5.402. || द्वितीय कहानी || वत्सराज की कथा-पुत्र-जन्म; जीमूतवाहन¹ की कथा; जोमूतवाहन के पूर्वजन्म की कथा; जीमूतवाहन और मलयवती का विवाह; कद्रू और विनता को कथा; नागों के लिए जीमूतवाहन का आत्मसमर्पण
5.402. || द्वितीय कहानी || वत्सराज की कथा-पुत्र-जन्म; जीमूतवाहन¹ की कथा; जोमूतवाहन के पूर्वजन्म की कथा; जीमूतवाहन और मलयवती का विवाह; कद्रू और विनता को कथा; नागों के लिए जीमूतवाहन का आत्मसमर्पण
द्वितीय तरंग
वत्सराज की कथा-पुत्र-जन्म
कुछ दिनों के अनन्तर वासवदत्ता ने शीघ्र ही वत्सराज के हृदय को आनन्द देनेवाले और कामदेव के अंशावतार से उज्ज्वल गर्भ को घारण किया ।।१।।
उस गर्भवती रानी का मुख चन्द्रमा के समान शोभित होने लगा। उस मुख में नेत्र चचल थे। उसकी शोभा कुछ पीलापन लिये हुई थी, मानो चन्द्रमा अपने मित्र कामदेव के प्रेम से आकर, रानी के मुँह में निवास करने लगा था ।।२।।
उस रानी के मणिमय पलग के दोनो और पति 'कामदेव' के प्रेम से आई हुई रति और प्रीति दोनों पत्नियाँ मानों प्रतिमा के रूप में चमकती थी ।।३।।
ऐसा लगता था कि विद्याधरो के भावी चक्रवर्ती उस गर्भस्थ बालक की सेवा के लिए आई हुई विद्याएँ रानी की सेवा कर रही थी ॥४।॥
रानी मानों गर्भस्थ बालक के अभिषेक के लिए गहरे हरे रग के नवपल्लवो के समान श्याम मुखवाले दो कुचों को कलशों के मदृश वहन करती थी ।।५।।
स्वच्छ, चमकीले और प्रतिविम्ब ग्रहण करनेवाली भूमि से युक्त शयन-गृह में सुखद शय्या पर सोई हुई रानी बहुत ही भली मालूम पड़ती थी ।।६।।
वह रानी, मानो उत्पन्न होनेवाले बालक की सुन्दर कान्ति से पराजित होने के भय से चचल पानीवाले रत्नों की राशि से शोभित हो रही थी। (अर्थात् उसके शरीर पर धारण किये हुए बहुमूल्य रत्नो का पानी चचल हो रहा था, झलमल-झलमल कर रहा था) ।।७।।
भवन के मध्य में जडे हुए रत्न के अन्दर दीखती हुई छाया, ऐमी मालूम होती थी कि मानो गर्भस्थ चक्रवर्ती को प्रणाम करने के लिए विद्याधरों की राजलक्ष्मी आकाश से उतर रही हो ।।८।।
वह गर्भवती रानी, मन्त्रसिद्धि में लगे हुए साधकों की कथाओं तथा इसी प्रकार की बातो में रुचि रखती थी ।।९।।
सरस गाान गाती हुई विद्याधरो की मुन्दर रमणियाँ, स्वप्न में रानी की स्तुति करती हुई दीखती थी ।।१०।।
रानी जागने पर भी आकाश में उड़कर विहार करने और भूमि के कौतुक (तमाशे) देखने की इच्छा करती थी ।।११।।
मन्त्री यौगन्धरायण तन्त्र, मन्त्र और ऐन्द्रजालिक प्रयोगो से रानी की इच्छा को पूरी करता था ।।१२।।
नागरिक स्त्रियो की आँखो को आश्चर्य देनेवाले उन आकाश-विहार के प्रयोगों से वह आकाश में विहार करती थी ।।१३।।
एक बार जब अपने भवन में बैठी हुई थी, उसके हृदय में विद्याधरो की उदारतापूर्ण कथा सुनने की इच्छा उत्पन्न हुई ।।१४।।
तब उस रानी की प्रार्थना पर सभी लोगों के सामने यौगन्धरायण ने यह कथा कही ।।१५।।
जीमूतवाहन¹ की कथा
पार्वती का पिता और पर्वतों का राजा हिमालय नाम का पर्वत है, जो गौरी का ही पिता नही, गौरीपति शिवजी का भी गुरु (श्वशुर) है ।।१६।
उन पर्वत में विद्याधरो² का निवास है। अतः उम महान् पर्वत पर जीमूतकेतु नाम का विद्याधरो का राजा निवास करता था ।।१७।।
उसके घर के उद्यान में कुल-परम्परा से एक उद्यान था; जो अपने नाम के अनुसार मनोरथ पूर्ण करने में प्रसिद्ध था ॥१८॥
किमी समय राजा जीमूतकेतु ने उद्यान में उस कल्पवृक्ष के समीप जाकर देवता-स्वरूप उम वृक्ष से प्रार्थना की - ॥१९॥
'हे देवस्वरूप, हमलोग सदा से तुम्हारे द्वारा अपना मनोरथ सिद्ध करते आए है। इसलिए मुझ पुत्रहीन को पुत्र प्रदान करो' ।।२०।।
तब कल्पवृक्ष ने कहा- हे राजन् ! तुम्हे पूर्वजन्म का स्मरण करनेवाला, प्राणियों का हित करनेवाला और दानवीर पुत्र उत्पन्न होगा' ।।२१।।
यह सुनकर प्रमन्न उस राजा ने यह समाचार रानी को सुनाकर उसे भी प्रसन्न किया ॥ २२॥
तदनन्तर शीघ्र ही राजा जीमूतकेतु के यहाँ पुत्र उत्पन्न हुआ और पिता ने उसका नाम जीमूतवाहन रखा ।।२३।।
प्राणियों पर दया के साथ-साथ वह महात्मा बालक धीरे-धीरे बढ़ने लगा।
एक बार युवराज पद को प्राप्त वह परोपकारी जीमूतवाह्न, एकांत सेवा से प्रसन्न पिता से बोला- 'पिताजी! इस मसार में जो कुछ भी है, वह सब नश्वर (नागवान्) है। स्थिर रहनेवाला केवल महान् व्यक्तियो का निर्मल यश ही है ।। २५-२६।।
यदि परोपकारी से उत्पन्न यह यश है, तो फिर उदारव्यक्तियों के लिए प्राणो से प्यारा घन क्या है ? ।। २७।।
सम्पत्ति बिजली के समान नश्वर तथा लोगो की आँखों को कष्ट देनेवाली, चचल और दूसरों को हानि पहुँचानेवाली वस्तु है ।॥ २८॥
इसलिए हमारे यहाँ यह जो वांछित फलदेने वाला कल्पवृक्ष है, उसे यदि परोपकार के लिए प्रयुक्त किया जाय तो उसकी सफलता हो ॥ २९॥
