5.306. || षष्ठ कहानी || वत्सराज की कथा; फलभूति की कथा; रानी कुवलयावली द्वारा कही गई कथा; गणपति की कथा; स्वामि कार्तिकेय की उत्पत्ति; कालरात्रि की कथा;

5.306. || षष्ठ कहानी || वत्सराज की कथा; फलभूति की कथा; रानी कुवलयावली द्वारा कही गई कथा; गणपति की कथा; स्वामि कार्तिकेय की उत्पत्ति; कालरात्रि की कथा; 

षष्ठ तरंग

वत्सराज की कथा (क्रमशः)

विजय-यात्रा से थकी हुई सेना को विश्राम कराने के लिए लावाणक में ठहरे हुए वत्सराज उदयन ने, एक बार एकान्त में, यौगन्धरायण से कहा ।।१।।

तुम्हारे बुद्धि-वैभव से मैंने पृथ्वी के मभी राजाओं को जीत लिया। उपाय से वश में किये गये वे राजा कभी विरोधी नही हो सकते ।।२।।

किन्तु वाराणसी का यह राजा ब्रह्मदत्त अब भी विरोध करता है। कुटिल मनुष्यों पर क्या विश्वास ? ॥३॥

वत्सराज के इस प्रकार कहने पर यौगन्धरायण ने कहा कि महाराज ! ब्रह्मदत्त अब फिर विरोध न करेगा ।।४।।

आक्रमण करके दवाया हुआ वह तुममे अत्त्यधिक सम्मानित हुआ है। कौन ऐसा बुद्धि-मान् होगा जो अपना भला करनेवाले के साथ बुरा बर्ताव करेगा ।।५।।

यदि करता भी है, तो अपनी ही आत्मा का अकल्याण करता है। इस प्रसग में एक कथा कहता हूँ सुनो ॥६॥

फलभूति की कथा

प्राचीन काल में पद्म-प्रदेश मे प्रसिद्ध नामवाला अग्निदत्त नाम का ब्राह्मण था, जो राजा के द्वारा दान दिये गये अग्रहार¹ (ग्राम) से जीवन-निर्वाह करता था ।।७।।

उसका बड़ा लडका सोमदत्त और छोटा वैश्वानरदत्त था ।।८।।

उनमें ज्येष्ठ पुत्र सोमदत्त सुन्दर होने पर भी, मूर्ख और उद्दण्ड था तथा छोटा पुत्र विद्वान्, विनयी और अध्ययनप्रेमी था। दोनों विवाहित थे, अत. पिता की मृत्यु हो जाने पर दोनों ने गाँव को आधा-आधा बाँट लिया ।।९-१०।।

दोनों में छोटा वैश्वानरदत्त, विद्वान् होने के कारण राजा से सम्मानित था और बड़ा सोमदत्त, उद्दण्ड एव क्षत्रिय-कर्म (लड़ने-भिडने) करनेवाला था ।।११।।

एक बार मूर्ख शूद्रों के साथ गोष्ठी बनाकर बैठे हुए सोमदत्त को उनके पिता के किसी मित्र ने कहा, हे मूखें ! अग्निदत्त के पुत्र होकर शूद्रों का-मा व्यवहार करते हो। राजा से सम्मानित अपने छोटे भाई को देखकर लज्जित नहीं होते ।।१२-१३।।

यह सुनकर क्रुद्ध सोमदत्त ने दौडकर उस ब्राह्मण को लात मारी ।। १४।।

लात खाकर क्रुद्ध ब्राह्मण ने वहां बैठे हुए लोगो को गवाह बनाकर राजा के समीप जाकर निवेदन किया ।।१५।।

तब राजा ने सोमदन को बाँधकर लाने के लिए सिपाहियों को भेजा। सोमदत्त के गुण्डे मित्रो ने, शस्त्रों से उन सिपाहियो को मारा ।।१६।।

यह सुनकर क्रोध में राजा ने मेना के द्वारा पकड़वाकर उसे फॉमी की आज्ञा दे दी ।।१७।।

शूली पर चढा हुआ वह ब्राह्मण, मानो किसी के द्वारा फेंका हुआ-सा पृथ्वी पर गिर पडा ।।१८।।

भाग्य ही, भविष्य में होनेवाले कल्याण की रक्षा करते है। उसे फिर शूली पर चढ़ाने के लिए तैयार वधिक अन्धे हो गये। उसी समय उसके छोटे भाई के अनुनय-विनय करने पर राजा ने, उसे फाँसी से छुडा दिया ।।१९-२०।।

मृत्यु-मुख से छूटे हुए सोमदत्त ने, राजा के द्वारा किये गये अपमान के कारण अपनी गृहस्थी के साथ उस देश को छोड़कर दूसरे देश जाने की इच्छा प्रकट की ।। २१॥

जब उसके एकत्र हुए बन्धुओं ने, उसे देश-त्याग के लिए मना किया, तब उसने राजा के आधे ग्राम का अधिकार छोड दिया और वही रहने लगा ।। २२।।

ग्राम छूट जाने से जीवन-निर्वाह का उपाय न देखकर उसने कृषि (खेती) करने का निश्चय किया और कृषि योग्य भूमि ढूंढ़ने के लिए किसी शुभ दिन जगल में गया ।।२३।।

जगल में उसने अच्छी फमल होने योग्य एक भूमि देखी और उसके मध्य मे बड़ी विस्तृत (लम्बी-चौड़ी) घनी छाया के कारण (सूर्य-किरणों को रोकने के कारण) शीतल एक पीपल के वृक्ष को वर्षाकाल के समान देखकर वह कृषक अत्यन्त मन्तुष्ट हुआ ।।२४-२५।।

तब मोमदत्त ने, इस वृक्ष में रहनेवाला जो भी देवता है, मैं उसका भक्त हूँ, ऐसा कहकर वृक्ष की प्रदक्षिणा कर उसे प्रणाम किया ।।२६।।

