5903. || तृतीय कहानी || राजा लक्षदत्त और लम्बद भिखारी की कथा; बोर ब्राह्मण प्रलम्बबाहु की कथा; वीरवर ब्राह्मण की कथा; देवपुत्र सुप्रभ की कथा;

5903. || तृतीय कहानी || राजा लक्षदत्त और लम्बद भिखारी की कथा; बोर ब्राह्मण प्रलम्बबाहु की कथा; वीरवर ब्राह्मण की कथा; देवपुत्र सुप्रभ की कथा; 

तृतीय तरंग

यह सुनकर गोमुख ने कहा-'स्वामिन्, मरुभूति ने ठीक ही कहा है। किन्तु महाराज ! इसमें आपका कुछ भी अपराध नहीं है। जबतक धन के विरोधी उसके पाप का क्षय न होगा, तबतक देनेवाला स्वामी, चाहने पर भी, उसकी दरिद्रता को दूर नहीं कर सकता ।।५-६॥

पाप के नष्ट हो जाने पर बलपूर्वक रोकने पर भी, ईश्वर, किसी-न-किसी प्रकार दे ही देता है। यह सब कर्म के अधीन है।॥ ७॥

इस सम्बन्ध में राजा लक्षदत्त और कार्यटिक लब्घदत्त की कथा¹ मुनो ।।८।।

राजा लक्षदत्त और लम्बद भिखारी की कथा

पृथ्वी पर लक्षपुर नाम का एक नगर था। उसमें दानियों में अग्रणी लक्षदत्त नाम का राजा या ॥९॥

वह राजा यांचक को एक लाल से कम देना जानता ही न था। जिस याचक से वह बात कर लेता था, उसे पाँच लाख देता था ।॥१०॥

जिस पर वह प्रमन्न हो जाता था, उसकी तो वह जन्म-भर की दरिद्रता ही दूर कर देता था। इसीलिए, उसका नाम लक्षदत्त था ॥११॥

उस राजा के सिंहद्वार पर एक चमड़े के टुकड़े से शरीर को ढके हुए एक भिखारी दिन-रात बैठा रहता या ॥१२०॥

सिर पर जटाओं को बाँध हुए वह भिखारी, शीत में, वर्षा में और कड़ी धूप में भी राजद्वार से जरा भी हिलता न था और राजा सदा उसे उसी स्थिति में देखता था ॥१३॥

इस प्रकार, बहुत समय कष्ट के साथ व्यतीत करने पर राजा ने दयालु और दानी होने पर भी कुछ नही दिया ॥१४॥

एक बार, वह राजा शिकार खेलने के लिए घने जंगल में गया। उसके पीछे लट्ठ लेकर वह भिखारी भी गया ॥ १५॥

जब कि सेना के साथ वाहुह्न पर बैठा हुआ राजा धनुष धारण किये हुए बाघों, सूजरों और मृगों को बाणों से मार रहा था। तब वह भिखारी कार्यटिक, राजा के आगे रहकर सुदृढ (मजबूत) डंडे के प्रहार से ही उन हिस्र पशुओं को मार डालता था ॥१६-१७७॥

उस दरिद्र कार्यटिक के अ‌द्भुत पराक्रम को देखकर, उसे बीर मानता हुआ भी राजा ने उसे कुछ नहीं दिया ॥१८॥

इस प्रकार, जंगली पशुओं का शिकार कर राजा अपने नगर में लौट आया और वह भिखारी भी पूर्ववत् सिहद्वार पर आकर टिक गया ॥१९॥

एक बार, सीमान्तवर्ती एक राजा को जीतने के लिए राजा लक्षदत्त गया। वहाँ दोनों में घनघोर युद्ध हुआ। उस युद्ध में राजा लक्षदत्त के सामने ही उस भिखारी ने मजबूत खैर के डंडे के प्रहार से अनेक शत्रुओं को मार डाला। इस प्रकार, शत्रुओं को जीतकर राजा अपने नगर लौट आया, किन्तु दरिद्र भिखारी के अद्भुत पराक्रम को देखकर भी राजा ने उसे कुछ नहीं दिया ॥ २०-२२१।

इस प्रकार, निरन्तर राजद्वार पर रहते हुए और लकड़ियाँ जलाकर अपना जीवन व्यतीत करते हुए उसे पाँच वर्ष बीत गये ॥२३॥

छठा वर्ष प्रारम्भ होने पर दैवयोग से एक बार उसे देखकर राजा लक्षदत्त को दया उत्पन हुई और उसने सोचा-॥२४॥

बहुत दिनों से कष्ट पाते हुए इसको मैंने आज तक कुछ भी नहीं दिया। तो इसे किसी युक्ति से कुछ देकर क्यों न देखूं ॥२५॥

कि इस वेबारे के पापों का नाश हुजा या नहीं। अब भी लक्ष्मी इसे दर्शन देती है या नहीं ॥२६॥

ऐसा सोचकर राजा अपने कोषागार में गया, वहाँ से उसने एक बिजौरा नीबू में रत्न भरकर के एक डिब्बे के समान उसे बन्द किया ॥२७७॥

