5804. || चतुर्थ कहानी || सूर्यप्रभ का रणभूमि में सेना का उतारना; रानियों द्वारा सूर्यप्रभ की तथा युद्ध की चर्चा;
5804. || चतुर्थ कहानी || सूर्यप्रभ का रणभूमि में सेना का उतारना; रानियों द्वारा सूर्यप्रभ की तथा युद्ध की चर्चा
चतुर्थ तरंग
सूर्यप्रभ का रणभूमि में सेना का उतारना
रात बीतने पर प्रातःकाल वह सूर्यप्रभ सुमेरु के तपोवन से अपनी सेना के साथ श्रुतशर्मा को जीतने के लिए चला ॥१॥
वहाँ से चलकर श्रुतशर्मा के निवास-स्थान त्रिकूट पर्वत पर पहुंचकर वहाँ पड़ी हुई उत्तकी सेना को बलपूर्वक हटाकर सूर्वप्रभ ने अपनी सेना का शिविर स्थापित किया ।॥२॥
शिविर लग जाने पर सुमेरु, मय आदि के साथ सभा में बैठे हुए सूर्यप्रभ के समीप त्रिकूटेश्वर (श्रुतशर्मा) का दूत आया ॥३॥
उस दूत ने सभा में आकर सुमेरु नामक विद्याधरराज से कहा कि श्रुतशर्मा के पिता ने यह सन्देश दिया है कि 'हमने दूर देशवासी तुम्हारा बातिथ्य सत्कार कभी नहीं किया है। आज तुम कुछ पाहूनों के साथ हमारे देश में पधारे हो। इसलिए, जब हम तुम्हारा समुचित आतिथ्य सत्कार करेंगे।' इस प्रकार शत्रु का सन्देश सुनकर सुमेरु ने दूत से कहा- ॥४-६॥
'ठीक है, हमारे समान दूसरे पाहून को तुम न पाओगे। हमारा आतिथ्य सत्कार परलोक में नहीं, इसी लोक में तुम्हें फल देगा ॥७॥
तो हम सब तैयार है, आतिथ्य सत्कार करो!' सुमेरु के ऐसा कहने पर दूत ने अपने स्वामी को वैसा ही उत्तर कह सुनाया ॥८॥
तदनन्तर, सूर्यप्रभ आदि ने ऊँचे स्थान पर खड़े होकर अलग-अलग खड़ी हुई अपनी सेनाओं का निरीक्षण किया ॥९॥
तब सुनीथ ने अपने पिता मयासुर से कहा- हमारी सेना में रथ आदि की व्यवस्था क्या है? यह मुझे बताओ' ॥१०॥
'अच्छा, ऐसा ही करता हूँ'- यह कह कर सर्वज्ञ दानवराज मय ने अंगुलि से दिखाते हुए कहना प्रारंभ किया-॥११॥
ये सुबाडू, निघात, मुष्टिक, गोहर, प्रलंब, प्रमाथ, कंकट, पिगल, वसुदत्त आदि राजा अर्धरयी हैं अंकुरी, सुविशाल, दंडी, भूषण, सोमिल, उन्मत्त, देवशर्मा, पितृशर्मा, कुमार और हरिदत्त ये सब पूर्णरथी हैं ।॥ १२-१४।।
प्रकम्पन, दपित, कुम्भीर, मातृपालित, महाभट, उम्रभट, वीरस्वामी, सुराधर, भंडीर, सिहदत्त, गुणवर्मा, कीटक, भीम और भयंकर सभी ये द्विगुण रयी हैं।॥१५-१६॥
विरोचन, वीरसेन, यज्ञसेन, खुज्जर, इन्द्रवर्मा और शबरक, क्रूरकर्मा और निरा-सक ॥१७॥
य सभी राजकुमार त्रिगुणरथी हैं। सुशर्मा, बाहुशाली, विशाल, क्रोधन और प्रचंड ये राजपुत्र चतुर्गुण रथी हैं। जुंजरी, वीरवर्मा, प्रवीरवर, सुप्रतिज्ञ, अमराराम, चन्द्रदत्त, जालिक आदि राजकुमार एवं सिमट, व्याघ्रमट और शत्रुभट राजा पंचगुण रयी हैं। यह उग्रवर्मा नाम का राजकुमार षड्गुण रथी है।॥ १८-२१॥
राजपुत्र विशाख, सुतन्तु, सुगम और नरेन्द्रशर्मा ये सप्तगुण रथी हैं।॥२२॥
राजा सहस्रायु का पुत्र महारधी है। यह शतानीक महारथियों के दल का सरदार है।॥२३॥
