51101 || प्रथम कहानी || नरवाहनदत्त की कथा (क्रमागत); रुचिरदेव और पोतक की कथा ।
51101 || प्रथम कहानी || नरवाहनदत्त की कथा (क्रमागत); रुचिरदेव और पोतक की कथा ।
वेला नामक एकादश लम्बक
[ प्रारम्भिक पद्म का अर्थ सप्तम लम्बक के प्रथम तरंग के प्रारम्भ में देखें।]
प्रथम तरंग
मंगलाचरण
नम्र भक्तों के समस्त दुःखों और विघ्नों को दूर करनेवाले, समस्त सिद्धियों के देनेवाले और पाप-रूपी समुद्र से पार लगानेवाले गजानन को प्रणाम है ।।१।।
नरवाहनदत्त की कथा (क्रमागत)
वत्सराज उदयन का पुत्र नरबाहनदत्त, इस प्रकार शक्तियशा नाम की पत्नी को पाकर मदनमंचुका आदि पहली रानियों के साथ, कौशाम्बी नगरी में अपने मित्रों के सहित, पिता के पास रहता हुआ, आनन्द-विलास करता था ।॥२-३।।
रुचिरदेव और पोतक की कथा
एक बार जब वह उद्यान में भ्रमण कर रहा था कि अकस्मात् दो राजपूत-बन्धु उसके पास आये ॥४॥
नमस्कार, आतिथ्य आदि शिष्टाचार के अनन्तर उन दोनों में से एक ने कहा- 'हम दोनों वैशाख नगर के राजा के दो सौतेले पुत्र हैं ।।५।।
मेरा नाम रुचिरदेव और इस दूसरे का नाम पोतक है। मेरे पास तेज चलनेवाली एक हथिनी है और इसके पास दो घोड़े हैं ॥६॥
इन पशुओं के कारण हम दोनों में विवाद उत्पन्न हो गया है। मैं कहता हूँ कि हथिनी तेज चलती है और यह कहता है, घोड़े ॥७॥
यदि मैं हार गया तो मेरा पण (दाँव) वही हथिनी है और यदि यह हार गया, तो इसके पण वे ही दोनों घोड़े ॥८॥
उनके वेग का अन्तर आपके सिवा दूसरा नहीं जान सकता; इसलिए हे प्रभो, हमारे घर पर पधारकर इसकी परीक्षा कीजिए ।।९।।
आप कृपा करें। आप सभी प्रकार की प्रार्थनाओं के लिए कल्पवृक्ष के समान हैं। इसीलिए हम दोनों प्रार्थी होकर दूर से आपके पास आए हैं' ।।१०।।
इस प्रकार रुचिरदेव से प्रार्थित नरवाहनदत्त ने, घोड़े और हथिनी की प्रतियोगिता के शौक से उसकी बात मान ली ।।११।।
और, वह उसी समय लाये हुए तेज घोड़ोंवाले रथ पर चढ़कर उन दोनों के साथ वैशाखपुर को चला ।।१२।।
चलते-चलते वह क्रमशः वैशाखपुर नगर में पहुँचा। उसके नगर में प्रवेश करते ही उसे देखकर दीवानी और एकटक निहारती हुई नागरिक स्त्रियाँ, नाना प्रकार के तर्क-वितर्क करने लगीं 'यह कौन है? क्या रति को बिना प्राप्त किया नवीन कामदेव तो नहीं है ? अथवा दिन में दीखनेवाला निष्कलंक चन्द्र तो यह नहीं है या ब्रह्मा ने पुरुष के आकार में कामदेव को निर्मित किया है ?' इत्यादि ।।१३-१५।।
वहाँ (वैशाखपुर में) युवराज नरवाहनदत्त ने, शृंगार-रसमय और प्राचीन लोगों से प्रतिष्ठित किया गया कामदेव का एक मन्दिर देखा ।।१६।।
रति और प्रीति देनेवाले उस कामदेव के मन्दिर में जाकर और मूर्ति को नमन करके, कुछ समय तक विश्राम करके उसने मार्ग की श्रान्ति (थकान) दूर की ॥१७॥
