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Showing posts from April, 2026

51101 || प्रथम कहानी || नरवाहनदत्त की कथा (क्रमागत); रुचिरदेव और पोतक की कथा ।

51101 || प्रथम कहानी || नरवाहनदत्त की कथा (क्रमागत); रुचिरदेव और पोतक की कथा । वेला नामक एकादश लम्बक [ प्रारम्भिक पद्म का अर्थ सप्तम लम्बक के प्रथम तरंग के प्रारम्भ में देखें।] प्रथम तरंग मंगलाचरण नम्र भक्तों के समस्त दुःखों और विघ्नों को दूर करनेवाले, समस्त सिद्धियों के देनेवाले और पाप-रूपी समुद्र से पार लगानेवाले गजानन को प्रणाम है ।।१।। नरवाहनदत्त की कथा (क्रमागत) वत्सराज उदयन का पुत्र नरबाहनदत्त, इस प्रकार शक्तियशा नाम की पत्नी को पाकर मदनमंचुका आदि पहली रानियों के साथ, कौशाम्बी नगरी में अपने मित्रों के सहित, पिता के पास रहता हुआ, आनन्द-विलास करता था ।॥२-३।। रुचिरदेव और पोतक की कथा  एक बार जब वह उद्यान में भ्रमण कर रहा था कि अकस्मात् दो राजपूत-बन्धु उसके पास आये ॥४॥ नमस्कार, आतिथ्य आदि शिष्टाचार के अनन्तर उन दोनों में से एक ने कहा- 'हम दोनों वैशाख नगर के राजा के दो सौतेले पुत्र हैं ।।५।। मेरा नाम रुचिरदेव और इस दूसरे का नाम पोतक है। मेरे पास तेज चलनेवाली एक हथिनी है और इसके पास दो घोड़े हैं ॥६॥ इन पशुओं के कारण हम दोनों में विवाद उत्पन्न हो गया है। मैं कहता हूँ कि हथिनी तेज चलत...

51009.10 || दशम कहानी || नरवाहन दत्त और शक्तियसा का विवाह।

51009.10 || दशम कहानी || नरवाहन दत्त और शक्तियसा का विवाह। दशम तरंग तब दूसरे दिन फिर रात में, मनोरंजन के लिए मन्त्री गोमुख ने नरवाहनदत्त के लिए यह कथा सुनाई ।।।१॥ प्राचीन समय में धारेश्वर नामक शिव-क्षेत्र में बहुत-से शिष्यों द्वारा सेवित एक महामुनि रहता था ।॥२॥ किसी समय उस मुनि ने, अपने शिष्यों से कहा- 'तुम लोगों में से किसी ने कोई अपूर्व कुछ देखा या सुना हो, तो बताओ' ॥३॥ मुनि के ऐसा कहने पर एक शिष्य बोला- 'मैने जो कुछ नया सुना है, उसे कहता हूँ, सुनिए' ॥४॥ कश्मीर देश में विजय नाम का विशाल शिव-क्षेत्र है। उस क्षेत्र में एक विद्याभिमानी संन्यासी था ।।५।। एकबार वह संन्यासी 'मैं सब स्थानों पर विजयी होऊँ, ऐसी कामना करता हुआ शिवजी को प्रणाम करके शास्त्र-वाद (शास्त्रार्थ) के लिए पाटलिपुत्र की ओर चला ॥६॥ रास्ते में जंगलों, नदियों और पहाडों को लांघता हुआ वह एक सुनसान वन में पहुंचकर एक वृक्ष के नीचे विश्राम करने लगा ॥७॥ कुछ ही समय के पश्चात् बावली से शीतल उस स्थान पर उसने लम्बी यात्रा के कारण धूल से भरे, सोंटा और कुंडी हाथ में लिये हुए एक धार्मिक पुरुष को देखा ।।८।। उसके वहाँ...

