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5.402. || द्वितीय कहानी || वत्सराज की कथा-पुत्र-जन्म; जीमूतवाहन¹ की कथा; जोमूतवाहन के पूर्वजन्म की कथा; जीमूतवाहन और मलयवती का विवाह; कद्रू और विनता को कथा; नागों के लिए जीमूतवाहन का आत्मसमर्पण

5.402. || द्वितीय कहानी || वत्सराज की कथा-पुत्र-जन्म; जीमूतवाहन¹ की कथा; जोमूतवाहन के पूर्वजन्म की कथा; जीमूतवाहन और मलयवती का विवाह; कद्रू और विनता को कथा; नागों के लिए जीमूतवाहन का आत्मसमर्पण द्वितीय तरंग वत्सराज की कथा-पुत्र-जन्म कुछ दिनों के अनन्तर वासवदत्ता ने शीघ्र ही वत्सराज के हृदय को आनन्द देनेवाले और कामदेव के अंशावतार से उज्ज्वल गर्भ को घारण किया ।।१।। उस गर्भवती रानी का मुख चन्द्रमा के समान शोभित होने लगा। उस मुख में नेत्र चचल थे। उसकी शोभा कुछ पीलापन लिये हुई थी, मानो चन्द्रमा अपने मित्र कामदेव के प्रेम से आकर, रानी के मुँह में निवास करने लगा था ।।२।। उस रानी के मणिमय पलग के दोनो और पति 'कामदेव' के प्रेम से आई हुई रति और प्रीति दोनों पत्नियाँ मानों प्रतिमा के रूप में चमकती थी ।।३।। ऐसा लगता था कि विद्याधरो के भावी चक्रवर्ती उस गर्भस्थ बालक की सेवा के लिए आई हुई विद्याएँ रानी की सेवा कर रही थी ॥४।॥ रानी मानों गर्भस्थ बालक के अभिषेक के लिए गहरे हरे रग के नवपल्लवो के समान श्याम मुखवाले दो कुचों को कलशों के मदृश वहन करती थी ।।५।। स्वच्छ, चमकीले और प्रतिविम्ब ग्रहण करने...