इमलिए मैं चाहता हूँ कि इम वृक्ष की सम्पत्ति मे संसार के समस्त याचक घनी हो जायें' ।॥ ३०।।
पिता को इस प्रकार निवेदन करके और उनकी आज्ञा प्राप्त करके जीमूतवाहन ने कल्पद्रुम से जाकर कहा- ।।३१।।
'हे देव ! तुम मबंदा हमारे अभीष्ट फलो को देते रहो। आज तुम मेरी एक अभिलाषा पूर्ण करो ॥ ३२॥
हे देव ! तुम इम मारी पृथ्वी को दरिद्रो से रहित कर दो। तुम्हारा कल्याण हो। मैने तुम्हे धन चाहनवाले याचको के लिए दे दिया' ।॥३३॥
धैर्यशाली जीमूतवाहन द्वारा इस प्रकार प्राथित उम कल्पवृक्ष ने भूमि पर प्रचुर स्वर्ण की वर्षा की और मारी प्रजा प्रसन्न हो गई ।। ३४।।
दयालू और बोधिसत्त्व के अश जीमूतवाहन को छोडकर और कौन ऐसा उदार है, जो कल्पवृक्ष को भी याचको के लिए दे डाले ॥ ३५।।
इस प्रकार जीमूतवाहन के प्रति दिग्दिगन्त अनुरागपूर्ण हो गये और जीमूतवाहन का उज्ज्वल तथा महान् यश चारो ओर फैल गया ।। ३६।।
तब जीमूतकेतु के राज्य को पुत्र-परम्परा से चलनेवाला देखकर, उसके कुटुम्बियों का ईर्ष्या उत्पन्न हुई और वे राजा के विरुद्ध हो गये ।। ३७७।
दान के लिए उपयोग किये गये कल्पवृक्ष के नि.सार हो जाने पर, अतएव राजा को प्रभाव-हीन समझकर उन्होने उनपर विजय पाप्त करना आसान समझा ।। ३८।।
तदनन्तर उनके इकट्ठे होकर युद्ध के लिए तैयार हो जाने पर धैर्यशाली जीमूतवाहन ने पिता मे कहा- 'जैसे यह शरीर जल के बुलबुलो के समान है, उसी प्रकार जाँधी में दीपक के समान यह राजलक्ष्मी किसके उपयोग में आ सकती है। ऐमी अस्थिर लक्ष्मी के लिए कौन बुद्धिमान् आपस में संघर्ष करना चाहता है। इमलिए पिता! मैं अपने कुटुम्बियो के साथ युद्ध करना नहीं चाहता। सोचता हूं कि इस राज्य को छोड़कर कही वन में चला जाना चाहिए । ये वेचारे राज्य भोगें और अपने कुल का भी क्षय न हो' ।।३९-४२।।
ऐसा कहते हुए जीमूतवाह्न को पिता जीमूतकेतु ने निश्चय करके कहा- 'बेटा ! मैं भी कही वन मे जाना चाहता हैं ।॥४३-४४।॥
मुझ वृद्ध की अब कौन-सी चाह शेष रह गई है। जबकि युवक होकर तुम राज्य को तृण के समान त्याग रहे हो' ।॥४४।।
पत्नी के साथ राजा के इस प्रकार कहने पर जीमूतवाहन पिता के साथ मलयाचल को चला गया ।।४५।।
चन्दन-वृक्षो से आवृत अरनोंवाले और सिद्ध-महात्माओ के निवासस्थान मलयाचल में वह आश्रम बनाकर पिता की मेवा मे तत्पर हो गया ।।४६।।
वहाँ पर मिद्धो के राजा विश्वावमु का पुत्र मित्रावसु जीमूतवाहन का मित्र बन गया। ज्ञानी जीमूतवाहन ने अपने मित्र विश्वावसु की बहिन को किमी समय एकान्त में देखा, जो पूर्वजन्म में उसकी प्यारी पत्नी थी ।।४७-४८।।
उस समय उन दोनों युवको का परस्पर दर्शन, मन-रूपी मृग का दृढ बन्धन करने में रस्मी के ममान हुआ अर्थात् दोनों ही दोनो के प्रति प्रेम-बधन में बंध गये ।।४९॥
कुछ समय के अनन्तर नीनो लोक के पूज्य जीमूतवाहन के समीप आकर मित्रावसु प्रसन्नतापूर्वक बोला- ।।५०।।
'मित्र ! मलयवती नाम की मेरी छोटी बहिन है। उसे मैं तुम्हे देता हूँ। तुम मना न करना' ।।५१।।
यह मुनते ही जीमूतवाहन भी बोला कि 'युवराज ! पूर्वजन्म में भी वह मेरी पत्नी थी और उसी जन्म में तुम मेरे दूसरे हृदय के समान मित्र थे ।।५२।।
मैं पूर्वजन्म का ज्ञानी हूँ। इसलिए अपने, तुम्हारे और उसके पूर्वजन्म का वृत्तान्त स्मरण करता हूँ' ।।५३।।
इस प्रकार कहते हुए जीनूतवाहन को मित्रावसु ने कहा कि 'पूर्वजन्म की कथा सुनाओ ! उसे सुनने की मेरी बहुत इच्छा है' ।।५४।।
जोमूतवाहन के पूर्वजन्म की कथा
मित्रावमु में यह मुनकर जीमूतवाह्न ने पूर्वजन्म की कथा उसके लिए कहनी प्रारम्भ की ।।५५।।
मैं पूर्वजन्म में आकाश मे विचरण करनेवाला विद्याधर था। किसी समय उड़ते-उड़ते मैं हिमालय के शिखर का उल्लघन कर गया। उम शिखर के नीचे शिवजी पार्वती के साथ विहार कर रहे थे ।।५६।।
इस प्रकार शिखर-उंधन से ऋद्ध शिवजी ने मुझे शाप दिया कि 'मत्त्र्ययोनि में तेरा पतन हो' ।॥५७॥
विद्याधरी पत्नी को प्राप्त करके अपने स्थान पर अपने पुत्र को बैठाकर पूर्वजन्म का स्मरण करते हुए पुनः विद्याधर योनि प्राप्त करोगे' ।।५८।।
इस प्रकार शाप का अन्त कहकर शिवजी के अन्तर्धान होने पर मैं पृथ्वी पर वलभी नाम की नगरी में बडे ही बनी वैश्यकुल में वसुदत्त नाम से उत्पन्न हुआ और बड़ा हुआ ।।५९-६०।।
कुछ समय के पश्चात् युवावस्था मे पिता के तैयार कर देने पर उनकी आज्ञा से व्यापार के लिए दूसरे द्वीप में गया ॥ ६१।।
वहाँ से लौटते हुए मुझे जंगल में लुटेरों ने गिराकर पकड़ लिया। वे मेरा सब कुछ छीनकर और मुझे बांधकर अपने गांव के चडिका मन्दिर में ले गये ।॥६२॥
