17. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 17 || *वाह रे बाबा तेरी पुंजी।* (एक लघु कथा संस्मरण)
17. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 17 || *वाह रे बाबा तेरी पुंजी।* (एक लघु कथा संस्मरण) परिक्रमा मार्ग पर अचानक तेज बारिश होने लगी। मैंने बारिश से बचने के लिए आसपास देखा तो बरसते आसमान और टपकते वृक्षों के सिवा ऐसा कोई स्थान नहीं मिला जहाँ मैं खुद को भीगने से बचा सकूँ। तभी मेरी नजर संत की एक सचल-कुटिया या चल-घर पर गई। यह चल-घर क्या है ? तो हम आपको बता दें कि आपने परिक्रमा मार्ग पर अधिकतर देखा होगा कि कुछ संतों ने अपने रहने के लिए लोहे की चादर से कुटिया या घर बनवा रखा होते हैं। जिसके नीचे पहिये भी लगें होते हैं। पहियों पर चलने के कारण ही इन्हें चल-घर नाम दिया गया है। बस ऐसी ही एक सचल-कुटिया या चल-घर के आगें तिरपाल लगी थी। मैं भीगने से बचने के लिए उसी के नीचे जाकर खड़ा हो गया। मेरी नजर कुटिया में विराजमान संत पर गई। वे ठाकुर जी के लिए प्रशाद आदि की व्यवस्था के लिए आटा गूंथ रहे थे। मैंने देखा की एक छोटे से स्थान पर एक सिंहसन रखा है। उसी के पास ₹10, ₹20, ₹50 और ₹100 के नोटों से भरी एक थाली तथा एक प्लेट में कुछ फल फ्रूट और मिठाइयां रखी थीं। उनकी नजर मुझ पर पडी तो मैंने उन्हें र...