सूयंत्रभ के मित्र मुभाष, हर्ष, विमल, महाबुद्धि, अचल, प्रियंकर और शुभंकर महा रथियों के नायक हैं।॥ २४॥
धर्मरुचि और यशरुचि ये दोनों महारथी हैं। इसी प्रकार, विश्वरुचि, भास और सिद्धार्थ ये तीनों सूर्यप्रभ के मन्त्री महारथियों के नायक है। प्रहस्त और महार्थ ये अतिरथियों के नायक हैं ।॥२५-२६॥
प्रज्ञावध और स्थिरबुद्धि ये रथयूथों के नायक हैं। दानव सर्वदमन, प्रमथन, धूमकेतु, प्रवहण, वज्रपंजर, कालचक्र और मरुद्वेग रथियों और अतिरथियों के नायक है। प्रकम्पन, सिंहनाद ये दोनों रथियों तथा अतिरथियों के सरदार हैं। हे पुत्र, महामाय, काम्बलिक, कालकम्पनक और हृष्टरोमा ये चारों असुरराज महारथियों के अधिपतियों के अधिपति हैं ।॥ २७-३०॥
सूर्यप्रभ के समान शक्तिशाली प्रभास और सुमेरु का पुत्र श्रीकुंजरकुमार ये प्रधान योद्धा महारथियों के नायक हैं। ये तथा अन्यान्य अपनी-अपनी सेनाओं के साथ आये हुए अनेक योद्धा हमारी सेना में हैं।॥३१-३२॥
यद्यपि शत्रु की सेना में सैनिक योद्धा हमसे अधिक हैं, फिर भी शिवजी की कृपा से वे हमारी सेना के लिए पर्याप्त नहीं है "।॥ ३३॥
इस प्रकार, मय दानव, अपने ज्येष्ठ पुत्र सुनीथ को जब अपनी शक्ति का परिचय दे रहा था, इतने में ही श्रुतशर्मा के पिता द्वारा भेजा हुआा दूत उसके समीप आया ॥३४।।
और कहने लगा- 'त्रिकूटाधिपति ने आपको यह सन्देश दिया है कि संग्राम शूर-वीरों का महोत्सव है ।। ३५।।
किन्तु, इस संग्राम-महोत्सव के लिए यह भूमि छोटी है, अतः हमलोग विस्तृत मैदानवाले कलापग्राम में चलें, इसलिए यहाँ से बाप वहीं आयें ।॥३६॥
यह सन्देश सुनकर सुनीथ आदि ने इस बात को स्वीकार किया और सूर्यप्रभ आदि सभी कलापग्राम को गये ॥३७॥
इसी प्रकार युद्ध के लिए तत्पर श्रुतशर्मा आदि भी विद्याधर-सेना के साथ उसी स्थान पर पहुँचे ।॥३८॥
श्रुतशर्मा की सेना में हाथियों को देखकर सूर्यप्रभ आदि ने विमानों द्वारा अपने हाथी मंगाये ॥ ३९॥
तदनन्तर, श्रुतशर्मा के सेनापति विद्याधरराज दामोदर ने अपनी सेना में महासूचिव्यूह की रचना की ॥४०۱۱
उस व्यूह के पाश्र्व में बुतशर्मा स्वयं मन्त्रियों के साथ खड़ा हुआ और उसके अग्रभाग में दामोदर सेनापति या तथा अन्यान्य विशेष स्थानों में और-और विद्याघर-राजा थे ॥४१॥
उधर सूर्यप्रभ के सेनापति प्रभास ने अर्धचन्द्राकार व्यूह बनाया और उसके बीच स्वयं रहा। ब्यूह के दोनों कोनों पर कुंजरकुमार और प्रहस्त खड़े थे। सूर्वप्रभ और सुनीय आदि ब्यूह के पृष्ठ भाग में उसकी रक्षार्थ तत्पर हुए ॥४२-४३।।
सुमेरु और सुवासकुमार के उन व्यूह के समीप खड़े होने पर दोनों सेनाओं में रण-मरी बज उठी ।॥४४
तबतक युद्ध देखने के कौतुक से आये हुए चन्द्रादि देवताओं, लोकपालों और अप्सराबों से स्थान भर गया ।॥४५॥
पार्वती के साथ विश्वनाथ शंकर भी आये। उनके पीछे देवता, गण, मातृकाएँ एवं भूत-प्रेत मावि मी थे ॥४६।।