उम चडिका-गृह मे, लाल रंग की लम्बी-लम्वी झडियों, मानो पशुओं के प्राणों का भक्षण करने की इच्छावाले काल की लपलपाती हुई जीभ के समान मालूम हो रही थी ।। ६३।।
उस मन्दिर में, बलिदान करने के लिए, वे लुटेरे, मुझे देवी के पूजक पुलिन्दक नामक अपने सरदार के पास ले गये ।। ६४।।
वह पुलिन्दक जगली भिल्ल होते हुए भी मुझे देखते ही दया से पिघल गया। विना कारण ही स्नेह करनेवाला मन, पूर्वजन्म के प्रेम-सम्वन्ध को बताता है ।।६५।।
तब उम भील ने मुझे बलिदान में बचाकर अपनी वलि देकर देवी को प्रसन्न करना चाहा ।।६६।।
'ऐसा न करो, मैं तुमसे प्रसन्न हूँ। वर मांग।।' इम प्रकार आकाशवाणी से कहा गया वह भीलराज बोला 'हे देवि, तू प्रसन्न है तो और क्या वर मांगू, इस वैश्य के साथ अगले जन्म में भी मेरी मित्रता बनी रहे, यही वर दो' ।॥६७-६८।।
'ऐसा ही हो' - इस प्रकार वर देकर वाणी के बन्द हो जाने पर उस भील ने मेरे धन से भी अधिक धन देकर मुझे अपने घर भेज दिया ।।६९।।
इस प्रकार लम्बी यात्रा और मृत्यु के मुख से मेरे लौटकर आने पर, समस्त वृत्तान्त जानकर मेरे पिता ने, प्रसन्नता में भारी उत्सव किया ।।७०।।
कुछ समय के अनन्तर मैंने अपने नगर में व्यापारियों को लूट लेने के कारण राजा द्वारा पकड़वाकर लाये गये उन लुटेरो के सरदार भीलराज को देखा ।।७१॥
उसी समय मैंने पिता से कहकर और राजा को सूचित कर उस भीलराज को एक लाख स्वर्ण-मुद्रा देकर उसे प्राणदंड से बचा लिया ।।७२।।
मैंने अपने प्राणदान का बदला इस प्रकार चुकाकर और प्रेम से भीलराज को अपने घर लाकर उसका बहुत दिनों तक स्वागत सत्कार किया ।।७३।।
अन्त में उसका समुचित सत्कार करके उसे घर भेज दिया। वह भीलराज भी अपना प्रेमपूर्ण हृदय देकर अपने गाँव की ओर गया ।।७४।।
घर जाकर मेरा प्रत्युपकार करने (बदला देने) के लिए अपने समीप के मोती, कस्तूरी आदि को भी उसने पर्याप्त नही समझा ।। ७५।।
इसलिए मेरे लिए बहुमूल्य और दुर्लभ गजमुक्ता³ प्राप्त करने के लिए वह धनुष-बाण के साथ हिमाचल को गया ।। ७६।।
वहाँ घूमते हुए उसने देत्रमन्दिर के साथ एक बड़े तालाब को देखा, जहाँ मित्र, अर्थात् सूर्य से प्रीति रखनेवाले खिले कमलों को देखकर वह बहुत प्रसन्न हुआ ।। ७७।।
उस तालाब में पानी पीने के लिए आनवाले हाथियो की आशा से उन्हे मारने के लिए धनुष लिये हुए वह एकान्त में वही छिप गया ।।७८।।
छिपकर उसने देखा कि एक अद्भुत सुन्दरी कुमारी, शिव-पूजन के लिए सिह पर सवार होकर तालाब पर आई ।।७९।।
वह भीलराज, शिवजी की पूजा के लिए कन्या के रूप में आई हुई दूसरी हिमाचल-नन्दिनी पार्वती के ममान उमे देखकर आश्चर्यचकित हो, मन में सोचने लगा कि 'यह कौन कन्या है, यदि मानव-कन्या है, तो वह सिंहवाहिनी कैसे, यदि देवकन्या, है तो मुझ जैसे लोग इसे कैसे देख सकते है।' अत. अवश्य ही यह मेरी जॉग्बो के पूर्व-पुण्यो की शरीरधारिणी मृत्ति है ॥८०-८२॥
यदि इस सुन्दरी से में अपने मित्र वमुदत्त का सम्बन्ध करादू, तो यह उसका समुचित प्रत्युपकार हो सकता है ।।८३।।
'इसलिए इसकी इच्छा जानने के लिए मैं इसके समीप जाता हूँ- यह सोचकर वह मित्र उसके पाम गया ।।८४।।
तब वह कन्या, छाया में बैठे हुए शेर से उतरकर पूजा के लिए पुष्प-चयन करने तालाब उतरी ।।८५।।
उम कन्या ने, पास आकर प्रणाम करते हुए, प्रथम बार ही देखे हुए भिल्लराज को, अतिथि-प्रेम के कारण स्वागत करते हुए प्रसन्न किया और पूछा, 'तू कौन है तथा इस दुर्गम भूमि में कैसे आया है ?' उसके इस प्रकार पूछने पर भीलराज बोला- ।।८६-८७।।
'मैं भवानीभक्त शबरराज हैं। गजमुक्ता लेने के हेतु इस जंगल में आया हूँ, तुम्हें देखकर मुझे अपना एक जीवनाधार आत्मीय मित्र स्मरण आ गया, जो एक बड़े व्यापारी और घनी का पुत्र है, उसका नाम वसुदत्त है' ।।८८-८९।।
'हे सुन्दरि ! वह रूप और यौवन में तुम्हारे ही समान सुन्दर है। आँखों के लिए मानो अमृत का झरना है, ऐसा पुरुष इस विश्व में दूसरा नहीं है।॥९०।।
इस संसार में वह लड़की धन्य होगी, जिसका वह पाणिग्रहण करेगा। वह मित्रता, दया, दान और धैर्य का ममुद्र है ।। ९१।।
यदि तुम्हारी ऐसी सुन्दर आकृति उसे न मिली, तो कामदेव का धनुष-बाणधारण करना ही व्यर्थ हो जायगा। इसका मुझे दुःख है।। ९२।।
इम प्रकार कामदेव के मोहन-मन्त्रो के समान भीलराज के वचनों से वह कुमारी तुरन्त अन्यमनस्क हो उठी ।।९३।।
माथ ही, कामदेव मे प्रेरित हो, उम भोल से बोली कि 'तुम्हारा वह मित्र कहाँ है, उसे लाकर दिखाओ' ।॥९४।।
यह सुनकर और 'अच्छा लाता हूँ' कहकर वह भील अपने को सफल समझता हुआ प्रसन्नता से चला ।।१५।।
तदनन्तर अपने घर आकर मोती, कस्तूरी आदि के सैकड़ो बोझे लदवाकर वह वसुदत्त के घर पहुँचा ।।९६।।
