्ट हो जाने पर उसका सिर फिर नहीं जुटा और वह मर गया ।।१३४॥

उस राक्षस के मरने पर वह सुन्दरी स्त्री और कुमारी दोनों प्रसन्न हो गई। तब छोटे भाई के साथ इन्दीवरसेन ने स्वस्यता से बैठकर पूछा- ॥१३५॥

'इस एकमात्र द्वारपाल से रक्षित नगर में यह कैसा राक्षस था और तुम दोनों कौन हो, जो उसके मारे जाने पर प्रसन्न हो रही हो ? ' ॥१३६॥

यह सुनकर उन दोनों में से कुमारी बोली- 'इस शैलपुर में बीरभुज नाम का राजा था। यह उम राजा को मदनदंष्ट्रा नामकी पत्नी (रानी) है। इस राक्षस ने नगर में आकर राजा वीरभुज को खा डाला, उसके अन्य कुटुम्बियों और सेवकों को भी खा लिया; किन्तु यह सुन्दरी है, इसलिए इसे नहीं खाया और अपनी पत्नी बना लिया ॥१३७-१३९॥

तब इस निर्जन नगर में सोने के भवन बनाकर बिना नौकर-चाकरों के ही वह इसके साथ आनन्द-विहार करता हुआ रहता था ।॥ १४०॥

और, मैं इस राक्षस की सड्‌गदंष्ट्रा नाम की छोटी बहन हूँ। मैं तुम्हें देखकर तुमसे प्रेम करने लगी हूँ ॥१४१॥

इसलिए, इसके मरने पर यह और मैं दोनों प्रसन्न हुए। अब तुम मेरे ही मन के द्वारा अरंण की गई मुझसे विवाह करो' ।॥१४२॥

ऐसा कहती हुई खड्ङ्गदंष्ट्रा को इन्दीवरसेन ने गान्धवं विधि से विवाहित कर लिया ॥१४३॥

और, खड्ग के प्रभाव से इच्छा करते ही अभिलषित भोगों को प्राप्त करता हुआ राजकुमार, अपने छोटे भाई के साथ वहीं रहने लगा ।॥१४४

एक बार उसने अपने खड्ग के प्रभाव से आकाश-यान का ध्यान किया, जिससे विमान बन कर आ गया ।। १४५॥

तब उसपर छोटे भाई ननिस्कासेन को बिठाकर उसने अपना समाचार माता-पिता को कहने के लिए विना श्रम के भेज दिया ॥१४६॥

वह अनिच्छासेन उस विमान के द्वार। आकाश-मार्ग से इरावती नगरी में पिता के समीप जा पहुंचा ॥ १४७॥

वहाँ जाकर उसने अत्यन्त उग्र कष्ट से व्याकुल माता-पिता को अपने दर्शन से ऐसा प्रसन्न किया, जैसे चन्द्रमा, चकवा-चकई को प्रसन्न करता है ॥ १४८॥

जाते ही माता और पिता को प्रणाम करके उनके द्वारा गले लगाये गये अनिच्छासेन ने अपने बड़े भाई की कुशल-वार्ता सुनकर उनकी शंका दूर कर दी ।।१४९।।

और, अपना तथा बड़े भाई का प्रारम्भ के कष्ट से लेकर अन्त में सुख की प्राप्ति तक का सारा समाचारः सुना दिया ॥ १५०॥

और, यहाँ पर दुष्ट बिमाता के द्वारा किये गये सारे पापकर्म की सारी कथा मी उसने सुनी, जो विमाता ने उनके नाश के लिए की थी ।॥ १५१।।

तदनन्तर, अत्यन्त प्रसन्नता और उत्सव मानते हुए माता-पिता और जनता से प्रशंसित अनिच्छासेन वहीं रहने लगा ॥१५२॥

कुछ दिनों के बीतने पर बुरे सपने के कारण भाई के अनिष्ट की आशंका से दुःखित अनिच्छामेन ने भाई से मिलने की उत्कण्ठा अपने पिता से प्रकट की ।॥१५३॥

और, कहा- आपके मिलने की उत्कण्ठा बताकर मैं आर्य इन्दीवरसेन को यहाँ लाता हूँ।' अतः, पिताजी आप मुझे उसके पास जाने की बाज्ञा दे, ॥१५४।।

यह सुनकर बड़े पुत्र को देखने के लिए उत्सुक पिता और माता से आज्ञा प्राप्त कर अनिच्छासेन, उसी विमानपर चढ़कर शीघ्र ही शैलपुर नगर को आया और प्रातःकाल ही अपने भाई के घर प्रविष्ट हुआ ॥१५५-१५६॥