सावित्री के साथ ब्रह्मा तथा उनके साथ मूत्तिमान् वेद और महर्षि भी आये ॥४७॥ और लक्ष्मी, कीत्ति, जया आदि के साथ चक्रधारी भगवान् विष्णु भी गरुडवाहन पर बैठ-कर वहाँ आये ॥४८॥
अपनी सभी पत्नियों के साथ महर्षि कश्यप, द्वादश आदित्य, अष्ट बसु, यक्षों, राक्षसों और नागों के राजा एवं प्रह्लाद आदि असुरों के राजा भी युद्ध देखने के लिए वहाँ एकत्र हुए ॥४९॥
इन दर्शकों के कारण आकाश-मार्ग भर जाने पर, शस्त्रों की अनझनाहट से भीषण और महान् कोलाहल दोनों ओर की सेनाओं में फैल गया। सारी दिशाओं के आकाश बादलों के समान दाणों के जाल से छा गये। दोनों ओर से चलते हुए बाणों के आपस में टकराने पर अग्नि-रूपी बिजली चमकने लगी ॥५०-५१॥
नीचे भूमि पर शस्त्रों से काटे गए हाथी-घोड़ों के वीरों के रक्त की नदियाँ बह चलीं। वीरों के शरीर-रूपी ग्राह उस नदी में बह रहे थे। नाचते, कूदते और रक्त की नदी में तैरते तथा चिल्लाते हुए शूरों-वीरों पर टूटते हुए सियारों और भूत-प्रेतों के लिए वह युद्ध अत्यन्त उत्सव और आनन्द का कारण बन गया था ॥५२-५३।।
असंख्य सैनिकों के कट जाने और उस घोर संग्राम के शनैः शनैः शान्त होने पर शेष सैनिक धीरे-धीरे अपने और पात्रु के पक्ष को भली भांति जान सके ।॥५४।।
तब सुमेरु द्वारा शत्रु-पक्ष के वीरों के नाम सूर्यप्रभ आदि ने सुने और उन्हें पहचाना ॥५५॥
सबसे पहले उबर के एक राजा सुबाडू तथा विद्याधरों के राजा अट्टहास का परस्पर द्वन्द्व-युद्ध प्रारम्भ हुआ ।॥५६॥
बहुत समय तक युद्ध करते हुए और बाणों से छिदे हुए सुबाहु के शिर को अट्टहास ने अर्धचन्द्राकार वाण से काट दिया ॥५७॥
सुबाहु को मृत देखकर मुष्टिक नामक राजा अट्टहास पर टूट पड़ा। अट्टहास ने उसे भी छाती में बाण मारकर धराशायी बना दिया ।॥५८॥
मुष्टिक के मारे जाने पर प्रलम्ब नामक राजा ने आगे आकर अट्टहास को बाणों की वर्षा से छा दिवा ॥५९॥
बट्टहास ने उसकी सेना को मारकर और उसके मर्मस्थानों पर प्रहार करके प्रलम्ब को भी रथ पर ही सुला दिया ॥६०॥
तदनन्तर, प्रलम्ब को मरा हुआ देखकर मोहन नामक राजा ने, सामने आकर अट्टहास को बाणों की वर्षा से छा दिया ॥६१॥
बट्टहास ने, धनुष काटकर और सारथी को मारकर दृढ प्रहारों द्वारा मोहन नामक राजा को भी गिरा दिया ।॥६२॥
रण-चतुर अट्टहास द्वारा चार वीरों के मारे जाने पर श्रुत्तशर्मा की सेना विजय मनाती हुई हर्ष से कोलाहल करने लगी ।॥६३॥
यह देखकर हर्ष नामक क्रुद्ध सूर्यप्रभ के मित्र ने अपनी सेना के साथ अट्टहास का सामना किया। अपने बाणों से उसके बाणों को हटाकर दो बाणों से उसके सारथी और तीन से उसके धनुष और ध्वजा को काट दिया ।।६४-६५।।
उसके पश्चात् हर्ष ने बाणों से अट्टहास का सिर काट डाला; जिससे रक्त उगलता हुआ अट्टहास रथ से भूमि पर गिर पड़ा ।।६६।।
अट्टहास के मरते ही ऐसा घमासान युद्ध मचा कि क्षण-भर में ही दोनों ओर की सेना आधी-आधी रह गई ॥६७७।