वहाँ सभी लोगों द्वारा स्वागत किये गये भीलराज ने, कई लाख मुद्राओं के मूल्य के उस उपहार को वसुदत्त के पिता को भेंट किया ।। ९७।।
हँसी-खुशी में दिन व्यतीत होने पर रात्रि में एकान्त के समय, भीलराज ने मेरे पास आकर कन्या को देखने का ममस्त वृत्तान्त प्रारम्भ से सुनाया और कहा कि 'चलो, वही चलें'- ऐसा कहकर रात्रि में ही मुझे साथ लेकर भीलराज चल पड़ा ।।९८-९९।।
प्रातःकाल ही भीलराज के साथ मुझे कही चला गया जानकर मेरे पिता ने, भीलराज से विश्वस्त होकर धैर्यपूर्वक दिन व्यतीत किये ॥१००॥
शीघ्र चलनेवाले उस भीलराज ने, मागं में मेरी सहायता करते हुए मुझे हिमाचल पर पहुँचा दिया ।।१०१।।
मैं और वह दोनों मायकाल उस तालाब पर पहुँचे और स्नान करके स्वादिष्ठफल खाकर उस रात वही सो गये। वह सुन्दर स्थान खिले हुए विविध पुष्पो से सुगन्धित, अमरियों के संगीत से आकर्षक और रात्रि में जलनेवाली औषधियों से आलोकित था ।।१०२-१०३।।
वह पर्वतीय प्रदेश, उस सरोवर के निर्मल जल को पीते हुए लोगों के विश्राम के लिए रति के निवास स्थान के समान सुखद हुआ ।।१०४।।
दूसरे दिन, प्रात. काल विविध प्रकार की उत्कंठाओं के कारण उछलते हुए और उस कन्या के मार्ग पर दौड़ते हुए मन से तथा उसे देखने की इच्छा से फड़कते हुए दाहिने नेत्र से उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे कि इतने में वह वहाँ आ गई। लहराते अयालवाले सिंह की पीठ पर बैठी उस सुभ्रू को मैंने देखा, जो शरद् के मेघ की गोद मे चमकती चन्द्रकला की तरह लग रही थी। विस्मय, उत्सुकता और भय से उम देखते हुए मेर। हृदय जाने क्यों धडकने लगा ॥१०५-१०८।।
वह कन्या वहाँ आकर, तालाब में स्नान कर पुष्प चयन करने लगी। और, तत्पश्चात् वह उम तालाब के तीर पर स्थित शिवजी के मन्दिर में जाकर उनका पूजन करने लगी ।। १०९।।
पूजा गमाप्त होने पर वह मेरा मित्र भील उनके समीप जाकर प्रणामपूर्वक अपना परिचय देने के पश्चात् स्वागत करती हुई उस कन्या मे बोला- ॥११०।।
'हे देवि, मै तुम्हारे अनुरूप वर, उम मित्र को लाया हूँ। यदि तुम बाहो, तो उसे अभी तुम्हे दिखाई ॥१११।।
यह सुनकर 'दिखाओ'- उसके ऐमा कहने पर वह भील मेरे पास आया और उसने मुझे ले जाकर उसे दिखाया ॥ ११२॥
परिणामस्वरूप वह भी मुझे प्रेम बरसाती हुई तिरछी आँखों से देखकर काम के वशीभूत होकर भीलराज से बोली-- ॥११३।।
'यह तुम्हारा मित्र मनुष्य नही, कोई देवता है, जो मुझे ठगने के लिए आया है; क्योंकि मनुष्य की ऐसी नाकृति कहां हो सकती है' ।।११४।।
यह सुनकर उसे विश्वास दिलाने के लिए मैंने स्वयं ही कहा- 'हे सुन्दरि ! मैं सचमुच मनुष्य हूँ। तुम्हारे समान मरल मनुष्य से ठगी करने से क्या लाभ है। मैं बलभी के रहनेवाले महाघन नामक व्यापारी का पुत्र हूँ; जो शिवजी की आराधना से उत्पन्न हुआ हूँ ।। ११५-११६।।
मेरे पिता ने पुत्र-प्राप्ति के लिए शिवजी की तपस्या की थी और स्वप्न मे शिवजी ने प्रसन्न होकर आदेश दिया था कि तुम तपस्या से उठो, तुम्हें एक महात्मा पुत्र उत्पन्न होगा यही मेरी उत्पत्ति का रहस्य है और अधिक कहना व्यर्थ है ।।११७-११८॥
यह आदेश सुनकर उठे हुए अपने पिता के यहाँ मैं पुत्र-रूप में उत्पन्न हुआ। मेरा नाम वसुदत्त है और यह भिल्लराज मेरा स्वय वरण किया हुआ कठिन समय का मित्र है ।।११९-१२०।।
संक्षेप में यह मेरा तत्त्व है।' ऐसा कहकर मेरे चुप हो जाने पर लज्जा से नीचे की ओर मुँह करके वह कन्या कहने लगी -'यह ठीक है। आज मैने स्वप्न में शिवजी की पूजा की, तो उन्होंने प्रसन्न होकर वरदान दिया कि तुम प्रान काल ही अपने वर (पति) को प्राप्त करोगी ।। १२१-१२२।।
इलिए नुम्ही मेरे पति और तुम्हारा यह मित्र मेरा भाई है।' इस प्रकार वाणी-रूपी अमृत में वह कन्या मेरा अभिनन्दन करके चुप हो गई ।।१२३।।
तदनन्तर विधिपूर्वक विवाह के लिए उसमे परामर्श करके मैंने मित्र के साथ अपने घर चलने का निश्चय किया ।।१२८।।
तब उम कन्या ने, मकेत मात्र से अपने वाहन सिह को पास बुलाया और वमुदत्त से कहा कि 'आर्यपुत्र आप गिह पर सवार हो' ।।१२५।।
मैं भी अपने मित्र भील के साथ उम सिह पर बैठा और गोद मे अपनी प्रियतमा को बैठा लिया ।। १२६।।
वहां से सफलपनोरथ होकर में अपनी पत्नी और मित्र के साथ मिह पर बैठा हुआ घर की ओर चला और शबर जागे-आगे मार्ग बताता हुआ चला ।। १२७।।
भील के बाणो में मारे गये हरिणों के माम से जीवन-रक्षा करते हुए हमलोग क्रमशः वलभी नगरी में पहुँचे ॥ १२८॥
उस नगरी में सिंह पर चढ़े और पत्नी के गाथ मुझे आये हुए देखकर आश्चर्यचकित परिचित नागरिकों ने मेरे पिता से कहा ॥१२९॥
वे सब प्रसन्न होकर मेरी अगवानी को आये और मिह से उतरकर उनके चरणो मे प्रणाम के लिए झुके हुए मुझे उन्होंने आशीर्वाद दिया ।। १३०।।
