Posts

Showing posts from March, 2026

5702. || द्वितीय कहानी || रत्नप्रना की कथा; राजा रत्नाविप की कथा; श्वेतरश्मि हाथी के पूर्वजन्म की कथा

5702. || द्वितीय कहानी || रत्नप्रना की कथा; राजा रत्नाविप की कथा; श्वेतरश्मि हाथी के पूर्वजन्म की कथा द्वितीय तरंग रत्नप्रना की कथा (क्रमश:) इस प्रकार, विद्याधर-जाति की रलप्रभा नामक नई पत्नी को प्राप्त करके आनन्द का उपभोग करते हुए नरवाहनदत्त से मिलने के लिए उसके गोमुख आदि मित्र एक दिन प्रातः काल आये और रनिवास के द्वार पर खड़े हुए ॥१-२॥ द्वारपालिका के द्वारा कुछ समय तक रोके जाकर और फिर सूचना देकर भीतर प्रवेश पाने पर नरवाहनदत्त द्वारा उनका स्वागत-सत्कार किया गया। उसके बाद रत्नप्रभा ने द्वार-पालिका से कहा-'तुम अब इन लोगों को द्वार पर रोका न करते, ये आर्यपूत्र के मित्र और हमारे ही अंग हैं ।॥३-४॥ रनिवास पर ऐसी रोक-टोक न होनी चाहिए ऐसा मेरा विचार है।' द्वारपालिका को ऐसा कहकर उसने अपने पति से कहा- 'आर्यपुत्र इस प्रसंग में मैं कहती हूँ, सुनो ! स्त्रियों की रक्षा और नियन्त्रण को मैं केवल नीति समझती हूँ या ईर्ष्या अथवा अज्ञानमात्र उससे कोई कार्य सिद्ध नहीं होता। स्त्रियाँ तो सबसे बड़े रक्षक अपने सच्चरित्र से ही रक्षित होती हैं। चंचला स्त्रियों के रक्षा के लिए तो ब्रह्मा भी समर्थ नहीं...

5701. || प्रथम कहानी || रलप्रभा की कथा; रत्नप्रभा का स्वकथित वृत्तान्त; राजा सस्वशील को कथा; विक्रमतुंग राजा की कथा

5701. || प्रथम कहानी || रलप्रभा की कथा; रत्नप्रभा का स्वकथित वृत्तान्त; राजा सस्वशील को कथा; विक्रमतुंग राजा की कथा रत्नप्रभा नाम सप्तमो क्षम्बकः इदं गुरुगिरीन्द्रजाप्रणयमन्दरान्दोलना-त्पुरा किल कथामृतं हरमुखाम्बुघेरुद्गतम् । प्रसह्य रसयन्ति ये विगतविघ्नलब्धर्द्धयो घुरं दघति वैबुधीं भुवि भवप्रसादेन ते ।। रत्नप्रभा नामक सप्तम लम्बक नगेन्द्र-नन्दिनी पार्वती के प्रबल प्रणय-मन्दराचल के मन्थन द्वारा शिवजी के मुख रूपी समुद्र से निकले हुए इस कथा-रूपी अमृत का जो लोग आदर और आग्रहपूर्वक पान करते हैं, वे शिवजी की कृपा से निविघ्न सिद्धियों को प्राप्त कर, दिव्य पद लाभ करते हैं। प्रथम तरंग मंगलाचरण शिव और पार्वती की प्रेम-क्रीडा के समय शिव का केश ग्रहण करते हुए पार्वती के हाथों के नलों में प्रतिविम्बित अनेक चन्द्रमाओं से युक्त उनका (शिव का) मस्तक आपका कल्याण करे ।।१।।¹ मदजल से गीली और सिकुड़ी हुई सूंड़ को फैलाकर मानों सिद्धि प्रदान करते हुए गण-पति आपकी रक्षा करें ॥२॥ रलप्रभा की कथा पूर्वोक्त प्रकार से प्राणप्यारी मदनमंबुका के साथ धूमधाम से विवाह करके सफलमनोरथ युवराज नरवाहह्नदत गोमुत्र आदि मन्त्रियों...