उसने भीतर जाते ही बेहोश और भूमि पर गिरे हुए अपने बड़े भाई को देखा और उसके समीप ही यमदंष्ट्रा और मदनदंष्ट्रा दोनों ही रो रही थीं ॥१५७॥

उनसे पूछने पर कि 'यह क्या हुआ?' नीचे मुँह किये हुई और मदनदंष्ट्रा से निन्दा की जाती हुई यमदंष्ट्रा बोली- ॥१५८॥

'तुम्हारी अनुपस्थिति में एक बार मेरे स्नान के लिए चले जाने पर तुम्हारा भाई इस मदनदंष्ट्रा के साथ एकान्त में रमण कर रहा था। मैंने तुरन्त स्नान करके आने पर उसे इसके साथ देखा और बचनों से फटकारा ।।१५९-१६०।।

उसके बहुत मनाने पर भी जलंघनीय दैव-गति के कारण ईर्ष्या से मोहित होकर मैंने सोचा कि आश्चर्य है कि यह मुझे कुछ न समझकर दूसरी स्त्री का सेवन करता है-यह सारा घमण्ड इसे इस सड्ग के कारण है, इसलिए इस खड्ग को ही छिपा देती हूँ, ऐसा सोचकर मूर्खता के कारण मैंने रात में उसके सो जाने पर तलवार को बाग में फेंक दिया ।।१६१-१६३।।

इस कारण यह लड्ग भी कलंकित (काला) हो गया और यह इस दशा (बेहोशी) को प्राप्त हो गया ॥ १६४॥

तदनन्तर प्रेम से अंधी यह और मैं दोनों मरने का प्रयत्न कर रही थीं कि तुम आ गये ॥१६५॥

तो, अब तुम ऐमे नृशंस-कर्म करनेवाली और अपनी जाति के धर्म को न छोड़नेवाली मुझे इसी तलवार से काट दो।' इस प्रकार, भौजाई के कहने पर अनिच्छासेन ने सोचा कि यह तो गोक और सन्ताप के कारण ऐसा कह रही है, इसे न मारना चाहिए। मैं ही भाई के शोक में आत्महत्या क्यों न कर लूं? ऐसा सोचकर उसने अपना गला काटना चाहा ।।१६६-१६७।।

हे राजकुमार ! ऐसा न करो यह तुम्हारा भाई मरा नहीं है। देवी के खड्ग का अपमान होने के कारण उसी के कोप से यह बेहोश हो गया है ॥ १६८॥

इस विषय में यमदंष्ट्रा को भी अपराविनी न समझो। क्योंकि, यह सब शाप के कारण लोगों का हस्तकौशल है। ये दोनों ही तुम्हारे भाई की पहले जन्म की पत्नियाँ हैं। इसलिए, अपनी इच्छा-सिद्धि के लिए उसी भगवती विन्ध्यवासिनी की आराधना करो ॥१६९-१७०।।

इस प्रकार, आकाशवाणी सुनकर अनिच्छासेन ने मरने का प्रयत्न रोक लिया। विमान पर चढ़कर और उस काले सहुम को लेकर वह विन्ध्यवासिनी के चरणों की शरण में गया ॥१७१-१७२।।

वहाँ जाकर देवी को अपने सिर का बलिदान देने के लिए उद्यत हुए उसने आकाशवाणी सुनी कि 'बेटा ! साहस न करो। जाओ। तुम्हारा भाई जीवित हो जाये और लड़ङ्ग भी निर्मल हो जाये। मैं तुझ पर प्रसन्न हूँ।' ॥१७३-१७४ ॥

ऐसी दिव्य वाणी सुनकर हाथ में लिये सड़ग को निष्कलंक (चमचमाता) देखकर देवी को प्रणाम किया तथा उसकी प्रदक्षिणा की ।॥ १७५।।

इसके बाद अपने सफल मनोरथ के समान उस विमान पर चढ़कर उत्सुकता के साथ शैलपुर को आया ॥१७६॥

वहाँ पर होया में आये हुए बड़े भाई को देखकर उसके चरणों पर गिर पड़ा। उसने भी उसे उठाकर गले लगा लिया ।।१७७।।

'तुमने हम दोनों के पति की और हमारी रक्षा की' ऐसा कहकर दोनों भौजाइयों उसके चरणों पर गिर पड़ीं ॥१७८॥

तदनन्तर, सब समाचार पूछते हुए बड़े भाई इन्दीवरसेन से अनिच्छामेन ने सारा वृत्तान्त सुना दिया ।।१७९॥

सब समाचार सुनकर इन्दीवरसेन ने यमदंष्ट्रा पर कोव नहीं किया और भाई के कार्यों पर मन्तोष प्रकट किया ।॥१८०॥