और, भवन के बाहर उसने एक सार्वजनिक दरबार किया। उस दरबार में सभी नागरिक, सामन्त और मन्त्री एकत्र हुए ॥२८॥

उन लोगों में आये हुए उस कार्यटिक को राजा ने स्नेह-भरी वाणी से कहा-'यहाँ निकट आओ ।॥२९॥

यह सुनकर लब्यदत्त कार्यटिक प्रसन्न हुआ और राजा के पास जाकर उसके आगे बैठ गया ॥ ३०।।

तब राजा ने उससे कुछ सुभाषित सुनाने के लिए कहा। राजा के यह कहने पर कार्यटिक ने एक आर्या पड़ी (जिसका अर्थ है-) ॥३१॥

'जिस प्रकार नदियों का समूह जल से भरे समुद्र को ही भरता है (और, तालाब आदि सूखे ही रहते हैं), उसी प्रकार यह लक्ष्मी भी भरे हुए (घनवान्) को ही भरती है और निर्बन की आँखों के सामने भी नहीं आती' ॥३२॥

यह सुनकर और इस आर्या को फिर से उससे पढ़वाकर राजा ने, प्रसन्न होकर रत्न से भरा हुआ एक विजौरा नींबू को डिब्बे के समान उसे दे दिया ॥३३॥

'यह राजा, जिस पर प्रसन्न होता है, उसके जीवन-भर की दरिद्रता दूर कर देता है। किन्तु यह कार्यटिक शोचनीय (अभागा) है, जिसे इस प्रकार आदर से बुलाकर भी इस प्रसन्न राजा ने यह बिजौरा नींबू दिया। सच है, कि अभागों के लिए कल्पवृक्ष भी पलाश का वृक्ष बन जाता हैं ।॥३४-३५।।

इस प्रकार, वास्तविक बात को न जानते हुए वहाँ बैठे हुए सभी लोग विषाद के साथ आपस में ऐसी बातें करने लगे ॥ ३६।।

वह कार्यटिक नींबू को लेकर जैसे ही बाहर निकला, वैसे ही विषाद करते हुए उसके सामने एक याचक आया ॥३७॥

उसका नाम राजबन्दिक था। उसने कार्यटिक को एक साड़ी देकर बदले में वह नींबू उससे ले लिया ॥३८॥

और उस याचक ने सभा में जाकर राजा को वह विजौरा नींबू भेंट कर दिया। तब राजा ने उमे पहचानकर भिक्षुक मे पूछा- ॥३९॥

'भदन्त, यह नींबू तुम्हें कहाँ मिला? तब उसने उस कार्यटिक को उसका देने वाला' बताया ॥४०

तब राजा लिन और चकित होकर सोचने लगा कि इस कार्यटिक का पाप अभी समाप्त नहीं हुआ है।॥४१॥

तब राजा ने उस नींबू की भेंट स्वीकार की ओर वह उठकर अपने दैनिक कार्यों में लग गया ॥४२॥

याचक की दी हुई साड़ी को बेचकर अपने भोजन आदि का प्रबन्ध करके वह काउंटिक लब्धदत्त, फिर राजा के सिहद्वार पर सदा की भाँति आकर खड़ा हो गया ॥४३॥

दूसरे दिन, राजा ने, फिर उसी प्रकार सार्वजनिक सभा की और उसमें पहले के समान नागरिक, दरबारी और मन्त्री एकत्र हुए ॥४४॥

उसी प्रकार उस सभा में आये हुए कार्यटिक को देखकर और पास बुलाकर उसने बैठाया और उसी आर्या को पुनः पढ़बाकर प्रसन्नतापूर्वक दूसरा नींबू उसे प्रदान किया ।।४५-४६।।

बाज दूसरे दिन भी, राजा इस प्रकार व्यर्थ ही प्रसन्न हुआ, यह क्या बात है, इस प्रकार सभी उपस्थित व्यक्ति आपस में आश्चर्य के साथ कहने लगे ॥४७॥

वह व्याकुल काउंटिक भी उस फल को हाथ में लेकर उसे ही राजा की कृपा समझता हुमा सभा से बाहर निकला ॥४८॥

उसके बाहर निकलते ही उसके सामने किसी ग्राम का एक अधिकारी राजा के दर्शन के लिए सभा में जाता हुआ आ गवा ॥४९॥

उसने कार्यटिक के हाथ में नींबू देखकर और उसे अच्छा शकुन समझकर तया काउंटिक की घोती-दुप‌ट्टे के दो जोड़े दे कर उसने उससे नींबू ले लिया और राजसभा में जाकर राजा के चरणों में झुककर उसको पहले नींव ही उसने भेट-स्वरूप रखा और उसके पश्चात् दूसरी वस्तुएँ राजा को अर्पित कीं ।॥५०-५१॥

राजा ने उस नींबू को पहचानकर उस ग्रामाधिकारी से पूछा कि यह फल तुम्हें कहाँ में प्राप्त हुना ? उत्तर में उसने कहा 'कार्यटिक से'। यह सुनकर आश्चर्य है कि उस अभागे को लक्ष्मी अब भी दर्शन नहीं देना चाहतो ऐसा सोचता हुआ राजा बहुत विश्न हुआ ।।५२-५३।।