विश्राम कर लेने के पश्चात् अगवानी किया जाता हुआ वह देवमन्दिर के समीप-स्थित रुचिरदेव के घर में, प्रेम के साथ प्रवेश किया ॥१८॥
नरवाहनदत्त के आगमन के उत्सव में हाथी और घोड़े को कमी नहीं थी। उनकी विराट् शोभा को देखकर नरवाहनदत्त बड़ा प्रसन्न हुआ ।।१९।।
वहाँ पर रुचिरदेव द्वारा समुचित सत्कार किये गये नरवाहनदत्त ने, अत्यन्त आश्चर्य-मय रूपवाली रुचिरदेव की अविवाहिता बहन को देखा ॥२०॥
उस कन्या के रूप-सौन्दर्य से आकृष्टहृदय और नेत्रवाले नरवाहनदत्त ने, प्रवास में होने-वाले अपनी रानियों के विरह का अनुभव नहीं किया। वह उन्हें भी भूल गया ॥२१॥
उस कन्या ने भी, नीलकमल की माला के सदृश प्रेम से उसके ऊपर डाली हुई दृष्टि से मानों उसे स्वयं वर लिया ॥२२॥
तब उस जयेन्द्रसेना नाम की कन्या का वह इस प्रकार ध्यान करने लगा कि दूसरी स्त्रियों की तो बात ही क्या, निद्रा की भी उसने उपेक्षा कर दी ।।२३।।
दूसरे दिन, घोड़ों की विद्या का रहस्य जाननेवाले नरवाहनदत्त ने, पोतक द्वारा लाये गये वायु से भी अधिक वेगवाले घोड़ों को देखा और स्वयं रुचिरदेव द्वारा लाई गई हथिनी पर बैठकर विद्या के प्रभाव से उसमें अधिक वेग का आधान करके हथिनी को घोड़ों से जिता दिया ॥२४-२५।।
तब रुचिरदेव, उन दोनों अश्व-रत्नों को जीत गया। इसके पश्चात् युवराज, जैसे ही रुचिरदेव के घर में प्रवेश कर रहा था कि उसके पिता का एक दूत वहाँ आ पहुँचा। उसे देखकर दूत ने चरणों में प्रणाम करके यह कहा ।।२६-२७।।
तुम्हें अकस्मात् यहाँ आये हुए जानकर तुम्हारे परिवार के साथ सम्मति करके तुम्हारे पिता ने मुझे दूत बनाकर यहाँ भेजा है और आज्ञा दी है कि तुम उद्यान से ही विंना सूचना दिये इननी दूर क्यों चले गये? हमलोग अधीर हो रहे हैं। इसलिये, जिस काम में लगे हो, उसे शीघ्र ही समाप्त करके चले आओ ।॥ २८-२९॥
पिता के दूत से इस प्रकार सुनता हुआ और नवीन प्रेयसी की प्राप्ति की चिन्ता करता हुआ वह नरवाहह्नदत्त कर्तव्य के सन्देह में पड़ गया कि वह क्या करे ॥३०॥
इतने में ही उसी समय अत्यन्त प्रसन्नचित्त एक व्यापारी आकर दूर से ही नमस्कार करके युवराज नरवाहनदत्त से बोला- ॥३१॥
'हे वीर, तुम्हारी जय हो। पुष्प के धनुष और पुष्पों के बाण धारण करनेवाले विद्याधरों के भावी चक्रवर्ती, हे प्रभो, तुम्हारी जय हो ।॥ ३२॥
हे स्वामिन्, बालक होकर भी चित्त को चुरानेवाले और बड़े होकर शत्रुओं को भय देने-वाले तुझे मैंने निःसन्देह देखा ।।३३।।
पाताल को जीतकर क्रमशः स्वर्ग को जीतते हुए उत्कृष्ट गुणोंवाले तुझे आकाशचारी लोग भी अवश्य ही देखेंगे ।। ३४।।
इन वचनों से स्तुति करता हुआ और युबराज से सत्कृत बनिया, युवराज के पूछने पर अपना वृत्तान्त कहने लगा ॥३५॥
व्यापारी और वेला की कथा
"समस्त पृथ्वी की मस्तक-माला के समान लम्पा नाम की एक नगरी है। उस नगरी में कुसुमसार नामक एक धनी वैश्य था ।। ३६।।
