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5.102. || दूसरी कहानी || वररुचि (पुष्पवन्त) और व्याडि की कथा

5.102. || दूसरी कहानी || वररुचि (पुष्पवन्त) और व्याडि की कथा द्वितीय तरंग वररुचि (पुष्पवन्त) को कथा मानव-शरीर धारण किये हुए पुष्पदन्त नामक गण वररुचि' एवं कात्यायन के नाम से प्रसिद्ध हुआ ॥ १॥ समस्त विद्याओं का पूर्ण अध्ययन तथा सम्राट् नन्द का मन्त्रित्व करके वह ( कात्यायन ) एक बार खिन्न होकर विन्ध्यवासिनी देवी के दर्शन करने के लिए आया ॥ २ ॥ तपस्या से आराधित विन्ध्यवासिनी देवी ने स्वप्न में वररुचि को एक आदेश दिया। उस आदेश के अनुसार वह काणभूति को देखने के लिए विन्ध्यारण्य में गया ॥ ३ ॥ बाघ और वानरों से भरे हुए, जल-रहित एवं रूखे वृक्षों से व्याप्त उस विन्ध्यारण्य में उसने एक अत्यन्त ऊँचे और विस्तृत बरगद वृक्ष को देखा ॥४॥ पुष्पदन्त ने उस वटवृक्ष के पास सैकड़ों पिशाचों से घिरे हुए सालवृक्ष के समान लम्बे कणभूति को देखा ॥५॥ कणभूति ने कात्यायन को देखकर उसके चरण छूकर प्रणाम किया और कुछ समय के उपरान्त विश्राम कर लेने पर कात्यायन ने काणभूति से पूछा ॥ ६॥ 'हे काणभूते ! ऐसे सदाचारी होकर तुम ऐसी हीन गति को कैसे प्राप्त हुए ?' कात्यायन के स्नेहपूर्ण प्रश्न को सुनकर काणभूति ने कहा ॥७॥ मुझे स...