और, उस नींबू को लेकर वह समा में उठ गया। उधर उस कार्यटिक ने उन कपड़ों के जोड़ों में एक को दूरुल में बेचकर अपने भोजन-रानी का प्रबन्ध किया और बचे हुए जोड़े के दो हिस्से करके अपने पहनने के काम में लिया ॥५४-५५।।

तब तीनरे दिन राजा ने उसी प्रकार सभा की और सभी लोग पहले की भाँति वहाँ एकत्र हुए ॥५६।।

और, सभा में आये हुए काउंटिक को पहले की भांति आर्या पढ़वाकर नींबू का फल पुनः उने प्रदान किया ॥५७॥

यह देखकर सभी उपस्थित व्यक्ति चकित हुए और कार्यटिक ने उस फल को राजा की वेश्या को ले जाकर दिया ॥५८॥

राजा के सम्मान-वृक्ष को चलती-फिरती लता के समान उस वेश्या ने, उस कार्यटिक को भावी फलसूबक सोना, उसके बदले में दिया ॥५९।।

वह कार्यटिक उस सोने को बेचकर सुख से रहने लगा और उधर वह बेश्या भी किसी कार्य से राजा के समीप आई। उसने राजा के लिए उस सुन्दर और बड़े नींबू को उपहार-स्वरूप भेंट किया। राजा ने नींबू को पहचानकर उसकी प्राप्ति का समाचार पूछा। तब वेश्या ने कहा-'यह मुझे कार्यटिक ने दिया है।' यह सुनकर राजा सोचने लगा कि यह कार्यटिक अब मी लक्ष्मी से नहीं देखा गया! वह अभागा अब भी मेरी कृपा को सफल नहीं समझ रहा है। ये महान् रत्न बार-बार घूम-फिरकर मेरे ही पास लौट कर जा रहे हैं ।।६०-६३॥

ऐसा सोचकर उस नींबू को लेकर और उसे सुरक्षित रखकर राजा दैनिक कृत्य के लिए उठ गया ।॥६४।।

इसी प्रकार, चौथे दिन भी राजा ने वैसा ही दरबार किया और कार्यटिक को सामने बैठाकर उसी आर्या को उससे पढ़वाया ।।६५-६६।।

और उसे, उसी प्रकार वह नींबू दिया, किन्तु बाज शीघ्रता से उसके हाथ से छूट जाने के कारण उसके हाथ से भूमि पर गिरकर उस नींबू के दो टुकड़े हो गये ।॥६७।।

और, उसके जोड़ खुल जाने के कारण रत्न उसमें से निकलकर बिखर गये। उन बहुमूल्य और उच्च कोटि के रत्नों से वह खाली स्थान भी जगमगाने लगा ॥६८॥

यह दृश्य देखकर वहाँ एकत्र लोग कहने लगे कि 'वास्तविक स्थिति को न जाननेवाले हम लोगों को मिथ्या भ्रम हुआ। राजा की कृपा तो इतनी बहुमूल्य है' ।॥६९।।

यह सुनकर राजा ने कहा-'मैंने इस बुक्ति से यह जानना चाहा कि लक्ष्मी इसे दर्शन देती है या नहीं। इस प्रकार, इसके भाग्य की परीक्षा की थी' ।॥७०॥

तीन दिनों तक उसके पापों का अन्त नहीं हुआ था, वह आज हुआ है, इसीलिए लक्ष्मी ने इसे अभी दर्शन दिया ॥७९॥

ऐसा कहकर राजा ने वे रत्न और गाँव, हाथी, घोड़े, सोना आदि देकर उस कार्यटिक को अपना एक सामन्त बना दिया ॥७२॥

अनन्तर, उसकी प्रवांसा करती हुई उस सभा से उठकर राजा अपने नित्यकर्म के लिए चला गया बौर कार्यटिक भी अपने निवास स्थान को गया ।॥७३॥

इस प्रकार, जबतक पारों का अन्त नहीं होता, तबतक लाखों यत्न करने पर भी स्वामी की कृपा प्राप्त नहीं हो सकती ॥७४।।

इस प्रकार, इस कथा को सुनाकर मन्त्रिश्रेष्ठ गोमुख ने अपने स्वामी नरवाहनदत्त से कहा-'महाराज, मैं समझता हूँ कि इस कार्यटिक का भी अभी पाप नष्ट नहीं हुआ है। इसीलिए, आप इस पर कृपा नहीं कर रहे हैं ।॥७५-७६।।

गोमूल के यह वचन सुनकर और 'हाँ ठीक है' ऐसा कहकर उस अपने कार्यटिक को वत्सराज के पुत्र नरवाहनदत्त ने बहुत-से ग्राम, हाथी, घोड़े, हजारों मन सोना, कपड़े और आभूषण प्रदान किये ॥७७-७८।।

जिससे वह दरिद्र भिवारी कलंटिक राजा के समान हो गया। सच है, कृतज्ञ और अच्छे परिवारवाले स्वामी की सेवा निष्फल कैसे हो सकती है? ॥७९॥