सारी रणभूमि में हाथी, घोड़े और पैदल सैनिक कटकर मर रहे थे। केवल शिरों से हीन घड़ ही घड़ खड़े दीख रहे थे ॥६८॥
तब अट्टहास की मृत्यु से कुद्ध हुआ विकृतदंष्ट्र नामक विद्याधरराज ने सामने आकर हर्ष को बाणों से घेर लिया ॥६९॥
हर्ष ने भी उसके बाणों का जाल काटकर उसकी ध्वजा और सारची को भी काटा और उसके घोड़ों को मारकर सुन्दर कुंडलवाले उसके शिर को भी काट डाला ॥७०॥
विकृतदंष्ट्र के मारे जाने के कारण चक्रवाल नामक विद्याधर-राजा क्रोध से हर्ष के प्रति दौड़ा ॥७१॥
चक्रवाल ने भी बार-बार हर्ष के धनुष को काटा और दूसरे शस्त्र को उठाने के पहले ही उसने थके हुए हर्ष को मार दिया ॥७२॥
यह देखकर प्रमाय नामक राजा ने चक्रवाल को लड़ाया, किन्तु चक्रवाल ने सामने आये हुए चार मुख्य राजाओं को क्रमशः मार डाला ॥७३-७४।।
जिनके नाम थे, कंकट, विशाल, प्रचंड और अंकुरी। यह देखकर निर्षात नाम का राजा क्रोष से चक्रवाल पर टूट पड़ा ॥७५॥
वे चक्रवाल और निर्धात परस्पर घमासान युद्ध करते हुए रथ, घोड़े, सारथी आदि के मारे जाने पर पैदल ही युद्ध करने लगे ॥७६॥
ढाल और तलवार से युद्ध करते हुए और क्रोष से भिड़े हुए, परस्पर के ही सङ्ग-प्रहार से कटे हुए शिरोंवाले दोनों ही भूमि पर गिर पड़े ॥७७॥
उन दोनों वीरों को गिरे हुए देखकर दोनों ओर की सेनाएँ निराश हो गई, तब विद्याधरों, का राजा कालकंपन रणभूमि में सामने आया ॥७८॥
इधर से प्रकंपन नाम का राजकुमार उसके सामने आया। उसे कालकंपन ने क्षण-भर में ही गिरा दिया ॥७९॥
उसके गिरते ही दूसरे पाँच महारथी मैदान में आये। वे ये जालिक, चंडदत्त, गोपक, सोमिल और पितृशर्मा। सभी ने एक साथ कालकंपन पर बाणों की बौछार की; किन्तु उस काल-कम्पन ने पाँचों को रथहीन कर दिया ॥ ८०-८१॥
और, एक साथ हो पाँच बाणों से पाँचों के कलेजे बींध दिये। इससे खेचर (विद्याषर) तो प्रसन्न हुए और मनुष्य और असुर दुःखी हुए ॥८२॥
तब चार रथ एक साथ उसकी ओर दौड़ पड़े। वे चारों रथों में थे उन्मत्तक, प्रशस्त, विलंबक और धुरंधर। कालकम्पन ने उन चारों को भी सहज में ही मार गिराया। और, उसी प्रकार दौड़कर आये हुए दूसरे छह महारथियों को भी मार डाला ॥८३-८४।॥
तदनन्तर, कालकम्पन ने युद्ध में सामने आये हुए और पाँच महारथियों को भी मार दिया। वे पाँच महारषी थे तेजिक, गेयिक, वेगिल, शाखिल, भद्रंकर और दंडी। इनके साथ बड़ी-बड़ी सेनाएँ भी मारी गई ।॥८५॥
इनके अतिरिक्त युद्ध में आये हुए भीम, भीषण, कुम्भीर, विकट और विलोचन नामक पाँच महारथियों को भी पराशायी कर दिया ॥८६॥
इस प्रकार, कालकंपन द्वारा किये जानेवाले संहार को देखकर सुगण नामक राजपुत्र युद्ध में उसके सामने आया ॥८७॥
वे दोनों परस्पर युद्ध करते हुए सारथी और रथ से विहीन हो गये ।॥८८॥
तब पैदल युद्ध करते हुए कालकम्पन ने सुगण को तलवार से काटकर भूमि पर गिरा दिया ।॥८९॥
