5702. || द्वितीय कहानी || रत्नप्रना की कथा; राजा रत्नाविप की कथा; श्वेतरश्मि हाथी के पूर्वजन्म की कथा

5702. || द्वितीय कहानी || रत्नप्रना की कथा; राजा रत्नाविप की कथा; श्वेतरश्मि हाथी के पूर्वजन्म की कथा

द्वितीय तरंग

रत्नप्रना की कथा (क्रमश:)

इस प्रकार, विद्याधर-जाति की रलप्रभा नामक नई पत्नी को प्राप्त करके आनन्द का उपभोग करते हुए नरवाहनदत्त से मिलने के लिए उसके गोमुख आदि मित्र एक दिन प्रातः काल आये और रनिवास के द्वार पर खड़े हुए ॥१-२॥

द्वारपालिका के द्वारा कुछ समय तक रोके जाकर और फिर सूचना देकर भीतर प्रवेश पाने पर नरवाहनदत्त द्वारा उनका स्वागत-सत्कार किया गया। उसके बाद रत्नप्रभा ने द्वार-पालिका से कहा-'तुम अब इन लोगों को द्वार पर रोका न करते, ये आर्यपूत्र के मित्र और हमारे ही अंग हैं ।॥३-४॥

रनिवास पर ऐसी रोक-टोक न होनी चाहिए ऐसा मेरा विचार है।' द्वारपालिका को ऐसा कहकर उसने अपने पति से कहा- 'आर्यपुत्र इस प्रसंग में मैं कहती हूँ, सुनो ! स्त्रियों की रक्षा और नियन्त्रण को मैं केवल नीति समझती हूँ या ईर्ष्या अथवा अज्ञानमात्र उससे कोई कार्य सिद्ध नहीं होता। स्त्रियाँ तो सबसे बड़े रक्षक अपने सच्चरित्र से ही रक्षित होती हैं। चंचला स्त्रियों के रक्षा के लिए तो ब्रह्मा भी समर्थ नहीं हैं। मदोन्मत्ता नारी और नदी का नियन्त्रण कौन कर सकता है!' ।॥५-८।।

राजा रत्नाविप की कथा

मैं इस सम्बन्ध में एक कथा कहती हूँ, सुनो- समुद्र के बीच में रत्नकूट नाम का एक विशाल द्वीप है। वहाँ महा उत्साही और परम विष्णुभक्त यथार्य नामवाला रत्नाधिपति नाम का राजा था। वह राजा पृथ्वी के सभी राजाओं की कन्याओं के साथ विवाह करने तथा मारी पृथ्वी का विजय करने के लिए विष्णु भगवान् का तप करने लगा ।।९--११॥

उसकी तपस्या में प्रसन्न होकर भगवान् विष्णु ने स्वयं दर्शन देकर कहा- 'राजन्, उठो, मैं तुम पर प्रसन्न हूँ। जो कहता हूँ, उसे मुनो ॥१२॥

कलिग देवा में कोई गन्धर्व, मुनि के शाप से सफेद हाथी के रूप में उत्पन्न हुआ है। वह श्वेतरश्मि के नाम से प्रसिद्ध है।॥१३॥

वह हाथी पूर्वजन्म की तपस्या-सिद्धि के कारण और मेरी भक्ति के कारण ज्ञानी, आकाशविहारी और पूर्वजन्म का ज्ञान रखनेवाला है ॥१४॥

मैं ने स्वप्न में उसे आजा दी है, वह आकाश-मार्ग से स्वयं आकर तुम्हारा वाहन बनेगा ॥१५॥

उस मकेद हाथी पर तुम, ऐरावत पर इन्द्र के समान, बैठकर आकाश-मार्ग से जिस राजा का आह्वान करोगे, वह भय से दिव्य प्रभाव से सम्पन्न तुम्हें स्वयं कन्या-दान के व्याज से कर देकर तुम्हारे अचीन हो जायगा ।।१६-१७।।