बोर ब्राह्मण प्रलम्बबाहु की कथा 

इस प्रकार, कौशाम्बी में रहते हुए नरवाहनदत्त के समीप सेवा के लिए दक्षिणदेशवासी एक युवक आया. जिसका नाम प्रलम्बबाहू था। उस वीर ने राजा से निवेदन किया- 'स्वामी मैं आप के यश से आकृष्ट होकर यहाँ आय। हूँ। मैं पृथ्वी पर रय, हाथी और घोड़े पर जाते हुए आपके पीछे-पीछे पैदल चलूंगा, किन्तु आकाश में गमन करते हुए आपके पीछे नहीं चल सुकता ।।८०-८२॥

क्योंकि, भविष्यत् काल में आप विद्यावरों के सम्राट् होंगे, ऐसा सुना जाता है। मेरे जीवन-निर्वाह के लिए प्रतिदिन आप एक सौ दीनार (सोने का सिक्का) दीजिए ॥८३॥

नरवाहनदत्त ने ऐसा कहते हुए उस अनुपम तेजस्वी ब्राह्मण के लिए प्रतिदिन एक सौ मुहों की जीविका प्रदान की ॥८४।।

उसके प्रसंग में गोमुख ने राजा से कहाँ 'स्वामिन्, इस प्रकार के (अत्यधिक वेतनवाले) राजाओं के जो सेवक होते हैं, उसके सम्बन्ध में एक क्या सुनो ।।८५।।

वीरवर ब्राह्मण की कथा

इस भूलोक में विक्रमपुर नाम का एक महान् नगर है। उसमें प्राचीन समय में विक्रमतुंग नाम का राजा थाः ॥८६॥

जिस नीतिमान् के कृपाण में तीक्ष्णता थी, दंड में नहीं। धर्म में जिसकी निरन्तर आसक्ति थी, स्त्री, मद्य और आबेट में नहीं। ॥८७॥

गुण का टूटना केवल धनुवों में ही देखा जाता था, अन्यत्र गुणमंग नहीं था। अ-विचार (भेड़ों का चराना) केवल पशु चरानेवालों में देखा जाता था, अन्यत्र अ-विचार नहीं था ।।८८।।

उस राजा के पास एक बार सुन्दर और भव्य स्वरूपवाला मालव-देशवासी ब्राह्मण सेवा (नौकरी) के लिए आया ॥८९॥

उसकी धर्मवती नाम को पत्नी, वीरवती नाम की कन्या और सत्वर नाम का बालक था। इस प्रकार इतना ही उसका परिवार था ।॥९०॥

इसी प्रकार, उसके पास सेवा के तीन साधन थे-कमर में कृपाण और एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में शोरों के समान चमकती हुई ढाल ।।९१।।

केवल इतने ही बड़े कुटुम्ब के लिए उसने राजा से पाँच सौ दीनार प्रतिदिन का वेतन माँगा ॥९२॥

राजा ने भी उसके प्रभावशाली व्यक्तित्व के कारण 'उसकी विशेषता देखें' ऐसा सोचते हुए उसे उनना ही वेतन देना स्वीकार कर लिया ॥९३॥

तदनन्तर राजा ने उसके पीछे गुप्तचर लगा दिये कि 'देखो, यह दो हाथोंवाल। इतनी मुहरों को कैसे खर्च कर मकता है?' वह वीरवर उन पाँच सौ मुहरों में से एक सौ मुहरे अपने भोजन आदि की व्यवस्या के लिए अपनी पत्नी को देता था। एक सौ से कपड़े, माला आदि खरीदता था, एक मो मुहरें प्रतिदिन स्नान करके विष्णु, शिव आदि के पूजन में व्यय करता या और शेष दो सौ मुहरें, प्रतिदिन वह ब्राह्मण और दीन भिक्षुकों को दान देता था। इस प्रकार, वह प्रतिदिन पाँच सौ दीनार व्यय करता या ।।९४-९७।।

और, प्रातःकाल से मध्याह्न तक वह प्रतिदिन राजभवन के मुख्य द्वार पर खड़ा रहता था। तदनन्तर स्नान, भोजन आदि करके शेष दिन और रात में फिर द्वार पर पहरा देता था ॥९८।।

राजा के गुप्तचर उस ब्राह्मण की प्रतिदिन की इस दिनचर्या की सूचना नित्य राजा को दिया करते थे ।।९९।।

कुछ दिनों के पश्चात् सन्तुष्ट राजा ने उससे गुप्तचरों को हटा लिया। वह वीरवर भी स्नान, भोजन आदि के समय को छोड़कर दिन-रात तलवार लिये द्वार पर राजा की सेवा में इटा रहता था ।।१००۱۱

कुछ दिनों के उपरान्त मानों वीरवर को जीतने की इच्छा से, धीरों के प्रताप को न सहने-वाला वर्षाकाल प्रचंड गर्जना करता हुआ आया ॥१०१॥