इतने में ही मनुष्यों के साथ विद्यावरों के युद्ध को असंभव समझकर, अतएव मानों खिन होकर सूर्य भगवान् अस्ताचल को चले गये ॥९०॥
रक्त-रूपी जल से भरी हुई युद्ध-भूमि ही केवल लाल नहीं हुई, प्रत्युत संग्च्या के कारण आकाश भी लाल हो गया ॥९१॥
तदनन्तर भूत-प्रेत, मृत-कबन्धों¹ के साथ आनन्द-नृत्य करने लगे और दोनों ओर की सेनाएँ भी युद्ध समाप्त करके अपने-अपने शिविरों को लौट गई ॥९२॥
उस दिन के युद्ध में श्रुतशर्मा की सेना के तीन वीर मारे गये और सूर्वप्रभ की सेना के तैतीस वीर काम आये ।।९३।।
इस प्रकार, बन्धुओं, मित्रों और वीर सैनिकों के मारे जाने के कारण सिन्नचित्त सूर्यप्रभ उस रात्रि को रानियों के विना ही रह गया ।॥९४॥
और, निद्रा-रहित होकर युद्ध-सम्बन्धी आवश्यक विश्वार करते हुए उसने रात्रि व्यतीत की ॥९५॥
रानियों द्वारा सूर्यप्रभ की तथा युद्ध की चर्चा
उसी रात में, मृत बन्धुओं के कारण दुःलित और एक दूसरे को आश्वासन देने के लिए आई हुई उसकी पत्नियाँ भी एक स्थान पर आकर मिलीं ॥९६॥
उस शोक मनाने और रोने-बोने के समय में भी वे विभिन्न प्रकार की बातें परस्पर करने लगीं। स्त्रियों का ऐसा कोई भी क्षण नहीं जाता, जिसमें वे अपनी या पराई चर्चा न करें ॥९७॥
इसी प्रकार की चर्चा के प्रसंग में एक राजकुमारी बोली- 'आश्चर्य है कि आज आर्यपुत्र (सूर्यप्रभ) अकेले कैसे सो गये ?' ॥९८॥
यह सुनकर दूसरी ने कहा- 'वुद्ध में अपने प्रिय व्यक्तियों की मृत्यु हो जाने के कारण दुःखित आर्यपुत्र पत्नियों के साथ आमोद-प्रमोद कैसे करते ? ।॥९९॥
यह सुनकर तीसरी बोल उठी 'यदि आज ही उन्हें नवीन सुन्दरी कन्या मिल जाती, तो वे सारे स्वजनों का दुःख भूल जाते' ॥१००॥
तब चौथी ने कहा कि 'यद्यपि आर्यपुत्र स्त्रियों में अधिक आसक्ति रखते हैं, किन्तु ऐसे कष्ट के समय वे ऐसा कार्य कैसे कर सकते हैं?'। वे सब परस्पर जब इस प्रकार की बातें कर रही थीं, तब एक स्त्री ने आश्चर्य के साथ कहा- "यह तो बताओ कि हमारे आर्यपुत्र भला इतने स्त्री-लम्पट क्यों हैं? ॥१०१-१०२॥
बहुत-सी स्त्रियों के रहते हुए भी वे दिन-रात नई-नई स्त्रियों को ही ग्रहण करके सन्तुष्ट होते हैं ॥ १०३॥
यह सुनकर उनमें से एक चतुरा मनोवती नाम की स्त्री बोली- 'सुनो, राजा लोग बहुत पत्नियोंवाले क्यों होते हैं, यह मैं बताती हूँ ॥१०४।।
देश, रूप, अवस्था, चेष्टा, विज्ञान आदि के मेव से अच्छी स्त्रियाँ भिन्न-भिन्न गुणोंवाली होती है। एक ही स्त्री सर्वगुण सम्पन्न नहीं हुबा करती ॥ १०५॥
कर्णाट, लाट, सौराष्ट्र, मध्यदेश आदि की स्त्रियाँ अपनी-अपनी विशेषताओं से पति का मनोरंजन करती हैं ॥१०६॥
