5.107. || सातवीं कहानी || शर्ववर्मा, राजा शिवि और माल्यवान की पूर्वकथा
5.107. || सातवीं कहानी || शर्ववर्मा, राजा शिवि और माल्यवान की पूर्वकथा सप्तम तरंग शर्ववर्मा की कथा ( कातन्त्रकालापक व्याकरण की उत्पत्ति) शर्मा के सफल हो जाने पर प्रतिज्ञानुसार तीनों भाषाओं के छोड़ देने के कारण मौन धारण करके मै राजा के समीप आया। उस समय वहाँ पर किसी ब्राह्मण ने राजा के सामने स्व-रचित श्लोक पढ़ा ॥ १ ॥ राजा ने उस श्लोक को विशुद्ध संस्कृत भाषा में स्वयं अनूदित किया। इस कारण सभा में बैठे हुए सभी सदस्य अत्यन्त प्रसन्न हुए ॥ २॥ तब राजा ने शर्ववर्मा से नम्रता के साथ कहा कि 'स्वामि कार्तिक ने आप पर जो कृपा की है; इसका वृत्तान्त स्वयं अपने मुख से कहिए ॥३॥ राजा की इस कृपा से आप्यायित होकर शर्ववर्मा ने कहा- 'महाराज, मैं उस समय यहाँ से निराहार और मौनी होकर निकल पड़ा ॥४॥ जब स्वामि कार्तिक के मन्दिर का मार्ग कुछ ही शेष रह गया, तब मैं कठोर तप (निराहार ) से दुर्बल होकर थका हुआ अचेतन ( बेहोश ) होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा ॥५॥ तब मुझे अचेतनावस्था मे ऐसा लगा कि हाथ में शक्ति (अस्त्र) लिये हुए कोई पुरुष मुझे कह रहा है — 'पुत्र, उठो, तुम्हारा सब कार्य सफल होगा' || ६ || अमृतव...