तब, जब कि मेव, भोषण धारा-रूपी बाण-वर्षा कर रहा था, वह वीरवर राजा के सिह-द्वार पर सम्मे के समान अविचल भाव से खड़ा रहा ॥१०२॥

राजा विक्रमतूंग, अपने भवन की खिड़की से उसे प्रतिदिन पहरा देते हुए देखकर शवन-गृह में चड़ता था ।॥ १०३॥

एक बार, राजा ने, घोर वर्षा के समय ऊपर से कहा- 'यहाँ कौन है? यह सुनकर बोरवर ने उत्तर दिया 'मैं वीरवर उपस्थित हूँ। ॥१०४।॥

आश्चर्य है कि यह महान् बलशाली व्यक्ति है, जो ऐसी घोर दृष्टि में भी सिद्धार को नहीं छोड़ता ॥१०५।।

उसका उत्तर सुनकर राजा जब यह सोच ही रहा था कि इतने में ही उसने दूर से किसी स्त्री को करुण स्वर में रोते हुए सुना ॥१०६॥

'मेरे राज्य में कोई भी दुखी नहीं है, फिर यह कौन रो रही है? ऐसा सोचकर राजा ने उसी समन वोरवर से कहा- 'वीरवर, दूसरे स्थान पर कोई स्त्री रो रही है, सुनो। यह कौन है और इने क्या दुःख है, यह वहाँ जाकर पता लगाओं' ।।१०७-१०८।।

यह सुनकर और 'जो जाजा' कहकर वह वहाँ जाने के लिए तैयार हुआ। उसकी कमर में खंजर बंधा हुआ था और तलवार को हाथ से लपलपा रहा था ।।१०९।।

चमकती हुई बिजलीवाले भीषण मेघ के मूसलाधार वृष्टि के कारण उस समय आकाश और पृथ्वी के एक होने पर भी वीरवर को उबर जाते हुए देखकर दयालु राजा भी महल से उत्तर-कर और तलवार हाथ में लेकर छिपे-छिपे उसके पीछे-पीछे चला ॥११०-१११॥

छिपकर राजा जिसका पीछा कर रहा था, रोने के शब्द को लक्ष्य करके जाते हुए उस बीरवर ने, नगर के बाहर एक तालाब देखा ॥ ११२॥

उस सरोवर में उस स्त्री को उसने देखा, जो यह कहती हुई रो रही थी- 'हाय नाय ! हे दधालो ! हे शूर ! तुझसे परित्यक्ता होकर मैं कैसे जिऊंगी' ।॥११३॥

'तू कौन है और किस पति को सोचकर विलाप कर रही है?' इस प्रकार, वीरवर के पूछने पर वह स्त्री कहने लगी- "बेटा, बीरबर, मैं पृथ्वी हूँ। मेरा पति धार्मिक राजा विक्रमतुंग है। आज से तीसरे दिन उसकी अवश्य मृत्यु होगी। इसलिए, सोच, कर रही हूँ कि ऐसा पति फिर मुझे कहाँ मिलेगा? इस प्रकार, मैं अत्यन्त दुःखी होकर अपने को ही सोच रही हूँ।" ॥११४-११६॥

देवपुत्र सुप्रभ की कथा

मैं विम्यवृष्टि से बागे होनेवाले शुभ और अशुभ को जानती हूँ। जैसे स्वर्ग में स्थित देवपुत्र सुप्रभ जानता था ॥११७॥

उस दिव्य दृष्टिवाले सुप्रभ ने पुष्य-क्षय के कारण स्वर्ग से अपना पतन और एक सप्ताह तक शूकरी के पेट में रहना जान लिया था ।।११८।।

तब शूकरी के गर्भ में रहने के कष्ट की कल्पना करते हुए देवपुत्र अपने साथ स्वर्गीय सुखों के लिए चिन्ता करने लगा 'हाय स्वर्ग, हाय अप्सराको, और हाय नन्दन-वन के लतागृहो, हाय, मैं अब तुम्हें छोड़कर शूकरी के गर्भ में कैसे रहूँगा और उसके पश्चात् कीचड़ में कैसे जीवन व्यतीत करूंगा ॥११९-१२०।।

इस प्रकार, रोते हुए देवपुत्र को सुनकर, देवराज इन्द्र ने, बकर उससे विलाप का कारण पूछा और उसने भी अपना दुःख उसे बता दिया ॥१२१॥

तब इन्द्र ने कहा कि 'तेरे लिए एक उपाय है, सुन'। 'ओं नमः शिवाय', इस मन्त्र का जप करता हुआ भगवान् शिव की शरण में जा ॥१२२॥

तू उनकी शरण में जाकर पापों से छूटकर पुष्य प्राप्त करेगा और उस पुष्प के प्रभाव से शूकर की योनि तुझे न मिलेगी और न तू स्वर्ग से ही पतित होगा ॥१२३॥

देवराज के इस प्रकार कहने पर गुप्रभ ने उसे स्वीकार किया और 'ऑनमः शिवाय' कह कर शंभु की शरण ली ॥१२४॥

छः दिनों तक तन्मय होकर शिवजी का जप करके वह छूकर-योनि से ही नहीं बच गया, प्रत्युत स्वर्ग से भी ऊपर चला गया ।।१२५।।