अनुपम सुन्दरी मेरी उस पत्नी को भी चरणों पर प्रणाम करते हुए देखकर और उसे मेरे अनुरूप भार्या समझकर वे (पिताजी) हर्ष से फूले न समाये ॥ १३१॥
वे हमलोगों को लेकर घर के अन्दर गये। वहाँ जाकर सब समाचार सुनकर उन्होंने भीलराज की प्रशसा करते हुए बहुत बड़ा उत्सव मनाया ।। १३२।।
तदनन्तर दूसरे दिन, ज्योतिषी से मुहूर्त निकलवाकर सभी बन्धु-बान्धवों के साथ मिलकर मैंने उस कन्या के साथ विधिपूर्वक विवाह किया ॥१३३।।
विवाह हो जाने पर सब लोगों के देखते-ही-देखते मेरी पत्नी का वाहन सिंह पुरुष बन गया ।।१३४।।
उसका यह परिर्वात्तत रूप देखकर वहाँ बैठे हुए सभी लोगों के विस्मित हो जाने पर, दिव्य वस्त्र और आभूषण पहने हुए वह मुझे प्रणाम करता हुआ इस प्रकार कहने लगा-॥१३५॥
मै चित्रांगद नामक विद्याधर हूँ और यह प्राणो से भी अधिक प्यारी मेरी कन्या है ।। १३६॥
मैं इसे गोद में लेकर सदा जगलों में घूमता रहता था। एक बार अनेक तपोवनी से अलकृत तटांवाली गगा के समीप पहुँचा ॥ १३७।।
तपस्वियों का लघन न हो, इस भय में मे तट से न जाकर उसके मध्य से जा रहा था। मेरे जाते हुए दैवयोग में मेरी पुष्पमाला गगा में गिर पड़ी। वह पुष्पमाला जल के अन्दर गोना लगाते हुए नारदजी की पीठ पर गिरी। फलत, इससे क्रुद्ध होकर नारदमुनि ने उस ममय मुझे शाप दिया कि 'हे पापी! तूने मेरे साथ उद्धनता की है। इसलिए जा, तू सिंह बनेगा और हिमाचल में जाकर इस कन्या को पीठ पर वहन करता रहेगा ।। १३८-१४०।।
जब यह कन्या मनुष्य से अपना विवाह कर लेगी, तब यह देखकर ही तू शाप से मुक्त हो जायगा ।। १४१।।
इम प्रकार नारदमुनि से शापित होकर मैं हिमाचल में मिह बनकर शिव-पूजन में रत इम कन्या को वहन करता रहता था ।।१४२।।
इमके पश्चात् भीलराज के प्रयत्न में यह सब जो कुछ मगलमय घटना हुई, वह सब आपको विदित ही है ।॥१४३।।
अत. अब मै स्वर्ग-लोक को जाता हैं। तुम लोगो का कल्याण हो। मैं शाप से मुक्त हो गया हूँ। ऐसा कहकर वह विद्याधर तुरन्त आकाश में उड गया ।॥१४४।।
उस सिंह द्वारा आश्चर्यान्वित और प्रमन्न बन्धुओवाले एव उच्चकोटि के विद्याधर के साथ हुए सम्बन्ध से उत्साहित और प्रसन्न मेरे पिता ने मेरे विवाह का महान् उत्सव मनाया ।। १४५।।
अपने प्राणो से उपकार करने पर भी जो उपकारी मित्र सन्तुष्ट नही होते, ऐसे मित्रो के चरित्र को कौन सोच या समझ सकता है। इस प्रकार भीलराज के उदारतामय चरित्र की चारो ओर चर्चा चलती रही ।। १४६-१४७।।
वलभी के राजा भी उसकी अतिशय उदारता की कथा सुनकर सन्तुष्ट हुए और मेरे पिता ने बहुमूल्य रत्नों का उपहार देकर और प्रत्युपकार के रूप में उसे वलभी के राजा की ओर से जंगल का राज्य दिला दिया ॥१४८-१४९॥
तदनन्तर में उस मनोवती पत्नी और अभिन्न हृदय मित्र भीलराज के साथ सुखपूर्वक बलभी में रहने लगा ।।१५०।।
वह भीलराज, अपने देश का प्रेम छोड़कर अधिकतर हमारे घर में ही रहने लगा ।। १५१॥
परस्पर उपकार के कामो में सर्वदा अतृप्त रहनेवाले हम दोनो मित्रो का समय व्यतीत हुआ ।।१५२।।
कुछ ही दिनों में मनोवती द्वारा मेरा पुत्र उत्पन्न हुआ, मानो मारे कुटुम्ब के हार्दिक उत्सव का मूर्तरूप वह प्रकट हुआ हो ।।१५३।।
हिरण्यदन्न नामक वह कुमार, धीरे-धीरे बड़ा हुआ और पढने-लिखने के पश्चात् मैंने उसका विवाह कर दिया ।।१५४।।
मेरे पिता यह देखकर और अपने जीवन का अन्तिम फल समझकर वृद्धावस्था में शरीर त्याग करने के लिए गगातट पर चले गये ।। १५५।।
पिता के चले जाने पर शोक से अत्यन्त दुम्वी होकर मैने अपने बन्धु-बान्धवो के धैर्य देने और ममआने-चुआने पर घर-गृहस्थी का भार उठाना स्वीकार किया ॥१५६॥
उस समय एक ओर तो नोवती के भोले-भाले मुँह को देखना और दूसरी ओर मित्र भवरगंज की मित्रता - ये दो मेरे ननोविनोद के साधन थे ।।१५७।।
सुपुत्र के कारण असीम आनन्ददायक, मपत्नी के कारण मनोरम एव सच्चे मित्र के गमागम में सुखद वे मेरे दिन व्यतीत हुए ।। १५८।।
कुछ समय के पश्चात् मुझ वयस्क को 'बेटा, अबतक घर में क्या कर रहे हो' मानो इस प्रकार प्रेमपूर्वक हित वचन कहती हुई वृद्धावस्था ने मेरी ठोढ़ी या दाढी पकड़ ली ।।१५९।।
इस कारण अकस्मात् वैराग्य उत्पन्न होने पर वन में जाने की इच्छा से मैंने कुटुम्ब का भार अपने पुत्र को दे दिया ॥ १६०॥
तदनन्तर में अपनी पत्नी के साथ कालंजर नामक पर्वत पर चला गया और भीलराज मेरे प्रेम से राज्य को छोड़कर मेरे साथ हो लिया ।। १६१।।
वहाँ जाकर मैंने अपनी पूर्वजन्म की विद्याधर जाति का स्मरण किया और अन्त होनेवाले शिवजी के शाप का भी सहसा स्मरण किया ।। १६२।।
उस शाप को मैंने अपनी पत्नी मनोवती तथा मित्र भीलराज को भी बता दिया ।। १६३।।
