04. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 04 || *" भाग्यहीन अमीर "*
04. यह दिल्ली है मेरी जान || कहानी 04 || *" भाग्यहीन अमीर " * 100 नम्बर की एक गाड़ी मेन रोड पर स्थित एक दो मंजिले मकान के बाहर आकर रुकी। कांस्टेबल को फ़ोन पर यही पता लिखाया गया था। पर यहां तो सभी पाॕंश मकान थे। यहां पर खाना किसने मंगवाया होगा? यही सोचते हुए कांस्टेबल ने उसी नम्बर पर कॉल बैक की। "अभी दस मिनट पहले जिस नम्बर से भोजन के लिए फोन किया गया था। आप जीत सिंह जी बोल रहे हैं क्या? हम मकान न० 112 के सामने खड़े हैं, कहाँ आना है।" दूसरी तरफ से जबाब आया, "सर जी ! आप वहीं रुकिए, मैं आ रहा हूं।" एक मिनट बाद 112 न० मकान का गेट खुला और करीब पैंसठ वर्षीय सज्जन बाहर आए। उन्हें देखते ही कांस्टेबल गुस्से में बोले, "आप लोगों को शर्म नही आई, इस तरह से फोन करके खाना मंगवाते हुए, गरीबों के हक का जब आप जैसे अमीर खाएंगे तो गरीब तक खाना कैसे पहुंचेगा? मेरा यहां तक आना ही बेकार हो गया।" "साहब ! ये शर्म ही है, जो हमें हाथ फैलाने तक ले आयी। सर्विस लगते ही शर्म के मारे लोन लेकर घर बनवा लिया। आधे से ज्यादा सेलरी क़िस्त में कटती रही और आधी बच्चों की परवरिश म...