तदनन्तर बैलो को जोड़कर मगल के लिए पूजा-पाठ आदि करके और वृक्ष को प्रमाद चढाकर उसने खेती प्रारम्भ कर दी ।।२७।।

खेती करता हुआ वह सोमदत्त उसी वृक्ष के नीचे दिन-रात रहने लगा। उसकी पत्नी, प्रतिदिन उमे वही भोजन लाकर देती थी ॥२८॥

कुछ समय के बाद जब उनकी बेती पककर तैयार हुई, तो दूसरे राजा के राष्ट्र पर आक्रमण करने के कारण लूट ली गई। शत्रु-गेना के चले जाने पर और धन के नष्ट होने पर उसने रोती हुई पत्नी को ममया-त्रझाकर कुछ बचा-खुचा अन्न ममेट लिया ।।२९-३०।।

और, पहले के ममान पीपल के वृक्ष में रहनेवाले देवता की बलि (प्रमाद) चढाकर धैर्य के साथ वही रहने लगा, क्याकि वैर्वशाली जीव, विपत्ति के समय स्वभावत. अधिक दृढ़ हो जाते है ।। ३ १।।

तदनन्तर एक दिन, रात में चिन्ता से निद्रा न आने के कारण जागते हुए सोमदत्त ने' पीपल के वृक्ष से निकली हुई यह वाणी सुनी हे सोमदत्त ! मै तुम से प्रसन्न हूँ। तुम श्रीकंठ-देश मे आदित्यप्रभ नामक राज्य के राष्ट्र में जाओ। उस राजा के द्वार पर निरन्तर सन्ध्या और अग्निहोत्र के मन्त्रों का पाठ करते हुए यह कहना कि मैं फलभूति नामक ब्राह्मण हूँ, जो कह‌ता हूँ उमे सुनिए- 'शुभ कार्य करनेवाला कल्याण प्राप्त करता है और अशुभ कार्यकारी अशुभप्राप्त करता है। तुम्हे मन्ध्या और अग्निहोत्र के मन्त्र नहीं आते, उन्हे अभी मुझसे पढ़ो, मैं यक्ष हूँ।' ऐसा कह‌कर यक्ष ने अपने प्रभाव से उसी समय मन्त्र पढा दिये। मन्त्र पढाकर वाण। मौन हो गई ।। ३२-३७।।

प्रातःकाल सोमदत्त यक्ष द्वारा दिये गये फलभूति नाम को पाकर, अपनी पत्नी के साथ श्रीकठ-देश की ओर चल पड़ा। वह अनेक बड़े-बड़े भीषण जगलो को पारकर दुर्दशा के साथ श्रीकठ-देश में पहुँचा ।।३८-३९।।

वहाँ राजद्वार पर सन्ध्या, अग्निहोत्र आदि के मन्त्र पढ़कर और अपना फलभूति, नाम सुनाकर बोला- 'कल्याणकारी कल्याण प्राप्त करता है और अशुभकर्ता अशुभ प्राप्त करता है।' लोगो में आश्चर्य उत्पन्न करनेवाले ये वचन बोलने लगा ।।४०-४१।।

उसे बार-बार ऐसा कहते हुए सुनकर चकित हुए राजा आदित्यप्रभ ने, उसे अन्दर बुलवाया ।।४२।।

वह फलभूति भीतर राजा के समीप जाकर भी बार-बार वही वाक्य कहने लगा, जिसे सुनकर राजा और उसके समीप बैठे हुए व्यक्ति हँसने लगे। इस प्रकार प्रसन्न राजा ने, उसे अच्छे-अच्छे वस्त्र, गहने और अनेक गाँव पुरस्कार में दिये। बड़ों की प्रसन्नता झूठी (व्यर्थ) नही होती ।।४३-४४।।

इस प्रकार, यक्ष की कृपा मे निर्धन फलभूति ने राजा द्वारा दी गई विभूति प्राप्त की और मदा इमी प्रकार बकना हुआ राजा का प्रेमपात्र बन गया। राजाओं का मन, विनोद का सदा रमिक होता है। क्रमश वह फलभूति (सोमदत्त) धीरे-धीरे राज्य में, रनिवास में और सर्वत्र ही राजप्रिय होने के कारण मम्मानित हुआ ।।४५-४७।।

किमी समय राजा आदित्यप्रभ, जगल से शिकार खेलकर एकाएक रनिवास में चला गया। द्वारपाल की घबराहट से शकित राजा ने रानी के भवन में प्रवेश करते ही रानी कुवलयावली को देव-पूजा में संलग्न देखा ॥४८-४९।।

राजा ने वहाँ उठे हुए बालोंवाली, आंखे मूंदे हुए, मोटा सिन्दूर का तिलक लगाये हुए, जप से फड़कते हुए ओठोवाली रग-बिरंगे बड़े-से मडल के भीतर बैठी हुई तथा रक्त, मद्य और नरमास से उग्र बलि देती हुई नगी रानी को देखा ।।५०-५१।।

रानी भी राजा के सहसा आ जाने पर घबराहट से बोती पहनने लगी, राजा के पूछने पर अभय-प्रार्थना करके बोली- 'महाराज ! तुम्हारी उन्नति के लिए ही यह पूजन कर रही हूँ। इस पूजा की प्राप्ति और सिद्धि का वृत्तान्त सुनो ।।५२-५३।।

रानी कुवलयावली द्वारा कही गई कथा

पहले पिता के घर में जब मैं कन्या (अविवाहित) थी, तब एक बार वसन्तोत्सव के समय, मुझे उद्यान में बैठी हुई सहेलियों ने आकर कहा- 'इस जनाने उद्यान में पेड़ो की झुरमुट में सिद्धिदाता वरदानी गणेशजी की मूत्ति है। वह भक्तो की मनस्कामना पूर्ण करते है ।।५४-५५॥

उनकी पूजा कर, तो अवश्य ही अपने अनुकूल पति को प्राप्त करोगी' ।॥५६॥

यह सुनकर मैंने अपने स्वाभाविक भोलेपन से सखियों से पूछा कि क्या बिनायक (गणेश) की पूजा से कुमारियाँ, अपने योग्य पति को प्राप्त करती है? ॥५७।।

