09. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 09 || भगवान पर भरोसा
09 . यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 09 || भगवान पर भरोसा [दो शब्द – यह कहानी मेरी नहीं है। मेरी दादी जी ने मुझे सुनाई थी आज अचानक से याद आ गई है। यह कहानी करीब 40 वर्ष पुरानी है क्योंकि तब मैं कक्षा 10 में पढ़ता था तब मेरी दादी जी ने मुझे हैं यह गाने सुनाई थी जो मेरे मन के अंदर तक उतर गई थी। मैं अपनी इस कहानी का श्रेय अपनी दादी जी को देता हूं । जिनके कहानी सुनाने की ढंग के कारण हे इसे लिख सका। मैं शायद उनकी तरह कहानी कहने वाला तो नहीं बन पाऊंगा फिर भी प्रयास किया है। मुझे मालूम है कि ऐसी घटनाएं बहुत कम घटित होती हैै। ] भगवान पर भरोसा एक पुरानी सी इमारत में था एक वैद्यजी का मकान था। मकान के पिछले हिस्से में रहते थे और अगले हिस्से में दवाख़ाना खोल रखा था। उनकी पत्नी की आदत थी कि दवाख़ाना खोलने से पहले उस दिन के घर के लिए आवश्यक सामान को एक चिठ्ठी में लिख कर वैद्य जी को पकड़ा देती थी। वैद्यजी गद्दी पर बैठकर, पहले भगवान का नाम लेते फिर वह चिठ्ठी खोलते। पत्नी ने जो बातें लिखी होतीं, उनके भाव देखते , फिर उनका हिसाब करते। फिर परमात्मा से प्रार्थना करते, "हे भगवान ! ...