51009 || नवम कहानी || गोमुख द्वारा नरवाहनदत्त को सुनाई गई विविध कयाएँ; बोधिसत्त्व के अंश से उत्पन बनिये को कथा; सिंह की आत्म कथा; स्वर्णचूड पक्षी की आत्म कथा; सर्प की आत्मकथा; दुष्टा स्त्री की आत्मकथा; मूर्ख टक्क की कथा; मार्जार-मूर्ख की कथा; हिरण्याक्ष की कथा।

51009 || नवम कहानी || गोमुख द्वारा नरवाहनदत्त को सुनाई गई विविध कयाएँ; बोधिसत्त्व के अंश से उत्पन बनिये को कथा; सिंह की आत्म कथा; स्वर्णचूड पक्षी की आत्म कथा; सर्प की आत्मकथा; दुष्टा स्त्री की आत्मकथा; मूर्ख टक्क की कथा; मार्जार-मूर्ख की कथा; हिरण्याक्ष की कथा। नवम तरंग गोमुख द्वारा नरवाहनदत्त को सुनाई गई विविध कयाएँ दूसरे दिन रात में, फिर पहले के ही समान मनोविनोद करते हुए गोमुख मन्त्री ने नरवाहनदत्त के लिए कथा सुनाई ॥१॥ बोधिसत्त्व के अंश से उत्पन बनिये को कथा किसी नगर में बोधिसत्त्व के अंश से उत्पन्न किसी धनी बनिये (सेठ) का लड़का था, जिसकी माँ मर गई थी ॥२॥ दूसरी स्त्री (सौतेली माँ) के वशीभूत और उसी के द्वारा प्रेरित पिता से वनवास के लिए निर्वासित वह पुत्र, अपनी पत्नी के साथ घर से निकल गया ।॥३॥ अपने साथ आते हुए अपने अशान्तचित्त छोटे भाई को लौटाकर वह दूसरे ही मार्ग से गया ॥४॥ चलते-चलते मार्ग में भोजन-रहित वह क्रमशः प्रचंड सूर्य की किरणों से संतप्त महान् मरुस्थल में जा पहुँचा ॥५॥ उस मरुस्थल में, सात दिनों तक थकी-माँदी और भूखी-प्यासी स्त्री को वह अपने मांस और रक्त से जिलाता रहा। वह पापिनी...

51008 || अष्टम कहानी || गोमुख द्वारा नरवाहनदत्त से कही गई नई-नई कथाएँ; ब्राह्मण और नेवले की कथा; मूर्ख रोगी और वैद्य की कथा; मूर्ख पुरुष और तपस्वियों की कथा; घट और कर्पर नाम के चोरों की कथा;

51008 || अष्टम कहानी || गोमुख द्वारा नरवाहनदत्त से कही गई नई-नई कथाएँ; ब्राह्मण और नेवले की कथा; मूर्ख रोगी और वैद्य की कथा; मूर्ख पुरुष और तपस्वियों की कथा; घट और कर्पर नाम के चोरों की कथा। अष्टम तरंग गोमुख द्वारा नरवाहनदत्त से कही गई नई-नई कथाएँ दूसरे दिन रात को अपने वास-गृह में बैठे हुए और नई वधू को पाने के लिए उत्सुक वत्सराज के पुत्र का मनोरंजन करते हुए मन्त्री गोमुख ने, उसी की आज्ञा से फिर क्रमशः इस प्रकार कथाएँ कहना प्रारम्भ किया ॥ १-२॥ ब्राह्मण और नेवले की कथा¹ किसी नगर में देवशर्मा नाम का एक ब्राह्मण था। उसको देवदत्ता नाम की स्त्री उसी के समान अच्छे कुल की थी ॥३॥ उसकी पत्नी ने गर्भ धारण करके यथासमय एक पुत्र उत्पन्न किया। वह ब्राह्मण निर्धन होने पर भी उस पुत्र को एक महती सम्पत्ति के लाभ के समान समझता था ॥४।। सूतक के अन्त में, उसकी स्त्री नदी में स्नान करने गई और देवशर्मा उस नवजात शिशु की देख-भाल करता हुआ घर में ही रहा ॥५॥ इतने में ही राजा के रनिवास से स्वस्ति-वाचन के लिए उसे बुलाने एक दासी वहाँ आई ।।६।। तब वह ब्राह्मण दक्षिणा के लोभ से शिशु की रक्षा के लिए अपने पालतू नेवले को वह...