मेरे पूछने पर उन्होने कहा- 'तुम क्या कह रही हो? उनकी पूजा के विना किसी को कोई भी मिद्धि प्राप्त नहीं हो सकती। हम गणेशजी का प्रभाव तुम्हें बतलाती है, सुनो।' ऐसा कहकर सहेलियो ने मुझे यह कथा सुनाई ॥५८-५९।।

गणपति की कथा

प्राचीन काल में देवता लोग सेनापतित्व के लिए शिवजी के पुत्र को चाहते थे, तारकासुर ने इन्द्र को भगा दिया और शिवजी ने कामदेव को दग्ध कर दिया। ऊर्ध्वरेता (आजन्म ब्रह्मचारी) अत्यन्त उग्र एव लम्बी तपस्या मे बैठे हुए शिवजी को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए पार्वती ने तप किया और पुत्र की प्राप्ति एव कामदेव का पुनर्जन्म माँगा; किन्तु उसने कार्य-सिद्धि के लिए गणेशजी के पूजन का स्मरण नहीं किया ।।६०-६२।।

तब अपना अभीष्ट चाहनेवाली पार्वती मे शिव ने कहा- 'प्रिये! सबसे पहले प्रजापति ब्रह्मा के मन से काम देव उत्पन्न हुआ। वह उत्पन्न होते ही मद से वोला, किसे उन्मत्त करूँ ?' तब प्रजापति ने उसका नाम कदर्प रख दिया और उससे बोले- 'बेटा, तुम्हे अत्यन्त दर्प हो गया है, तो एक त्रिनेत्र शिव से अपनी रक्षा करना। कही उससे तुम्हारी मृत्यु न हो। ब्रह्मा से इस प्रकार समझाया हुआ भी दुष्ट कामदेव मुझे क्षुब्ध करने के लिए आया और मैंने उसे दग्ध कर दिया। वह पुनः देह के साथ जीवित नही हो सकता ।॥ ६३-६६।।

तुम्हे तो मैं अपनी ही शक्ति से पुत्र उत्पन्न कर दूंगा। साधारण सांसारिक जनो के समान मुझे कामदेव की प्रेरणा से प्रजोत्पादन-शक्ति की आवश्यकता नहीं है ।। ६७।।

जब शिवजी पार्वती से इस प्रकार कह रहे थे, तभी उनके सम्मुख ब्रह्मा, इन्द्र के साथ प्रकट हुए। उन्होंने स्तुति करके शिवजी से तारकासुर से शान्ति के लिए प्रार्थना की। शिवजी ने भी पार्वती की कोख से सन्तान उत्पन्न करना स्वीकार किया ।।६८-६९।।

और, ब्रह्मा के कहने पर प्राणियों के चित्त में कामदेव का जन्म होना भी स्वीकार किया, जिससे सृष्टि का विच्छेद न हो। उन्होंने अपने चित्त में भी कामदेव को स्थान दिया। इससे प्रसन्न होकर ब्रह्मा चले गये और पार्वती प्रसन्न हुई।।७०-७१।।

कुछ दिन व्यतीत होने पर एक बार एकान्त में शिव-पार्वती का समागम हुआ ॥७२॥

स्वामि कार्तिकेय की उत्पत्ति

सैकडों वर्ष व्यतीत होने पर भी क्रीडा ममाप्त न हुई, प्रत्युत उनमे तीनो लोक काँप गये । ससार के नाश के भय से शिव की क्रीडा में विघ्न डालने के लिए देवताओ ने ब्रह्मा की आज्ञा से अग्नि का स्मरण किया। स्मरण करते हो उपस्थित हुआ अग्नि शिवजी के भीषण क्रोध का स्मरण करके देवताओं से भागकर जल में जा छिपा ।।७३-७५।।

जल में अग्नि के ताप में जलते हुए मेहको ने अग्नि को खोजते हुए देवताओ से जल में छिपे अग्नि का पता बता दिया ।।७६।।

अग्नि मेढको को अस्पष्ट वाणीवाले होने का शाप देकर और छिपकर मन्दराचल पर चला गया। वहां देवताओ ने, पर्वत के दरें में शम्बूक (घांघा) के रूप में उस अग्नि को देखा। वहाँ उसने गजशुक नाम से देवताओं को दर्शन दिया ।।७७-७८।।

अग्नि ने सुग्गों की जिह्वा को पलटने का शाप दिया और देवताओ के स्तुति करने पर अग्नि ने देवताओ के कार्य को स्वीकार कर लिया ।। ७९।।

अग्नि ने जाकर अपनी गर्मी में शिवजी को तुरत क्रीडा से विरत करके और प्रणाम करके देवताओ का कार्य निवेदित किया। प्रचण्ड वेगवान् शिवजी ने वह्नि में ही अपना वीर्य स्थापित कर दिया; क्योंकि उसे पार्वती और अग्नि दोनों ही धारण करने में असमर्थ थे ।।८०-८१।।

'मैंने तुमसे पुत्र नहीं प्राप्त किया' - ऐसा कहती हुई पार्वती को शिव ने कहा- ॥८२॥

'इस कार्य में विघ्नेश (गणेश) का पूजन न करने से यह विघ्न तुम्हें प्राप्त हुआ। इसलिए गणेश-पूजा करो, तो अग्नि में हम दोनो का पुत्र उत्पन्न होगा' ।॥८३॥

शिवजी से इस प्रकार कही गई पार्वती ने विघ्ननाशक गणेश का पूजन किया और उस शिवजी के अमोघ वीर्य से अग्नि को गर्भ रह गया ।।८४।।

शिवजी के तेज को धारण किये हुए अग्नि ऐसा चमक रहा था, जैसे सूर्य के तेज के अन्दर प्रविष्ट होने से आग चमकती है ।।८५।।