इस प्रकार, तुम सारी पृथ्वी का और राजकन्याओं का विजय करोगे और अस्सी हजार राजकुमारियों से विवाह करोगे ॥ १८॥

ऐसा कह‌कर भगवान् विष्णु के अन्र्ताहत होने पर वह राजा व्रत का पारण करके प्रकृतिस्थ हुआ और दूसरे ही दिन, उसने आकाण से आये हुए कल्याणमय हाथी को देखा ।।१९।।

उस आये हुए हाथी पर विष्णु भगवान् के आज्ञानुसार चढ़कर राजा ने सारी पृथ्वी को जीतकर राज-कन्याओं का आहरण किया ॥२०॥

वह राजा जस्ती हजार कन्याओं को लाकर रत्नकूटपुर में यथेच्छ विहार करता हुआ रहने लगा ॥ २१॥

और उस श्वेतरविम¹ हाथी की शान्ति के लिए प्रतिदिन पांच सौ ब्राह्मणों को भोजन कराता था ॥२२॥

किसी समय उस हाथी पर चढ़कर और अनेक द्वीपों का भ्रमण करके वह राजा, अपने द्वीप में आया। वहाँ पर आकाश से भूमि पर उतरते हुए उस हाथी के मस्तक पर गरुडजातीय पक्षी ने चोंच से प्रहार किया ।। २३-२४।।

राजा के तीखे अंकुश के प्रहार से वह पक्षी तो भाग गया, किन्तु हाथी बींच की मार से मूच्छित होकर भूमि पर गिर पड़ा ॥२५॥

राजा के उतर जाने पर होण में आया हुआ भी वह हाथी, उठाये जाने पर भी न उठ सका और न आहार कर सका ॥२६॥

इस प्रकार, पाँच दिनों तक उस हाथी के निराहार पड़े रहने पर राजा भी निराहार रहकर दुःखित हुआ और बडी चिन्ता में पड़कर बोला- हे लोकपालो, मुझे इस संकट में कोई उपाय बताओ। नहीं तो मैं अपना सिर काटकर तुम्हें बलि दे दूंगा' ॥ २७-२८।।

ऐसा कह‌कर और तलवार सोंचकर अपना गला काटने को तैयार राजा में आकाशवाणी ने अत्रत्यक्ष रूप से कहा- ॥२९॥

'हे राजन् ! ऐसा दुस्वास कार्य न करो। यदि कोई पतिव्रता स्त्री अपने हाथ से इस हाथी का स्पर्श करेगी, तो यह उठ जायगा। इसके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है' ।॥ ३०णा

यह सुनकर प्रमन्त्र राजा ने, अमृतलता नाम को सुरक्षित प्रधान रानी को बुलवाया ।॥३१॥

जब उसके छूने पर हाथी नहीं उठा, तब उसने अन्य सभी रानियों को बुल‌वाया ।।३२।।

उनके छूने पर भी जब हाथी न उठा, तब यह निश्चय हो गया कि इनमे कोई भी सच्चरित्रा और पतिव्रता नहीं है।।। ३३।।

राजा की अस्ती हजार रानियाँ, इस घटना से जन-समाज के सामने अस्पन्त लज्जित हुई ॥३४॥

तब राजा ने भी लज्जित होकर अपने नगर की सभी स्त्रियों को बुलाकर क्रम से हाथी को छुलाया ।। ३५।।

फिर भी, वह हाथी न उठा, तो राजा को इसके लिए बड़ी लज्जा इस बात को हुई कि मेरे नगर में एक भी सदाचारिणी स्त्री नहीं है।॥३६॥

इतने में ताम्रलिप्ती (तमलुक) नगरी से आया हुआ हर्षगुप्त नाम का एक वैश्य उस तमाशे को देखने के लिए आया। उसके पीछे उसकी एक शीलवती नाम की सेविका पत्नी भी आई और उसने देखकर कहा ।।३७-३८॥

'मैं इस हाथी को हाथ से छूती हूँ। यदि मैंने अपने पति के सिवाय दूसरे को मन से भी न ध्यान किया हो, तो यह हाथी उठ जाय ॥ ३९॥

