5.104. || चौथी कहानी || उपकोशा व पाणिनि की कथा

5.104. || चौथी कहानी || उपकोशा व पाणिनि की कथा (प्रारंभ)

तुर्थ तरंग 
उपकोशा की कथा

विन्ध्यारण्य में इस प्रकार वररुचि ने काणभूति को कथा सुनाकर पुनः प्रासंगिक विषय का वर्णन प्रारम्भ किया ॥ १ ॥

इसी क्रम से व्याडि और इन्द्रदत्त के साथ पाटलिपुत्र में रहते हुए बाल्यावस्था के समाप्त होते-होते मैं समस्त विद्याओं का पारगामी पंडित हो गया || २ ||

एक वार इन्द्रोत्सव देखने के लिए हम लोग, नगर में निकले, तो वहाँ हम लोगो ने एक कन्या देखी ; जो मानों कामदेव के सायक (बाण) - विहीन अस्त्र (धनुष) के समान थी ॥३॥ उसे देखकर मैंने अपने सहपाठी इन्द्रदत्त से पूछा कि 'यह कौन होगी ?' उत्तर में उसने मुझसे कहा कि 'उपवर्ष की कन्या उपकोशा है ॥ ४ ॥

उसने भी अपनी सखियों से मेरा परिचय प्राप्त किया और प्रेमपूर्ण दृष्टि से मेरे मन को खीचती हुई किसी तरह अपने घर को चली गई || ५ || उस उपकोशा का मुख, पूर्णचन्द्र के समान गोल और आकर्षक था। आँखें, नील कमल के समान सुन्दर थी। भुजाएँ, कमलनाल के समान कोमल तथा सुन्दर थी और सुंदर स्तनों से वह अधिक आकर्षक हो रही थी ॥ ६ ॥

उसका गला, शख के समान था, और प्रवाल या मूंगे के समान रक्ताभ ओठों से उसकी शोभा और बढ़ रही थी। इस प्रकार वह मानो काम रूपी महीपति के सौन्दर्य-मन्दिर की दूसरी गृह लक्ष्मी के समान थी ॥७॥

उसके देखने के अनन्तर काम बाण से मेरे हृदय के बिंघ जाने से, अतएव उसके बिम्बाधरों की पिपासा के कारण व्याकुल मुझे उस रात को नीद नही आई ॥८॥

किसी प्रकार रात्रि के व्यतीत होने पर प्रात काल मुझे निद्रा आई। उस समय स्वप्न मे श्वेतवस्त्रधारिणी किसी दिव्य स्त्री ने मुझसे कहा || ९ ||

'उपकोशा, तुम्हारी पूर्वजन्म की पत्नी है। वह तुम्हारे गुणो पर अनुरक्त है और वह दूसरे को पति नहीं बनाना चाहती। इसलिए हे पुत्र ! तुम उसकी चिन्ता न करो ॥ १०॥ मैं तुम्हारे शरीर के अन्दर सदा रहनेवाली सरस्वती हूँ, इसलिए मैं तुम्हारा कष्ट नही देख सकती' । इतना कहकर वह अंतर्हित हो गई ।। ११ ।।

प्रातःकाल जगकर मैं विश्वस्त हो गया और धीरे-धीरे उपकोशा के मकान के समीप आम के छोटे वृक्ष के नीचे जाकर बैठ गया ॥ १२॥

कुछ समय के पश्चात् उपकोशा की सखी ने आकर उसकी गम्भीर काम-पीड़ा की शुभ सूचना दी ॥ १३ ॥

उसकी अवस्था को जानकर, दूना सन्तप्त होकर मैंने उसकी सखी से कहा — गुरुजनों के दान के बिना मैं उपकोशा को स्वच्छन्दतापूर्वक कैसे ग्रहण कर सकता हूँ ?' ||१४||

"निन्दा होने की अपेक्षा मर जाना श्रेष्ठ है।' इसलिए उपकोशा के माता-पिता तुम्हारी सखी के मनोभाव को यदि समझ लें, तो कल्याण हो सकता है ॥ १५ ॥ इसलिए तुम ऐसा करके अपनी सखी और मुझे दोनों को जिलाओ, तुम्हारा कल्याण हो ।" यह सुनकर वह घर गई और उपकोशा की माता से सारा वृत्तान्त कह सुनाया ।। १६ ।। उपकोशा की माता ने यह सब वृत्तान्त अपने पति उपवर्ष से कहा। उपवर्ष ने अपने बड़े भाई वर्ष से कहा और वर्ष ने उसका अनुमोदन किया ॥ १७॥