तदनन्तर मानव-शरीर को छोड़ने की इच्छा में मैंने अन्तिम समय यही कामना की है कि अगले जन्म में भी ये ही दोनो मेरी पत्नी और मित्र बनें। इस प्रकार मनमें शकर का ध्यान कर पर्वत (हिमालय) की चोटी⁴ से गिरकर उनने पत्नी और मित्र के साथ गरीर का त्याग कर दिया ।।१६४-१६५।।
वह जातिस्मर मैं अब वसुदत्त जीमूतवाहन नाम से विद्याधर-कुल में उत्पन्न हुआ, वही शबरेन्द्र तुम मित्रावसु हो, जो शिवजी की कृपा से सिद्धो के राजा विश्वावसु के पुत्र हो ।।१६६-१६७।।
हे मित्र, वह मेरी विद्यावरी पत्नी मनोवती, मलयवती नाम मे तुम्हारी बहिन है। वह तुम्हारी बहिन, मेरे पूर्वजन्म की पत्नी है और तुम भी मेरे उसी जन्म के मित्र हो। अत मै इमसे विवाह करना उचित समझना हूँ ।।१६८-१६९।।
किन्तु इसके पूर्व तुम मेरे पिता में निवेदन करो। उनके स्वीकार करने पर ही तुम्हारा यह अभीष्ट मिद्ध होगा ।।१७०।।
जीमूतवाहन और मलयवती का विवाह
जीमूतवाहन में ऐसा गुनकर प्रसन्नचित मित्रावसु ने मेरे पिता के समीप जाकर यह प्रस्ताव उपस्थित किया। उनके द्वारा समर्थन प्राप्त कर लेने पर सन्तुष्ट मित्रावसु ने यही प्रस्ताव अपनी माता और पिना मे किया ।। १७१।।
वे यह मुनकर अभिलपित सम्पत्ति मिल जाने के समान प्रसन्न हुए और उन्होंने प्रसन्नता-पूर्वक इस सम्बन्ध को स्वीकार किया ।।१७२।।
तदनन्तर युवराज मित्रावसु ने अपने विवाह की तैयारी की और जीमूतवाहन ने भी विधिपूर्वक मलयवती का पाणिग्रहण किया ।।१७३।।
आकाशचारी चारणो के गीतो से मनोहर उनका विवाह-सस्कार सम्पन्न हुआ। इस विवाह में सिद्धो और विद्याधरो के झुड भी सम्मिलित हुए थे ।। १७४-१७५।।
विनाह के उपरान्न जीमूतवाहन अपनी पत्नी के साथ अपने राजसी ठाटबाट से वहाँ रहने लगा ।। १७६।।
एकबार वे अपने माले मित्रावसु के साथ ममुद्र-तट के जगलो की सैर करता हुआ टहल रहा था कि इतने में उमने एक व्याकुल युवा पुरुष को अपनी ओर आते हुए देखा और उसके पीछे एक वृद्धा स्त्री 'हाय बेटा, 'हाय बेटा', कहकर रोती-चिल्लाती आ रही थी ।। १७७-१७८।।
पीछे आते हुए सैनिक के समान किसी पुरुष ने एक ऊँची चट्टान के समीप लाकर उसे छोड़ दिया था ।।१७९।।
'तू कौन है तथा क्या चाहता है? माता तेरे सम्बन्ध में शोच क्यों कर रही है?' इत्यादि । जीमूतवाहन ने उस युवक से यह सब वृत्तान्त पूछा। उत्तर में उसने जीमूतवाहन को सारा वृत्तान्त इस प्रकार कहा- ।।१८०।।
कद्रू और विनता को कथा
प्राचीन समय में कश्यप की दो पत्तियाँ विनता और कद्रू किसी कथा के प्रमग में परस्पर विवाद कर बैठी ।। १८१।।
कद्रू ने कहा कि सूर्य के घोड़े काले है और विनता ने कहा श्वेत। बस, इसी बात पर उन्होने आपन में गर्न लगा लो कि जिसकी बाल झूठी होगी, वह सच्ची बातवाली की दामता करेगी ।। १८२।।
जीतने की इच्छा रखनवाळी कद्रू ने अपने पुत्र मर्यो के द्वारा विषैली फूत्कार से सूर्य के घोडों का रंग काला करवा दिया औरछल में जीती हुई कद्रू ने विनता को दामी बना लिया। सच है कि स्त्रियो की पारम्परिक ईर्ष्या भी दु बद होनी है ।। १८३-१८४।।
यह जानकर विनता के पुत्र गरुड़ ने यान्ति के साथ अपनी माता की दामना की मुक्ति के लिए कद्रू से प्रार्थना की ।। १८५॥
तब कद्दू के पुत्र नागगण आपस में विचार करके बाले कि 'हे गरुड ! देवताओ ने अभी क्षीरसागर का मथना प्रारम्भ किया है। वहा से इसके बदले में अमृत लाकर हमे दो, तब अपनी
माता को स्वीकार करो, क्योंकि तुम जत्यन्त बलवान् हो ।।१८६-१८७७।
नागो के यह वचन सुनकर और अमृत के लिए क्षीर समुद्र पर जाकर गरुड ने अत्यन्त पौरुष प्रकट किया ।।१८८।।
गरुड़ के पराक्रम में प्रसन्न होकर भगवान् विष्णु ने स्वय गरुड़ से कहा कि 'मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, अतः कुछ वर माँगो' ।॥१८९॥
माता के दासत्व के अपमान से कुद्ध गरुड़ ने भगवान् से वर माँगा कि 'नाग मेरे भक्ष्य हो ।।१९०।।
भगवान् ने 'ऐसा हो हो'- कहकर उसे यही वरदान दिया। तत्पश्चात् गरुड़ अपने पराक्रम में अमृत को प्राप्त कर जब चलने लगा, तब तत्त्वज्ञ इन्द्र ने उमने कहा- ॥१०.१॥
'हे पक्षिराज, तुम्हे ऐसा करना चाहिए कि जिससे वे मूखं सर्प, अमृत को न खा सके। अतः मैं इसे सर्पों से हरण कर लूंगा' ।। १९२।।
ऐसा सुनकर विष्णु के वर से प्रचड गरुड़ ने, इन्द्र के इम प्रस्ताव को स्वीकार किया और अमृत-कलश लेकर सर्पों के समीप गया ॥ १९३॥
और वर के प्रभाव से डरे हुए नागोंमे बोला कि 'मैंने अमृत ला दिया है, मेरी माता को दासता से मुक्त करके इसे लो ॥१९४।।
यदि तुम्हें मुझसे भय है, तो मैं इसे कुणा के आसन पर रख देता हूँ और अपनी माता को छुड़ा ले जाता हूँ। तुम लोग इसे स्वीकार करो' ।। १९५।।
'ऐमा हो करी' नागों के इस प्रकार कहने पर पवित्र कुशासन पर अमृत-कलश को रखवा-कर नागों ने गरुड की माता विनता को छोड दिया ।।१९६