हे वत्सराज के नन्दन, उसी परम धार्मिक वैश्य का में चन्द्रसार नामक पुत्र हूँ; जिसे उसने शंकर की आराधना से पाया था ।। ३७।।
एक बार मैं मित्रों के साथ देवताओं की यात्रा देखने के लिए गया। वहाँ मैंने दूसरे धनिकों से दान मांगते हुए भिक्षुओं को देखा ॥३८॥
तब देने की श्रद्धा के कारण मुझे घन उपार्जित करने की इच्छा हुई। पिता द्वारा उपार्जित बहुत लक्ष्मी होने पर भी मैं उससे सन्तुष्ट न था ॥३९॥
इस कारण मैंने समुद्र के मार्ग से दूसरे द्वीपों में जाकर व्यापार द्वारा धन कमाने का विचार करके विविध रत्नों से भरे व्यापारिक नाव पर यात्रा की ॥४०॥
देव और वायु के अनुकूल होने से वह मेरी नाव कुछ ही दिनों में निर्दिष्ट द्वीप पर पहुँच गई ॥४१॥
वहाँ मेरे जवाहरात के व्यापार को धूमधाम से चलते देखकर, उस द्वीप के राजा ने, मुझ पर विश्वास न करके धन के लोभ से, मुझे बाँधकर कारागार में डाल दिया ॥४२॥
नरक के समान उस कारागार में रोते-कलपते भूख-प्यास से पीड़ित, कंकाल-मात्र शेष प्रेतों के समान कैदियों के साथ में कुछ दिनों तक पड़ा रहा ॥४३॥
तब मेरे कुल (वंश) को जाननेवाले वहाँ के महाधनी व्यापारी महीधर ने, मेरे लिए राजा से प्रार्थना की कि 'हे महाराज, यह लम्पा-निवासी वैश्यों के चौधरी का बालक है। यह निर्दोष है, इसे कारागार में रखना आपके लिए निन्दा की बात होगी' ।॥४४-४५॥
इस प्रकार समझाये गये राजा ने, मुझे कैद से छुड़ाकर और अपने पास बुलाकर आदर के साथ मेरा सम्मान किया ॥४६॥
तब राजा की कृपा से, राजा के मित्र महीधर वैश्य के आश्रय में रहते हुए मैं वहाँ व्यापार करता हुआ सुखी था ॥४७॥
एक बार उसी द्वीप में मैंने वसन्तकालीन उद्यान-यात्रा में वहाँ के निवासी शिखर नामक वैश्य की सुन्दरी कन्या को देखा ॥४८।।
कामदेव के दर्प-रूपी समुद्र की लहरी के समान, उस कन्या से हरण (आकृष्ट) किया गया मैं, उसके पिता शिखर के पास गया और उससे उस कन्या की माँग की ॥४९॥
उसके पिता ने, मन में क्षण-भर सोचकर, मुझसे कहा- 'मैं इसे स्वयं अपने हाथों से दान नहीं कर सकता। इसमें कुछ कारण है ।।५०।।
इसलिए, मैं इसे सिंहल-द्वीप में इसके नाना के पास भेज देता हूँ, तुम वहाँ जाकर उससे माँगकर इससे विवाह कर लो ॥५१॥
मैं इसके नाना को ऐसा सन्देश भेज दूंगा कि वह इसे तुम्हें ही देगा। इस प्रकार, कहकर और मेरा समुचित सम्मान करके शिखर ने मुझे घर भेज दिया ।।५२।।
दूसरे दिन, शिखर ने अपने पुरुषों और साज-सामान के साथ, उस कन्या को, समुद्री मार्ग से, नाव पर बैठाकर, सिंहल द्वीप भेज दिया ।।५३।।
उसके जाने के उपरान्त जब मैं सिंहल द्वीप जाने को उद्यत हुआ, तब वज्रपात के समान यह समाचार वहाँ फैल गया ।॥५४।।
कि शिखर की कन्या जिस नाव से गई थी; वह नाव समुद्र में डूब गई। एक भी व्यक्ति उनमें से समुद्र से नहीं निकल सका ।।५५।।
