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5.104. || चौथी कहानी || उपकोशा व पाणिनि की कथा

5.104. || चौथी कहानी || उपकोशा व पाणिनि की कथा (प्रारंभ) च तुर्थ तरंग  उपकोशा की कथा विन्ध्यारण्य में इस प्रकार वररुचि ने काणभूति को कथा सुनाकर पुनः प्रासंगिक विषय का वर्णन प्रारम्भ किया ॥ १ ॥ इसी क्रम से व्याडि और इन्द्रदत्त के साथ पाटलिपुत्र में रहते हुए बाल्यावस्था के समाप्त होते-होते मैं समस्त विद्याओं का पारगामी पंडित हो गया || २ || एक वार इन्द्रोत्सव देखने के लिए हम लोग, नगर में निकले, तो वहाँ हम लोगो ने एक कन्या देखी ; जो मानों कामदेव के सायक (बाण) - विहीन अस्त्र (धनुष) के समान थी ॥३॥ उसे देखकर मैंने अपने सहपाठी इन्द्रदत्त से पूछा कि 'यह कौन होगी ?' उत्तर में उसने मुझसे कहा कि 'उपवर्ष की कन्या उपकोशा है ॥ ४ ॥ उसने भी अपनी सखियों से मेरा परिचय प्राप्त किया और प्रेमपूर्ण दृष्टि से मेरे मन को खीचती हुई किसी तरह अपने घर को चली गई || ५ || उस उपकोशा का मुख, पूर्णचन्द्र के समान गोल और आकर्षक था। आँखें, नील कमल के समान सुन्दर थी। भुजाएँ, कमलनाल के समान कोमल तथा सुन्दर थी और सुंदर स्तनों से वह अधिक आकर्षक हो रही थी ॥ ६ ॥ उसका गला, शख के समान था, और प्रवाल या मूंगे के समान रक...