माता को दासता से मुक्त कराकर गरुड के चले जाने पर नाग निर्भयतापूर्वक जब अमृतपान करने के लिए एकत्र हुए, तब इन्द्र ने अपनी शक्ति से कुशासन पर रखे हुए सुघा-कलश का अपहरण कर लिया ।। १९७-१९८।।
हुताय नागो ने कही अमृत, गिरकर कुशा में न लगा हो ऐसा सोचकर कुशाओ को चाटना प्रारम्भ किया ।। १९९।।
कुशाओ को चाटने में उनकी जीभो⁵ के दो टुकडे हो गये। सच है, अत्यन्त लोभियो को हँसी के सिवा और क्या फल मिलता है।॥ २००॥
अमृत के स्वाद से वचित नागों का शत्रु गरुड़, विष्णु के वरदान के कारण बार-बार नागों पर टूटकर उन्हे खाने लगा ।।२०१।।
फलत गरुड के आक्रमण से माग पाताल व्याकुल हो गया। भय के कारण सर्प निर्जीव-म हो गये। गभिणी नागपत्नियों के गर्भपात होने लगे और डमी भय मात्र से अनेक नाग प्राणों से भी हाथ धो बैठे ॥२०२।।
नागों के लिए जीमूतवाहन का आत्मसमर्पण
प्रतिदिन इस प्रकार का आतक देखकर नागराज वामुकि ने गोचा कि इस प्रकार तो सारा नागलोक महसा नष्ट हो जायगा और गरुड भी अजेय है। ऐसा सांचकर उसने गरुड़ के साथ मिलकर एक नियम बना लिया कि प्रतिदिन एक नाग, समुद्र तट के पर्वत पर गरुड़ के भोजन के लिए भेज दिया जायगा। तब नागराज ने गरुड़ से कहा कि 'तुम पाताल में उपद्रव करने या आनक फैलाने न आया करो। अन्यथा इस प्रकार एक माथ ही ममस्त नागों के नाश होजाने पर तुम्हारा स्वार्थ नष्ट हो जायगा' ।।२०३-२०६।।
गरुड़ ने भी इस व्यवस्था को मान लिया और वासुकि द्वारा भेजे गए एक-एक नाग को वह प्रतिदिन खाने लगा ।।२०७।।
अतः नागवध के उसी क्रम में आज मेरी बारी है। मेरा नाम शंखचूड़ है। मैं भी नागराज की आज्ञा से आज गरुड़ के आहार के लिए इस वध्यशिला पर लाया गया हूँ। अतः मैं माता के लिए शोचनीय हो रहा हूँ। इस प्रकार शंखचूड़ के वचन सुनकर और उसके दुःख से दु.खी जीमूतवाहन खेदपूर्वक उससे बोला- ॥२०८-२१०।।
अहो ! वासुकि का नागराज होना कितना सारहीन है, जो स्वयं अपने हाथों से अपनी प्रजा को शत्रु का आमिष (भोजन) बना रहा है॥ २११॥
क्यों नहीं; उसने सबसे पहले अपने को ही गरुड़ के लिए प्रदान किया। प्रत्युत इसके विपरीत ही नामक के ममान उनने अपने कुल का ही नाग स्वीकार किया ॥ २१२॥
उधर, गरुड़ भी कश्यप ऋषि की सन्तान होकर कितना पाप कर रहा है। महान् पुरुषों को भी इस देह के लिए कितना मोह है ।॥ २१३।।
इसलिए आज मै तुम एक नाग की, अपना शरीर-दान करके रक्षा करता हूँ। तुम व्यर्थ शाक न करा ॥ २१४।।
यह सुनकर शश्वचूड़ भी धैर्य के साथ बोला- 'हे महात्मन् ! ऐमा फिर न कहना ।। २१५।।
काँच के लिए मोती की हानि करना उचित नहीं है। मैं भी कुल-कलक बनना नही चाहता' ।।२१६।।
ऐसा कहकर और जीमूतवाहन को रोककर वह सज्जन नाग शखचूड़, तुरन्त आनेवाले गरुड़ के समय को जानकर समुद्रतीरवासी गोकर्ण नामक शिव को अन्तिम समय का प्रणाम करने के लिए गया। उसके जाने पर दयानिधि जीमूतवाहन को उसकी रक्षा के लिए अपना प्राणदान करने का अवसर मिल गया ।। २१७-२१९।।
तब उसने युक्ति से मानों किमी ाली बात का स्मरण करके किसी काम के बहाने से अपने साथी मित्रावसु को वहाँ से भेज दिया ॥ २२०।।
उसी समय समीप आये गरुड़ के पंखो की वायु से काँपती हुई भूमि मानो उम महापुरुष के दर्शन से आश्चर्यान्वित हो घूमने लगी ॥२२१॥
इस लक्षण से परोपकारी जीमूतवाहन गरुड़ को आया हुआ जानकर उस वध्यशिला पर चढ़ गया ।।२२२॥
अपने विशाल पंखों की छाया से आकाश को छाये हुए गरुड़ ने चोंच मारकर उस महाप्राणी जीमूतवाहन को उठा लिया ।। २२३।।
बहती हुई रवतधारावाले और उखड़कर गिरी हुई शिर की मणिवाले जीमूतवाहन को पहाड़ की चोटी पर ले जाकर उसका भक्षण करने लगा ।। २२४।।
इसी समय आकाश से पुष्पवृष्टि हुई। गरुड़ भी यह क्या है, ऐसा सोचकर आश्चर्य-चकित है। गया ।।२२५।।
इतने में ही वह शखचूड भी गोकर्णेश्वर शिव को प्रणाम करके आ गया और उसने वध्यशिला को रक्त से लथपथ पाया ॥२२६।।
और सोचने लगा कि विक्कार है मुझे। उम महात्मा ने अवश्य ही मेरे लिए जीवन-दान दिया है। गरुड़ इस समय उसे कहाँ ले गया होगा ।। २२७।।
मैं उमे शीघ्र खोजता हूँ। सम्भव है, में उसे प्राप्त कर लूं। ऐसा सोचकर वह सज्जन रक्त की धारा के पीछे-पीछे चला ॥ २२८॥
उबर, जीमूतवाहन को प्रसन्न देखकर गरुड ने उसका भोजन करना छोड़ दिया और आश्चर्यान्वित हो उसे देखने लगा ।। २२९।।
'यह नाग नहीं, कोई दूसरा ही जीव है, जो मेरे खाये जाने पर भी मरता नही, प्रत्युत इसके विपरीत प्रसन्न हो रहा है' ।। २३०।।
इस प्रकार मन में सोचते हुए गरुड़ को अपनी इष्टसिद्धि के लिए जीमूतवाहन बोला- ।।२३१।।
'हे पक्षिराज' अब भी मेरे शरीर में मास और रक्त है। फिर भी, तुम विना तृप्त हुए ही खाने मे महमा क्यो रुक गये हो ? ' ॥ २३२॥