कुछ समय के अनन्तर अग्नि ने उम अमह्य शिव के तेज को गंगा में वमन करके गिरा दिया और गगा ने, शिव की आज्ञा से उगे मुमेरु पर्वत पर वह्नि-कुंड में छोड दिया ।।८६।।

वहाँ पर शिवजी के गणो में रक्षा किया जाता हुआ वह तेज, एक हजार वर्ष के अनन्तर छह मुँहवाले कुमार के रूप में उत्पन्न हुआ ।।८७।।

तब गौरी (पार्वती) के द्वारा नियुक्त छह कृत्तिकाओं के स्तनों से छह मुखों द्वारा दूध पीकर वह कुमार कुछ दिनों मे वडा हो गया ।॥८८॥

इसी बीच तारकासुर से भगाया हुआ इन्द्र, युद्ध छोडकर सुमेरु पर्वत की चोटियो में छिप रहा था ।। ८९।।

ऋषियो के साथ देवनागण पण्मुख कुमार की शरण में गये, कुमार ने भी उनकी रक्षा की ।।९०।।

यह जानकर और राज्य को हारा हुआ समझकर, इन्द्र को क्षोभ हुआ और उसने ईर्ष्या-युक्त होकर कुमार से युद्ध किया ।।९१।।

इन्द्र के वज्र के प्रहार में षण्मुख के अंग से गाख और विशाख दो अनुपम तेजस्वी बालक उत्पन्न हुए ।। ९२।।

पुत्रों के साथ इन्द्र के पराक्रम को दबाते हुए बालक षण्मुख को देखकर शिवजी स्वयं आये और उन्हें युद्ध करने से रोक दिया और कहा- 'तुम तारकासुर को मारने और इन्द्र की रक्षा करने के लिए उत्पन्न हुए हो, इसीलिए उसी अपने यथार्थ कार्य को करो' ।॥ ९३-९४।।

इसी समय प्रसन्न हुए इन्द्र ने, कुमार का सेनापतित्व के लिए अभिषेक किया ।।९५।।

अभिषेक के लिए कलश उठाये हुए इन्द्र का हाथ जब रुक गया, तब इन्द्र को शोक हुआ। उसे देखकर शिवजी ने कहा- 'इन्द्र! तुमने सेनापति का निर्वाचन करते हुए गणेश की पूजा नही की थी, उसी से यह विघ्न हुआ, तब उसका पूजन करो' ।।९६-९७।।

ऐसा सुनकर गणेश-पूजन करने पर इन्द्र के हाथ खुल गये और कुमार के सेनापतित्व का अभिषेक निविघ्न हो गया ।।९८।।

तदनन्तर सेनापति षण्मुखकुमार ने, शीघ्र ही तारकासुर को मारा। देवतागण प्रसन्न हुए और पार्वती ने अपने को पुत्रवती माना ।। ९९।।

तो, बिना गणेश-पूजन के देवताओं को भी सिद्धि सम्भव नही। इसलिए, तू भी उचित पति की प्राप्ति के लिए उनका पूजन कर ।। १००।।

सखियो से इस प्रकार कही गई मैंने बगीचे के एकान्त स्थान में स्थित विघ्नराज की पूजा की थी। पूजा के अन्त में मैंने अकस्मात् देखा कि मेरी सखियाँ, अपनी सिद्धि के प्रभाव से उछलकर आकाश में पक्षियों के समान उड़ रही है ।। १०१-१०२।।

यह देखकर आश्चर्य से मैने उन्हे बुलाकर और नीचे उतारकर पूछा कि यह क्या है ?

तब उन्होंने तुरन्त कहा- मनुष्य का मांस खाने से प्राप्त होनेवाली ये डाकिनी-मन्त्रो की सिद्धियाँ है। कालरात्रि नाम की ब्राह्मणी इस विषय में हमारा गुरु है। आकाश मे चलने की सिद्धि के लिए लोलुप होने पर मानव-माम खाने से भयभीत मैं कुछ समय तक सोचती रही। किन्तु उस मिद्धि का लोभ न रोक सकी और सखियो से बोली कि 'तुमलोग यह दीक्षा मुझे दिलवाओं ॥१०३-१०६।।

तब मेरी प्रार्थना पर वे मेरी सहेलियाँ उसी समय विकट आकृतिवाली कालरात्रि को बुला लाई। उस कालरात्रि का विकट रूप था- जैसे मिली हुई भौहे, नीली आँखें, बँसी हुई चिपटी नाक, फूले लटके हुए स्तन, फूला हुआ पेट, फटे और फूले पाँव, मानों विधाता ने कुरूपता के निर्माण में अपनी विशेषता का प्रदर्शन किया हो ।।१०७-१०९।।

पैरों पर झुकी हुई और स्नान करके गणेश का पूजन किये हुए मुझे नंगी करके वह कालरात्रि मडल के बीच बैठकर भैरव की पूजा करने लगी ॥११०।।

तदनन्तर मेरा अभिषेक करके उसने उन मन्त्रो की दीक्षा दी और देवताओ द्वारा भोग लगाया हुआ मनुष्य का मांस मुझे खाने के लिए दिया ॥१११॥

मन्त्रों की दीक्षा लेकर और मनुष्य के मांस का भक्षण करके मैं नंगी ही सखियों के साथ आकाश में उड़ने लगी ॥ ११२।।

इस प्रकार आकाश में खेल-कूद करके गुरु की आज्ञा से भूमि पर उतरकर मैं अपने निवास-थान पर गई ॥११३

महाराज ! इस प्रकार डाकिनियों की चक्रवत्तिनी होकर मैंने सहेलियो के साथ बहुत-से मनुष्यो का मास खाया ।।११४।।

कालरात्रि की कथा

महाराज ! इसी कथा के बीच एक और कथा सुनो। हमारी उस गुरुजनी कालरात्रि का पति विष्णुदत्त नाम का ब्राह्मण था। वह एक प्रसिद्ध अध्यापक और वेद-विद्या विशारद था और दूर-दूर देश से आते हुए शिष्यों को पढाता था ।।११५-११६।।