इस प्रकार, विवाह का निश्चय हो जाने पर आचार्य वर्ष की आज्ञा से व्याडि, कौशाम्बी से मेरी माता को लिवा लाया ।। १८ ।। तदनन्तर उसके पिता उपवर्ष ने, विवाह-तिथि पर विधिपूर्वक उपकोशा मुझे प्रदान कर दी और मैं भी माता तथा पत्नी के साथ पाटलिपुत्र में सुखपूर्वक रहने लगा ।। १९ ।।

पाणिनि को कथा'

कुछ समय के अनन्तर उपाध्याय वर्ष के शिष्यों की सख्या बढी । उसमें पाणिनि नाम का एक शिष्य अत्यन्त जडबुद्धि था ॥ २० ॥ उसे गुरुगृह में सेवा करते हुए अत्यन्त क्लेष-युक्त और खिन्न देखकर गुरु-पत्नी ने विद्या प्राप्ति की कामना से तपस्या करने के लिए हिमालय जाने को कहा और वह चला गया ॥ २१ ॥

तब वहाँ उसने अपनी कठोर तपस्या से प्रसन्न हुए शिवजी से सब विद्याओं के मुखस्वरूप नवीन व्याकरण को प्राप्त किया ॥ २२ ॥ हिमालय से लौटने पर पाणिनि ने मुझे शास्त्र-विचार के लिए ललकारा। फलतः, हम लोगों का शास्त्रार्थं प्रारम्भ हुआ और सात दिन व्यतीत हो गये ।। २३ । आठवे दिन मेरे द्वारा शास्त्रार्थ में पाणिनि को जीत लेने पर आकाश से शिवजी ने भयकर हुकार किया ||२४|| इस विवाद में हमारा पढ़ा हुआ ऐन्द्र व्याकरण पृथ्वी से नष्ट हो गया। तब पाणिनि ने हम लोगों को जीत लिया और हम सब फिर मूर्ख हो गये ।। २५ ।।

इस शास्त्र-विचार में पाणिनि से पराजित होने के कारण मुझे अत्यन्त वैराग्य उत्पन्न हुआ और घर का खर्च चलाने के लिए कुछ धन, हिरण्यगुप्त को देकर और यह बात उपकोशा को बता- कर तपस्या से शंकरजी को प्रसन्न करने के लिए में निराहार होकर हिमालय को चला गया ।।२६-२७।।

उपकोशा की कथा (प्रारंभ)

मेरे तपस्या के लिए चले जाने पर मेरी कल्याण-कामना करती हुई उपकोशा भी नियमित व्रत लेकर प्रतिदिन गंगा स्नान करती थी ॥ २८ ॥

एक बार मेरे विरह में दुर्बल, पीली, अतएव मनोहर और प्रतिपदा के चन्द्र के समान जन-लोचनों के लिए आकर्षक उपकोशा, वसन्त-समय में, गंगा स्नान के लिए जा रही थी। मार्ग मे उस नयन - मधुर आकृति को राजपुरोहित, नगरपाल तथा युवराज के मन्त्री ने देखा ।। २९-३०।। उसे देखकर वे तीनों काम बाण के लक्ष्य बन गये। उनकी अवस्था को समझकर उपकोशा ने भी स्नान करने में जान-बूझकर विलम्ब किया ।। ३१ ।।

सायंकाल या स्नान से लौटकर आती हुई उपकोशा को कुमारमचिव ने बलपूर्वक रोका, किन्तु प्रतिभावती उपकोशा ने उससे कहा ।। ३२ ।।

'भले आदमी ! यह ठीक है। जो तुम चाहते हो वही मैं भी चाहती हूँ । किन्तु में उच्च कूल मे उत्पन्न हुई हूँ और प्रोषितभर्तृका हूँ ॥३३॥ अत इस प्रकार का कार्य ही क्यों किया जाय। यदि कदाचित् कोई देख ले, तो तुम्हारे साथ मेरा भी कल्याण नही होगा ||३४||