सातवें दिन उसे स्वर्ग में न देखकर इन्द्र ने विशेष दृष्टि डाली तो देखा कि वह स्वर्ग से ऊपर दूसरे लोक में चला गया है।॥ १२६॥

इस प्रकार, जैसे सुप्रभ ने भावी अशुभ के लिए शोक किया था, उसी प्रकार मैं भी राजा की होनेवाली मृत्यु के लिए सोच कर रही हूँ" ।॥१२७।।

इस प्रकार, कहती हुई पृथ्वी से उस वीरवर ने कहा-'माता! जैसे इन्द्र द्वारा मुक्ति बताने पर सुप्रभ पापमुक्त हो गया, उसी प्रकार राजा के भी जीवित रहने का कोई उपाय हो, तो बतायो।' वीरवर के ऐसा कहने पर पृथ्वी बोली- ॥१२८-१२९॥

'इसका एक ही उपाय है और वह तुम्हारे अधीन है।' यह सुनकर वीरवर प्रसन्न होकर बोला- ॥१३०ना

'यदि ऐसा है, तो उसे शीघ्र बताओ। जिससे मेरे प्रभु का कल्याण हो। मेरे और मेरी स्त्री तथा पुत्र के प्राणों से भी यदि कोई उपाय हो, तो मेरा जन्म सफल हो' ।॥ १३१ ॥

ऐसा कहते हुए वीरवर से पृथ्वी ने कहा-'राजभवन के पास जो चंडिका देवी का मन्दिर है, वहाँ जाकर यदि तुम अपने पुत्र सत्त्वत्वर को भेंट (बलि) चढ़ा दो, तो यह राजा जीवित रह सकता है और कोई दूसरा उपाय नहीं हैं।॥ १३२-१३३॥

पृथ्वी के वचन को सुनकर धीर वीरवर ने कहा-'देवि, जाता हूँ और अभी इस उपाय को करता हूँ' ।॥१३४।।

'तुम्हारे सिवा स्वामी का हित और दूसरा कौन कर सकता है। बच्छा, जाओ तुम्हारा कल्याण हो,' - ऐसा कहकर पृथ्वी अन्र्ताहन हो गई और छिपकर पीछे-पीछे आए हुये राजा ने यह मब सुना ।।१३५।।

तदनन्तर, राजा विकमतुंग के छिपे-छिपे पीछा करते रहने पर वह वीरवर उसी रात्रि में अपने घर गया ।॥१३६॥

तब स्त्री को जगाकर वीरवर ने राजा के जीवन के लिए पुत्र के बलिदान तक का सारा वृत्तान्त, जो पृथ्वी ने कहा था, स्त्री को सुनाया ।। १३७।।

यह सुनकर उसकी पत्नी बोली- 'स्वामी का हित अवश्य करना चाहिए। इसलिए, पुत्र को जगाकर आप उससे कहिए' ।॥१३८॥

तब वीरवर ने बालक को जगाकर उने वह सब समाचार सुनाया, जो राजा के लिए पृथ्वी ने कहा था ॥१३९॥

यह सुनकर वह यथार्थनाम वाला बालक सत्त्वत्वर बोला 'पिता! स्वामी के हित में प्राणों का उपयोग करनेवाला क्या मैं धन्य नही हूँ ? ॥१४०॥

मैंने जो उमका अन्न खाया है, उसका प्रत्युपकार मुझे करना ही चाहिए। इसलिए, मुझे ले जाकर देवी को भेंट करो ॥१४१॥

ऐसा कहते हुए पुत्र से वीरवर ने धीरज के साथ कहा- 'तू सवमुच मुझसे उत्पन्न हुजा मेरा पुत्र है' ।॥ १४२॥

बाह्र खड़े हुए राजा विक्रमतुंग ने आश्चर्य के साथ सोचा कि ये सभी समान आत्मबल-वाले प्राणी हैं।॥१४३॥

तदनन्तर, वीरवर अपने पुत्र को कन्धे पर रखकर और उसकी पत्नी धर्मवती, अपने पीछे कन्या बीरवती को लेकर उसी रात्रि में चंडिका के मंदिर में गये और छिपा हुआा राजा विक्रपतुंग भी उन लोगों के पीछे गया ।॥१४४-१४५।।

वहाँ जाकर कन्धे से उतारे हुए चेर्यराशि सत्त्ववर ने बालक होते हुए भी देवी को प्रणाम करके निवेदन किया- हे देवि! मेरे सिर की बलि से ह‌मारा स्वामी विक्रमतुंग जीवित रहे और पृथ्वी का पालन करता रहे' ।।१४६-१४७।।

ऐसा कहते हुए सत्त्वत्वर को वीरवर ने 'वाह बेटा, ठीक है, इस प्रकार कहा और म्यान से तलवार निकालकर उसका शिर काट दिया ॥१४८॥

और, 'राजा का कल्याण हो' ऐसा कहते हुए वह शिर देवी को भेंट कर दिया। यह सत्य है कि सच्चे स्वामिभक्त सेवकों को पुत्र की या अपने प्राणों की चाह नहीं होती ॥१४९॥