विष्णुदत्त के शिष्यों मे सुन्दरक नामक एक युवक शिष्य था, जो बहुत ही विनयी और सदाचारी था ।।११७।।

एक बार विष्णुदत्त की पत्नों, उस कालरात्रि ने मोहित कर एकान्त मे सुन्दरक से अनुचित प्रस्ताव किया, जबकि उसके पति कही बाहर चले गये थे ।। ११८।।

यह सच है कि हमने योग्य कुरूप व्यक्तियों से कामदेव क्रीड़ा करता है, अर्थात् हास्य करता है। तभी तो कुरूपा कालरात्रि ने, अपने रूप को न देखकर सुन्दरक को चाहा ।। ११९।।

प्रार्थना करने पर भी सुन्दरक ऐसा कुकृत्य करना नहीं चाहता था। स्त्रियाँ चाहे जितनी चेष्टाएँ करें, किन्तु मज्जनों का मन हिलता नही ॥१२०॥

सुन्दरक के हाथ न लगने पर कालरात्रि ने क्रोध से दाँतो और नखों से अपने अगों को काटा और नोच-खसोट डाला ।। १२१।।

वह कपड़ो और बालो को बिखेरे हुए रो रही थी। उसी बीच उसका पति विष्णुस्वामी घर आया ।। १२२।।

उसके आते ही उसने पति से कहा- 'देलो, बलात्कार करने की चेष्टा में सुन्दरक ने मेरी यह हालत बना डाली है' ।॥ १२३।।

यह सुनकर अध्यापक विष्णुस्वामी क्रोध से जल उठा। सत्य है, स्त्रियों पर विश्वास करना, विद्वानों की भी विचार-शक्ति को नष्ट कर देता है ।। १२४।।

सायंकाल सुन्दरक के घर आने पर विष्णुस्वामी ने अपने अन्य शिष्यों के साथ उसे दौड़ा-कर मुक्कों, लातों और डडो से खूब पीटा ।। १२५।।

मार खाकर बेहोश सुन्दरक को गुरु ने रात में बाहर गली में लापरवाही से फेंकवा दिया ।। १२६।।

रात की ठंडी वायू से होश में आये सुन्दरक ने अपनी अवस्था को देखा और वह सोचने लगा ॥ १२७।।

जिस प्रकार आँधी, निर्मल जलवाले तालाबों को क्षुब्ध और मलिन कर देती है, उसी प्रकार स्त्री की प्रेरणा रजोगुणी पुरुषो के निर्मल हृदय को क्षुब्ध कर डालती है। इसी कारण वृद्ध और विद्वान् गुरु ने बिना विचारे अति क्रोध से मेरे विरुद्ध भयंकर व्यवहार किया ।।१२८-१२९।।

यह भी बात है कि इस सृष्टि के आरम्भ काल से ही, मोक्ष-मार्ग के विरोधी काम और क्रोध ब्राह्मणो मे दैवयोग से प्रकृति-सिद्ध होते है ।॥ १३०॥

जैमे पूर्वकाल में अपनी स्त्रियो के नष्ट होने की शका से देवदारु-वन में, मुनिगण, शिवके ऊपर क्रुद्ध हो गये थे। उन्होंने पार्वती को ऋपियो की अशान्तता दिखलाते हुए क्षपणक रूप-धारी शिव को नही पहिचाना। शिवजी के शाप देने पर तीनों जगत् को हिला देनेवाले शिवजी को पहचान करके वे लोग फिर शिवजी की शरण में गये ।।१३१-१३३।।

इस प्रकार काम, क्रोध आदि छह गत्रुओं से ठगे हुए ऋषिगण भी जब मोहित हो जाते है तब वेदपाठी ब्राह्मणों की तो बात ही क्या ? ।।१३४।।

इस प्रकार सोचता हुआ सुन्दरक रात को चोर-डाकुओ के भय से पास की सूनी गोशाला मे जाकर ठहरा ।।१३५।।

वह गोशाला के एक कोने में अभी बैठ ही रहा था कि उम मकान में कालरात्रि आ पहुँची ।।१३६।।

वह छुरी लिए हुए भीषण फूत्कार करती हुई आँखो और मुख से आग की ज्वाला फेंक रही थी और अनेक डाकिनियों के झुड के साथ थी ।। १३७।।

इस प्रकार आई हुई कालरात्रि को देखकर डरा हुआ सुन्दरक राक्षसों का नाश करने-वाले मन्त्रों का जप करने लगा ॥ १३८।।

उसके मन्त्र-जप से मोहित कालरात्रि ने भय से एक कोने में सिकुड़ हुए उसे नही देखा ।।१३९।।

तदनन्तर डाइन सहेलियों के साथ उस कालरात्रि ने उड़ने का मन्त्र पढ़ा और गौओ के बाड़े के साथ उड़कर आकाश-मार्ग से उज्जयिनी चली गई। उसी समय सुन्दरक ने सुनकर -उसके मत्र को जान लिया ।। १४०-१४१।।

वहाँ (उज्जैन में) मन्त्र से उसने उस मकान को एक साग के बाड़े में उतारा और वहाँ से श्मशान में जाकर डाइनों के साथ क्रीड़ा करने लगी ॥१४२।।

उसी समय भूख लगने पर सागबाड़े में उतर कर सुन्दरक ने वहा से उम्बाड़ी हुई मूलियो से भूख शान्त की ।। १४३।।

भूख मिटाकर सुन्दरक फिर पहले के समान गोवाट में आकर बैठ गया। कालरात्रि भी रात को आई और पहले के समान शिष्याओ के साथ मन्त्र-मिद्धि के बल से गोवाट को उड़ाकर अपने घर आ गई ।।१४४-१४५।।

गोवाट को पुनः अपने स्थान पर रखकर शिष्याओ को भेजकर वह अपने शयनागार में चन्नी गई ।।१४६।।