इसलिए वसन्तोत्सव की धूमधाम में नागरिकों के व्यस्त रहने पर तुम रात के पहले पहर मेरे घर पर आओ' ।। ३५ ।। ऐसा कहकर उससे प्रतिज्ञा करके उपकोशा उससे छूटकर जब कुछ आगे बढ़ी तब दैवयोग से उसे पुरोहित ने आ घेरा ।। ३६ ।। उपकोशा ने उससे भी उसी दिन उसी प्रकार रात के तीसरे पहर आने का निश्चय किया ||३७|| 

पुरोहित से किसी प्रकार छूटकर वह विह्वल उपकोशा ऐसे ही कुछ दूर गई थी कि नगर-शासक (शहर कोतवाल) ने भी उसी प्रकार उसे रोका ।। ३८ ।। इसके बाद उपकोशा ने उसे भी, उसी प्रकार उसी दिन, उसी रात के दूसरे पहर में, घर पर आने का सकेत किया ।। ३९ ।।

विधिवत् उससे भी छूटी हुई उपकोशा कांपती हुई अपने घर पहुंची और अपनी दातियों को बुलाकर स्वतन्त्रतापूर्वक कर्तव्य-निर्धारण करते हुए बोली ॥४०॥ 'पति के प्रवास मे रहने पर कुलस्त्री का मर जाना अच्छा है; किन्तु रूप पर मरनेवालों की आँखों पर चढ़ना अच्छा नहीं ||४१ ॥

इस प्रकार सोचती हुई तथा मुझे स्मरण करती हुई उस पतिव्रता उपकोशा ने निराहार रहकर उस रात्रि को व्यतीत किया ॥४२॥

सबेरे उठकर उसने ब्राह्मणों को भोजन कराने तथा उनकी पूजा करने के लिए कुछ धन लाने के लिए हिरण्यगुप्त बनिये के पास दासी को भेजा ॥ ४३ ॥ वह बनिया भी एकान्त में आकर उससे ( उपकोशा से) बोला कि 'यदि तुम मेरी सेवा करो, तो मैं तुम्हारे पति का रखा हुआ धन तुम्हे दे दूंगा' ।। ४४ ।।

ऐसा सुनकर और पति के रखे हुए धन मे किसी की पक्की साक्षी न होने के कारण उपकोशा दुःख और क्रोध से अधीर हो गई और उसने बनिये को भी उसी दिन उसी रात के चतुर्थ प्रहर में, आने का निमन्त्रण दिया, जिसे सुनकर प्रसन्न बनिया चला गया ।।४५-४६।।

तब उसने तेल मिलाकर कुँडी में रखा हुआ बहुत-सा अलकतरा सखियों (दासियों) से मंगाया और उसमे कस्तूरी आदि अनेक सुगन्त्रित द्रव्य मिलाये ॥ ४७॥

उस कोलतार से सने हुए उसने चार छोटे-छोटे कपड़े के टुकडे ( कमर में लपेटने के लिए) तैयार कराये और एक बड़ा भारी सन्दूक बनवाया, जिसमें बाहर से बन्द करने की अर्गला ( कुण्डी) लगी हुई थी ॥ ४८ ॥

कुछ समय के अनन्तर उस वसन्तोत्सव के दिन रात के पहले प्रहर के समय कुमारसचिव, सुन्दर वेष धारण किये हुए सजधज के साथ आया ।। ४९ ।।

चुपचाप घर मे आये हुए उम कुमारमचिव से उपकोशा ने कहा- 'बिना स्नान किये तुम्हारा स्पर्श न करूँगी ?' अत पहले अन्दर जाकर स्नान करो ॥ ५०॥ उस मूर्ख ने स्नान करना स्वीकार किया, तो उसे दासियों ने अन्धकारमय स्नानागार मे मैं प्रवेश करा दिया ॥५१॥

उसे अन्दर ले जाकर दासियों ने उसके गहने, कपड़े उतार लिये और कमर मे लपेटने के लिए (काजल से सना ) कपड़े का एक टुकडा दे दिया ।। ५२ ।।

घने अन्धकार मे कुछ न देखते हुए उस पापी के मालिश करने के बहाने सिर से पैर तक के सभी अंगों को उन सखियों (दासियों) ने तेल मिले हुए उस अलकतरे से काला कर दिया ।। ५३ ।।