कुछ सुन्दरियाँ शरत्कालीन चन्द्रमा के समान मुल से मन हण करती हैं, कुछ सोने के घड़ों के समान उठे और घने स्तनों से चित्त रंजन करती हैं, कुछ स्त्रियाँ काम के सिहासन के समान जघनस्थल से आकर्षण करती है और कुछ दूसरे-दूसरे सौन्दर्य से तथा आकर्षक अंगों से मनोहरण करती हैं। कोई तपे हुए स्वर्ण के समान वर्णवाली होती है, कुछ प्रियंगु पुष्प के समान साँवले वर्ण की होती हैं और कुछ ललाई लिये हुए गौर वर्ण की होती हैं, जो देखते ही मन को मोहित कर लेती हैं ॥ १०७-१०९।।
कुछ नई अवस्था के कारण सुन्दर होती हैं, तो कुछ यौवन के पूर्ण विकसित होने पर मनोरम हो, जाती हैं। कुछ स्त्रियाँ प्रौढता के कारण सरस होती हैं और कुछ अपने हाव-भाव-विलास से अपने सौंदर्य की छटा दिखाती है ।॥ ११०॥
कोई हँसती हुई प्यारी लगती है, तो कोई क्रुद्ध होने पर मनोहरण करती हैं। कोई गज-गामिनी होती है और कोई हंसगामिनी होने के कारण अच्छी लगती हैं ।॥१११॥
कुछस्त्रियाँ मधुर भाषण के अमृत से कानों को सिक्त करती हैं और कोई सहज भू-विलास से देखती हुई अच्छी लगती है ॥११२॥
कोई नाचने में निपुण होती है, तो कोई गाने में कुशल होती है। कोई वाद्य-कला में पारंगत होने के कारण संग्राह्य होती है ॥११३॥
कोई स्त्री बाहरी रति विलास में दक्ष होती है, तो कोई अन्तरंग रति विलास में चतुर होती है। कोई शृंगार करने में निपुण होती है, तो कोई बात करने में चतुर ॥ ११४॥
और, कोई पति के चित्त को वश में करके सौभाग्य प्राप्त करती है। कहाँ तक कहूँ, भिन्न-भिन्न स्त्रियों में भिन्न-भिन्न प्रकार के गुण होते हैं।॥११५॥
इन सब गुणों में से किसी में कोई और किसी में कोई अपना विशिष्ट गुण होता है। किन्तु, तोनों लोकों में भी कोई स्त्री सर्व-गुण-सम्पन्न नहीं मिलती ॥११६॥
इसलिए, भिन्न-भिन्न रसों के आस्वाद लेने के लोभी राजा लोग सदा नई-नई स्त्रियों से विवाह किया करते हैं ।॥११७॥
उच्च कोटि के व्यक्ति दूसरों की स्त्रियों को नहीं चाहते। इसलिए, हमारे आर्यपुत्र (अधिक विवाह करके) दोषी नहीं है और न हमलोगों को इसमें ईर्ष्या ही करनी चाहिए' ॥११८॥
इस प्रकार, मनोवती के कहने पर सूर्वत्रभ को मदनसेना आदि स्त्रियाँ क्रमशः इसी प्रकार की चर्चा करने लगीं ॥११९॥
तदनन्तर, किसी प्रकार की रोक-टोक के विना वे स्त्रिाँ स्वच्छन्द भाव से गुप्त रहस्य की वार्ताएँ भी करने लगी। किसी अवसर से एकत्र हुई और वार्तालाप के रस में निमग्न स्त्रियाँ आपस में ऐसी कौन-सी बात है, जिसे नहीं कह डालतीं ॥१२०॥
अँधेरे के बीतने की प्रतीक्षा करते हुए और शत्रु-दल पर विजय की कामना करते हुए सूर्यप्रभकी वह लम्बी रात्रि क्रमशः समाप्त हुई और उधर बातचीत के रस में निमग्न उसकी पत्नियों की वह लम्बी चर्चा भी क्रमशः समाप्त हो गई ॥१२१॥
महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कयासरित्सागर के सूर्यप्रभ लम्बक का चतुर्थ तरंग समाप्त
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1. शिर से रहिन बड़ मृत कलेबर।
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