5608. || अष्टम कहानी || वत्सराज की कथा; पतिव्रता वैश्यपत्नी की कथा; मदनमञ्चुका के जन्म की कथा; नरवाहनदत्त और मदनमंचुका का बाल्य-विलास; नरवाहनदत्त का यौवराज्याभिषेक; शत्रुघ्न और उसकी दुष्टा स्त्री की कथा; राजनीति का सार

5608. || अष्टम कहानी || वत्सराज की कथा; पतिव्रता वैश्यपत्नी की कथा; मदनमञ्चुका के जन्म की कथा; नरवाहनदत्त और मदनमंचुका का बाल्य-विलास; नरवाहनदत्त का यौवराज्याभिषेक; शत्रुघ्न और उसकी दुष्टा स्त्री की कथा; राजनीति का सार अष्टम तरंग वत्सराज की कथा (अनुक्रमशः) एक बार रात के समय वत्सराज उदयन, कलिंगसेना के अनुपम सौन्दर्य का स्मरण करके कामावेश से क्षुब्ध (उत्तेजित) हो गया ।।१।। और उठकर हाथ में नंगी तलवार लिये अकेले ही उसके भवन में गया। कलिंगसेना ने आदर-सत्कार के साथ उसका स्वागत किया ॥२॥ तब राजा ने उससे पत्नी बनने की प्रार्थना की। उत्तर में कलिंगसेना ने कहा- 'अब मैं दूसरे की पत्नी हो गई हैं'- ऐसा कहकर उसे रोक दिया ॥३॥ 'तू तीसरे पुरुष के पास चली गई, इसलिए व्यभिचारिणी हो गई। अत. तेरा समागम करने में कोई दोष नहीं', वत्सराज ने कहा ।।४।। राजा के इस प्रकार कहने पर कलिंगसेना ने कहा- 'हे राजन् ! मैं तुम्हारे लिए यहाँ आ गई, किन्तु तुम्हारा रूप धारण करनेवाले मदनवेग नामक विद्याधर ने गुप्त रूप से मेरे साथ विवाह कर लिया। वही मेरा एक पति है, अब मैं व्यभिचारिणी कैसे हुई ॥५-६।॥ अपने सम्बन्ध...

5607. || सप्तम कहानी || वत्सराज उदयन और कॉलगसेना की कथा; राजा श्रुतसेन की कथा; किसान की कथा; विद्युद्धोता और राजा श्रुतसेन की कथा (चालू); उन्माविनी और राजा देवसेन की कथा; मन्त्री यौगन्धरायण का राजनीतिक प्रपंच (चालू); उल्लू, नेवला, बिल्ली और चूहे की कथा;

5607. || सप्तम कहानी || वत्सराज उदयन और कॉलगसेना की कथा; राजा श्रुतसेन की कथा; किसान की कथा; विद्युद्धोता और राजा श्रुतसेन की कथा (चालू); उन्माविनी और राजा देवसेन की कथा; मन्त्री यौगन्धरायण का राजनीतिक प्रपंच (चालू); उल्लू, नेवला, बिल्ली और चूहे की कथा;  सातवाँ तरंग वत्सराज उदयन और कॉलगसेना की कथा (चालू) अपने देश और बन्धु-बान्धव आदि को छोड़कर आई हुई कलिंगसेना, गई हुई सखी सोमप्रभा को स्मरण करती हुई उदास होकर बैठी रही ॥१॥ नरेन्द्रकम्या कलिंगसेना, कौशाम्बी में वत्सराज के पाणिग्रहण महोत्सव में, विलम्ब होने के कारण जंगल से बाहर आकर व्याकुल हरिणी के समान हो रही थी ॥२॥ इधर कलिंगसेना के विवाह में विलम्ब करनेवाले वत्सराज भी ज्योतिषियों के प्रति कुछ रुष्ट-से रहे ।।३।। उस दिन, उत्त्सुकता से व्याकुल राजा उदयन, मनोविनोद के लिए महारानी बासवदत्ता के महल में गया ।॥४١١ वहाँ पर मन्त्री यौगन्धरायण द्वारा शिक्षित महारानी ने, किसी भी प्रकार का विकार न प्रकट करते हुए, सदा की भाँति उचित उपचारों से राजा का स्वागत-सत्कार किया ।।५।। 'कलिंगसेना का वृत्तान्त प्रसिद्ध हो जाने पर भी, महारानी पूर्व की ही भाँति क...