उस समय समाचार-रूपी आँधी से अधीर और नाव के लिए व्याकुल असहाय होकर मैं शोक-समुद्र में डूब गया ॥५६।।
बड़ों से धैर्य दिलाये जाते हुए और आशाओं से मन को शान्त करते हुए मैंने, यह समाचार जानने के लिए सिहल द्वीप जाने का निश्चय किया ॥५७॥
तदनन्तर, राजा का प्रिय होने पर और तरह-तरह के धन से समृद्ध होने पर भी, मैंने जहाज पर चढ़कर समुद्र-यात्रा की ।॥५८॥
जब मैं समुद्र-यात्रा कर ही रहा था कि इतने में धारा-रूपी बाणों की वर्षा करता हुआ भीषण बादल-रूपी चोर, अकस्मात् आकाश में चढ़ आया ।।५९।।
तब विपरीत वायु से और मेरे बलवान् भाग्य से बार-बार टकराकर उछलता हुआ जहाज टूट-फूट कर डूब गया ।।६०।।
भाग्यवश मेरे साथियों और धन-सम्पत्ति के समुद्र में डूब जाने पर, समुद्र में बहते हुए मैंने, एक बड़ा लकड़ी का तख्ता पा लिया ॥६१॥
उस पर चढ़कर और हाथों से उसे चलाते-बढ़ाते मैं, वायु के अनुकूल होने पर किसी प्रकार किनारे पर पहुँच गया ।।६२।।
तट पर लग कर अतर्कित देव की निन्दा करते हुए मैंने वहीं पर गिरा हुआ सोने का एक टुकड़ा पाया ॥६३।।
उसे तटवर्ती गाँव में बेचकर भोजन आदि करके दो वस्त्र पहनने और ओढ़ने के लिए खरीदकर मैंने समुद्र-तरण की थकावट को कुछ दूर किया ॥६४॥
तब दिशा को न जानते हुए और प्रेयसी के विरह से दुःखी होकर घूमते हुए मैंने बालू के शिलिगों से भरी भूमि देखी ॥६५॥
उस भूमि में, मुनि-कन्याएँ विचर रहीं थीं। उन कन्याओं में एक कन्या को शिव की पूजा में लगी हुई मैंने देखा, जो मुनियों के वेष में भी सुन्दरी थी ।॥६६॥
ओह ! यह मेरी प्राणप्यारी के समान है या सम्भवतः वही हो। किन्तु, यह कैसे होगा ? मेरा ऐसा भाग्य कहाँ ।।६७।।
मैं इस प्रकार सोच ही रहा था कि इतने में प्रसन्नता से बार-बार फड़कती हुई दाहिनी आँख ने कहा- 'यह वही है ?' ॥६८॥
'हे कृशांगी, महलों में रहने योग्य तू इस जंगल में कौन है ?' मुझसे इस प्रकार पूछी गई उस बाला ने कुछ न कहा ॥६९।।
तब मैं मुनि के शाप के भय से लता-गुल्म से छिपकर खड़ा हुआ उसे अतृप्त नेत्रों से देखता रह गया ।॥७०।।
वह सुन्दरी पूजन करने के उपरान्त घूम करके स्नेहपूर्वक मुझे देखती हुई और कुछ सोचती हुई धीरे-धीरे चल पड़ी ॥७१॥
उसके चले जाने पर मेरे लिए चारों ओर अँधेरा हो जाने पर मेरी दशा रात्रि में चकवे के समान अवर्णनीय थी ॥ ७२॥
कुछ समय के पश्चात् निःशंक आती हुई, तेज से सूर्य के समान चमकती हुई, मतंग मुनि की बाल-ब्रह्मचारिणी शुभदर्शना पुत्री यमुना नाम की उसकी सहेली को मूर्ति मती धृति (धैर्य) के रूप में मैंने देखा ।।७३-७४।।
वह मुझे लक्ष्य करके कहने लगी- "हे चन्द्रसार, धीरज धर के सुन। दूसरे द्वीप में शिखर नाम का महान् वैश्य है ।॥७५॥
उसकी रूपवती पत्नी में कन्या उत्पन्न होने पर जिनरक्षित नामक विज्ञानी भिक्षु ने अपने मित्र शिखर से कहा- ।।७६।।