दासियाँ जबतक उसके एक-एक अंग को काजल से मल रही थी, तबतक दूसरे पहर में पुरोहित आ गया ॥ ५४ ॥

तब दासियों ने कहा अरे! वररुचि का मित्र राजपुरोहित आ गया। अतः, तुम ऐसे ही जाकर इस सन्दूक में छिप जाओ। इस प्रकार उन्होंने, घबराहट के साथ उस नंगे कुमारसचिव को, उस सन्दूक में घुसाकर बाहर से अर्गला अर्थात कुंडी लगाकर बन्द कर दिया ।। ५५-५६।।

दासियाँ, पुरोहित को भी स्नान कराने के बहाने अँधेरे स्नानागार मे ले गई और उसके कपड़े उतार कर तेल मिले हुए काजल से उसकी भी मालिश करने लगी। इस प्रकार, एक कपड़े का टुकड़ा लपेटा हुआ वह पुरोहित भी दासियों द्वारा मुर्ख बनाया गया। इतने में तीसरे पहर कोतवाल भी आ गया ।।५७-५८।।

उसके आते ही दासियों ने घबराकर उन पुरोहित को भी पहलेवाले सन्दूक में बन्द कर दिया ।। ५९ ।। पुरोहित के सन्दूक को अर्गला से बन्द कर देने के पश्चात् दासियों ने कोतवाल को भी स्नान के बहाने स्नानागार में ले जाकर उसी प्रकार काजल की मालिश की || ६०॥ 

पहले, दोनों के समान उन दासियों द्वारा यह कोतवाल भी एक कपड़े का टुकड़ा पहनाकर मूर्ख बनाया गया। इतने में रात्रि के अन्तिम पहर में वह हिरण्यगुप्त नामक बनियाँ आ पहुँचा ॥ ६१ ॥

कोतवाल को, वह देख लेगा, इस प्रकार का भय दिखाकर दासियों ने उसे भी उसी सन्दूक में बन्द करके बाहर से अर्गला चढ़ा दी ॥ ६२ ॥

उस एक ही सन्दूक में, वे तीनों, मानों अन्धतामिस्र नरक में वास करने का अभ्यास करते हुए-से, परस्पर अगस्पर्श होते हुए भी बोलते न थे ॥ ६३ ॥

उपकोशा ने दिया जलाकर और उस बनिये को स्नानागार में ले जाकर कहा कि मेरे पति का दिया हुआ धन मुझे लौटा दो ।। ६४ ।।

उपकोशा की बाते सुनकर और एकान्त घर को देखकर वह घृतं बनिया बोला- 'मैंने कह दिया कि तुम्हारे पति का रखा हुआ धन में अवश्य दे दूंगा' ।। ६५ ।। उपकोशा ने बन्द सन्दूक को सुनाते हुए कहा - 'हे देवताओ । हिरण्यगुप्त का वचन सुनो ।। ६६ ।।

ऐसा कहकर उपकोशा ने दिया बुझा दिया और दासियों ने को भी अन्य तीनों उस बनिये के समान, स्नान के बहाने मे अलकतरे का लेप किया ॥६७॥

मर्दन में विलम्ब के कारण प्रातःकाल होते ही दासियों ने उससे कहा कि 'अब जाओ, रात समाप्त हो गई। जब उसने जाने में आनाकानी की तो दासियों ने गलहस्त ( गर्दनिया) देकर उसे घर से बाहर निकाल दिया ।।६८||

एक फटा चिथड़ा लपेटे हुए घर से निकाले जाने पर काजल से पुता हुआ, अतएव कुत्तों से काटा जाता हुआ बनिया, अत्यन्त लज्जा के साथ अपने घर पहुँचा ॥६९॥ 

घर जाकर जब उसके सेवक, उसके शरीर की कालिमा छुड़ाने लगे, तब तो वह उनके सामने भी मुँह न कर सका। सच है, बुरी बातों का परिणाम बुरा ही होता है ॥७०॥

इसके उपरान्त प्रातः काल दासी को साथ लेकर उपकोशा भी अपने माता-पिता की आज्ञा के बिना ही राजा नन्द के भवन को चली गई ॥ ७१ ॥ राजभवन में जाकर उसने राजा से स्वयं निवेदन किया कि हिरण्यगुप्त नामक बनिया,  मेरे पति द्वारा उसके पास रखे हुए धन को हड़प लेना चाहता है ॥ ७२ ॥