विघ्ना से चकित सुन्दरक ने वह रात किसी प्रकार बिताई। प्रातः काल गोवाट को छोड़ कर अपने मित्रों के समीप गया। उनसे अपना वृत्तान्त सुनाकर वह विदेश जाने के लिए तैयार हुआ, किन्तु मित्रो के समझाने बुझाने में उसने वही रहना स्वीकार किया ।।१४७-१४८।।

गुरु-गृह को छोड़कर वह मत्र (अन्नमत्र) में भोजन करने लगा और मित्रो के साथ स्वतन्त्रतापूर्वक विहार करने लगा ।। १४९।।

एक बार वह कालरात्रि घर का सामान खरीदने के लिए निकली और उसने बाजार में सुन्दरक को देखा और निकट जाकर कहा- 'हे सुन्दरक ! काम से पीड़ित मुझे अब भी स्वीकार कर लो, मेरा जीवन सदा के लिए तुम्हारे अधीन है' ।। १५०-१५१।।

उसके ऐसा कहने पर वह सज्जन सुन्दरक बोला- 'माता, ऐसा न कहो। गुरुपत्नी का गमन करना धर्म नहीं है। तुम मेरी माता और गुरुपत्नी हो' ।।१५२।।

कालरात्रि फिर बोली- प्रदि तुम धर्म पर ध्यान देते हो 'तो मेरे प्राणों की रक्षा करना भी महान् धर्म है' ।।१५३।।'

तब सुन्दरक बोला- 'माता, हृदय में ऐसी बात न लाओ। गुरुपत्नी का गमन करना कहाँ का घर्म है?' ।।१५४।।

इस प्रकार उससे तिरस्कृत कालरात्रि उसे फटकारती हुई अपने हाथ से अपनी चादर फाड़कर घर चली गई और पति से बोली- 'देम्बो, सुन्दरक ने मेरी यह दशा की है' ।।१५५-१५६॥

यह सुनकर उसके पति ने क्रोध से जाकर उसके वध की घोषणा की और सत्र में उसका भोजन बन्द करा दिया ।। १५७।।

गोवाट मे सीखे हुए उड़ने के मन्त्र को जानता हुआ सुन्दरक, उम नगर को छोड़कर जाने को उद्यत हुआ; किन्तु उतरने का मन्त्र नहीं जानता था, जो सुनने पर भी भूल गया था। उसे पुनः सीखने के लिए वह फिर उसी सूने गौ-बाड़े मे गया ।। १५८-१५९।।

जब वह उन बाडे में छिपकर बैठा था. तब पहले के समान कालरात्रि वहाँ आई और मकान-महित उड़कर उज्जैन गई ।।१६०।।

वहाँ पर मन्त्र में साग के बाड़े में गोवाट को उतारकर रात का नृत्य करने के लिए फिर श्मशान में गई ।। १६१॥

सुन्दरक ने, आकाय में उतरने का मन्त्र सुनकर भी याद नही किया, गुरु के उपदेश के विना मन्त्र-मिद्धि कैसे पूरी हो सकती है ॥ १६२।।

वहां पर उसने पहले के समान मूलियों खाई और कुछ ले जाने के लिए वही रख ली और पहले के गमान छिप गया ।। १६३।।

तदनन्तर कालरात्रि, उस गोवाट-रूपी वाहन पर चढ़कर अपने नगर में आई और वाहन को वैसे ही रखकर अपने घर चली गई ।।१६४।।

वह सुन्दरक भी सबेरे गोवाट से निकलकर मूलियों को बेचकर भोजन का दाम प्राप्त करने के लिए बाजार में गया ।। १६५।।

जब वह मूली बेच ही रहा था, तब मालवा की मूलियाँ बताकर मालवा के सिपाहियो ने अपने देश की बताकर उसने मूलियाँ छीन ली ।। १६६।।

उनमे झगडने हुए मुन्दरक को उसके मित्रो के माथ मिपाही उसे राजा के समीप ले गये ।।१६७७॥

उन दुष्ट सिपाहियों ने राजा में कहा- 'हमलोग उससे पूछते है कि तुम मालवा से मूली लाकर कन्नौज में कैसे बेचते हो? हमारे पूछने पर यह उत्तर नही देता, उल्टे ढेलों और पत्थरो से मारता है।' तब राजा ने भी उससे उस आश्चर्य के सम्बन्ध में पूछा। तब सुन्दरक के मित्र बोले- 'महाराज ! यदि इसको हमलोगो के साथ राजमहल पर चढा दिया जाय, तो यह सब आश्चर्य-वृत्तान्त सुना देगा ।।१६८-१७०।।

स्वीकार करके राजा ने उसे महल पर चढ़ा दिया और वह सुन्दरक राजा के देखते-देखते मन्त्र के प्रभाव से राजभवन समेत आकाश में उड़ गया ।। १७१।।

मित्रों के साथ उड़कर वह प्रयाग पहुंचा और थक गया। प्रयाग में उसने स्नान करते हुए किसी राजा को देखा ।।१७२।।

वहाँ पर राजभवन को रोककर लोगों द्वारा आश्चर्य से देखा जाता हुआ सुन्दरक आकाश से गगा में कूद पड़ा और राजा की ओर गया ।। १७३।।

राजा ने नम्रता से पूछा- तुम कौन हो? और आकाश से क्यो उतरे हो?' तब सुन्दरक बोला- 'मैं शिवजी का मुरजक नाम का गण हैं। मनुष्यो के भोग भोगने के लिए उनकी आजा से तुम्हारे पास आया हूँ।' यह सुनकर और उसे सच मानकर राजा ने उसे अन्न, घन, स्त्री, रत्न आदि में भरा हुआ एक नगर मनुष्य-भोग के लिए दे दिया ॥ १७४-१७६।।

उस नगर में जाकर अपने मित्रो के साथ आकाश में उड़कर सुन्दरक चिरकाल के लिए स्वच्छन्दतापूर्वक विचरण करने लगा ।। १७७।।