'हे शिखर, यह कन्या दूसरी माता की है। इसे तुम स्वयं किसी को दान न करना। स्वयं दान करने से पाप होगा, यही तेरे लिए हित है' ।॥७७॥
भिक्षु के इस प्रकार कहने पर उस वैश्य शिखर ने, तुम्हारे द्वारा मांगी गई उस कन्या को उसके नाना के हाथ से दान कराने की इच्छा की ॥७८॥
तब उसने उसे नाव द्वारा सिंहल द्वीप में, उसके नाना के पास भेज दिया। किन्तु, वह नाव भीषण तूफान के कारण समुद्र में डूब गई ॥७९॥
नाव के डूबने पर भी आयु शेष रहने के कारण भाग्य ने लहरों के साथ इसे समुद्र-तट पर ला पटका ॥८०॥
इसी अवसर पर मेरे पिता मतंग मुनि, अपने शिष्यों के साथ समुद्र में, स्नान करने के लिए उतरे और अचेतन पड़ी हुई इस कन्या को उन्होंने देखा ॥८१॥
दयालु मुनि, उसे धीरज बँधाकर अपने आश्रम में ले आये और 'यमुने, तुझे इसे पालना है' कहकर मुझे सौंप दिया ॥८२॥
समुद्र के तट से यह लड़की प्राप्त हुई, इसलिए मतंग मुनि ने मुनियों की प्यारी इस कन्या का नाम वेला रख दिया ।।८३।।
इस कन्या के स्नेह से मेरा चित्त सन्तान-स्नेह से भर गया है। ब्रह्मचर्य से त्याग किया हुआ संसार भी आज मुझे कष्टप्रद प्रतीत हो रहा है ॥८४॥
हे चन्द्रसार, अविवाहित और नवयौवन से सुसज्जित इस कन्या को देख-देखकर मेरा चित्त दुःखी हो रहा है ॥८५॥
बेटा, योगबल से मैंने जान लिया कि यह तेरी पूर्वजन्म की भार्या है और दैवयोग से तू भी यहाँ आ गया है ॥८६॥
इसलिए, आओ और हमारे द्वारा दान की गई इस कन्या का पाणिग्रहण करो। तुम दोनों ने जो कष्ट का अनुभव किया है, वह सफल हो" ॥८७॥
बिना मेघ की वृष्टि के समान मुझे शान्त करती हुई यमुना, अपने पिता मतंग मुनि के आश्रम में ले गई ।॥८८॥
वहाँ जाकर सूचित किये गये मतंग ने, मनोराज्य की मूर्ति मती सम्पत्ति के समान उस कन्या को मुझे प्रदान किया ।।८९।।
तब मैं वहाँ आश्रम में वेला के साथ सुखपूर्वक रहने लगा। एक बार मैं उसके साथ तालाब के जल में केलि कर रहा था। उस समय वेला के साथ स्थित मैंने अनजाने में मर्यादा के प्रतिकूल पानी फेंकते हुए वहाँ स्नान के लिए आये हुए मतंग ऋषि को भिगो दिया ॥९०-९१॥
इस कारण क्रुद्ध मुनि ने, पत्नी-सहित मुझे शाप दिया कि 'हे पापियो, तुझ दम्पती का भविष्य में वियोग होगा' ।॥९२॥
तब चरणों पर पड़ी हुई वेला द्वारा दीनतापूर्वक प्रार्थना किये जाने पर मुनि ने, हम दोनों का शापान्त इस प्रकार बतलाया ।।९३।।
जो हस्तिनी के वेग से उत्तम घोड़ों की जोड़ी को जीतेगा, उस विद्याघर-चक्रवर्ती वत्सराज के पुत्र नरवाहनदत्त को जब देखोगे, तब तुम्हारे शाप की शान्ति होगी और इस भार्या से तुम्हारा पुनः समागम होगा ।॥९४-९५।।
ऐसा कहकर वह मतंग मुनि स्नान, सन्ध्या आदि नित्यक्रिया करके हरि के दर्शन के लिए आकाश-मार्ग से श्वेतद्वीप को चले गये ॥९६।।