राजा ने इस बात को जानने के लिए, बनिये को वहीं बुलवाया, तो बनिये ने राजा से कहा - 'महाराज ! मेरे पास इसका कुछ भी नहीं है ॥७३॥ तब उपकोशा ने कहा- 'महाराज ! इतके साक्षी मेरे गृह के देवता हैं, जिन्हें मेरे पति सन्दूक में बन्द कर गये हैं ॥ ७४ ॥

इस बनिये ने उन देवताओं के आगे अपने मुँह से धन स्वीकार किया है। आप उस सन्दूक को मंगाकर उन देवताओं से पूछिए ॥७५॥ ऐसा सुनकर राजा को आश्चर्य हुआ और उसने सन्दूक लाने की आज्ञा दी और कुछ ही समय में बहुत व्यक्ति मिलकर उस सन्दूक को राजा के सामने ले आये ||७६ ||

सन्दूक आ जाने पर उपकोशा ने कहा - 'हे देवताओ! सच बोलो। जो इस बनिये ने कहा है-बताओ और फिर घर को जाओ ॥७७॥

'यदि तुम न बोलोगे, तो तुम्हे सन्दूक के साथ ही जला दूंगी या राजसभा में सन्दूक खोल- कर तुम्हारा प्रदर्शन करूंगी।' यह सुनकर सन्दूक के अन्दर से वे लोग भयभीत होकर बोले ॥७८॥

'सच है, इसने हम लोगो के सामने धन स्वीकार किया है।' तब बनिये ने निरुत्तर होकर उसका धन स्वीकार किया ।। ७९ ।।

इसके अनन्तर अत्यन्त कुतूहलवश राजा के स-आग्रह प्रार्थना करने पर उपकोशा ने, अर्गला तोड़कर उस सभा में सन्दूक खोल दिया ||८०|

सन्दूक खोलने पर अन्धकार के पिंड के समान वे तीनों पुरुष, उसमें से निकले, तो बड़ी कठिनता के साथ उन्हें राजा और मन्त्रियों ने पहचाना ॥ ८१ ॥

उन्हें देख सभी सभासदों के हँसने पर राजा ने आश्चर्य के साथ उपकोशा से पूछा कि 'यह क्या है ?' तब उपकोशा ने सारा वृत्तान्त सभा मे सुना दिया ॥८२ 'चरित्र की रक्षा करनेवाली कुलीन स्त्रियों के चरित्र अचिन्तनीय होते है।' इस प्रकार सभी सभासद, उपकोशा के चरित्र की प्रशंसा करने लगे ॥ ८३ ॥

राजा ने समस्त वृत्तान्त सुनकर परदाराभिगामी उन तीनों की सम्पत्ति का हरण करके उन्हें देश से निकाल दिया। सच है, दुश्चरित्र किसके लिए कल्याणकारक होता है || ८४||

'तू मेरी बहिन हैं' — ऐसा कहकर तथा प्रसन्नता के साथ बहुत-सा धन देकर राजा ने उपकोशा को वापस भेज दिया। वह अपने घर आ गई ॥ ८५ ॥

वर्ष और उपवर्ष भी इस समाचार को जानकर उस पतिव्रता स्त्री का अभिनन्दन करने लगे और सभी नगर निवासी इस समाचार से आश्चर्यचकित हो, मुस्कराने लगे ॥ ८६ ॥

इसी बीच मैंने हिमालय में कठोर तपस्या करके वरदानी महादेव की आराधना की ॥८७॥

वरदचि का प्रत्यागमन

शिवजी ने मुझे उसी पाणिनीय शास्त्र (व्याकरण) का प्रकाश दिया और उन्हीं की कृपा से मैंने (वात्तिक बनाकर ) उसे पूर्ण किया ॥ ८८।। तब मैं चन्द्रमौलीश्वर (महादेव) के कृपा-रूपी अमृत से तृप्त होकर मार्ग के श्रम को कुछ भी न समझते हुए अनायास ही घर चला आया ॥ ८९ ॥ घर आकर माता और गुरुजनों का चरणस्पर्श करके मैंने उपकोशा के अत्यन्त अद्भुत वृत्तान्त को सुना ॥ ९०॥ 