ऐसा कहकर और समीप जाकर उसने हाथी को छू दिया। उसके छूते ही हाथी उठ खड़ा हुजा और आहार करने लगा ।॥८०॥

इस प्रकार, ईश्वर के समान, इस संसार की मृष्टि, पालन और संहार करने में समर्थ, पतिव्रता स्त्रियाँ विरळ ही हैं। इस प्रकार, कोलाहल करती हुई जनता वहाँ पर सती शीलवती की प्रशंसा करने लगी ॥४१-४२॥

राजा ने प्रसन्न होकर सती शीलवती को असंख्य बन-रत्न दिये और उसके पत्ति हर्षगुप्त को राजभवन के समीप ही पर देकर बसा दिया और उसका बहुत सत्कार किया ॥४३०४४।

और तभी से उस राजा ने अपनी सभी स्त्रियों का स्पर्श तक छोड़ दिया और उनके लिए केवल भोजन-वस्त्र का प्रबन्ध कर दिया ॥४५॥

तदनन्तर राजा ने हर्षगुप्त को बुलवाया। उसके साथ भोजन करने के बाद, राजा ने सती शीलवती से एकान्त में कहा- ।।४६।।

'हे शीलवती ! क्या तुम्हारे पिता के कुल में कोई कन्या है? यदि है, तो उसे मुझे दिलवाओ। मैं समझता हूँ कि वह भी तुम्हारे समान अवश्य सदाचारिणी होगी ॥४७॥

उस राजा से इस प्रकार कही गई शीलवती बोली- 'ताम्रलिप्ती नगरी में राजदत्ता नाम की मेरी बहन है। महाराज, यदि आप चाहते है, तो उस सुन्दरी से विवाह कीजिए ॥४८-४९॥

उसके ऐसा कहने पर राजा ने उसे स्वीकार किया ॥४९॥

दूसरे दिन शीलवती से निश्चय करके, उस हर्षगुप्त वैश्य के साथ आकाशगामी श्वेतरश्मि हाथी पर बैठकर वह राजा स्वयं ताम्रलिप्ती नगरी में गया और हर्षगुप्त के यहाँ जाकर ठहरा ।।५०-५१।।

वहाँ जाकर उसने ज्योतिषियों से गीलवती की बहन से विवाह करने का लग्न पूछा। गणकों ने दोनों के नक्षत्र पूछकर कहा- 'राजन् ! तुम दोनों का विवाह आज से तीन महीने के बाद ठीक बनता है। आज ही यदि इसका विवाह किया जायगा, तो यह कन्या अवश्य दुराचारिणी हो जायगी' ।॥५२-५४।।

गणकों के इस प्रकार कहने पर भी उस सुन्दरी कन्या के लिए उत्सुक और इतने दिनों तक अकेले रहने में असमर्थ राजा ने सोचा ॥५५॥

अधिक सोच-विचार क्या करें। आज ही राजदत्ता से विवाह करता हूँ। क्योंकि यह शीलवती की बहन है, शान्त और सती ही होगी। और, रत्नद्वीप के समीप ही, जो विना मनुष्यों का एक छोटा-सा टापू है, उसमें एक चौसाला (चतुःशाल) बनाकर इसे रखता हूँ ॥५६-५७१।

उस दुर्गम द्वीप में इसके नौकर-चाकरों में सभी स्त्रियाँ रहेंगी। पुरुष का जब दर्शन ही नहीं होगा, तब यह व्यभिचारिणी कैसे होगी ॥५८॥

ऐसा सोचकर राजा ने उसी दिन शीलवती से दान की गई उस राजदत्ता से विवाह कर लिया ॥५९॥

इस प्रकार, विवाह करके हर्षगुप्त द्वारा वैवाहिक रीति-रिवाजों के किये जाने पर, राजा उस नववधू, शीलवती और वैश्य के साथ हाथी पर चढ़कर आकाश-मार्ग से रत्नकूट द्वीप में आया, जहाँ जनता उत्सुकता से उसकी प्रतीक्षा कर रही थी ॥ ६०-६१।।

