5702. || द्वितीय कहानी || रत्नप्रना की कथा; राजा रत्नाविप की कथा; श्वेतरश्मि हाथी के पूर्वजन्म की कथा
5702. || द्वितीय कहानी || रत्नप्रना की कथा; राजा रत्नाविप की कथा; श्वेतरश्मि हाथी के पूर्वजन्म की कथा द्वितीय तरंग रत्नप्रना की कथा (क्रमश:) इस प्रकार, विद्याधर-जाति की रलप्रभा नामक नई पत्नी को प्राप्त करके आनन्द का उपभोग करते हुए नरवाहनदत्त से मिलने के लिए उसके गोमुख आदि मित्र एक दिन प्रातः काल आये और रनिवास के द्वार पर खड़े हुए ॥१-२॥ द्वारपालिका के द्वारा कुछ समय तक रोके जाकर और फिर सूचना देकर भीतर प्रवेश पाने पर नरवाहनदत्त द्वारा उनका स्वागत-सत्कार किया गया। उसके बाद रत्नप्रभा ने द्वार-पालिका से कहा-'तुम अब इन लोगों को द्वार पर रोका न करते, ये आर्यपूत्र के मित्र और हमारे ही अंग हैं ।॥३-४॥ रनिवास पर ऐसी रोक-टोक न होनी चाहिए ऐसा मेरा विचार है।' द्वारपालिका को ऐसा कहकर उसने अपने पति से कहा- 'आर्यपुत्र इस प्रसंग में मैं कहती हूँ, सुनो ! स्त्रियों की रक्षा और नियन्त्रण को मैं केवल नीति समझती हूँ या ईर्ष्या अथवा अज्ञानमात्र उससे कोई कार्य सिद्ध नहीं होता। स्त्रियाँ तो सबसे बड़े रक्षक अपने सच्चरित्र से ही रक्षित होती हैं। चंचला स्त्रियों के रक्षा के लिए तो ब्रह्मा भी समर्थ नहीं...