इस समाचार से मेरे आश्चर्य और आनन्द की सीमा न रही और उपकोशा के प्रति स्वाभाविक स्नेह और सम्मान की भावना भी असीम हो गई ।। ९१ ॥

उपाध्याय वर्ष ने, मेरे मुख से इस नवीन व्याकरण को सुनने की इच्छा प्रकट की; किन्तु स्वामिकुमार ने उपाध्याय के हृदय में उसे स्वयं ही प्रकाशित कर दिया ।। ९२ ॥ तब व्याडि और इन्द्रदत्त ने गुरु, वर्ष से गुरु-दक्षिणा के लिए प्रार्थना की। उत्तर में गुरु वर्ष ने कहा कि एक करोड़ स्वर्ण मुद्रा मुझे दो ॥९३॥

गुरु वर्ष की आज्ञा को स्वीकार कर व्याडि और इन्द्रदत्त दोनों ने मुझसे कहा - 'आओ मित्र ! राजा नन्द से गुरु-दक्षिणा माँगने के लिए चले ।। ९४ ।

अन्य किसी से इतना सुवर्ण नही प्राप्त हो सकता; क्योंकि राजा नन्द इस समय निन्यानब्बे करोड़ स्वर्ण मुद्राओं का स्वामी है ।। ९५ ।।

उसने कुछ समय पहले ( तुम्हारी धर्मपत्नी ) उपकोशा को धर्म की बहिन भी माना है। अतः वह तुम्हारा साला होता है। इस नाते भी तुम्हारे चलने पर धन मिल सकता है ॥९६॥ ऐसा निश्चय करके हम तीनों सहपाठी, अयोध्या में लगे हुए नन्द के शिविर में गये ।। ९७ ।। 

हम लोगों के वहाँ पहुँचते ही राजा नन्द का देहान्त हो गया और हमारे दुःख के साथ सारे राष्ट्र में कोलाहल मच गया ।। ९८ ।। इसी समय योग की सिद्धियों को जाननेवाला इन्द्रदत्त बोला- 'मैं इस मृत राजा के शरीर में ( पर काय प्रवेश' - विद्या द्वारा) प्रवेश करता हूँ ।। ९९ ॥ 

वररुचि अर्थी बने, मैं इसे धन दूंगा और मेरे पुनः लौटने तक व्याडि मेरे वास्तविक शरीर की रक्षा करे ॥१००॥

ऐसा कहकर इन्द्रदत्त, अपनी विद्या के प्रभाव से राजा नन्द के शव में प्रविष्ट हो गया। इस प्रकार राजा के पुनर्जीवित होने पर सारे राष्ट्र में उत्सव मनाया गया ॥ १०१ ॥ एकान्त देव मन्दिर में, इन्द्रदत्त के शरीर की रक्षा के लिए व्याडि बैठ गया और मैं राजा के समीप गया ॥ १०२ ॥

राजभवन में जाकर राजा को आशीर्वाद देकर मैंने उस योगनन्द से गुरुदक्षिणा के लिए एक करोड़ स्वर्ण- मुद्रा की याचना की ।। १०३ ॥ तब योगनन्द ने शकटाल नामक पूर्वनन्द के मन्त्री को आज्ञा दी कि 'तुम इसे एक करोड़ की स्वर्ण मुद्रा दिला दो' ।। १०४ ।।

मृत राजा का तुरन्त जीवित हो उठना और उसी समय याचक का उपस्थित हो जाना देखकर वह मंत्री सच्ची बात को ताड़ गया। सच है, बुद्धिमानों के लिए कौन-सी बात अज्ञेय है ।। १०५ ॥

'राजन् ! देता हूँ' ऐसा कहकर उस मन्त्री ने यह सोचा कि नन्द का लड़का अभी बालक है और राज्य के शत्रु भी बहुत हैं। अतः इस (नकली ) राजा के शरीर की अभी रक्षा करनी चाहिए। ( कही कार्य होने पर यह भाग न जाय ) यह निश्चय करके उसने तत्काल राज्य के सभी मुर्दों को जलवा दिया ।। १०६-१०७ ।।