राजधानी में अक्कर राजा ने शीलवती को फिर से पर्याप्त धन, मान आदि से सत्कार किया। उसे भी पतिव्रता-पालन का अच्छा फल मिला ।॥६२॥

तदन्तर राजा उस नववधू को उसी नाकाशगामी हाथी पर बिठाकर पूर्वचिन्तित समुद्र के मध्य में स्थित, मनुष्यों से अगम्य द्वीप में ले गया और अनेक दासियों के साथ उसे बहीं चौसाले में रख दिया ।॥६३-६४।।

वहाँ जिन-जिन वस्तुओं की आवश्यकता होती यौ, उन्हें राजा आकाशगामी हाथी से भेजता था। किसी पुरुष का विश्वास न करता बा ॥६५॥

स्वयं भी उसके प्रेम के कारण प्रति रात्रि को हायी से वहाँ जाता था और दिन में फिर रत्नकूट चला आता था ॥६६॥

एक बार राजा ने बुरे स्वप्न की शान्ति के लिए प्रभात-काल में ही उसके (राजदत्ता के) साथ मद्यपान कर लिया। मद्यपान से मत्त उस रानी के बार-बार मना करने पर भी, वह राजा राजकार्यों को देखने के लिए रत्नकूट चला आया। क्योंकि, राजकार्य, दैनिक प्रिय कर्तव्य है ।।६७-६८।।

वहाँ राजकार्य करते हुए भी राजा मदोन्मत्ता अकेली रानी की चिन्ता करते हुए, अनमने भाव से कार्य कर रहा था ।॥६९॥

इतने में ही वह रानी राजदत्ता दासियों के भोजन-निर्माण आदि कार्यों में व्यस्त हो जाने पर, उस दुर्गम द्वीप के भवन के द्वार पर अकेली ही निकल आई ॥७०॥

उसके द्वार पर आते ही उसकी रक्षा भंग करने के लिए मानों दैव से प्रेरित कोई पुरुष आया, उसे मदोन्मत्ता राजदत्ता ने देखा और पास आने पर पूछा- तुम कहाँ से आये हो, कौन हो और इस दुर्गम स्थान पर किस प्रकार आ सके ? ॥७१-७२।।

अनेक कष्टों को देखे हुए उस पुरुष ने कहा- हे सुन्दरी! मैं मथुरावासी पवनसेन नामक बनिये का पुत्र हूँ। पिता की मृत्यु होने पर कुटुम्बियों द्वारा सब धन हरण कर लेने पर विदेश जाकर दीन चाकरी करने लगा ।।७३-७४।।

तब बड़ी कठिनाई से ब्यापार द्वारा धन कमाकर दूसरे देश को जाता हुआ राह में चोरों से लूट लिया गया ॥७५।।

तब अपने ऐसे लोगों के साथ रत्नों की खदानोंवाले कनक-क्षेत्र में गया ॥७६॥

वहाँ पर राजा को हिस्सा देने का निर्णय करके एक साल तक रत्न-प्राप्ति के लिए जमीन खोदता रहा। गहरे गड़ों के खोदने पर भी रत्न न मिला ॥७७॥

और, मेरे साथी रत्नों को पाकर प्रसन्न हो रहे थे, इसलिए मैंने दुःख से पीड़ित होकर समुद्र के किनारे लकड़ियाँ एकत्र करके जल मरने के लिए बिता बनाई। जब मैं चिता में प्रवेश कर ही रहा था कि इतने में जीवदत्त नामक जहाजी बनिया दैवयोग से आया ॥७८-७९।।

स्वर्णद्वीप जाते हुए उस दयालु बनिये ने मरने से रोककर और जीवन-निर्वाह का प्रबन्ध करके मुझे जहाज पर चढ़ा लिया ।।८० ।।