सोने के पलगों पर सोता हुआ, चंवरो से डुलाया जाता हुआ एव मुन्दरी स्त्रियों से सेवित वह इन्द्र के समान मुख भोगने लगा ॥१७८॥

एक बार, किमी आकाशचारी सिद्ध ने, उसकी स्तुति से प्रसन्न होकर उसे आकाश से उतरने का मन्त्र भी दे दिया। उतरने का मन्त्र प्राप्त कर वह सुन्दरक उड़कर अपने देश कान्य-कुब्ज (कन्नौज) में उतरा। उसे नगर के साथ पूर्ण लक्ष्मी से युक्त एव आकाश से उतरे हुए जानकर कान्यकुब्ज का राजा स्वय उसके समीप आया। राजा ने उसे पहचानकर पूछा, तो उसने अवसर समझकर कालरात्रि का सारा कृत्य उसे सुना दिया। तब राजा ने कालरात्रि को बुलवाकर पूछा। उसने भी निर्भय होकर अपनी दुष्टता बता दी और स्वीकार किया ।। १७९-१८३।।

राजा क्रुद्ध होकर उसके कान काटने के लिए जैसे ही उद्यत हुआ, वैसे ही सबके देखते-देखते पकड़ी हुई कालरात्रि गुम हो गई ।। १८४।।

तब राजा ने अपने राज्य से उसके निर्वासन की आज्ञा दे दी और राजा से सम्मानित सुन्दरक फिर आकाश में उड़ गया ।। १८५।।

रानी कुवलयावली राजा आदित्यप्रभ को इस प्रकार कथा सुनाकर बोली- 'महाराज ! डाकिनी-मन्त्रो की सिद्धियाँ इसी प्रकार की होती है' ।।१८६-१८७।।

यह सारा समाचार मेरे पिता के देश में प्रसिद्ध है। मैं भी उसी कालरात्रि की शिष्या हूँ, यह मैंने पहले ही कहा था, किन्तु पतिव्रता होने के कारण मेरी सिद्धि उससे भी बढ़ी चढ़ी है ।।१८७-१८८।।

तुम्हारे कल्याण के लिए ही पूजन करते हुए तुमने मुझे आज देख लिया है। मैं बलि देने के लिए उपयुक्त मनुष्य को आकृष्ट करने के लिए तैयार थी ।। १८९॥

इसलिए तुम्हीं हमारे सम्प्रदाय मे अब प्रवेश करो- आ जाओ। सिद्धियो के प्रभाव से जीते हुए राजाओं के सिर पर पैर रखो ।॥ १९०।।

डाइनों के मत में आकर कहाँ महामांम का भोजन और कहाँ मैं राजा ! यह सम्भव नही है-ऐसा कहकर राजा ने निषेध कर दिया ।। १९१।।

जब रानी प्राण-त्याग करने के लिए तैयार हो गई, तब राजा ने विवश होकर डाकिनी के मत मे आने की स्वीकृति दे दी। विषयी लोग सुपथ में कैसे रह सकते है ? ॥ १९२॥

तब प्रसन्न रानी ने पहले ही पूजा किये हुए मंडल में राजा को बुला लिया और बोली- 'यह जो तुम्हारे पास फलभूति नाम का ब्राह्मण है, उसे ही मैंने बलिदान के लिए आकृष्ट करने का निश्चय किया था। किन्तु आकृष्ट करने में अत्यन्त परिश्रम होता है, इसलिए अच्छा हो कि तुम रसोइयो में से किसी एक को अपने मत में मिलाओ, जो स्वय मारे भी और पकावे भी ।।१९३-१९५।।

तुम्हे उस मास-भक्षण से घृणा नही करनी चाहिए, पूजा समाप्त होने पर सिद्धि अवश्य होगी, क्योकि सफलता ही मर्वोत्तम है ।।१९६।।

प्यारी पत्नी से इस प्रकार बाधित राजा ने पाप से डरते हुए भी उसकी बात मान ली। सच है, स्त्रियों के प्रति अनुरोध होना ५ खद होता है ।।१९७।।

तब राजा ने साहमिक नामक रसोइये को बुलाकर और विश्वास दिलाकर तथा अपने मत में दीक्षित करके (चेला बनाकर) राजा और रानी दोनों ने उससे साथ ही कहा- ।।१९८।।

'आज राजा, रानी के साथ भोजन करेंगे, इसलिए जल्दी भोजन तैयार करो'- इस प्रकार का सन्देश, जो भी व्यक्ति तुम्हारे पास आकर कहे, उसे तुम मार डालना और उसके मास से प्रात. काल, एकान्त में, हम दोनो के लिए तुम स्वादिष्ठ भोजन बनाना। इस प्रकार आज्ञा पाकर रसोइया 'ठीक है' ऐसा कहकर अपने घर चला गया ।।१९९-२००।।

तदनन्तर समीप आये हुए राजा ने फलभूति से कहा कि 'जाओ! माहसिक नामक रसोइये से रसोईघर में जाकर कह दो कि 'आज राजा, रानी के साथ स्वादिष्ठ भोजन करेंगे, इसलिए शीघ्र ही अच्छा स्वादिष्ठ भोजन बनाओ' ॥२०१-२०२।।

'ऐमा ही होगा' कहकर फलभूति जैसे ही बाहर निकला, वैसे ही चन्द्रप्रभ नाम का राज-पुत्र (राजकुमार) आकर उससे बोला कि यह सोना लो और इस सोने से मेरे लिए वैसे ही कानों के कुंडल शीघ्र बनवाकर लाओ; जैसे तुमने पिताजी के लिए बनवाये थे ।।२०३-२०४॥

राजकुमार की आज्ञा से फलभूति सोना लेकर तुरन्त कुंडल बनवाने के लिए चला गया। उबर फरुभूति का सन्देश लेकर अकेला ही राजकुमार रसोईघर में साहसिक रसोइये के ममीप गया ।। २०५-२०६।।

रसोईघर में राजा की आज्ञा से रसोइया पहले से ही तैयार बैठा था। उसने छुरी से राज-कुमार का वध कर डाला ॥२०७३।