राज्य के गुप्तचरों ने ढूंढ-ढूंढकर मुर्दों को जलाना शुरू किया। इसी प्रसंग मे देवालय में पड़े हुए इन्द्रदत्त के शव को भी व्याडि से छीनकर हठात् जला दिया गया ।। १०८ ।।

इस बीच राजा को स्वर्ण देने में शीघ्रता करते हुए देख कर चतुर शकटाल बोला ||१०९॥

महाराज ! सारे राज-कर्मचारी उत्सव के कार्यों में व्यस्त हैं। इसलिए यह ब्राह्मण क्षण- भर प्रतीक्षा करे। तबतक मैं अभी देता हूँ ।। ११० ।

इसी अवसर पर व्याडि ने आकर राजा के सामने रोना प्रारम्भ किया कि आपके इस शुभ उदयकाल में अत्यन्त पाप हो गया। प्राणों के शेष रहने पर भी योग-समाधि में स्थित ब्राह्मण के शव को - अनाथ शव कहकर —तुम्हारे नौकरों ने जला डाला। यह सुनकर शोक के कारण योगनन्द' को कुछ अद्भुत एवं विचित्र-सी दशा हो गई ।। १११-११२ ॥

शरीर के दग्ध हो जाने पर नन्द के शरीर में इन्द्रदत्त की आत्मा को स्थिर समझकर महाबुद्धिमान् शकटाल ने उठकर मुझे एक करोड़ स्वर्ण मुद्राएँ प्रदान कीं ॥ ११३ ॥ इसके अनन्तर वह योगनन्द, एकान्त मे, खेद के साथ व्याडि से बोला- अब में ब्राह्मण होकर भी शूद्र हो गया । इसलिए मुझे इस स्थिर राज्यलक्ष्मी से भी क्या लाभ ।। ११४ ॥

यह सुनकर व्याडि ने राजा को कालोचित आश्वासन देते हुए कहा- 'तुम्हारा रहस्य शकटाल को मालूम हो गया है। इसलिए अब पहले इसकी चिन्ता करो ।। ११५ ।। यह महामन्त्री है। अपनी इच्छा से शीघ्र ही यह तुम्हारा नाश करके पूर्वनन्द के पुत्र चन्द्रगुप्त को राजा बनायेगा ।। ११६ ।। 

इसलिए तुम वररुचि को अपना प्रधान मन्त्री बनाओ, उसकी दिव्य और प्रतिभाशाली बुद्धि से तुम्हारा राज्य स्थिर रहेगा ।। ११७ ।।

ऐसा कहकर व्याडि गुरू-दक्षिणा देने के लिए चला गया और योगनन्द ने मुझे बुलाकर मन्त्रिपद समर्पित किया ।। ११८ ।।

मन्त्रिपद ग्रहण कर लेने पर मैंने राजा से कहा कि 'तुम्हारा ब्राह्मणत्व तो गया। परन्तु उसके जाने पर भी जबतक शकटाल मन्त्री है, तबतक राज्य भी स्थिर नहीं रह सकता ॥ ११९ ॥ इसलिए नीति के साथ इसका नाश करो। इस प्रकार मेरी सम्मति से योगनन्द ने शकटाल को अँधेरे कुएं में डाल दिया ।। १२० ।।

शकटाल के साथ राजा ने उसके सौ पुत्रों को भी उसी अँधेरे कुएं में डलवा दिया। उसका अपराध यह घोषित किया गया कि उसने जीवित ब्राह्मण को जलवा दिया था ॥ १२१ ॥

मिट्टी के एक पात्रविशेष में सत्तू और ऐसे ही एक पात्र में पानी शकटाल और उसके पुत्रों के लिए कुएं में रख दिया जाता था ।। १२२ ।। शकटाल ने लड़कों से कहा कि 'इस सत्तू और पानी से एक का भी जीवन कठिन है, बहुतों की तो बात ही क्या ? ।। १२३ ।।

इसलिए जल के सहित इस मत्तू को वही प्रतिदिन खाया करे, जो योगनन्द से बदला लेने की शक्ति रखता हो ।। १२४ ।।

लड़कों ने शकटाल से कहा कि 'राजा से बदला लेने के लिए आप ही समर्थ हैं। अतः, आप ही इसे खाया करें। सच है, महान् लोगों के लिए शत्रु से बदला लेना प्राणों से भी प्यारा होता है ।। १२५ ।।