और, उमके मुंह से मुना कि उसके माता-पिता उसे देखने के लिए अत्यन्त उत्सुक हो रहे हैं। दूसरी विमाता के किये हुए छल-कपट को भी उसने मुना ॥ १८१॥

तब छोटे भाई अनिच्छा मेन मे दिये गये खड़ग को लेकर उसके प्रभाव से ध्यान करते ही उपस्थिन महान् विमान पर चढ़कर सोने के महलों तथा दोनों पत्नियों और छोटे भाई के साथ इन्दीवरमेन, अपनी इरावती नगरी को आ गया ॥१८२-१८३॥

वहाँ पर जनता से आश्चर्य के साथ देखा गया इन्दीवरसेन अपने साथियों के साथ पिता के घर में गया ॥ १८४॥

वियोग से दुर्बल और दुःखी पिता और माता को देखकर आंनुओं से मुँह को धोता हुआ वह उनके चरणों पर गिर पडा ।॥१८५ ॥

वे दोनों (राजा-रानी) छोटे भाई के साथ ज्येष्ठ पुत्र को देखकर उनका आलिंगन करते हुए अत्यन्त सन्ताप को भूलकर शान्ति और सुख में मग्न हो गये ॥ १८६॥

विव्य रूपवाली पाद-वन्दन करती हुई उन दोनों बहुओं को देखकर उन लोगों ने प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद दिया ॥१८७॥

इस प्रकार, माता-पिता को प्रसन्न करता हुआ और जनता को उत्साह देता हुआ इन्दीवरसेन पिता के समीप ही रहने लगा ॥ १८८॥

आकाश-पान, सोने का महल आदि लाने के कारण और उसके प्रभाव से इन्दीवरसेन के माता-पिता आश्चर्य से प्रसन्न होते थे। इन्दीवरमेन भी दोनों पत्नियों के साथ तथा अपने कुटुम्ब के साथ जनता की आँखों को तृप्त करता हुआ वहाँ रहने लगा ॥१८९-१९०॥

एक बार पिता परित्यागसेन को निषेवन करके इन्दीवरसेन अपने छोटे भाई के साथ पुनः दिग्विजय के लिए चला ॥१९१॥

उम महाबली इन्दीवरसेन ने, देवी के सखड्ग के प्रभाव से सारी पृथ्वी का विजय करके और भाई के साथपुनः राजधानी में आकर अपने पिता और माता अधिकसंगमा को आनन्दित किश ॥१९२-१९३।।

राजधानी में आकर अनुजीवी राजाओं का सम्मान-सत्कार आदि करके अपनी पत्नियों के साथ उसने वह दिन आनन्द से व्यतीत किया ।।१९४॥

एक दिन उस राजपुत्र ने कर के द्वारा सारी पृथ्वी का राज्य पिता को सौंपकर अकस्मात् अपने पूर्व जन्म का स्मरण किया ।।१९५-१९६॥

तब महमा सोकर उठा हुआ वह राजकुमार इन्दीवरमेन अपने पिता से बोला- हे पिता ! मैंने अपने पूर्वजन्म का स्मरण कर लिया है। कहता हूँ, सुने - ॥१९७॥

हिमालय के शिखर पर मुक्ता पुर नाम का एक नगर है। यहाँ पर मुक्तसेन नाम का विद्याधरों का राजा है। कम्बुवती नाम की उसकी रानी के पद्मसेन और रूपसेन नाम के दो गुणवान् पुत्र हुाए। उन दोनों में से पद्मसेन नामक बड़े कुमार को आदित्यप्रभा नाम की विद्याधर-कन्या ने स्वयं वरण कर लिया ।।१९८-२००।।

यह जानकर आदित्यप्रभा की सहेली बन्द्रावती नाम की विद्याधर-कन्या ने भी काम-पीड़ित होकर पद्मसेन को वर लिया ॥२०१।।

इस प्रकार, दो पत्नियोंवाला पद्मसेन सौत से डाह करनेवाली उस आदित्यप्रभा से सदा दुःखित रहने लगा ॥ २०२॥

उस पत्नी के फलह से दुःखी होकर पद्मसेन ने पिता मुक्तसेन से आग्रहपूर्वक कहा कि पिताजी ! में इम कलह की शान्ति के लिए तपोवन में जाता हूँ। इस भीषण कष्ट का सहन नहीं कर सकता। आप आज्ञा दीजिए ॥२०३-२०४।।

पद्मसेन के आग्रह से क्रुद्ध होकर पिता ने मार्यों सहित पुत्र को क्रोष से शाप दिया कि 'तुम तपोवन जाकर क्या करोगे? मत्र्यलोक में जाओ' ॥२०५॥