तब समुद्र के बीच जहाज से जाते हुए हम लोगों को पाँच दिन बीत गये छठे दिन अकस्मात् बादल दीख पड़े और मूसलाधार पानी बरसने पर आँधी से जहाज, हाथी के सिर के समान झूमने लगा। और क्षण-भर में टूटकर दूब गया। डूबते हुए मैंने एक लकड़ी का तस्ता पा लिया ॥ ८१--८३॥

उस पर बैठा हुआ में, आकाश साफ होने पर, इस द्वीप के किनारे वन में आ लगा। वहाँ से इस चौसाले मकान को देखकर इधर आया और यहाँ आँखों के लिए अमृत-वर्षा के समान दुःख शमन करनेवाली तुम्हें देखा ॥८४-८५॥

ऐसा कहते हुए उस बनिये को. मंद और काम से उन्मत्त राजदत्ता ने पलंग पर बैठाकर लिपटा लिया ॥८६।।

स्त्रीत्व, मद्य का नशा, एकान्त, पुरुप का मिलना और पूर्ण स्वतन्त्रता, जहाँ ये पांच अग्नियाँ, एकत्र हों, वहाँ चरित्र-रूपी तृण की बात ही क्या ? ॥८७॥

काम से उत्तेजित नारी किसी प्रकार का विचार नहीं कर सकती। इसीलिए, उसने विपत्ति में पड़े हुए उस दरिद्र और कुरूप को भी अपना लिया ॥८८॥

इतने में ही वह राजा रत्नाधिपति, उत्सुकता के साथ आकाशगामी हाची पर बैठकर शीघ्र ही वहाँ आ पहुँचा ॥८९॥

उसने आते ही उस दीन दरिद्र के साथ सोयी हुई रानी राजदत्ता को अपनी आँखों से देवा ॥९०॥

उसने मार डालने योग्य व्यक्ति को भी दीनतापूर्वक प्रार्थना करने पर नहीं मारा। डरी हुई और नशे में चूर पत्नी को देखकर वह इस प्रकार मोचने लगा कि काम का एकमात्र मित्र मद्य के पी लेने पर स्त्री सती कैसे रह सकती है ? ॥९१-९२॥

चंचला (दुराचारिणी) स्त्री, रक्षा से भी रोका नहीं जा सकती। क्या प्रलयकालीन आँधी, हावों से रोकी जा सकती है ? ॥९३॥

मैंने जो गणकों का कहना नहीं माना, उसी का यह फल है। विश्वस्त और हितैषी पुरुषों की बात का अनादर करना किसके लिए परिणाम में कड़वा नहीं होता ॥९४।।

यह शीलवती की बहन है- यह देखते हुए मैं यह भूल गया कि हलाहल विष भी अमृत का सहोदर ही है।॥९५॥

यह भी ठीक है कि देव की आश्चर्यजनक चेष्टा को, कौन व्यक्ति, पुरुषार्य से, जीत सकता है ।।९६।।

ऐसा सोचकर राजा ने कोष नहीं किया और वृत्तान्त पूछकर उस वैश्यन्पुत्र को छोड़ दिया ॥९७।।

छूटा हुआ वैश्य-पुत्र, अपने जाने का मार्ग खोजता हुआ भवन से निकलकर समुद्र के तट पर गया और उसने दूर से आते हुए एक जहाज को देखा ॥९८॥

तब उसी तस्ते पर चढ़कर, जिससे पहले आया था, समुद्र में कूद पड़ा और चिल्लाकर रोने लगा कि मुझे बचाओ। उसका रोना-चिल्लाना सुनकर उस जहाज में बैठ हुए उसके स्वामी क्रोधवर्मा ने उसे जहाज में चढ़ाकर अपने पास रख लिया ॥९९-१००।।

दैव ते जिनके नाश के लिए जो विधान रथ रखा है, वह, दौड़कर भागते हुए का भी पीछा करता है।॥१०१।।

यही कारण था कि वह मूर्ख बनिया जहाज में चलते हुए एकान्त में कोषवर्मा की स्त्री के साथ पकड़ा गया। क्रोधवर्मा उसके इस कुकृत्य को देखकर क्रुद्ध हो उठा और उसे समुद्र में फेंक दिया, जिससे वह डूबकर मर गया ॥ १०२॥