यह सुनकर आश्चर्यचकित गरुड़ ने पूछा- 'हे मज्जन, तुम नाग नही, बताओ कौन हो ?' ॥२३३।।
'मैं नाग ही हूँ, तुम स्ताओ। जो प्रारम्भ किया है, उसे समाप्त करो। महान् व्यक्ति किसी कार्य को, जिसको आरम्भ किया हो, समाप्त किये बिना नहीं छोड़ते' ।॥ २३४।।
जीमूतवाहन जबतक ऐसा कह ही रहा था, तबतक शखचूड़ दूर से चिल्लाकर बोला- ।।२३५।।
'हे, गरुड ! इसे मत खाओ, मत खाओ। यह नाग नही है, तुम्हारा भक्ष्य नाग मैं हूँ ! तुम्हे यह सहसा भ्रम कैसे हो गया। इसे छोड़ दो' ।॥२३६।।
यह सुनकर पक्षिराज गरुड़ अत्यन्त व्याकुल हो गया और जीमूतवाहन को अपनी अभीष्ट-सिद्धि न होने का खेद हुआ ।। २३७।।
तदनन्तर परस्पर वार्तालाप के प्रसंग में सिसकते हुए उसे विद्याधरों का राजा जानकर और भ्रम से उसे खाकर गरुड़ को भारी मानसिक ताप हुआ ।। २३८।।
वह सोचने लगा कि मुझ जैमा क्रूर ने भारी पाप किया। उच्छृंखल वृत्ति के व्यक्तियों से पाप हो जाना सुलभ या स्वाभाविक है। यह एक प्रशसनीय महात्मा है, जो दूसरों के लिए अपने प्राण दे रहा है। मैंने अज्ञानवश ससार को नीचा कर दिया ।।२३९-२४०।।
इस प्रकार पश्चात्ताप कर पापमुक्ति के लिए आग में जलकर प्राण-त्याग करने की बात सोचते हुए गरुड़ को जीमूतवाहन ने कहा- ।।२४१।।
'हे पक्षीराज ! दुःखी क्यों हो रहे हो। यदि सचमुच पाप से डरते हो, तो आज से इन सर्पों का भक्षण करना छोड़ दो। पहले जिन्हे खा चुके हो, उनके लिए पश्चात्ताप करो। यही इसका प्रायश्चित्त या प्रतिक्रिया है। और कुछ सोचना व्यर्थ है' ।।२४२-२४३।।
इस प्रकार प्राणियों पर दया करनेवाले जीमूतवाहन के कहने पर गरुड़ ने उसके वचन को गुरु की आज्ञा के समान माना ।। २४४।।
ओर, तत्पश्चात् वह खाये हुए नागों को जीवित करने के लिए अमृत लेने गया। उस अमृत से क्षत-विक्षित अगांवाले जीमूतवाहन पर उसकी पत्नी मलयवती की भक्ति से सन्तुष्ट गौरो ने स्वय आकर अमृत-सिचन किया। स्वय गोरी के अमृत-सिचन से अधिक मनोहर अगो के कारण उसकी शोभा और बढ़ गई। आनन्दयुक्त देवताओ के गान-वाद्य के साथ स्वस्थ होकर उठे जोमूतवाहन को देखकर गरुड ने समूचे समुद्र-तट पर अमृत की वर्षा कर दी ।। २४५-२४८।।
इस अमृत-सिंचन से तट पर इधर-उधर बिखरे हुए सभी नाग-ककाल पुनर्जीवित हो उठे। फलतः वह वेला-वन नागो के झुडो से भर गया और उन्हें सर्वदा के लिए गरुड़ के भय से मुक्ति मिल गई ।। २४९।।
ऐसा प्रतीत होता था कि नागकुल के रक्षक जीमूतवाहन को देखने के लिए मानों सारा पाताल वहाँ आ गया हो ।। २५०।।
तदनन्तर अक्षय गरीर और अक्षय यश से शोभित जीमूतवाहन का समस्त बन्धुओं ने अभिनन्दन किया ।।२५१।।
जीमूतवाहन की पत्नी और उसके माता-पिता सभी परम प्रसन्न हुए। सच है, दुःख के सुख-रूप में परिणत हो जाने पर कौन प्रसन्न नहीं होता ।। २५२।।
जीमूतवाहन के कहने पर शंखचूड़ भी रसातल को गया और जीमूतवाहन का यश तीनों लोकों में फैल गया ।। २५३।।
तदनन्तर प्रेम से नम्र देवताओं के समूह गरुड के पास आकर उस विद्याधर-कुल के तिलक जीमूतवाहन को प्रणाम करने लगे। पार्वती की कृपा से मतंग नामक जीमूतवाहन के सम्बन्धी भी भय से आकर उसे प्रणाम करने लगे, जो पहले उसके विरुद्ध थे ।। २५४।।
उन्हीं पूर्वविरोधी बन्धुओं से प्रार्थना किया गया जीमूतवाहन अपनी पत्नी मलयवती और प्रियमित्र मित्रावसु के साथ मलयाचल से हिमाचल पर अपनी प्राचीन राजधानी को गया ।। २५५।।
इस प्रकार उस पैर्यशाली जीमूतवाहन ने चिरकाल तक विद्याधर-चक्रवर्ती पद का उपभोग किया ।। २५६।।
अपने इस उज्ज्वल चरित्र से तीनो लोकों के हृदयों को चमत्कृत करनेवाले महापुरुषों की कल्याण-परम्परा स्वय उनके समीप आती है ॥ २५७।।
महारानी वासवदत्ता यौगन्धरायण के मुख से इस अद्भुत कथा को सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुई ॥२५८।।
तदनन्तर प्रसन्न देवताओ के निरन्तर आदेश प्राप्त होते रहने के कारण इसी प्रसंग की चर्चा करती हुई अपने पति के निकट बैठी वासवदत्ता ने विद्याधरों के भावी चक्रवर्ती अपने पुत्र की कथा मे वह दिन व्यतीत किया ।। २५९।।
नरवाहनदत्तजनन नामक चतुर्थ लम्बक का दूसरा तरग समाप्त।
1. यही श्रीहर्ष के नागानन्ध नाटक की आधारभूत कथा है।
2. मन्त्र-तन्त्र-विद्याओं के द्वारा बने हुए देवताओं की एक जाति।
3. गज = हाथी, मुक्ता मोती। हाथी के मस्तक से निकला मोती बहुमूल्य और कल्याणकारी होता है।
4. इसको शिलापात मृत्युप्रावा कहते है, इस पर चढ़कर प्राण त्याग करने से अगले जन्म में मनोवाञ्छित सिद्धि होती है। अनु०
5. सर्प इसीलिए 'द्विजिह्व' या वो जिहया वाले कहे जाते है।
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