इनने में ही उमने आकाशवाणी मुनी' है वीरवर बहुत अच्छा। तूने अपने पुत्र के प्राणों में भी स्वामी को जीवन प्रदान किया' ।॥ १५०॥

तब अत्यन्त चकित राजा के यह सब दृश्य देखते-सुनते मत्त्ववर की बहन वीरवर की कन्या वीरवती, मृत भाई के समीप जाकर और उसके मस्तक को गोद में लेकर, चूमकर और 'हाय भाई-इस प्रकार चिल्लाने लगी और हृदय फट जाने से मर गई ॥१५१-१५२॥

कन्या को भी मृत देखकर वीरवर की धर्मपत्नी धर्मवती, पति को हाथ जोड़कर अत्यन्त दोनता के साथ बोली- ।। १५३।।

'राजा का कल्याण तो किया। अब मुझे भी आज्ञा दो। इन दोनों मृत बच्चों को लेकर मैं अग्नि में प्रवेश करूं ॥१५४।।

जब कि यह अज्ञान बालिका भी भाई के शोक में मर गई, तब दोनों बच्यों के मरने पर मेरे जीवन की क्या शोभा है' ।।१५५।।

इस प्रकार, दृढतापूर्वक कहती हुई पत्नी से वोरवर ने कहा-'हे सदाचारिणी, ऐसा ही करो। मैं इस समय क्या कहूँ। पुत्रों के शोक से तुझे अब संसार में सुख नहीं है। प्रतीक्षा करो, मैं तुम्हारे लिए चिता बनाता हूँ, ॥१५६-१५७७॥

ऐसा कहकर उसने वहाँ देवी के मन्दिर-निर्माण से बची हुई लकड़ी से चिता बनाई बऔर दोनों बच्यों को उस पर रखकर आग लगा दी ।॥ १५८॥

तब वीरवर की भार्या पतिवता धर्मवती, पति के चरणों में प्रणाम करके और हे आर्यपुत्र, बगले जन्म में भी तुम्हीं मेरे पति होना, ।।१५९।।

तथा हमारे राजा का कल्याण हो' इस प्रकार कहकर उठती हुई वह ज्वालाबोंवाली चिता में ठंडे हृद में जैसे प्रविष्ट हुई ॥१६०।।

छिपे-छिपे राजा विक्रमतुंग, यह सब दृश्य देखकर, 'मैं इससे कैसे उऋण होऊँगा, इसी चिन्ता में मग्न होगया ॥१६१॥

तब धीरचित्त वीरवर ने भी सोचा 'मेरे स्वामी का कार्य तो हो गया। दिव्य वाणी भी सुन ली। राजा के अन्न का बदला अपने पालनीय और प्यारे कुटुंब के बलिदान से चुका दिया ॥ १६२-१६३॥

अब केवल अपना पेट भरने के लिए जीवन को रखना अच्छा नहीं। तो क्यों न मैं भी अपने को भगवती चंडिका का उपहार बनाकर पूजन करूं ॥१६४।।

मात्विक वीरवर ने, इस प्रकार निश्चय करके वरदायिनी देवी की इस प्रकार स्तुति प्रारम्भ की ।।१६५॥

'हे प्रणत भक्तों को आश्रय देनेवाली महेश्वरी, तुझे प्रणाम है। संगार के पंक में फंसे हुए मुझे शरणागत का उद्धार करी ॥१६६।।

तू समस्त प्राणियों की प्राणशक्ति है। तेरे ही कारण यह सारा संसार जीवित है। सृष्टि के प्रारम्भ में तू हो पहले उत्पन्न हुई थी। तुझे शिव ने स्वयं देखा। तू विश्व को उत्पन्न करके अपने प्रचंड तेज में उय और असमय में उत्पन्न नवीन करोड़ों सूर्यो की पंक्ति के समान प्रादर्भत हुई ॥१६७-१६८॥

तू ने खड्ग, पेटक, धनुर और शूल आदि धारण करनेवाले भुजमंडल से आकाश को छा लिया ॥१६९।।

इस प्रकार, स्वयं शिव ने तेरो स्तुति की है। है चंडि! हे चामुंडे हे मंगले ! हे त्रिपुरे ! हे जये। तुझे प्रणाम करता हूँ। तू एक अंग-रहित शिवा, दुर्गा, नारायणी, सरस्वती, भद्रकाली, महालक्ष्मी, सिद्धा और रुद्र-दानब का नाश करनेवाली है ॥ १७०-१७१॥

तू ही गायत्री, महारानी, रेवती, विन्ध्यवासिनी, उमा, कात्यायनी और शर्व-पर्वत की निवासिनी है ॥ १७२।।

हे देवि, इन नामों से तेरी स्तुति करते हुए शिवजी को सुनकर स्कन्द, वसिष्ठ और ब्रह्मादि देवों ने तेरी स्तुति को ॥१७३।।

तेरी स्तुति करते हुए देवता, ऋषि और मनुष्य अपनी चाह से भी अधिक फल प्राप्त कर चुके और करते हैं।॥ १७४।।