इधर राजा रत्नाधिपति, क्रोध न करके राजदत्ता (अपनी स्त्री) को सेवकों और सामान के साथ श्वेतरश्मि हाथी पर बैठाकर रत्नकूट ले आया ।।१०३।।

रत्नकूट में पहुंचकर राजा ने उसे उसकी बहन गीलवती को सौंप दिया और शीलवती तथा मन्त्रियों को उसका सारा वृत्तान्त कह सुनाया ॥१०४।।

और बोला- 'आश्चर्य है कि मार-रहित और नीरस सांसारिक भोगों में आसक्त रहकर मैंने कितना कष्ट पाया ॥१०५।।

इसलिए, अब वन में जाकर भगवान् की शरण लेता हूँ, जिससे फिर ऐसे कष्टी का भोग न करूं ॥१०६।।

ऐसा कहते हुए, राजा, दुःखी मन्त्रियों और शीलवती द्वारा बहुत रोके जाने पर भी वैराग्य पर दृढ रहा ।॥ १०७॥

और उसने अपना सारा राज्य पापभंजन नामक एक श्रेष्ठ ब्राह्मण को विधिपूर्वक दान कर दिया और शेष धन शीलवती तथा अन्यान्य ब्राह्मणों को देकर भोगों से सर्वया विरक्त हो गया ।॥१०८-१०९।।

राज्य और धन का दान करके राजा ने, रोते हुए नागरिकों के सामने ही तपोवन में जाने की इच्छा से श्वेतरदिम हाथी को बुलाया ॥११०॥

सामने प्रस्तुत श्वेतरश्मि हाथी ने, तुरन्त अपना हाथी का शरीर छोड़कर हार-केयूर-धारी दिव्य पुरुष गन्धर्व का रूप धारण किया ॥११११॥

श्वेतरश्मि हाथी के पूर्वजन्म की कथा

'तुम कौन हो, और यह क्या किया ?' राजा के इस प्रकार पूछने पर हाथी बोला-'मैं और तुम हम दोनों पूर्वजन्म में मलयाचल-निवासी गन्धर्वजातीय भाई है। मैं छोटा भाई मोमत्रम हूँ और दूसरा बड़ा भाई देवप्रभ था। उसकी राजवती नाम की अत्यन्त प्यारी पत्नी थी, जिसे वह गोद में लेकर घूमते हुए सिद्धवास नामक स्थान में मेरे साथ गया ।।११२-११४।।

वही पर विष्णु भगवान् के एक मन्दिर में उनकी पूजा करके हम लोग गाने के लिए प्रवृत्त हुए ॥११५।।

उस मन्दिर में एक निद्ध आया और वह अतिमनोहर गान करते हुए राजवनी को एकटक मे देखने लगा ।।११६١١

मेरे बड़े भाई ने उसे इस प्रकार पूरते हुए देखकर उस सिद्ध से, क्रुद्ध होकर कहा कि तू निद्ध होकर भी दूसरे की स्त्री को इस प्रकार की लालसा से क्यों देखता है? ॥११७॥

तब सिद्ध ने भी क्रुद्ध होकर उसे शाप देने के लिए इम प्रकार कहा- 'रे मूले ! गाने के आश्चर्य से मैंने इसे देखा, बामना ने नहीं। इसलिए, हे ईर्ष्यावाले! तुम दोनों इसके साथ मनुष्य की योनि में जा गिरोगे और तुम इसी पत्नी को दूसरे से समागम करते हुए अपनी आँखों से देखोगे'। ऐसा कहते हुए उस मिद्ध की मैंने कोच में, हाथ में लिये हुए मि‌ट्टी के सफेद हाथी (खिलौने) से मारा ॥ ११८-१२०।।

तब उसने मुझे शाप दिया कि 'तूने मुझे मिट्टी के सफेद हाथी से मारा है, इसलिए तू अगले जन्म में सफेद हाथी की वोनि में जन्म लेगा ॥१२१॥

