5806. || षष्ठ कहानी || सूर्यप्रभ-चरित; गुणशर्मा ब्राह्मण की कथा; गुणशर्मा का जन्म-वृत्तान्त
5806. || षष्ठ कहानी || सूर्यप्रभ-चरित; गुणशर्मा ब्राह्मण की कथा; गुणशर्मा का जन्म-वृत्तान्त षष्ठ तरंग सूर्यप्रभ-चरित तदनन्तर, रात्रि में पत्नियों के विना सोया हुआ और युद्ध के लिए उत्साहित सूर्यप्रभ, शय्या पर लेटे-लेटें अपने मन्त्री वीतमीति से बोला- 'मित्र, मुझे नींद नहीं जा रही है, इसलिए सात्विक वीरता से भरी कोई कहानी सुनाओ ।॥१-२॥ उस वीतमीति ने सूर्यप्रभ की बात सुनकर 'जो आज्ञा' कहकर यह कहानी आरंभ की ॥३॥ गुणशर्मा ब्राह्मण की कथा उज्जयिनी नाम की एक नगरी इस पृथ्वी का श्रृंगारस्वरूप है। वह निर्मल गुणों¹ से गूंथी गई रत्नावली के समान है।।४।। उस नगरी में गुणियों का प्यारा महासेन नाम का एक राजा था। वह कलाओं का प्रधान आधार था और प्रताप में सूर्य तथा शील में चन्द्रमा के समान था ।॥५॥ उस राजा की प्राणों के समान प्यारी अशोकवती नाम की रानी थी, जिसके समान सुन्दरी स्त्री तीनों लोकों में नही थी ॥६॥ उस महारानी के साथ राज्य का शासन करते हुए उस राजा का गुणशर्मा नामक आदरणीय और प्यारा मित्र या ।।७।। वह गुणशर्मा शूर, बीर और अति रूपवान्, वेद-विद्याओं का पारगामी, युवक और कलाबों तथा शस्त्र-विद्या...