बतः, हे वरदायिनी, मुझ पर कृपा करो और मेरे शरीर से अपनी पूजा स्वीकार करो। मेरे स्वामी राजा विक्रमतुंग का कल्याण हो ।। १७५।।

ऐसा कहकर वह अपना गला काटने के लिए जैसे ही तैयार हुआ, वैसे ही आकाशवाणी हुई--।। १७६॥

'बेटा, ऐसा साहस न करो। तेरी इस वीरता से मैं बहुत प्रसन्न हूँ, इसलिए तुम अपना मनमाना वर माँगो' ।॥१७७।।

यह सुनकर वह वीरवर बोला- 'हे देवि! यदि तू सन्तुष्ट है, तो राजा विक्रमतुंग सौ वर्ष और जिये और मेरी पत्नी तथा बच्चे फिर से जीवित हो जावें ॥१७८॥

ऐसा वर माँगने पर 'ऐसा ही होगा' इस प्रकार की दिव्यवाणी फिर हुई ।।१७९।।

ओर, उसी क्षण सम्पूर्ण शरीर के साथ धर्मवती, सत्त्ववर और वीरवती तीनों जी उठे ॥१८०॥

तव प्रसन्नचित्त वीरवर उन सब को घर पहुंचाकर फिर राजद्वार पर उपस्थित हो गया ॥ १८१॥

इन सब दृश्यों को देखकर हृषित और चकित राजा विक्रमतुग फिर अपने महल में छिपे-छिपे ही जा बढ़ा ॥१८२॥

ओर, 'सिहद्वार पर कौन है', इस प्रकार ऊपर मे ही बोला। यह सुनकर नीचे खड़े वीरवर ने उमसे कहा- ॥१८३॥

'मैं यहाँ हूँ उस स्त्री को देखने के लिए मैं गया था। किन्तु, वह देखते-ही-देखते अन्तर्धान होकर कहीं बली गई ॥१८४॥

इस मारे आश्चर्यकारी वृत्तान्त को सुनकर राजा विक्रमतुंग एकान्त रात्रि में सोबते लगा--।।१८५।।

ओह! यह वीरवर कोई असाधारण और अपूर्व पुरुष है। ऐसा प्रशंसनीय कार्य करके भी उसकी चर्चा तक नहीं करता ।॥ १८६॥

गम्भीर, विशाल और महासत्त्वशाली समुद्र भी प्रलयकालीन तूफान से क्षुब्ध हो उठता है, किन्तु इससे समुद्र भी बराबरी नहीं कर सकता; क्योंकि यह उससे भी अधिक गम्भीर है।॥ १८७॥

मेरे अनजाने, रात्रि में मेरे लिए इसने पुत्र, पुत्री, स्त्री और अपने भी प्राण दे दिये, अब मैं इसका बदला कैसे दे सकता हूँ ॥१८८॥

इस प्रकार की अनेक बातों को सोचता हुआ राजा राज-भवन से उतरा और अपने शयनागार में नाश्वर्यान्वित होकर रात्रि व्यतीत की ॥१८९।।

प्रातःकाल सार्वजनिक सभा (आम दरबार) में बौरबर के उपस्थित होने पर, राजा ने रात्रि में हुआ वीरवर का सारा आश्चर्यमय वृत्तान्त सम्वों से कह सुनाया ॥ १९०॥

तब राजा ने सभी सभ्यों द्वारा प्रशंसा किव जाते हुए वीरवर को, पुत्र के साथ बैठाकर, उसे अपने हाथ से पट्ट बाँधकर बहुत-से देश उसे दान में दिये और दस करोड़ सोने की मुहरें तया साठवुनी मासिक वृत्ति उसे प्रदान की ।।१९१-१९२॥

वह वीरवर ब्राह्मण, उसी समय राजा के समान होगया। उस पर श्वेत छत्र लग गया। इस प्रकार अपने कुटुम्ब के साथ वह सफल हुआ ।॥ १९३॥

मन्त्री गोमुख इस प्रकार नरवाहनदत्त को कथा सुनाकर उसका उपसंहार करते हुए कहने लगा-'स्वामी, इस प्रकार राजाओं के पुण्य के योग से ही कोई अनुपम वीर सेवक उन्हें मिलते हैं। जो स्वामी के लिए अपने शरीर और प्राणां का मोह त्यागकर दोनों लोकों को सिद्ध और सफल बनाले हैं ।॥१९४-१९५॥

हे महाराज, यह उत्तम बाह्मणकोर, तुम्हारा उसी प्रकार का सेवक प्रतीत होता है; क्योंकि यह नवीन बीर अधिक-से-अधिक सत्त्व गुणवाना, लम्बी भुजाओंवाला और स्थिर एवं मुन्दर आकृतिवाला है ॥ १९६॥

उदारहृदय नरवाह्नदत्त, अपने मुख्य मन्त्री गोमुख से इस प्रकार की उत्तम कया सुनकर अत्यन्त सन्तुष्ट हुआ ।।१९७।।

महाकवि सोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के अलंकारवतो लम्बक का तीसरा तरंग समाप्त

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