तदनन्तर मेरे भाई द्वारा किये गये अनुनय-विनय पर प्रसन्न उस सिद्ध ने दयालु होकर हम दोनों का शापान्त इस प्रकार किया ॥ १२२॥

देवप्रभ से कहा कि 'तू विष्णु भगवान् की कृपा से मनुष्य होकर भी एक द्वीप का राजा होगा और हाथी बने हुए अपने भाई को दिव्य वाहन के रूप में प्राप्त करेगा। तेरी अस्सी हजार रानियाँ होंगी। उन सभी रानियों की दुश्चरित्रता तुझे जनता के सामने मालूम होगी ॥१२३-१२४।।

तदनन्तर तू मनुष्य-योनि में उत्पन्न इसी पत्नी को प्राप्त करेगा इसे और दूसरे पुरुष के साथ अपनी आँखों से देखेगा। तब तू विरक्त होकर बाह्मण को राज्य देकर वन जाने का यत्न करेगा। उस समय तेरा छोटा भाई सोमप्रभ भी हाथी की योनि से मुक्त हो जायगा और तू भी इसी पत्नी के साथ मानव-योनि से मुक्त होकर अपने गन्धर्व-रूप को प्राप्त करेगा' ।॥१२५-१२७।।

हाथी ने फिर कहा- 'इस प्रकार, हम लोग सिद्ध के शाप से मुक्त हो गये। अपने-अपने कर्म के भेद से हमलोग दुबक बक् योनि में उत्पन्न हुए थे। जब हमलोगों के शाप का आज अन्त हो गया' ।॥ १२८॥

सोमप्रभ के ऐसा कहने पर वह राजा त्नाधिपति बोला- 'मैं अपने पूर्व जन्म का स्मरण करता हूँ। वह देवप्रभ मैं ही तो था और यह राजदत्ता मेरी राजवती नाम की पत्नी है। ऐसा कहकर राजा और रानी राजवती राजदत्ता ने अपना मनुष्य का चोला त्याग दिया। उसी समय वे तीनों (राजा, रानी और हावी) गन्धर्व-देह धारण करके लोगों के देखते-देखते आकाश में उड़कर मलयाचल-स्थित अपने धाम को बले गये ।।१२९- १३१॥

शीलवती भी अपने शुद्ध चरित्र के प्रभाव से प्रबुर धन प्राप्त करके ताम्म्रलिप्ती नगर में जाकर धार्मिक जीवन व्यतीत करने लगी ।॥ १३२॥

इस प्रकार, संसार में कहीं भी कोई स्त्री को नियन्त्रण में रखकर रक्षा करने में समर्थ नही हो सकता। कुलीन स्त्री की, उसका अपना ही एकमात्र प्रबल और विशुद्ध मन उनकी रक्षा कर सकता है ।।१३३।।

इस प्रकार, दूसरों से ईर्ष्या करना और उन पर दोष लगाना यह मानव-स्वभाव का दोष है। यही अधिक नियन्त्रण स्त्रियों की उत्सुकता को अत्यधिक बढ़ा देता है।॥१३४।।

नरवाहनदत्त, इस प्रकार अपनी पत्नी रत्नप्रभा से कही गई कथा को सुनकर अपने मन्त्रियों के साथ अत्यन्त प्रसन्न हुआ ॥१३५॥

महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचित कथासरित्सागर के रत्नप्रभालम्बक का द्वितीय तरंग समाप्त

1. किसी-किसी पुस्तक में हाथी का नाम 'शीतरश्मि' लिखा है। किन्तु, 'श्वेतरश्मि' नाम ही उबित प्रतीत होता है। अनु०

Comments

Popular posts from this blog

5.201. || पहली कहानी || राजा सहस्त्रनीक, रानी मृगावती के विवाह व उदयन के जन्म की कथा

5.101. || प्रथम कहानी || शिव और पार्वती का संवाद और पार्वती के जन्म की कथा