यह निर्णय होने पर वह अकेला शकटाल ही उस सत्तू और पानी से जीवन निर्वाह करने लगा। सच है, शत्रु से बदला लेनेवाले अत्यन्त क्रूर प्रकृति के होते हैं ।। १२६ ॥

अपने कल्याण की कामना करनेवाले या उन्नतिशील व्यक्ति को चाहिए कि अपने मालिक को चित्तवृत्ति को बिना समझे और बिना उसका विश्वास प्राप्त किये उसके साथ व्यवहार न करे ।। १२७ ।।

भूख से प्राण त्यागते हुए बच्चों की पीड़ा देखकर अन्ध-कूप में पड़ा शकटाल इस प्रकार पश्चात्ताप करने लगा ।। १२८ ।।

उसके देखते-देखते ही उसके सौ-के-सौ पुत्र मर गये। उनके कंकालों से घिरा हुआ एकमात्र शकटाल ही जीवित रह गया ॥ १२९ ॥ इतने मे योगनन्द भी धीरे-धीरे साम्राज्य में स्थिर हो गया, तो व्याडि गुरु-दक्षिणा देकर उसके पास आया ॥ १३० ॥

व्याडि ने आते ही योगानन्द से कहा- 'मित्र ! मेरी बताई नीति के अनुसार तुम चिरकाल तक राज्यभोग करो। मैं अब कही तपस्या करने जाता हूँ' ।। १३१ ॥ व्याडि की बातें सुनकर गद्गद कंठ से राजा ने कहा—'तुम मेरे राज्य में रहकर सांसारिक भोगों को भोगी। मुझे छोड़कर न जाओ ।। १३२ ॥

तब व्याडि ने कहा- 'हे राजन् ! यह शरीर क्षण-भर में नष्ट हो जानेवाला है। अतः कौन बुद्धिमान् इस अनित्य सुख-भोगों में डूबता है ।। १३३ ॥ लक्ष्मी की मृगतृष्णा, किस धीर पुरुष को मोहित नहीं कर लेती ? ऐसा कहकर तपस्या के लिए निश्चय किए हुये वह व्याडि, उसी समय चला गया ॥ १३४ ॥ वररुचि कहता गया हे काणभूते ! इसके अनन्तर योगनन्द, अयोध्या-शिविर से, समस्त सेना के सहित मेरे साथ चलकर प्रधान राजधानी पाटलिपुत्र में राज-भोग करने के लिए आ गया ।। १३५ ॥

इस प्रकार, पाटलिपुत्र में आकर उपकोशा द्वारा मेरी सेवा होती रही। और साथ ही राजा नन्द के मन्त्रित्व भार को वहन करता हुआ मैं माता और गुरुजनों के साथ समृद्धि का उपभोग करने लगा ॥ १३६॥

पाटलिपुत्र में तपस्या से प्रसन्न होकर गंगाजी, मुझे प्रतिदिन बहुत-सा सुवर्ण देती थीं और साक्षात् शरीरधारिणी सरस्वती मेरे कार्यों मे सर्वदा स्वयं सम्मति देती रहती थीं ॥ १३७॥

महाकवि सोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के कथापीठ लम्बक का चतुर्थ तरंग समाप्त |










१. इसमें वर्णित पाणिनि की कथा ऐतिहासिक भय और प्रमाणिक नहीं मानी जा सकती। पाणिनि और वरदचि के समय में पर्याप्त अन्तर है। परिशिष्ट प्रकरण में 'पाणिनि' बेखिए ।

२. इस कथा से मिलती-जुलती कहानी, वर्टन के अरेबियन नाइट्स में एक मिली स्त्री और उसके चार पारों की कहानी में है। अंगरेजी के उपन्यासों में भी परियों की कहानी में ऐसा प्रसंग मिलता है।

३. योग के द्वारा परकाय-प्रवेश किया जाता था। इसका रहस्य अगले खण्ड में मय मानव के द्वारा प्रकट किया गया है। अनु०

४. योग के द्वारा पुनः जीवित होने के कारण इसका नाम योगनन्द पढ़ा था। असली नन्द का नाम सत्यनन्य या पूर्वनन्य था। इस विषय में विस्तृत विवेचन परिशिष्ट में किया गया है।

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