5903. || तृतीय कहानी || राजा लक्षदत्त और लम्बद भिखारी की कथा; बोर ब्राह्मण प्रलम्बबाहु की कथा; वीरवर ब्राह्मण की कथा; देवपुत्र सुप्रभ की कथा;
5903 . || तृतीय कहानी || राजा लक्षदत्त और लम्बद भिखारी की कथा; बोर ब्राह्मण प्रलम्बबाहु की कथा; वीरवर ब्राह्मण की कथा; देवपुत्र सुप्रभ की कथा; तृतीय तरंग यह सुनकर गोमुख ने कहा-'स्वामिन्, मरुभूति ने ठीक ही कहा है। किन्तु महाराज ! इसमें आपका कुछ भी अपराध नहीं है। जबतक धन के विरोधी उसके पाप का क्षय न होगा, तबतक देनेवाला स्वामी, चाहने पर भी, उसकी दरिद्रता को दूर नहीं कर सकता ।।५-६॥ पाप के नष्ट हो जाने पर बलपूर्वक रोकने पर भी, ईश्वर, किसी-न-किसी प्रकार दे ही देता है। यह सब कर्म के अधीन है।॥ ७॥ इस सम्बन्ध में राजा लक्षदत्त और कार्यटिक लब्घदत्त की कथा¹ मुनो ।।८।। राजा लक्षदत्त और लम्बद भिखारी की कथा पृथ्वी पर लक्षपुर नाम का एक नगर था। उसमें दानियों में अग्रणी लक्षदत्त नाम का राजा या ॥९॥ वह राजा यांचक को एक लाल से कम देना जानता ही न था। जिस याचक से वह बात कर लेता था, उसे पाँच लाख देता था ।॥१०॥ जिस पर वह प्रमन्न हो जाता था, उसकी तो वह जन्म-भर की दरिद्रता ही दूर कर देता था। इसीलिए, उसका नाम लक्षदत्त था ॥११॥ उस राजा के सिंहद्वार पर एक चमड़े के टुकड़े से शरीर को ढके हुए एक भिखारी ...