वहाँ मत्स्यलोक में भी यह कलह‌कारिणी तुम्हारी भार्या आदित्यप्रभा राक्षस-योनि में उत्पन्न होकर तुम्हारी ही पत्नी होगी। यह दूसरी तुम्हारी प्यारी चन्द्रावती भी राक्षसी और राजा की रानी होकर तुम्हें ही पति के रूप में प्राप्त करेगी ।।२०६-२०७।।

तुम्हारा साथ देने की इच्छा करनेवाला यह तुम्हारा भाई रूपसेन भी, मर्त्यलोक में तुम्हारा भाई ही बनेगा ॥२०८॥

मत्र्यलोक में भी दो पत्नियों के होने का कुछ कष्ट भी प्राप्त करेंगे।' ऐसा कहकर और कुछ क्षण रुककर हमारे पिता ने आप का अन्त इस प्रकार किया ।।२०९॥

'तुम राज पुत्र होकर, पृथ्वी को जीनकर जब पिता को पृथ्वी प्रदान करोगे, तब इन सब (पत्नियों और भाई) के साथ पूर्वजन्म का स्मरण करके माप से छूट जाओगे' ॥२१०॥

अपने पिता से इस प्रकार कहा गया प‌द्मसेन, उन पत्नियों और भाई के साथ उसी समय पृथ्वी पर अवतीर्ण हुआ ॥२११॥

अतः, 'हे पिना ! वहपद्ममेन में इन्दीवरमेन नाम से तुम्हारा पुत्र हुआ और जो करना था, किया। यह दूसरा विद्याधर कुमार रूगमेन है। जो यह ऑनच्छासेन के नाम से तुम्हारा दूसरा पुत्र, हुआ, जो मेरा पूर्वजन्म का छोटा भाई ही है। आदित्यप्रभा और बन्द्रावती नामवाली ये दोनों मेरी पत्नियाँ ही यमदंष्ट्रा और मदनदंष्ट्रा है। अब हम सब लोगों ने शाप की अवधि समाप्न हो गई है। अब हम अपने विद्याधर नगर को जाते हैं ।॥२१२-२१५॥

ऐसा कहकर वह इन्दीवरसेन, अपने पूर्वजन्म का स्मरण करती हुई पत्नियों और छोटे भाई के साथ मानव-शरीर को छोड़कर और विद्याधर-शरीर घ.रण कर, माता-पिता के चरणों में प्रणाम करके और दोनों पलियों को गोद में उठाकर छोटे भाई के साथ अपने विद्याधर-स्थान को चला गया ।॥२१६-२१७॥

वहाँ विद्याधर-नगर में पिता मुक्तसेन से अभिनन्दन किया गया माता की आँखों का तारा रूपमेन से युक्त वह पद्मसेन ईर्ष्या-रहित आदित्यप्रभा और चन्द्रावती के साथ सुख से रहने लगा ॥२१८-२१९।।

मार्ग में जाते हुए मन्त्री गोमुख ने नरवाहनदत्त से यह कथा सुनाई और कहा--'इसप्रकार महान् व्यक्तियों को महान् कष्ट प्राप्त होते हैं। दूसरे साधारण व्यक्तियों का तो कितने ही बार उत्थान और पतन होते हैं ।॥ २२०-२२१॥

तुम तो रानी रत्नप्रभा की विद्या-शक्ति से रक्षिन हो, इसलिए राजकुमारी कर्पूरिका को विना कष्ट ही प्राप्त करोगे ॥२२२०।

इस प्रकार, नरवाहनदत्त ने सुमुख गोमुख के मुँह से कया मुनकर रास्ते की थकावट का अनुभव नहीं किया ॥ २२३॥

जाते हुए उसने सायंकाल एक सुन्दर सरोवर को देखा, जो सुन्दर शब्द करते हुए हंसों के स्वर से मुखरित हो रहा था, जिसका जल, अमृत के समान मधुर और तृप्तिकारक था और आम अनार एवं कटहल के वृक्षां से उसके किनारे रमणीय हो रहे थे ॥ २२४॥

उस सरोवर में स्नान करके, भक्ति-भाव में शिव की पूजा करके मुगन्धित मीठे और तृप्तिकारक फलों में आहार करके उस नरवाहनदत्त ने कोमल पत्तों की शस्या पर अपने मित्र के साथ उसके किनारे पर मोकर उस रात को बिताया ॥२२५॥

महाकवि श्रीसोमदेव भट्ट-विरचित कयामरित्मागर के रत्नप्रभालम्बक का अष्टम तरंग समाप्त

1. शरभ –यह पशु (मुग विशेष) आठ फुट लम्बा होता है। आजकल यह नहीं मिलता। अनु०2

2. कर्पूर-संभव – अरेबियन नाइट्स: सिंदबाद जहाजी की कहानी में कपूर के टापू का नाम आया है। अनु०

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