विद्याधर ने, प्राचीन समय में, शिवजी के चरण के अग्रभाग से जो आम का पौधा पाया था, उस बालक पौधे को मैंने उससे ले लिया था। अच्छे-अच्छे रत्नों से भरे हुए इस पौधे को अब मैं तुझ दम्पती को देती हूँ। इस प्रकार सपत्नीक मुझे कहकर यमुना भी चली गई ।॥९७-९८॥
तदनन्तर, अपनी प्रेयसी पत्नी को पाकर और वनवास से त्रस्त में वियोग के भय से अपने देश को जाने के लिए उत्सुक हुआ ।॥९९॥
यात्रा के लिए उद्यत मैंने समुद्र तट पर आकर किसी व्यापारी की नाव मिल जाने पर पहले अपनी पत्नी को उस पर चढ़ा दिया ॥१००॥
जब मैं उस पर चढ़ने के लिए उद्यत हुआ, तब मुनि के शाप के प्रभाव से वायु ने मेरी नाव को किनारे से दूर कर दिया ॥१०१॥
उस नाव द्वारा पत्नी का हरण हो जाने पर, मूर्च्छा ने भी अवसर देखकर मेरी चेतना का हरण कर लिया । अर्थात् मैं मूछित होकर गिर पड़ा ॥१०२॥
तब वहाँ आया हुआ एक तपस्वी मूछित देखकर मुझे होश में लाकर धीरज देकर अपने आश्रम में ले गया ।।१०३।।
वहाँ ले जाकर उसने मेरा सारा समाचार सुनकर, इसे शाप का प्रभाव समझकर और शाप की अवधि को जानकर भी उसने मुझे धैर्य बंधाया ॥१०४।।
तब अपनी पत्नी को ढूंढ़ता हुआ मैं टूटी हुई नाव से बचकर निकले हुए अपने मित्र वैश्य से मिला ।।१०५।।
शाप से क्षय की आशा से उससे आश्वस्त मै उन-उन बहुत-से दुर्गम देशों को लांघता हुआ तुमसे मिलने के लिए विशाखपुर आया, तो ज्ञात हुआ कि वत्सराज के वंश के मोती-स्वरूप तुम यहाँ आये हो ॥१०६-१०७॥
जब दूर से मैंने हथिनी द्वारा दोनों घोड़ों को तुम्हारे द्वारा जीतते हुए देखा, तब मैं जीवन पाकर शाप से मुक्त हो गया और क्षण-भर में ही मैंने उसी नाव से वणिकों द्वारा लाई गई अपनी प्राणप्यारी को भी देखा ।।१०८-१०९।।
तब मैं, यमुना के कल्याणमय हाथों से प्राप्त की गई उस वेला से मिला और तुम्हारी कृपा से शाप का कष्ट पार किया ॥११०।।
इसलिए, हे वत्सराज के नन्दन, तुम्हें प्रणाम करने के लिए मैं यहाँ आया हूँ और अब कष्टों से मुक्त होकर अपनी प्रियतमा के साथ जा रहा हूँ" ।॥१११॥
इस प्रकार, उस वैश्य चन्द्रसार के अपना वृत्तान्त कहकर और प्रणाम करके चले जाने पर वह रुचिरदेव, नरवाहनदत्त की महिमा को जानकर अत्यन्त हर्षित हुआ और उसके प्रति और अधिक नम्र हो गया ॥११२।।
साथ ही, रुचिरदेव ने प्रेम से वश में किये गये नरवाहनदत्त के लिए, हथिनी और घोड़ों की जोड़ी के साथ अपनी बहन जयेन्द्रसेना को प्रदान किया, जिसे वह पहले ही देना चाहता था ।।११३।।
तदनन्तर, नरवाहनदत्त, रुचिरदेव से मिलकर घोड़े और हथिनी के साथ उसकी बहन जयेन्द्रसेना को लेकर अपनी नगरी कौशाम्बी लौट आया ।।११४।।
और, अपने पिता वत्सराज तथा मदनमंचुका आदि पत्नियों के साथ वह नरवाहनदत्त अपनी नगरी में सुखपूर्वक रहने लगा ।।११५।।
महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के वेला-लम्बक का प्रथम तरंग समाप्त
एकादश वेला-लम्बक समाप्त
Comments
Post a Comment