उमके मांस से पकाये हुए भोजन को राजा और रानी ने पूजन करने के अनन्तर खाया; क्योंकि वे सच्ची बात नहीं जानते थे कि फलभूति के स्थान पर अपने ही पुत्र का मास खा रहे हैं।॥ २०८॥

पश्चात्ताप से पीड़ित राजा ने किसी प्रकार रात बिताकर प्रात काल हाथ में कुडल लेकर आये हुए फलभूति को देखा ॥ २०९॥

घबराये हुए राजा ने कुडल के बहाने उनसे समाचार पूछा। उसके द्वारा मारा समाचार सुनाने पर राजा अचेत होकर भूमि पर गिर पड़ा, फिर होश में आकर अपने साथ रानी को कोसता हुआ 'हाय बेटा'! 'हाय बेटा!' इस प्रकार चिल्लाने लगा। मन्त्रियो के पूछने पर उसने सारा सच्चा समाचार सुना दिया ।। २१०-२११।।

फलभूति का वह वचन भी बोला, जिसे वह प्रतिदिन कहा करता था कि 'भला करनेवाले का भला होता है और बुरा करनेवाले का बुरा ही होता है' ।॥ २१२।।

जैसे सामने दीवार पर फेंका हुआ गेंद लौटकर फेंकनेवाले पर आकर गिरता है, उसी प्रकार दूमरे का बुरा चाहनेवाले का अपना बुरा होता है।॥ २१३।।

हम पापियो ने ब्रह्महत्या करनी चाही थी, उसी के फलस्वरूप अपने ही पुत्र का मांस खाना पड़ा ।। २१४।।

ऐसा कहकर और शोक एवं आश्चर्य से नीचे मुँह लटकाये हुए मन्त्रियों को समझाकर और अपने राज्य पर उसी फलभूति को बैठाकर तथा दान देकर अपुत्र राजा अपने पापो का प्रायश्चित्त करने के लिए रानी के साथ आग में जल मरा, यद्यपि पश्चात्ताप की आग से वह पहले ही जल चुका था ।। २१५-२१६।।

इधर फलभूति राज्य पाकर देश का शासन करने लगा। ठीक है, अच्छा या बुरा जो कुछ भी किया जाता है, वह अपने ऊपर है। घटित होता है ।। २१७।।

यौगन्धरायण, वत्सराज के सम्मुख यह कथा कहकर राजा से फिर बोला-'हे राजेन्द्र ! जीतकर भी उसकी कल्याण-कामना करते हुए तुम्हारा यदि ब्रह्मदत्त (काशिराज) अपकार करता है, तो तुम उसे दड दे सकते हो' ।। २१८-२१९।।

मुख्य मन्त्री से इस प्रकार कहे गये राजा ने उसकी सम्मति का अभिनन्दन किया और उठकर प्रातःकालीन कृत्यो से निवृत्त होने में लग गया ॥ २२०।।

और दूसरे दिन वह नीतिकुशल राजा उदयन समस्त दिशाओ को जीतकर लावाणक से अपनी नगरी कौशाम्बी को चला ॥२२१॥

वत्सराज सभी साधनों के साथ क्रमश. चलकर अपनी नगरी पहुँचा। जो (नगरी) पताकारूपी भुजलता को उपर उठाकर आनन्द से नाचती-सी मालूम हो रही थी ॥ २२२॥

नागरिकों की कमल-कानन जैमी आँखो को पग-पग पर हवा के झोको के समान झकोरता हुआ (वत्सराज) ने नगरी में प्रवेश किया ।॥ २२३।।

चरणों से प्रशंसित, वन्दियों में अभिवन्दित और राजाओ से प्रणाम किया जाता हुआ राजा अपने भवन मे गया ।। २२४।।

तब सभी देशों के विनम्र राजाओं को अपने शासन में लाकर परम्परा के अनुसार पूर्वाजित सिंहासन पर साधिकार बैठा ।। २२५।।

उस समय मांगलिक वाद्यों के धीर-गम्भीर शब्दों से आकाश इस प्रकार गूंज उठा, मानों राजा के मुख्य मन्त्रियो द्वारा परितोषित लोकपालां ने प्रत्येक दिशा से एक साथ साधुवाद दिये हों ॥ २२६॥

इसके बाद लोभरहित राजा ने दिग्विजय के क्रम में अजित विपुल धन ब्राह्मणो को दिया और महोत्सव मनाकर सभी नरेशों तथा अपने मन्त्रियों को कृतार्थ किया ।।२२७।।

इस प्रकार वह राजा जब अपने गुणों के अनुसार पात्रों में दान कर रहे थे, तब बजते हुए मृदंग की मेघ-मन्द ध्वनि से प्रतिध्वनित उस नगरी की प्रजा भी अनेक प्रकार के धन-धान्य की संभावना करती हुई अपने घरो में उत्सव मनाने लगी ॥२२८॥

इस प्रकार वह नीतिनिपुण राजा वत्सराज समस्त संसार को जीतकर रुमण्वान् और यौगन्धरायण को राज्य का भार सौंपकर पद्मावती और वासवदत्ता के साथ स्वच्छन्द विहार करने लगा ।। २२९।।

कीति और श्री के समान उन दोनों देवियों के बीच में बैठा वह वत्सराज श्रेष्ठ चारणों से प्रशंसित अपने यश के समान उज्ज्वल चन्द्रोदय का आनन्द लेता हुआ, शत्रु के प्रताप के समान मद्य का निरन्तर पाम करने लगा ॥२३०॥

छठा तरंग समाप्त

कथासरित्सागर का लावाणक नामक तृतीय लम्बक समाप्त

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1. प्राचीन समय में राजा लोग ब्राह्मणों को जीवन निर्वाह के लिए जल-सिंचाई आदि सुविधावाली भूमि वान देते थे। उसे अग्रहार कहते हैं। वक्षिण-भारत में अब भी ऐसे सहलों अग्रहार मिलते हैं।




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