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5804. || चतुर्थ कहानी || सूर्यप्रभ का रणभूमि में सेना का उतारना; रानियों द्वारा सूर्यप्रभ की तथा युद्ध की चर्चा;

5804. || चतुर्थ कहानी ||  सूर्यप्रभ का रणभूमि में सेना का उतारना; रानियों द्वारा सूर्यप्रभ की तथा युद्ध की चर्चा चतुर्थ तरंग सूर्यप्रभ का रणभूमि में सेना का उतारना रात बीतने पर प्रातःकाल वह सूर्यप्रभ सुमेरु के तपोवन से अपनी सेना के साथ श्रुतशर्मा को जीतने के लिए चला ॥१॥ वहाँ से चलकर श्रुतशर्मा के निवास-स्थान त्रिकूट पर्वत पर पहुंचकर वहाँ पड़ी हुई उत्तकी सेना को बलपूर्वक हटाकर सूर्वप्रभ ने अपनी सेना का शिविर स्थापित किया ।॥२॥ शिविर लग जाने पर सुमेरु, मय आदि के साथ सभा में बैठे हुए सूर्यप्रभ के समीप त्रिकूटेश्वर (श्रुतशर्मा) का दूत आया ॥३॥ उस दूत ने सभा में आकर सुमेरु नामक विद्याधरराज से कहा कि श्रुतशर्मा के पिता ने यह सन्देश दिया है कि 'हमने दूर देशवासी तुम्हारा बातिथ्य सत्कार कभी नहीं किया है। आज तुम कुछ पाहूनों के साथ हमारे देश में पधारे हो। इसलिए, जब हम तुम्हारा समुचित आतिथ्य सत्कार करेंगे।' इस प्रकार शत्रु का सन्देश सुनकर सुमेरु ने दूत से कहा- ॥४-६॥ 'ठीक है, हमारे समान दूसरे पाहून को तुम न पाओगे। हमारा आतिथ्य सत्कार परलोक में नहीं, इसी लोक में तुम्हें फल देगा ॥७॥ तो हम...