5.306. || षष्ठ कहानी || वत्सराज की कथा; फलभूति की कथा; रानी कुवलयावली द्वारा कही गई कथा; गणपति की कथा; स्वामि कार्तिकेय की उत्पत्ति; कालरात्रि की कथा;
5.306. || षष्ठ कहानी || वत्सराज की कथा; फलभूति की कथा; रानी कुवलयावली द्वारा कही गई कथा; गणपति की कथा; स्वामि कार्तिकेय की उत्पत्ति; कालरात्रि की कथा; षष्ठ तरंग वत्सराज की कथा (क्रमशः) विजय-यात्रा से थकी हुई सेना को विश्राम कराने के लिए लावाणक में ठहरे हुए वत्सराज उदयन ने, एक बार एकान्त में, यौगन्धरायण से कहा ।।१।। तुम्हारे बुद्धि-वैभव से मैंने पृथ्वी के मभी राजाओं को जीत लिया। उपाय से वश में किये गये वे राजा कभी विरोधी नही हो सकते ।।२।। किन्तु वाराणसी का यह राजा ब्रह्मदत्त अब भी विरोध करता है। कुटिल मनुष्यों पर क्या विश्वास ? ॥३॥ वत्सराज के इस प्रकार कहने पर यौगन्धरायण ने कहा कि महाराज ! ब्रह्मदत्त अब फिर विरोध न करेगा ।।४।। आक्रमण करके दवाया हुआ वह तुममे अत्त्यधिक सम्मानित हुआ है। कौन ऐसा बुद्धि-मान् होगा जो अपना भला करनेवाले के साथ बुरा बर्ताव करेगा ।।५।। यदि करता भी है, तो अपनी ही आत्मा का अकल्याण करता है। इस प्रसग में एक कथा कहता हूँ सुनो ॥६॥ फलभूति की कथा प्राचीन काल में पद्म-प्रदेश मे प्रसिद्ध नामवाला अग्निदत्त नाम का ब्राह्मण था, जो राजा के द्वारा दान दिये गये अग्रहार¹ (ग्...